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कंपनियों की बिक्री से सरकार का खर्च!

nirmilaभारत सरकार 24 सरकारी कंपनियों को बेचने जा रही है। चालू वित्त वर्ष में उसने एक लाख पांच हजार करोड़ रुपए विनिवेश यानी सरकारी कंपनियों को बेच कर जुटाने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य पूरा नहीं होता दिखा तो मुनाफा कमाने वाली कंपनियों को भी बेचने का फैसला अब लिया गया है। अगले साल विनिवेश का लक्ष्य और बढ़ा होगा तो और कंपनियां बेची जाएंगी। उसके लिए अभी से कंपनियों को ऐसी हालत में लाने का काम चालू हो गया है ताकि उनको अगले साल आसानी से बेचा जा सके।

सरकार जिन कंपनियों को बेचने जा रही है उनमें से तीन कंपनियों का मामला जरा अलग और खास है। इसलिए सबकी नजर इनकी बिक्री पर है। इस बिक्री में सबसे बड़ा सवाल है कि खरीदेगा कौन? इन तीन में से पहली कंपनी भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड, बीपीसीएल है। दूसरी, एयर इंडिया है और तीसरी कंटेनर कारपोरेशन ऑफ इंडिया है। इसके अलावा शिपिंग कारपोरेशन या नार्थ ईस्ट पावर कंपनी भी है। बाकी और भी कई कंपनियां हैं, जिनको सरकार बेच रही है। पर इन कंपनियों के खरीदार को लेकर ज्यादा उत्सुकता है।

सरकार किन्हे बेचेगी कंपनियां?

बी पीसीएल भारत की महारत्न कंपनियों में से एक है। इसकी बाजार पूंजी एक लाख 18 हजार करोड़ रुपए है और पिछले वित्त वर्ष का उसका मुनाफा करीब आठ हजार करोड़ रुपए का है। वित्त वर्ष 2011-12 में करीब एक हजार करोड़ रुपए का मुनाफा कमाने वाली इस कंपनी का मुनाफा हर साल बढ़ता गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम कम होने और भारत में दाम में उस अनुपात में कमी नहीं करने की वजह से सभी तेल कंपनियों का मुनाफा कई गुना बढ़ा। साथ ही इन कंपनियों की बाजार पूंजी भी बढ़ती गई। पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाले कर, उपकर और सरचार्ज से सरकार ने कितने लाख करोड़ रुपए कमाए और उनका क्या कर दिया, जो इन कंपनियों को बेचने की नौबत आ गई, वह एक अलग मसला है।

करीब 43 साल पहले भारत सरकार ने बर्मा शेल कंपनी का अधिग्रहण किया था, जिसका नाम बीपीसीएल रखा गया। सरकार ने इसे कुल 28 करोड़ रुपए में खरीदा था। संसद के एक कानून के जरिए इसका अधिग्रहण किया गया। तभी इसे बेचने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी थी। पर केंद्र की सरकार ने पिछले सत्र में एक कानून के जरिए वह अनिवार्यता खत्म कर दी। यानी अब इस कंपनी को बेचने के लिए सरकार को संसद में जाने की जरूरत नहीं है। अपने कार्यकारी आदेश से सरकार इसकी बिक्री कर सकती है। तभी वित्त मंत्री ने पूरे शान से ऐलान किया कि सरकार बीपीसीएल को मार्च तक बेच देगी। यह ऐलान ऐसा था, जैसे यह सरकार की बड़ी उपलब्धि हो।

