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भाजपा स्थापना दिवस ; अंधेरा छटा और कमल खिला

Advani_Vajpayee6 अप्रैल, वर्ष 1980 को भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के मौके पर संस्थापक अध्यक्ष भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी का प्रथम अध्यक्षीय भाषण आज करोड़ों कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर रहा है। गठन के बाद 1984 में हुए प्रथम आम चुनाव में मात्र 2 सीटें जीतने वाली पार्टी 40 साल के सफर में सत्ता के शीर्ष तक पहुंच चुकी है। उस दौर में अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की जोड़ी द्वारा खोदी गई नींव पर आज पार्टी मजबूत दीवार जैसी खड़ी है, जिसका श्रेय नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी को भी जाता है। अपने 41 साल के इतिहास में भारतीय जनता पार्टी का ध्येय, सत्ता हासिल करने का नहीं रहा, बल्कि भारत को विश्वगुरु बनाने का लक्ष्य रहा। देश के लिए समर्पण भाव, दृढ़ इच्छाशक्ति और कुशल रणनीति के फलस्वरूप देश की तमाम समस्याओं का समाधान भाजपा के शासन में हुआ।

“हम छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और संघर्ष से प्रेरणा लेंगे, सामाजिक समता का बिगुल बजाने वाले महात्मा फुले हमारे पथ-प्रदर्शक होंगे।” “भारत के पश्चिमी घाट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं- ‘अंधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा’।”- अटल बिहारी वाजपेयी

भारतीय संस्कृति और आस्था के प्रतीक मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मस्थान पर भव्य मन्दिर का सपना साकार हो रहा है। राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए जनसंघ के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ‘एक देश-एक निशान-एक विधान-एक प्रधान’ का सपना जम्मू-कश्मीर से 370 हटाकर पूरा किया जा चुका है। भारतीय जनता पार्टी भले ही 1980 में बनी। लेकिन, इसकी विचारधारा का जन्म 1951 में ही हो चुका था। जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ बनाया था। उस दौर में कांग्रेस ही भारतीय राजनीति का चेहरा थी और 1952 के लोकसभा चुनाव में जनसंघ को सिर्फ 3 सीटें मिलीं थीं। देश में जब लोकतंत्र खतरे में पड़ा तो जनसंघ देश और संविधान की रक्षा के लिए के आगे आया। 1975 में देश में आपातकाल लगाया गया। इस दौरान जनसंघ के लोगों ने खुलकर कांग्रेस का विरोध किया। इसके कारण पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को यातनाएं भी झेलनी पड़ीं। फिर आपातकाल खत्म होने पर जनसंघ और ऐसी कई दूसरी छोटी पार्टियों ने मिलकर जनता पार्टी बना ली। अब 1977 में लोकसभा चुनाव हुए। कांग्रेस की करारी हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी। उस सरकार में बतौर विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने दुनिया को भारत की भाषा हिंदी से अवगत कराया।

अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सिद्धांत पर अडिग रहने के उद्देश्य से भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई और अटल बिहारी वाजपेयी जी पार्टी के प्रथम अध्यक्ष बने। फिर, 1984 के चुनाव में पार्टी को सिर्फ दो सीट मिलीं। लेकिन, पार्टी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और एकात्म मानववाद के मूलमंत्र के साथ भारतीय राजनीति में अपनी अलग छवि के साथ निखरती गई। 1989 में पार्टी 85 सीटें तो 1991 में 120 सीटें जीतने में सफल रही थी। 1996 में 161 और 1998 में 182 सीटें मिलीं। जनसंघ के नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर से 370 हटाने की बात करते थे जिसे नरेन्द्र मोदी सरकार ने पूरा कर दिया है। भाजपा नरेंद्र मोदी और जगत प्रकाश नड्डा की जोड़ी के नेतृत्व में विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन गयी है तथा और आगे बढ़ रही है। भाजपा ने 2014 में 282 सीटों के साथ अपने दम पर सरकार बनाई तो 2019 में और दमदार जीत मिली। पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में अकेले 303 सीटें जीतकर दोबारा सत्ता हासिल की है। इन 40 सालों में पार्टी ने अपने कई मुद्दे स्वीकार किये हैं। एनआरसी और सीएए पर जोर है। पार्टी के लिए देश सर्वोच्च रहा है, राष्ट्रवाद की बात अहम है, भले ही मुद्दे और तरीके बदल गए हैं। भाजपा की विचारधारा “एकात्म मानववाद” सर्वप्रथम 1965 में पं. दीनदयाल उपाध्याय ने दी थी। पार्टी की नीतियां ऐतिहासिक रूप से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पक्षधर रही हैं। इसकी विदेश नीति राष्ट्रवादी सिद्धांतों पर केन्द्रित है।

