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खिलाफत आंदोलन के 100 साल

[डॉ. श्रीरंग गोडबोले]। यह एक गलतफहमी है कि असहयोग और खिलाफत आंदोलन एक साथ शुरू किये गए या फिर असहयोग के बाद खिलाफत आरम्भ हुआ। इस godboleyphotograph-1-1-216x300विषय पर कुशाग्र बुद्धि के स्वामी डॉ. अंबेडकर लिखते हैं कि श्री गाँधी खिलाफत के लिए न केवल मुसलमानों से सहमत थे, बल्कि इस काम में उनके मार्गदर्शक और मित्र भी बन गये। खिलाफत आन्दोलन में श्री गांधी ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इससे अधिकतर लोग मानने लगे कि कांग्रेस ने ही स्वराज पाने प्राप्ति के लिए असहयोग आन्दोलन शुरू किया। यह विचार सब जगह घर कर गया था। सच्चाई यह है कि असहयोग आन्दोलन का उद्गम खिलाफत आन्दोलन से हुआ था, न कि स्वराज के लिए कांग्रेस के आंदोलन के रूप में। इसे खिलाफतवादियों ने तुर्की की मदद के लिए शुरू किया था और कांग्रेस ने केवल खिलाफतवादियों की मदद करने के लिए इसे अपनाया था। इसका मूल उद्देश्य स्वराज नहीं, बल्कि खिलाफत था। स्वराज का गौण उद्देश्य बनाकर उससे जोड़ दिया गया था, ताकि हिन्दू भी उसमे भाग लें और यह बात नीचे दिए गए तथ्यों से स्पष्ट होती है।खिलाफत आंदोलन की शुरुआत 27 अक्टूबर 1919 को हुई समझी जा सकती है, क्योंकि इसी दिन देश भर में खिलाफत सम्मलेन हुआ। इस अधिवेशन में मुसलमानों ने इस बात की संभावना पर विचार किया कि क्या असहयोग करके अंग्रेज सरकार को खिलाफत की गलती दूर करने के लिए विवश किया जा सकता है। 10 मार्च 1920 को कलकत्ता में खिलाफत सम्मलेन हुआ और उसमे यह फैसला कर लिया गया कि आन्दोलन के लक्ष्य को आगे बढाने के लिए असहयोग सर्वोत्तम हथियार हो सकता है।

9 जून 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत सम्मलेन हुआ और वहां असहयोग का सहारा लेने पर सर्वसम्मति बनी। 22 जून 1920 को मुस्लिमों ने वायसराय को सन्देश भेजा कि यदि एक अगस्त 1920 से पूर्व तुर्क लोगों की शिकायतें दूर न की गईं तो वे असहयोग आन्दोलन शुरू करेंगे। 30 जून 1920 को इलाहाबाद में खिलाफत कमेटी की बैठक हुई, जिसमें तय हुआ कि वायसराय को एक महीने का नोटिस देकर असहयोग आन्दोलन शुरू किया जाए। 1 जुलाई 1920 को नोटिस दिया गया और 1 अगस्त 1920 से असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ। इस संक्षिप्त विवरण से पता चलता है कि असहयोग आन्दोलन, खिलाफत कमेटी द्वारा शुरू किया गया था। इसकी शुरूआत खिलाफत सम्मलेन से हो चुकी थी। यह स्वराज के लिए नहीं, बल्कि खिलाफत आन्दोलन में मुसलमानों की सहायता के लिए था।

