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कांग्रेस के सिमटने के सियासी संदर्भ….

नई दिल्ली । लोकसभा चुनाव 2014 में हार के बाद विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस पार्टी के लिए लगातार निराशा के विषय बने हुए हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस का प्रदर्शन मोदी मैजिक के तिलिस्म को तोड़ नहीं पाया। अपना किला लगातार हार रही कांग्रेस भाजपा के किले में सेंध क्यों नहीं लगा पा रही है यह उसके लिए चिंतन और मंथन का विषय है। भाजपा गठबंधन सरकारों समेत 19 राज्यों में अपनी पहुंच बना ली है जबकि कांग्रेस केवल पांच में ही सिमट कर रह गई है।

70 साल बाद बुरे दौर में कांग्रेस
आजादी के बाद 70 सालों के इतिहास में यह पहला मौका है जब कांग्रेस इतने बुरे दौर से गुजर रही है। लगभग 55 साल की सत्ता की छवि समेटे 132 बरस पुरानी कांग्रेस की राजनीति क्यों ध्वस्त हो रही है। इसे समझना होगा। जिस गांधी और नेहरू के प्रभाव से कांग्रेस मतदाताओं को रिझाने में कामयाब रहती थी क्या अब यह बेअसर हो गया। क्या वास्तव में कांग्रेस अपनी बिगड़ती छवि से परेशान है तो जवाब हां में ही मिलेगा पर स्थिति ऐसी क्यों है? कांग्रेस हमेशा से सांप्रदायिकता विरोधी छवि और धर्मनिरपेक्षता के लिए जानी जाती रही है। इसका पुख्ता सबूत हिंदू कोड बिल के तौर पर देखा जा सकता है। जब यह कानून 50 के दशक में उभरा था तब कांग्रेस पर हिंदू विरोधी होने के आरोप लगे थे परन्तु लोकप्रियता में कोई घटाव नहीं हुआ था। रोचक यह भी है कि जब लोकप्रियता में इन दिनों कांग्रेस घटाव महसूस कर रही है तो मंदिर-मंदिर भी जा रहे हैं। मंथन तो उन्हें यहां भी करना होगा। धर्मनिरपेक्षता की प्रहरी कांग्रेस अल्पसंख्यकों के संरक्षण में अपनी भूमिका मानती रही है पर कितना पोषित कर पाई इस पर भी संदेह बना रहा है। उत्तर प्रदेश समेत कई प्रदेशों में मुस्लिम मतदाताओं का कांग्रेस से मोह भंग होना इसका सबूत है।

कांग्रेस और परिवारवाद
सबसे ज्यादा समय देश में राज कांग्रेस ने किया। अब तक के कुल 14 प्रधानमंत्रियों में 9 कांग्रेस से रहे हैं। जवाहरलाल नेहरू से लेकर डॉ. मनमोहन सिंह तक कांग्रेस ने बहुत उतार-चढ़ाव भी देखे परन्तु 2014 से अब यह दल तेजी से ढल रहा है। जिस दल का लंबा वक्त सत्ता में बीता हो उसी में नेतृत्व की कमी हो जाय तो चिंता लाजमी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस संरचनात्मक और नेतृत्व के तौर पर इन दिनों कमजोर अवस्था में है और धुर-विरोधी भाजपा दोनों मामलों में मीलों आगे है। ऐसे में कांग्रेस का सिमटना और बड़े अंतर के साथ हार के सिलसिले में बने रहना एक बड़ा कारण है। कांग्रेस में जमीन से जुड़े नेताओं की निहायत कमी मानी जाती है और परिवारवाद की रणनीति इस पर हावी रही है। 1975 में जब देश को आपातकाल की आग में झोंका गया था तब कांग्रेसी सरकार की उग्रता और एकाधिकार का चेहरा भी दिखाई दिया था जिसे देश की जनता ने 1977 के चुनाव में हराकर जवाब दिया। हालांकि 1980 में एक बार फिर कांग्रेस की वापसी हुई पर तब इसमें उग्रता के बजाय उदारता आ चुकी थी। 1984 का चुनाव कांग्रेस के लिए लोकतंत्र का क्षितिज सिद्ध हुआ। कईयों ने इसे राजीव गांधी की लोकप्रियता समझी तो ज्यादातर इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में उमड़ी जनभावना मानी। भारी चुनावी जीत वाली कांग्रेस ने बोफोर्स कांड के चलते 1989 में सत्ता खो दी और कुछ हद तक लोकप्रियता भी। गौरतलब है कि राजीव गांधी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे वी.पी. सिंह के तिलिस्म के आगे आंकड़े 415 से 200 के भीतर सिमट गए थे। यहां से कांग्रेस कमजोर तो हुई पर असर बना रहा।

