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2G स्पेक्ट्रम केस: क्यों बरी हुए राजा समेत सभी आरोपी

dmkनई दिल्ली बहुचर्चित 2 स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाले में स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने गुरुवार को सभी आरोपियों को बरी कर दिया। पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा और डीएमके नेता कनीमोझी समेत सभी आरोपियों को बरी करते हुए कोर्ट ने कहा, ‘अभियोजन किसी भी आरोपी के खिलाफ किसी भी आरोप को साबित करने में नाकाम रहा है।’ करीब दो हजार पन्नों के अपने विस्तृत आदेश में कोर्ट ने केस के सभी पक्षों और आरोपियों की कथित भूमिका का विश्लेषण किया।सीबीआई ने दावा किया था कि राजा ने टेलिकॉम लाइसेंसों को आवंटित करने में मनमानी की और ‘पहले आओ-पहले पाओ’ सिद्धांत का उल्लंघन किया। सीबीआई ने दावा किया कि राजा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को गुमराह किया और दूसरे मंत्रालयों की चिंताओं को तवज्जो न देते हुए उन्हें लाइसेंस दिया जिन्होंने उन्हें उपकृत करने की पेशकश की थी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री का ऐंगल
कोर्ट ने गौर किया कि लाइसेंसों का आवंटन और बदले हुए मापदंडों के साथ लेटर ऑफ इन्टेंट (LOI) जारी करने का राजा ने बचाव किया था। LOI को तत्कालीन प्रधानमंत्री के सामने सही समय पर नहीं रखा गया। ऐसे आरोप लगाए गए कि 2 नवंबर 2017 को राजा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को लिखे खत में तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया और 25 सितंबर 2007 के कटऑफ डेट को बदलने के अपने फैसले का बचाव किया। सीबीआई के मुताबिक पूर्व केंद्रीय मंत्री ने प्रधानमंत्री को भी गुमराह किया और मामले को एम्पावर्ड ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (EGOM) में भेजे जाने के कानून और न्याय मंत्रालय की राय को गलत तरीके से बताया।

कोर्ट ने पूछा कि खत पर प्रधानमंत्री ने कब चर्चा की और पीएमओ में से किसी का भी बयान नहीं लिया गया और न ही प्रासंगिक फाइलों की जांच की गई और उन्हें कोर्ट में पेश किया गया। ऐसे में कोई कैसे कह सकता है कि तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया गया या प्रधानमंत्री को कानून मंत्री की राय को लेकर गुमराह किया गया? कोर्ट ने कहा, ‘रेकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं है जो इशारा करे कि प्रधानमंत्री को गुमराह किया गया था या तथ्यों को उनके सामने गलत तरीके से पेश किया गया था।’

‘स्पेक्ट्रम से जुड़े अस्पष्ट गाइडलाइंस’
कोर्ट ने कहा कि नीतियों के साथ-साथ स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े गाइडलाइंस की स्पष्टता का अभाव था और इससे कन्फ्यूजन पैदा हुआ। कोर्ट ने कहा कि गाइडलाइंस को ऐसी तकनीकी भाषा में बनाया गया कि दूरसंचार विभाग के अफसरों को भी तमाम शब्दावलियों के अर्थ के बारे में स्पष्ट राय नहीं थी। कोर्ट ने कहा, ‘जब विभाग के अफसर ही विभाग के गाइडलाइंस को नहीं समझ पाए तो वे गाइडलाइंस के उल्लंघन के लिए कंपनियों/दूसरों को कैसे दोष दे सकते हैं।’

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