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बजट सत्र साल 2000 के बाद सबसे कम उत्पादक रहा

BJP_Parliament_congressनई दिल्ली। संसद के बजट सत्र का शुक्रवार को समापन हो गया। सत्र का दूसरा चरण पूरी तरह हंगामे की भेंट चढ़ गया। सरकार व विपक्ष के बीच गतिरोध लगातार कायम रहा। सत्तापक्ष को अच्छा बहाना मिला, विपक्ष एक पखवाड़े बाद भी अविश्वास प्रस्ताव ला न सका। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने विभिन्न विपक्षी पार्टियों द्वारा पटल पर रखे गए अविश्वास प्रस्ताव को नहीं लिया। उन्होंने सदन में व्यवधान का हवाला दिया और कहा कि वह व्यवधान की वजह से प्रस्ताव का समर्थन करने वाले सदस्यों की गणना करने में सक्षम नहीं हैं। अविश्वास प्रस्ताव के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। नियम में यह भी कहा गया है एक बार अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने के बाद अध्यक्ष को सभी दूसरे कामकाज निलंबित करने होते हैं और प्रस्ताव को सदन पटल पर लाना होता है। संसद में गतिरोध को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का खेल जारी रहा। इस दौरान बजट, अनुदान मांगों व वित्त विधेयक को कुछ मिनटों में बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया गया। बजट सत्र का पहला चरण (29 जनवरी से 9 फरवरी तक) उत्पादक रहा, जबकि 5 मार्च से दूसरे चरण में अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके), तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) व वाईएसआर कांग्रेस के सदस्यों के सदन में नारेबाजी, तख्तियां दिखाने व हंगामे के बीच लोकसभा व राज्यसभा को बार-बार स्थगित करना पड़ा। शुरुआत में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस व वाम पार्टियों के बैंक धोखाधड़ी, एससी/एसटी अधिनियम के प्रावधानों को हल्का करने, कृषि संकट जैसे मुद्दों को लेकर उनकी मांगों के बीच समानता रही, जबकि टीडीपी व वाईएसआर कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश के लिए विशेष दर्जा की मांग को लेकर दबाव बनाया व अन्नाद्रमुक सदस्यों ने कावेरी प्रबंधन बोर्ड बनाने की मांग की। करोड़ों रुपये के बैंकिंग धोखाधड़ी की चर्चा संसद में जिस नियम के तहत होनी थी, वही सरकार व विपक्ष के बीच गतिरोध का कारण था। पीआरएस के अनुसार, बजट सत्र साल 2000 के बाद सबसे कम उत्पादक रहा है। पीआरएस संसद के कामकाज को ट्रैक करता है। संसद के दोनों सदनों ने 2000 के बाद से सबसे कम समय चर्चा पर खर्च किया। इस सत्र में साल 2014 के बाद से सार्वजनिक महत्व के मुद्दों पर सबसे कम संख्या में चर्चा हुई और यह लोकसभा के प्रश्नकाल का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। लोकसभा में विधायी कामकाज पर सिर्फ एक फीसदी व राज्यसभा में छह फीसदी उत्पादक समय खर्च किया गया। पीआरएस विधायी शोध के कार्यक्रम अधिकारी तृणा राय ने आईएएनएस से कहा, बार-बार व्यवधान के कारण लोकसभा ने अपने तय समय का सिर्फ 22 फीसदी कार्य किया और राज्यसभा ने 27 फीसदी कार्य किया। संसद अपने संवैधानिक दायित्व का पालन करने में सक्षम नहीं रही जो चिंता का विषय है। जैसा कि हमेशा से होता आया है, गतिरोध के लिए विपक्ष व सरकार ने एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन व राज्यसभा के सभापति एम. वेकैंया नायडू ने व्यवधान को लेकर अपनी गंभीर चिंता जताई। सत्र के समापन पर अपनी टिप्पणी में सभापति नायडू ने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि राज्यसभा में जो कामकाज हुआ, उसके बारे में उनके पास बताने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन राज्यसभा में जो नहीं हो पाया, उसके बारे में बताने को बहुत कुछ है। इस सत्र में भारतीय जनता पार्टी राज्यसभा में भी सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी और कई नए सदस्यों ने शपथ ली। राज्यसभा के उप सभापति पी.जे. कुरियन जुलाई में सेवानिवृत्त हो रहे हैं, अगले सत्र में इस पद के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन व विपक्ष के बीच प्रतिस्पर्धा हो सकती है।

राज्यसभा के गत 29 जनवरी से शुरु हुए बजट सत्र की कार्यवाही शुक्रवार को अनिश्चितकाल के लिये स्थगित कर दी गई. हंगामे की भेंट चढ़ गये बजट सत्र के दूसरे चरण का हवाला देते हुये सभापति एम वेंकैया नायडू ने गतिरोध पर पीड़ा व्यक्त की और सदस्यों से सदन में बैनर, पोस्टर आदि लाने और नारेबाजी से बचने का आह्वान किया.