मंडल-कमंडल के बाद सियासी करवट

मंडल-कमंडल के बाद 1990 के दौर में सियासत ने नई करवट ली। वी.पी. सिंह के बाद चंद्रशेखर देश के प्रधानमंत्री बने जिसके समर्थन में कांग्रेस थी। 1991 में मध्यावधि चुनाव हुआ कांग्रेस की एक बार पुन: वापसी हुई। हालांकि दु:खद यह है कि चुनाव के मध्य में ही राजीव गांधी की हत्या हो चुकी थी। नए नेतृत्व की खोज हुई और पी.वी. नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने। यहां से नेहरू, गांधी परिवार का आवरण देश की सियासत में हटा हुआ दिखाई देता है। राव ने पांच साल सत्ता चलायी। सांसदों को खरीदने का इन पर आरोप भी लगे। कहीं न कहीं कांग्रेस को यहां नुकसान हुआ। हवाला मामले ने भी कांग्रेस की छवि को प्रभावित करने का काम किया। 6 दिसंबर 1992 की बाबरी मस्जिद के ध्वंस के दंश से भी कांग्रेस घिरी जिसके चलते उन दिनों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश समेत भाजपा की बहुमत से भरी चार राज्यों की सरकारों को उखाड़ फेंका जो लोकतंत्र के हिसाब से अखरने वाला था। दौर बदला सत्ता बदली, सत्ताधारी नए रूप रंग में आए और सिलसिलेवार तरीके से भाजपा को भी केंद्र में 13 दिन, 13 महीने और अंतत: गठबंधन के साथ पांच साल की सरकार चलाने का मौका मिला। इस दौरान तक कांग्रेस अपने सबसे खराब अवस्था से जूझ रही थी पर उसे भी नहीं मालूम था कि 2014 में हालात इससे भी बुरे होने वाले हैं।

कांग्रेस की साख को लगा बट्टा
स्थिति को देख सोनिया गांधी जो शायद राजनीति से मुंह मोड़ना चाहती थीं 1998 में दल का नेतृत्व संभाला और 2004 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता की दहलीज पर पहुंचाया। 2009 तक चली यूपीए की पहली पारी में सरकार और दल दोनों की साख बरकरार रही और 2009 के चुनाव में एक बार फिर सत्ता हाथ आई परन्तु दूसरी पारी 2009 से 2014 के बीच जिस प्रकार अनियंत्रित भ्रष्टाचार का खेल हुआ उससे कांग्रेस बैकफुट पर चली गई। भ्रष्टाचार के आरोप से घिरी कांग्रेस का सामना जब 2014 के 16वें लोकसभा के चुनाव में सशक्त भाजपा और तीन बार गुजरात में चुनाव जीत चुके और 14 साल तक वहां के मुख्यमंत्री रहे ब्रांड मोदी से हुआ तो कांग्रेस के परखच्चे उड़ गए जो 543 सीटों के मुकाबले 44 पर सिमट गई। फिलहाल राज्यों में लगातार कांग्रेस की हार से सिमटने का सिलसिला अभी जारी है। देखा जाए तो कांग्रेस के सिमटने वाली वजह तात्कालिक ही नहीं बरसों की रीति-नीति का भी नतीजा है। जाहिर है कांग्रेस को उभरने के लिए नेतृत्व व संरचना ही नहीं धारा और विचारधारा के साथ मोदी मैजिक की काट और जनभावना की सही समझ को भी समेटना होगा और इतिहास की गलतियों से बाज भी आना होगा ताकि सिमटने का सिलसिला थमे।

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