यह बात कही जाती रही है कि भारतीय जनता पार्टी दूसरी राजनीतिक पार्टियों से भिन्न एक विशेष विचारधारा वाली पार्टी है तो यह बात केवल कहने भर की नहीं है। वास्तव में भाजपा केवल एक राजनीतिक पार्टी ही नहीं, एक सतत चिन्तन वाली विचारधारा, विशेष कार्यशैली, समर्पित कैडर, जनलोक-कल्याणकारी नीतियां इसका मुख्य आधार स्तंभ हैं। यदि हम भाजपा की तुलना अन्य पार्टियों से करें तो हम पाएंगे कि वास्तव में भारतीय जनता पार्टी ही केवल एक ऐसी राजनीतिक पार्टी है जो मर्यादित राजनीतिक पार्टी के रूप में कसौटी पर खरी उतरती है। जहां देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टियां कुनबा परस्ती, भाई-भतीजावाद व वंशवाद की पोषक बन कर रह गई हैं और सत्ता प्राप्ति ही केवल एक मात्र लक्ष्य बनकर रह गया है। आज जहां भारतीय राजनीति भ्रष्टाचार, अत्याचार, जातीय संघर्ष, वर्ग संघर्ष, सम्प्रदाय संघर्ष, धनतंत्र, बलतंत्र, अपराध तंत्र एवं अनुशासनहीनता की शिकार बन गई है, वहीं भारतीय जनता पार्टी अपने समर्पित कैडर और विशिष्ट विचारधारा के आधार पर निरंतर आगे बढ़ रही है।

देश भर में ऐसे हजारों समर्पित कार्यकर्ता जो जीवन भर अविवाहित रहकर घर-परिवार व ऐश्वर्यपूर्ण जीवन का त्याग कर एक संन्यासी की भांति इस पार्टी के माध्यम से राष्ट्र को एक मां के रूप में स्वीकार करते हैं और सभी भारतवासी उसके पुत्र हैं व भारत माता के रूप में इसका वंदन भी करते हैं। पार्टी का चाल-चरित्र और चेहरा दूसरी पार्टियों से बिल्कुल भिन्न है। भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इसका मूलमंत्र है। हमारा देश सुरक्षा की दृष्टि से आत्मनिर्भर और पूर्ण शक्तिशाली राष्ट्र बने, परमाणु नीति और कार्यक्रम इसी सोच का हिस्सा है।

हमारा राष्ट्र विश्व में आध्यात्मिक गुरु रहा है। वही स्थान और प्रतिष्ठा भारत की पुनः स्थापित हो ऐसा चिंतन पार्टी का है। हमारा राष्ट्र अतीत में सोने की चिड़िया कहा जाता था। इसी के अनुरूप भाजपा परम वैभवशाली राष्ट्र का सपना संजोये है। पार्टी चाहती है कि भारत एक सुखी-समृद्धिशाली राष्ट्र बने। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों में पार्टी की गहन आस्था और विश्वास है। इन मूल्यों को किसी प्रकार की ठेस न पहुंचे, ऐसा प्रयास हमेशा पार्टी का रहता है। समाज के सभी वर्गों का हित हो, किसी भी एक वर्ग का तुष्टिकरण व वोट बैंक की राजनीति पार्टी को कतई स्वीकार नहीं है। समाज के अंतिम पायदान पर खड़े वंचित वर्ग का उत्थान पार्टी का मुख्य उद्देश्य है। अंत्योदय का सूत्र लेकर पार्टी इसे क्रियान्वत करने में लगी है। धर्म जाति के नाम पर भेदभाव पार्टी को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं है। इस समय पार्टी नरेन्द्र मोदी के बोधवाक्य “सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास” के साथ चल रही है। सरकार समाज के अंतिम व्यक्ति को मुख्यधारा में लाने के लिए सैंकड़ों योजनाएँ लागू कर चुकी है।