असहयोग की खिलाफतवादी योजना

28, 29 फरवरी 1920 को, मौलाना आजाद ने कलकत्ता में खिलाफत कांफ्रेंस की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि शरीयत के अनुसार किसी भी मुस्लिम का गैर-मुस्लिम शत्रुओं के साथ सहयोग पाप है। उन्होंने बड़ी चतुराई से इस श्रेणी से हिंदुओं को बाहर रखा था। उन्होंने असहयोग को इस्लामी ‘तर्क-ए-मवालत’ (सामाजिक बहिष्कार) के रूप में परिभाषित किया और इसे मुसलमानों के लिए अनुशंसित किया, क्योंकि उनके लिए यही एकमात्र उपाय बचा था। 11 मई 1920 को जिस शांति की शर्तों की घोषणा की गई, उन्हें तुर्की की स्वतंत्रता को नष्ट करने और उसके साम्राज्य को छीनने वाला बताया गया। खिलाफतवादियों ने कांग्रेस के हिंदू नेताओं का समर्थन प्राप्त करने के लिए, गांधी के परामर्श से सेंट्रल खिलाफत कमेटी की एक विशेष बैठक की। हिंदू-मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी में ये बैठक जून 1920 के पहले सप्ताह में इलाहाबाद में हुई। इसमें, असहयोग की परिकल्पना चार चरणों में की गई :

1. उपाधियों और मानद पदों का त्याग

2. सरकार की सिविल सेवाओं में पदों का त्याग, इससे पुलिस को बाहर रखा जाना

3. पुलिस और सेना में सेवा का इस्तीफा

4. करों के भुगतान करने से इनकार करना

खिलाफत की तेज आवाजें

गांधी ने दिसंबर 1919 में खिलाफत मुद्दे पर सरकार द्वारा घोषित शांति समारोह के बहिष्कार की वकालत की। वह पंजाब के मुद्दे (जलियांवाला बाग हत्याकांड और मार्शल लॉ) को बहिष्कार के कारणों में जोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। खिलाफत कांफ्रेंस की हिंदू-मुस्लिम संयुक्त बैठक (24 नवंबर 1919) को संबोधित करते हुए गांधी ने कहा, “व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि पंजाब के लोगों की जो भी पीडाएं हों, हम एक स्थानीय मुद्दे पर खुद को इस समारोह से अलग नहीं कर सकते हैं, जो कि संपूर्ण साम्राज्य से जुड़ा हुआ है। इसके लिए खिलाफत ही वह मुद्दा है, जिस पर हम शांति समारोह में शामिल होने से इंकार कर सकते हैं।” हालाँकि, खिलाफतवादियों ने पंजाब मुद्दे का फायदा उठाना शुरू कर दिया, क्योंकि इसने व्यापक जन असंतोष को उभारा था। गांधी ने भी अब खिलाफत के साथ पंजाब के मुद्दे को एक चारे के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया, ताकि हिंदुओं को असहयोग आंदोलन के प्रति आकर्षित किया जा सके। पारंपरिक और संवैधानिक रास्तों से कांग्रेस का हटना, एक बड़ा मुद्दा माना गया जिसके लिए कोलकाता में 4-9 सितंबर 1920 को कांग्रेस का एक विशेष सम्मलेन हुआ।

