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देश की संपत्ति पर एक प्रतिशत अमीरों का कब्जा

rich-in-indiaयह चिंता का विषय है कि भारत में आर्थिक असमानता बढ़ती ही जा रही है। गरीबी उन्मूलन पर काम करने वाली संस्था ‘ऑक्सफैम’ की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते साल भारत में जितनी संपत्ति पैदा हुई, उसका 73 प्रतिशत हिस्सा देश के 1 फीसदी धनाढ्य लोगों के हाथों में चला गया, जबकि नीचे के 67 करोड़ भारतीयों को इस संपत्ति के सिर्फ एक फीसदी यानी सौवें हिस्से से संतोष करना पड़ा है। 2016 के इसी सर्वे के अनुसार, भारत के 1 फीसदी सबसे अमीर लोगों के पास देश की 58 फीसदी संपत्ति थी। हमारे यहां इतनी तेज बढ़ती असमानता दुनिया के नामी अर्थशास्त्रियों को भी चकित किए हुए है। दावोस में वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम का सालाना सम्मेलन शुरू होने के कुछ ही घंटों पहले जारी इस रिपोर्ट के अनुसार बाकी दुनिया का हाल भी अच्छा नहीं है।

पिछले साल दुनिया की संपत्ति में हुए कुल इजाफे का 82 प्रतिशत हिस्सा महज एक प्रतिशत अमीर आबादी के हाथ लगा, जबकि 3.7 अरब लोगों की संपत्ति में कोई वृद्धि नहीं हुई। ऑक्सफैम के सालाना सर्वे को लेकर दुनिया भर में उत्सुकता रहती है और इस पर वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के सम्मेलन में चर्चा भी होती है। आय असमानता की बढ़ती खाई और लैंगिक असमानता जैसे मुद्दे भी सम्मेलन के अजेंडा में शामिल रहते हैं। अगर यह सम्मेलन आर्थिक असमानता कम करने का कोई सूत्र ढूंढ सके तो इसे जरूर सार्थक समझा जाएगा, वरना सुपर-अमीरों की पिकनिक तो इसे कहा ही जाता है। आर्थिक असमानता के चलते आज हर जगह आम जनता में भारी आक्रोश है, जिसकी अभिव्यक्ति अराजकता और हिंसक प्रदर्शनों में हो रही है। अमीरों के पास संपत्ति इकट्ठा होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि इस संपत्ति का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक होकर अर्थतंत्र से बाहर हो जाता है। उनका उपभोग न तो उत्पादन में कोई योगदान करता है, न ही उससे विकास दर को गति मिल पाती है।

करोड़ों की गाड़ियां, लाखों की घड़ियां और पेन, बिटकॉइन जैसी आभासी मुद्रा में लगा हुआ पैसा क्या किसी पिछड़े देश में कोई रोजगार पैदा करता है? ऑक्सफैम की रपट को एक अर्थ में उदारीकरण और भूमंडलीकरण पर की गई टिप्पणी भी माना जा सकता है। दुनिया में पूंजी के अबाध प्रवाह के बावजूद फायदा उन्हीं के हिस्से गया, जो पहले से समृद्ध थे। नई व्यवस्था में सरकारों का रोल घट जाने से राजनीति भी गरीबों के पक्ष में नीतियां बनाने के बजाय उन्हें भरमाने पर केंद्रित हो गई है। मनरेगा जैसी कुछ गरीब समर्थक नीतियां बनीं भी तो उनका जोर कमजोर वर्ग को उत्पादन प्रक्रिया का हिस्सा बनाने की बजाय उन्हें किसी तरह जीवित रखने पर रहा। बहरहाल, असमानता के मुद्दे को टालते जाने की भी सीमा है। कहीं ऐसा न हो कि दुनिया ऐसी अराजकता की शिकार हो जाए, जिससे उबरने की कल्पना भी मुश्किल लगने लगे।

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