पांच बार केंद्र की सत्ता मिलने पर तमाम योजनाओं का केंद्र गरीब और अंतिम व्यक्ति ही रहा। 1996, 1998 और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी। 1999 में बनी सरकार ने न सिर्फ अपना कार्यकाल पूरा किया, बल्कि गठबंधन की राजनीति की सफलता का भी मार्ग दिखाया। साथ ही देश की शासन व्यवस्था में सुशासन को भी स्थापित किया। वर्तमान में राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के संगठन कौशल में जहाँ सेवा ही संगठन के भाव से लाखों कार्यकर्ता कोरोना काल में जनसेवा में जुड़कर सेवा को ही मूल मंत्र बना चुके हैं। इस समय 543 सदस्यीय लोकसभा में भाजपा के 303 सदस्य हैं। इसी तरह संसद के ऊपरी सदन 245 सदस्यीय राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी के 95 सदस्य हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, असम, त्रिपुरा, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा, अरुणाचल प्रदेश में भाजपा की सरकार है। बिहार, नागालैंड, मेघालय, सिक्किम एवं मिजोरम में भाजपा के नेतृत्व में राजग की सरकार हैं। अपने 18 करोड़ सदस्यों के साथ भारतीय जनता पार्टी भारत ही नहीं आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है। इसके सदस्यों की संख्या से दुनिया के सिर्फ आठ देशों की आबादी ही ज्यादा है। पार्टी की इस विकास यात्रा में करोड़ों कार्यकर्ताओं का त्याग और बलिदान रहा है।

स्थापना काल से लेकर अब तक के भाजपा के अध्यक्षों की सूची-

 1. श्री अटल बिहारी वाजपेयी 1980 – 1986
 2.  श्री लालकृष्ण आडवाणी 1986 – 1991
 3.  डॉ. मुरली मनोहर जोशी 1991 – 1993
 4.  श्री लालकृष्ण आडवाणी  1993 – 1998
 5.  श्री कुशाभाऊ ठाकरे 1998 – 2000
 6.  श्री बंगारू लक्ष्मण  2000 – 2001
 7.  श्री के. जना कृष्णमूर्ति  2001 – 2002
 8.  श्री वेंकैया नायडू  2002 – 2004
 9.  श्री लालकृष्ण आडवाणी  2004 – 2006
 10.  श्री राजनाथ सिंह  2006 – 2009
 11.  श्री नितिन गडकरी 2009 – 2013
 12.  श्री राजनाथ सिंह  2013 – 2014
 13.  श्री अमित शाह  2014 – 2020
 14.   श्री जगत प्रकाश नड्डा  2020   से अभी तक

 जनसंघ के अध्यक्षों की सूची-

 

 1.  डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  1951–1952
 2.  श्री मौलिचन्द्र शर्मा  1954
 3.  श्री प्रेमनाथ डोगरा  1955
 4.  आचार्य देव प्रसाद घोष  1956–1959
 5.  श्री पीतांबर दास  1960
 6.  श्री अवसरला राम राव  1961
 7.  आचार्य देव प्रसाद घोष  1962
 8.  श्री रघुवीर 1963
 9.  आचार्य देव प्रसाद घोष  1964
 10.  श्री बच्छराज व्यास  1965
 11.  श्री बलराज मधोक  1966
 12.  श्री दीनदयाल उपाध्याय  1967- 1968
 13.  श्री अटल बिहारी वाजपेयी  1969 – 1972
 14.  श्री लालकृष्ण आडवाणी  1973 – 1977