शत्रुतापूर्ण हिंदू नेतृत्व

असहयोग आंदोलन के प्रति कई हिंदू नेताओं के धुर विरोध ने खिलाफतवादियों को चिंतित कर दिया। मुस्लिम नेता एक भारतीय राष्ट्र के निर्माण हेतु हिंदुओं के साथ अपने मतभेद समाप्त करने के इच्छुक नहीं थे। गांधी एक खिलाफतवादी रूप में खिलाफत फंड के व्यय पर देश का दौरा कर रहे थे। इसका अन्य हिंदू नेताओं ने विरोध किया। उन्हें लगता था कि यह सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा संचालित आंदोलन था। उदारवादियों ने इसे अपनी अवधारणा में विचित्र और पूरी तरह से अव्यावहारिक पाया। श्रीमती एनी बेसेंट (1847-1933) जो भारत में थियोसोफी एवं होम रूल लीग की अगुआ थीं, ने इसे ‘राष्ट्रीय आत्महत्या’ बताया। सर पीएस सिवास्वामी अय्यर (1864-1946) जो मद्रास प्रेसीडेंसी के एडवोकेट-जनरल रहे, ने इसे देश के लिए आपदा से भरा अभियान माना। वीएस श्रीनिवास शास्त्री ने इसे अतार्किक और हानिकारक बताया। साथ ही अप्रैल 1920 में भविष्यवाणी की कि शीघ्र ही आंदोलन हिंसक हो जाएगा। मद्रास प्रेसीडेंसी के ही एडवोकेट जनरल रहे श्रीनिवास अयंगर ने इस आन्दोलन के तीसरे और चौथे चरण को ‘निश्चित रूप से अवैध और असंवैधानिक’ करार दिया। ऐसे ही विचार पंडित मदन मोहन मालवीय ने व्यक्त किये। कांग्रेस के संस्थापक सदस्य सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने भी इस संबंध में अपना सार्वजनिक अस्वीकरण जारी किया।कांग्रेस के ‘अतिवादी’ इस विषय पर एकमत नहीं थे। हालांकि यह सार्वजनिक रूप से माना जा रहा था कि तिलक, खिलाफत आंदोलन के साथ नहीं थे। परन्तु तिलक द्वारा 1920 में कांग्रेस के भीतर स्थापित डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी के मेनिफेस्टो के अनुसार “यह पार्टी खिलाफत से जुडी समस्या के मुस्लिम मान्यताओं और कुरान के सिद्धांतों के अनुरूप समाधान के लिए मुस्लिमों के दावे का समर्थन करती थी। मोतीलाल नेहरू हिंसा फैलने से चिंतित थे। सीआर दास, बीसी पाल, जीएस खापर्डे, एनसी केलकर, विट्ठलभाई पटेल जैसे अन्य नेता भी इससे सशंकित थे। गांधी और खिलाफतवादियों दोनों के लिए कलकत्ता में कांग्रेस का विशेष सत्र महत्वपूर्ण था।

स्वराज से पहले खिलाफत

हिंदुओं को अपनी ताकत दिखाने के लिए खिलाफतवादियों ने कांग्रेस से असहयोग पर चर्चा करने से पहले अपना सम्मेलन (5 सितंबर 1919) आयोजित किया। खिलाफत कांफ्रेंस ने सर्वसम्मति से पुष्टि की कि असहयोग एक अत्यंत बाध्यकारी धार्मिक दायित्व था। शौकत अली और अन्य खिलाफतवादियों के अत्यधिक दबाव के कारण मुस्लिम लीग ने भी सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी का अनुसरण करने का निर्णय लिया। हालाँकि जिन्ना ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी। “श्री गांधी का तात्कालिक उद्देश्य कांग्रेस के विशेष सत्र को उनके पंथ में परिवर्तित करना था, लेकिन श्री गांधी ने इस हेतु सूक्ष्मता के साथ तैयारियाँ की थीं। बॉम्बे और मद्रास से खिलाफत स्पेशल ट्रेनों से कांग्रेस के प्रतिनिधियों को भरकर लाया गया, जिन्हें पक्ष में वोट देने के लिए शपथ दिलाई गई थी। राष्ट्रवादियों ने शिकायत की कि खिलाफतवादियों ने सभागार को बंद कर दिया था और बहुमत के साथ छेड़छाड़ की थी।” असहयोग समिति में असहयोग के प्रस्ताव पर तीन दिनों तक बहस चली, जिसे 132 के मुकाबले 144 वोट से संकीर्ण बहुमत से स्वीकार किया गया था। मुस्लिम प्रभुत्व ने असहयोग के पक्ष में पलड़ा झुका दिया था।

अप्रैल 1920 में सेंट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा लाये गए असहयोग प्रस्तावों की तुलना (जो कि गांधी द्वारा तैयार किए गए थे) यदि सितंबर 1920 में कांग्रेस के विशेष सत्र द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव से करें, तो पता चलता है कि खिलाफतवादी, कांग्रेस से कहीं आगे जाने के लिए तैयार थे। लगभग एक साल बाद, जब असहयोग आंदोलन मुसलमानों की शिकायतों का निवारण करने में विफल रहा तो गांधी ने लिखा कि “अपने धीरतापूर्ण गुस्से के कारण मुसलमानों ने कांग्रेस और खिलाफत संगठनों से अधिक जोरदार और तत्काल कदम उठाने की मांग करनी शुरू कर दी।