अब जबकि इस कंपनी को बेचने के लिए सरकार को संसद के पास नहीं जाना है तो इसे बेचना और बिक्री की शर्तें आदि तय करना सरकार के लिए बहुत आसान है। सो, सरकार ने पहली शर्त यह तय कर दी है कि इंडियन ऑयल कारपोरेशन सहित कोई भी सरकारी कंपनी इसके लिए बोली नहीं लगा सकेगी। यानी आठ हजार करोड़ रुपए का मुनाफा कमाने वाली, एक लाख 18 हजार करोड़ रुपए की पूंजी वाली और देश में आने वाले कुल 14 फीसदी कच्चे तेल को रिफाइन करने की क्षमता वाली कंपनी को अनिवार्य रूप से कोई निजी कंपनी ही खरीदेगी। तभी सवाल है कि वह निजी कंपनी कौन सी होगी? क्या दुनिया की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में से एक सऊदी अरब की कंपनी आरामको इसके लिए बोली लगाएगी? ध्यान रहे आरामको मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस में हिस्सेदारी खरीदने जा रही है और महाराष्ट्र में बनने वाली सबसे बड़ी रिफाइनरी में पार्टनर भी बनने जा रही है। सो, संभव है कि वह इसकी खरीद में शामिल हो। क्योंकि रिलायंस के अलावा किसी दूसरी निजी कंपनी के पास बीपीसीएल को खरीदने के पैसे नहीं हैं। न ही भारतीय बैंकों के पास इतना पैसा है कि वे किसी ऐसी वैसी कंपनी को कर्ज दे दें। ध्यान रहे बीपीसीएल की खरीद पर सरकार को 63 हजार करोड़ रुपए मिलेंगे और खरीदार का कुल खर्च 90 हजार करोड़ के करीब आएगा।

इसी तरह यह बड़ा सवाल है कि एयर इंडिया कौन खरीदेगा? सरकार ने इसकी बिक्री भी आसान कर दी है। पिछली बार इसका कोई खरीदार नहीं मिला था। सो, सरकार ने एयर इंडिया को संचालन खर्च के लिए दिए गए करीब 50 हजार करोड़ रुपए के कर्ज को बिक्री से अलग कर दिया है। यानी जो इसे खरीदेगा उसे संचालन खर्च के लिए लिया गया कर्ज वापस नहीं करना होगा। बैंकों के उस कर्ज का भुगतान कैसे होगा, यह भगवान जाने। पर अब खरीदार को सिर्फ वहीं कर्ज चुकाना होगा, जो एयर इंडिया विमान खरीदने या उसकी लीज के लिए लिया है। यह कर्ज करीब 15 हजार करोड़ रुपए का है। सोचें, खरीदार के लिए सरकार ने कितनी बड़ी राहत दी है! इस बार एयर इंडिया की कुछ अचल संपत्ति भी बिक्री के लिए लगाई जा सकती है। सो, सवाल है कि खरीदार कौन है? महाराजा के नाम से मशहूर एयर इंडिया क्या टाटा समूह के पास जाएगा या स्पाइस जेट को दिया जाएगा? दोनों सरकार के करीब हैं और दोनों विमानन के क्षेत्र में हैं। पिछले दिनों जेट एयरलाइंस के दिवालिया होकर बंद होने का सबसे बड़ा फायदा स्पाइस जेट को हुआ या कराया गया है।

तीसरी कंपनी शिपिंग कारपोरेशन ऑफ इंडिया और कंटेनर कारपोरेशन ऑफ इंडिया हैं। ये दोनों भी मुनाफा कमाने वाली कंपनियां हैं और पिछले वित्त वर्ष में दोनों का मुनाफा दो-दो सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का था। कंटेनर कारपोरेशन ग्लोबल लॉस्जिस्टिक की सबसे बड़ी कंपनी है। इसकी बिक्री से सरकार को 10 हजार आठ सौ करोड़ रुपए मिलने हैं। ये दोनों कंपनियां किसी एक आदमी को मिलेंगी या अलग अलग कंपनी इसे खरीदेगी? शिपिंग और पोर्ट के कारोबार में सबसे तेजी से बढ़ रही कंपनी अदाणी समूह की है। सो, यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या शिपिंग और कंटेनर कारपोरेशन दोनों उस समूह को जा सकते हैं? जो हो सरकार ने यह तय कर लिया है कि वह मुनाफे वाली कंपनियों को बेचेगी और अपने हिसाब से बेचेगी, इसमें संसद या किसी और का दखल नहीं होगा। सो, यह तय है कि खरीदार भी सरकार की पसंद का ही होगा।

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