 राष्ट्रवाद की परिकल्पना से उपजी है भारतीय जनता पार्टी

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की विचारधारा से उपजी भारतीय जनता पार्टी आज अपने स्वर्णिम काल में है। 06 अप्रैल, 1980 को गठित भारतीय जनता पार्टी के मूल में स्वर्गीय श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा निर्मित भारतीय जनसंघ की एक राष्ट्रवाद की परिकल्पना है तो दूसरी तरफ राष्ट्र के पुनरुत्थान का जज़्बा भी। 06 अप्रैल, 1980 में भारतीय जनता पार्टी के गठन के बाद पार्टी का पहला अधिवेशन दिसंबर 1980 में मुंबई में हुआ था। इस अधिवेशन में भाजपा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष भारत रत्न स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि भाजपा का अध्यक्ष पद कोई अलंकार की वस्तु नहीं है, यह पद नहीं दायित्व है, प्रतिष्ठा नहीं है, परीक्षा है, यह सम्मान नहीं है चुनौती है, मुझे भरोसा है कि आपके सहयोग से और देश की जनता के समर्थन से मैं इस जिम्मेदारी को ठीक तरह से निभा सकूंगा।

अपने भाषण के अंत में उन्होंने कहा, “भारत के पश्चिमी तट को मंडित करने वाले महासागर के किनारे खड़े होकर मैं यह भविष्यवाणी करने का साहस करता हूं कि अंधेरा छटेगा सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा। 41 साल पहले की गई अटल जी की यह भविष्यवाणी आज सच हो रही है और 11 करोड़ से अधिक कार्यकर्ताओं के साथ विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल के रूप में भारतीय जनता पार्टी लोगों के सामने है। अटल जी ने न सिर्फ अपने वादों को निभाया बल्कि भारतीय जनता पार्टी को भारत के राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में एक श्रेष्ठ स्थान दिलवाया जिसकी वजह से आज एक मजबूत राजनैतिक दल के रूप में देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी एक अलग पहचान भारतीय जनता पार्टी बना चुकी है।अयोध्या में भगवान रामलला के मंदिर के लिए संघर्ष हो, जम्मू-कश्मीर में धारा 370 को लेकर चली आ रही गफलत हो या फिर देश को एकजुट करने की बात हो, भारतीय जनता पार्टी देशवासियों से किए गए अपने वचन को पूरा करने में सफल रही है। हमारा नेतृत्व हमेशा से ही शक्तिशाली, दूरदर्शी और राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत रहा है। हम जब अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण अडवाणी के अध्यक्षीय काल को याद करते हैं तो उसे भी युग की संज्ञा दी जाती है उसे अटल-अडवाणी युग कहा जाता है। मुरली मनोहर जोशी का कार्यकाल हो, कुशाभाऊ ठाकरे, जिनको मध्य प्रदेश में पार्टी को खड़ा करने का श्रेय जाता है, आज इन सभी पुरोधाओं के अथक परिश्रम से पार्टी राजनीति के अपने सर्वोच्च शिखर पर है।

मध्य प्रदेश की राजधानी के जिस जिला कार्यालय का कायाकल्प कर आज हम पार्टी के कार्यकर्ता प्रसन्न हो रहे हैं यह उनकी ही डाली गई नींव पर खड़ा है। के. जना कृष्णामूर्ति, बंगारू लक्ष्मण, हमारे वर्तमान उपराष्ट्रपति एम. वैंकया नायडू, वर्तमान केंद्रीय सरकार में मंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडगरी, अमित शाह और अब वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा, सबका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारतीय जनता पार्टी के 41 साल के इतिहास में हमारे राष्ट्रीय अध्यक्षों की एक वैभवशाली परंपरा रही है। चाहे फिर वह राष्ट्रीय अध्यक्ष हों या फिर राज्यों के अध्यक्ष, वर्तमान में देश के सबसे अधिक राज्यों में भारतीय जनता पार्टी और उनके सहोयगी दलों की सरकार है। अगर 2011 जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो 2018 में बीजेपी जिन राज्यों में सरकार में थी, वहां की कुल आबादी क़रीब 84 करोड़ थी, यानी देश की कुल जनसंख्या का 70 फ़ीसदी। यह सफलता हमने हमारे प्रधानसेवक नरेन्द्र मोदी व राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे अमित शाह के नेतृत्व में हासिल की गयी है।