कट्टर इस्लामी शिकंजा

सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने अपनी प्रचार समिति द्वारा प्रशिक्षित वेतनभोगी व्याख्याताओं को नियुक्त किया, साथ ही साथ प्रचार प्रसार करने के लिए गुप्त कार्यकर्ताओं और दूतों को नियुक्त किया। हर शाम, मुस्लिम स्वयंसेवकों ने बड़े शहरों की गलियों में ड्रिल और परेड की। खाकी कपड़ों में चाकू और भाले से लैस खिलाफत कार्यकर्ताओं ने खिलाफत की मांगों के समर्थन में राजनीतिक बैठकें कीं और असहयोग ने हिंसा का समर्थन करने वाले आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। ‘इस्लाम खतरे में’ या ‘क्रिश्चियन ताकतों का छल’ जैसे अपने पुराने विषय का उपयोग कर, पैम्फलेट्स, कविताओं और वाद विवाद के द्वारा लोगों की भावनाओं को भड़काया गया। धनराशि की मांग के लिए प्रत्यक्ष अपील के अलावा, सेंट्रल खिलाफत कमेटी ने ‘कागजी मुद्रा’ जारी की, जो एक रुपये की रसीदों के रूप में थे, जो आकार और प्रकार में एक-एक रुपये के नोट से मिलती-जुलती थी। इसमें उर्दू में कुरान के उद्धरणों की छपाई की गई थी।

उलेमा ने धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ असहयोग का इस्तेमाल करने की भी इच्छा व्यक्त की; जिसमे विधायी निकायों को उलेमाओं की समिति द्वारा, “विधर्मी” न्यायालयों को शरिया अदालतों और सरकारी स्कूलों को दारुल उलूम द्वारा प्रतिस्थापित किया जाना था। जमीयत-उल-उलमा-ए-हिंद ने कुरान और पैगंबर के कथनों पर आधारित एक सामूहिक फतवा जारी किया, जो असहयोग आंदोलन की मांगों का समर्थन करता था। मार्च 1921 को, जमीयत-उल-उलमा ने बरेली में यह निर्धारित किया कि असहयोग के विरोधियों को धार्मिक न्यायाधिकरणों के माध्यम से दंडित किया जाए। खिलाफतवादियों ने कांग्रेस की विशाल मशीनरी और उसके सभी फंडों पर कब्जा कर लिया, जिसमें तिलक स्वराज फंड भी शामिल था। इसमें कुल एक करोड़ पाँच लाख रूपये थे। खिलाफत फंड के ब्योरों और ऑडिट की मांग मार्च 1920 से बढ़ रही थी, लेकिन जुलाई 1920 तक कुछ भी नहीं हुआ। कई लोग यूरोप में खिलाफत प्रतिनिधिमंडल के भव्य खर्च से हैरान थे।

अमीर को आमन्त्रण

1921 की गर्मियों में खिलाफत के कुछ नेताओं के भाषणों का स्वर पहले की तुलना में अधिक हिंसक हो गया। मुत्तफिक़ फतवे की प्रतियाँ, जिसमें सेना की सेवा को हराम घोषित किया गया था, फरवरी से मई 1921 तक गुप्त रूप से वितरित की गई थीं। इस प्रतिबंधित फतवे को भारतीय सेना की कई इकाइयों के बीच पर्चे के रूप में वितरित किया गया। सैनिकों को रिश्वत देने के लिए खिलाफत फंड में से बड़ी धनराशि का उपयोग किया जा रहा था। 1920-21 में अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने की साजिश रची थी। 18 अप्रैल 1921 को मुहम्मद अली ने मद्रास में ‘भारत पर अफगान आक्रमण की स्थिति में भारतीय मुसलमानों के कर्तव्यों’ के विषय पर भाषण दिया। उन्होंने कहा कि अगर अमीर ने भारत को अधीन बनाने के लिए आक्रमण किया तो मुस्लिमों को इस हमले का विरोध करना चाहिए। अगर उसका उद्देश्य इस्लाम और खलीफा के उत्पीड़कों को हराने के लिए था, तो यह भारतीय मुस्लिमों का कर्तव्य होगा कि वे भारत सरकार से सभी सहयोग वापस ले लें और यहां तक कि अफगानों के साथ मिलकर इस्लाम की लड़ाई लड़ें। इस विचार के कारण हिंदुओं में बेचैनी बढ़ गई। गांधी ने यंग इंडिया में लिखा: “मैं एक तरह से अफगानिस्तान के अमीर की मदद जरूर करूंगा, अगर उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। मैं खुलकर अपने देशवासियों से कहूंगा कि एक ऐसी सरकार की सहायता करना अपराध होगा, जिसने सत्ता में बने रहने हेतु राष्ट्र का विश्वास खो दिया है”।