नायडू ने इस सत्र के दूसरे चरण में एक भी दिन विधायी कार्य नहीं हो पाने पर खेद व्यक्त करते हुये कहा कि लोगों की चिंताओं और उनकी वास्तविक अपेक्षाओं को पूरा करने में हमारा योगदान नगण्य रहा. बजट सत्र के आज अंतिम दिन अपने पारंपरिक संबोधन के बाद नायडू ने सदस्यों से सदन में तख्ती, बैनर लाने और नारेबाजी करने से भविष्य में बचने का अनुरोध किया. उन्होंने संसदीय परंपराओं का हवाला देते हुए कहा कि सदन में हंगामा कर विधायी कार्य नहीं होने देना उचित नहीं है. पीएनबी घोटाला मामले, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग तथा कावेरी जल विवाद सहित विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष के हंगामे के कारण पांच मार्च से शुरु हुए बजट सत्र के दूसरे चरण में लगातार गतिरोध बना रहा. इसके कारण सरकारी विधेयक तो क्या बजट के महत्वपूर्ण अंग, वित्त विधेयक पर भी उच्च सदन में चर्चा नहीं हो सकी.

सभापति ने सत्र को अनिश्चितकाल के लिये स्थगित करने से पूर्व अपने पारंपरिक संबोधन में कहा कि गतिरोध के कारण सदन के बहुमूल्य 120 घंटे बर्बाद हो गए जबकि मात्र 45 घंटे कामकाज हुआ. नायडू ने कहा कि ग्रेच्युटी भुगतान संशोधन विधेयक को बिना चर्चा के पारित करने के अलावा सदन में कोई विधायी कार्य नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून के बारे में एक फैसला सुनाया था, इसके परिणामस्वरूप देश में उभरी जनधारणा के चलते आंदोलन हुए और देश के कुछ हिस्सों में हिंसा भी हुई. उन्होंने सदस्यों से कहा ‘‘आप ने इस पर भी चर्चा नहीं की.’’ नायडू ने कहा ‘‘मैं इस बात पर गौर करके दुखी हूं कि इस महत्वपूर्ण संसदीय संस्थान और इसकी जिम्मेदारियों के जनादेश के प्रति असम्मान और गंवाये गये अवसरों के कारण यह सत्र व्यर्थ चला गया.’’

नायडू ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रबंधन एवं निगरानी में स्पष्ट कमजोरी के बारे में भी चर्चा नहीं हो सकी जिसके कारण देश में व्यापक स्तर पर चिंता व्याप्त है. सभापति ने कहा ‘‘आपके पास दूसरी प्राथमिकताएं है और इस पर चर्चा का समय नहीं था.’’ उन्होंने कहा कि तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश के सदस्य अपने राज्यों से जुड़े कुछ मुद्दों को लेकर उद्वेलित थे, हालांकि इन मुद्दों पर भी चर्चा नहीं हो सकी. उल्लेखनीय है कि बजट सत्र की शुरुआत 29 जनवरी को संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण के साथ हुई थी. कोविंद ने राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार संसद के केन्द्रीय कक्ष में दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित किया था.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक फरवरी को वित्तीय वर्ष 2018-19 का आम बजट पेश किया था. इसमें रेल बजट भी शामिल था. बजट सत्र का पहला चरण नौ फरवरी को पूरा हुआ था. दूसरा चरण पांच मार्च को शुरू हुआ. दूसरे चरण के दौरान उच्च सदन में 60 सदस्यों का कार्यकाल पूरा हुआ और उन्हें सदन में विदाई दी गई. इनमें सचिन तेंदुलकर एवं रेखा सहित चार मनोनीत सदस्य भी शामिल हैं. सत्र के दौरान 17 राज्यों एवं दिल्ली से 60 सदस्य निर्वाचित या पुनर्निर्वाचित होकर आए. इनमें केन्द्रीय मंत्री जेटली, रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, धर्मेन्द्र प्रधान और थावरचंद गहलोत, सपा की जया बच्चन, राकांपा की वंदना चह्वाण सहित कई सदस्य पुनर्निर्वाचित होकर उच्च सदन में आए हैं. आम आदमी पार्टी ने पहली बार उच्च सदन में दस्तक दी तथा दिल्ली से निर्वाचित इसके तीन सदस्यों ने सदन की सदस्यता ग्रहण की.

सत्र के दूसरे चरण में पीएनबी बैंक घोटाला, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग तथा कावेरी जल विवाद सहित विभिन्न मुद्दों पर विपक्षी दलों के सदस्य बार बार आसन के समक्ष आकर नारेबाजी करते रहे. हंगामे के कारण एक भी दिन प्रश्नकाल और शून्यकाल नहीं चल सका. सत्र के दौरान भ्रष्टाचार निवारण संशोधन विधेयक चर्चा और पारित करने के लिये सदन के पटल पर रख भी दिया गया किंतु विपक्ष के हंगामे के कारण इस पर मतविभाजन नहीं होने से सरकार इसे पारित कराने में नाकाम रही. इस विधेयक पर सदन की प्रवर समिति पहले ही अपनी रिपोर्ट पेश कर चुकी थी. इस दौरान आसन से सदस्यों के कार्यवाही की प्रक्रिया संबंधी नियम 255 के तहत दो सदस्यों के वी पी रामचंद्र राव और सी एम रमेश को आसन के प्राधिकार का अनादर करने के कारण सदन से बाहर जाने का निर्देश दिया गया.

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