भारतीय जनता पार्टी अपने स्थापना से ही पंच निष्ठाओं को लेकर चली है। हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने पार्टी के स्थापना दिवस पर पार्टी की इन पंच निष्ठाओं को लेकर लिखा था 1- राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय एकता: भाजपा इसको मंत्र मानकर चलती है और इससे कोई भी समझौता न किया है और न करेगी इस संकल्प के साथ हम आगे बढ़े हैं। 2- लोकतंत्र: हमारे काम करने की पद्धति फिर चाहे वह पार्टी हो या देश हो, लोकतंत्र पर अटूट विश्वास इसी को लेकर हम चले हैं। 3- सामाजिक और आर्थिक विषय पर गांधीवादी दृष्टिकोण: इसको भी हम लोगों ने बखूबी निभाते हुए हम आगे बढ़े हैं। 4- सकारात्मक पंथनिरपेक्षता: इसको भी हम लोगों ने बखूबी निभाया है। सभी को बराबर का सम्मान देना, सभी का बराबर ध्यान रखना और किसी का भी शमन न करना इसको ध्यान हम लोगों ने माना है। 5- मूल्यों पर आधारित राजनीति: इस पर हम लोगों ने कभी भी समझौता नहीं किया है।भारतीय जनता पार्टी की यात्रा दो से शुरू होकर 303 तक पहुँची है जो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 352 सांसदों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के रूप में लोकतंत्र के मंदिर में देश को एक नए भारत की तरफ ले जा रही है। एक भारत श्रेष्ठ भारत, नया भारत, समृद्ध भारत की परिकल्पना को पार्टी नेता साकार करने में लगे हैं।

ऐसे बनी बीजेपी अचूक, अभेद्य, अपराजेय

संघर्षों की बुनियाद पर कामयाबियों की बुलंद इमारत कैसे तैयार होती है भारतीय जनता पार्टी इसकी मिसाल है। जिसका हर कदम कामयाबियों को चूमता है, हर निशाना अचूक होता है। जिसकी सियासी सूझबूझ का किला अभेद्य है। आज हिन्दुस्तान की राजनीति में इस पार्टी का कद और ओहदा इतना बड़ा और बुलंद हो गया है कि उसे अपराजेय कहा जाने लगा है। एक पार्टी जहां एक और एक ग्यारह हो जाते हैं। फिर ग्यारह लोग मिलकर 41 साल पहले एक सफर की शुरूआत करते हैं। वो राजनीतिक सफर आज उस मुकाम पर पहुंच गया है कि ग्यारह लोगों की खड़ी की गई पार्टी न सिर्फ केंद्र में बल्कि देश के 17 राज्यों में अपनी सरकार चला रही है। जिसका विजय रथ बगैर किसी रोक-टोक के बढ़ता ही जा रहा है। आज हम उसी भारतीय जनता पार्टी का एमआरआई स्कैन करेंगे जो लोकसभा में कभी दो पर थी आज 303 सांसद हैं। जिसके पास 1 हजार से ज्यादा विधायक और 13 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ता हैं।

1951 में श्याना प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ बनाया। जब 1952 में पहली बार लोकसभा के चुनाव हो रहे थे तो उस दौर में कांग्रेस के खिलाफ सोशलिस्ट पार्टियां भी लड़ रही थीं और कम्युनिस्ट भी थे। इनके बीच एक दल था भारतीय जनसंघ जिसे चुनावी गणित में खास नोटिस नहीं लिया गया। इस चुनाव में जनसंघ को केवल 3 सीटें मिलीं। इसके बाद जनसंघ का संघर्ष चलता रहा लेकिन उसी जनसंघ के गर्भ से निकली बीजेपी ने आज हिदुस्तान में सभी दलों की राजनीतिक चौहद्दी को समेट दिया है। ये कहानी है एक पुकार की एक यल्गार की ये कहानी है हिन्दुस्तान की नहीं दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की। ये कहानी है बीजेपी के बनने और राजनीतिक क्षितिज की ओर बढ़ने की।