यू.पी. के गवर्नर बटलर ने वायसराय लॉर्ड रीडिंग को दिए एक नोट (12 जनवरी 1922) में यह निष्कर्ष निकाला था कि “इसमें कोई शक नहीं है कि मुस्लमान उपद्रवी तत्व हत्या और किसी भी तरह की हिंसा के लिए तत्पर हैं।” कई स्थानों पर अवज्ञा की भावना भीड़ और पुलिस के बीच मुठभेड़ में परिवर्तित हो गई। विशेष रूप से यूपी और बंगाल में पुलिस स्टेशन और अन्य सरकारी इमारतें हमले के विशेष लक्ष्य बन गए। मुस्लिम रक्त-पिपासा के बारे में बटलर के शब्द भविष्यवाणी साबित हुए।

चौरी चौरा नरसंहार

4 फरवरी 1922 को, गोरखपुर जिले के चौरी चौरा स्थित थाने पर 3000 से 5000 प्रदर्शनकारियों की भीड़ ने चढ़ाई कर दी। इस मुठभेड़ में भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया जिसके जवाब में पुलिस ने पहले हवा में और फिर भीड़ पर गोलियां चलाईं। जब भीड़ को पता चला कि पुलिस के पास गोला-बारूद की कमी है तो उसने पुलिस को भागने पर मजबूर कर दिया। इनमे से कुछ बाहर खेतों में भाग गए, जबकि कुछ ने थाने में ही शरण ले ली। भीड़ ने थाना भवन में आग लगा दी, जिसमें सभी 21 पुलिस और चौकीदार मारे गए। सब-इंस्पेक्टर के एक नौकर जो एक छोटा लड़का था, की भी हत्या कर दी गई। ज्यादातर पुलिसकर्मियों को लाठी-डंडों और ईंट-पत्थरों से पीट-पीटकर मार डाला गया। कई शवों पर भाले के निशान के निशान भी थे। गांधी ने सार्वजनिक रूप से इस हिंसा पर पश्चाताप किया और अपने आंदोलन को अचानक बंद कर दिया।

सबाल्टर्न इतिहास की आड़ में, चौरी चौरा की घटना को किसानों के प्रकोप के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया जाता रहा है। 1921-22 की सर्दियों में, खिलाफत और कांग्रेस स्वयंसेवी संगठनों को एक समग्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक कोर में मिला दिया गया था। 1921 के मध्य में, चौरी चौरा पुलिस स्टेशन के एक मील पश्चिम में एक गाँव छोटकी डुमरी में ऐसे स्वयंसेवकों की एक ग्राम इकाई स्थापित की गई थी। चौरा के एक व्यक्ति लाल मोहम्मद साईँ ने गोरखपुर जिला कांग्रेस और खिलाफत समितियों के एक पदाधिकारी को इस ग्राम की इकाई की स्थापना के लिए आमंत्रित किया था। खिलाफत के प्रमुख मौलवी सुभानुल्ला ही जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी थे। डुमरी इकाई औपचारिक रूप से गोरखपुर खिलाफत समिति के उपाध्यक्ष हकीम आरिफ द्वारा स्थापित की गई थी। हकीम आरिफ ने एक व्याख्यान दिया, कुछ अधिकारियों को नियुक्त किया और शाम की ट्रेन से वापस अपने जिला मुख्यालय चले गए।

स्वयंसेवकों को शनिवार, 4 फरवरी, 1922 को डुमरी में एकत्र होने के लिए कहा गया। दंगे वाले दिन सुबह डुमरी की बैठक में, एक आदमी ‘हरे रंग का चश्मा पहने’ आया और उसकी भाषा से स्पष्ट प्रतीत होता था कि वह एक मुस्लमान है’। उसने ‘कागज की एक पर्ची पढ़नी शुरू की।’ एक गीत गाते हुए उसने उपस्थित भीड़ से मोहम्मद और शौकत अली की तरह, कैद को गले लगाने के लिए उकसाया। गीत के बाद वह शख्स वहां से चुपचाप निकल गया। ‘भीड़’ जिसे नजर अली ने शपथ दे रखी थी, थानेदार से स्पष्टीकरण मांगने के लिए हुजूम लेकर चल पड़े। थानेदार गुप्तेशर सिंह द्वारा प्रभावशाली व्यक्तियों (मलिकों) को इकट्ठी भीड़ को हटाने के लिए भेजा गया। पर यहाँ उनकी बेइज्जती की गई और उनके मंतव्यों पर सवाल उठाये गए।

वह शनिवार का दिन था जब खाल और चमड़े के लिए विशेष हाट, भोपा में लगा हुआ था, जो रेल गोदाम के नजदीक था। भोपा में आस-पास के गाँवों के अधिकांश मुस्लिम किसान, इस चमड़े की हाट में आते थे। भोपा के मुस्लिम प्रभुत्व को एक मस्जिद द्वारा समझा जा सकता था, जो बाजार के सामने ही थी। अधिकांश हिंदू शनिवार को भोपा से दूर रहते थे। खालों की बदबू इस व्यापार से जुड़े किसी प्रतिबद्ध व्यापारी को छोड़कर, अन्य किसी को यहाँ से दूर रखने लिए पर्याप्त थी। एक संस्करण के अनुसार, दंगे में शामिल असली लोग चौरा चौरा से 20 मील दक्षिण-पूर्व में एक पठान-व्यापारी बहुल गाँव मदनपुर से थे। मदनपुर के गाडी वालों ने सुझाव दिया कि रेलवे ट्रैक पर पड़े पत्थरों का पथराव के लिए इस्तेमाल किया जाए। इन्हीं गाडी वालों ने थाने को जलाने के लिए प्रयोग किये गए केरोसिन की आपूर्ति की। इस उपद्रव के कारण, व्यापारी अपनी चावल और कच्ची चीनी से लदी गाड़ियाँ निकाल कर ले गए।

आग लगाए जाने के बाद धुँआ बहुत था, इसलिए सभी पुलिसकर्मी थाने से बाहर आ गए। तब नजर अली और शिकारी तथा मदनपुर के चार-पाँच पठानों ने कहा कि आप सभी को ध्यान रखना चाहिए ताकि कोई भी बच कर भाग न सके। मेवालाल ने बताया (जिसने अपने पिता से यह वृत्तान्त सुना था) यहाँ कहा जा रहा था “तुम क्या मारोगे हम मारेंगे। उसके अनुसार ‘थाना जलाने में मदनपुर के पठानों का बहुत हाथ था। वह सब व्यापारी थे। हमलावरों की धार्मिक संरचना और प्रेरणाओं को वफ़ादारी से छुपा कर रखा गया है। इन भयावह वर्षों में जबरदस्ती और नरसंहार का प्रतिनिधित्व करने वाली दो घटनाएं सामने आईं। अफगानिस्तान के लिए एक हिज़रत (सामूहिक मुस्लिम उत्प्रवास) के रूप में ज़बरदस्ती थी; और नरसंहार ने बर्बर मोपला जिहाद का रूप ले लिया। दोनों पर अलग से चर्चा की जरूरत है।

(लेखक ने इस्लाम, ईसाई धर्म, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धी आंदोलन और धार्मिक जनसांख्यिकी पर पुस्तकें लिखी हैं।)

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