एक सपना जो चार दशक में किसी राजनीतिक दल के लिए सबसे खूबसूरत सच्चाई बन गया। 1980 में 6 अप्रैल को बनी बीजेपी आज देश की सत्ताधारी पार्टी ही नहीं बल्कि इसके खिले हुए कमल में 13 करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ताओं का ज्जबा समाया है। आज देश की सबसे बड़ी पार्टी देश पर राज करने वाली पार्टी बनकर उभरी बीजेपी का जन्म 41 साल पहले मुंबई में समुद्र किनारे हुआ। जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनसंघ के नेताओं ने 6 अप्रैल 1980 को मुंबई में भारतीय जनता पार्टी बनाई और अटल बिहारी वाजपेयी को इसका पहला अध्यक्ष। उस उमस भरी शाम को ही अटल बिहारी वाजपेयी ने कमल के खिलने की भविष्यवाणी अपनी ओजस्वी वाणी में कर दी थी।

उस वक्त बीजेपी के पास जनता पार्टी की सरकार का अनुभव था और पुराने जनसंघ के कार्यकर्ताओं का समर्थन था और पीठ पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का हाथ। फिर भी  बीजेपी ने जनसंघ के पुराने तेवरों को छोड़ते हुए गांधीवादी समाजवाद का रास्ता चुना। लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए 1984 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ऐसी दुर्गति हुई कि वो महज दो पर सिमट गई। तब कांग्रेस ने उनका खूब मजाक भी उड़ाय़ा था। उस चुनाव में दो सीटे जीतने वाली बीजेपी में एक चंदू पाटिया थे जिन्होंने नरसिम्हा राव को मात दी थी वहीं गुजरात के मेहसाणा से एके पटेल को जीत मिली थी। 1984 की हार ने बीजेपी को रास्ता बदलने पर मजबूर कर दिया। आखिर वाजपेयी तक हार गए थे। थोड़े कट्टर छवि के माने जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी बीजेपी के नए अध्यक्ष बन गए। अब बीजेपी में नेतृत्व आडवाणी का था और नियंत्रण संघ का।

1987 में आडवाणी, वाजपेयी और आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बाला साहेब देवरस के बीच हुई मीटिंग में सवाल उठा कि बीजेपी कैसे कांग्रेस से आगे निकल पाएगी। देवरस ने कहा- राम मंदिर के रास्ते से। आडवाणी ने लाइन पकड़ ली।राजीव सरकार भ्रष्टाचार, शाहबानों केस और अयोध्या में राम मंदिर का ताला खुलवाकर घिर चुकी थी। बीजेपी एक तरफ संयुक्त विपक्ष का हिस्सा बनी तो दूसरी तरफ संघ के प्रखर हिन्दुत्व का प्रतीक बनी विश्व हिंदू परिषद। बीजेपी को इसका फायदा मिला जब 1989 के चुनाव में जनता दल से हाथ मिलाकर उसने 86 सीटें जीत ली। हिमाचल के पालमपुर में 1988 में अयोध्या आंदोलन में शामिल होने का फैसला किया और फिर सोमनाथ से अयोध्या रथयात्रा के कार्यक्रम से मिली लोकप्रियता ने आडवाणी को संघ और पार्टी की नजर में अलग पहचान दी। 1991 का चुनाव बीजेपी ने राम मंदिर के मुद्दे पर लड़ा और उसने 120 सीटें जीत लीं। इस साल बीजेपी देश की नंबर दो पार्टी बन गई। बीजेपी को लग गया कि सत्ता की संजीवनी चाहिए तो राम नाम से राष्ट्रवाद पर जाना होगा। इसी दौर में बीजेपी में मुरली मनोहर जोशी अध्यक्ष बन गए थे। दिसंबर 1991 में उनकी तिरंगा यात्रा निकली जिसका मकसद 26 जनवरी 1992 को श्रीनगर के लाल चौक पर तिरंगा फहराना था। साल 1993 में आडवाणी एक बार फिर बीजेपी के अध्यक्ष बनते हैं। आडवाणी को ये अंदाजा था कि पार्टी को नंबर टू से नंबर 1 बनाने और इससे भी आगे प्रधानमंत्री देने के लिए कोई उदार छवि वाला चेहरा चाहिए। 1995 में वाजपेयी जी से बगैर पूछे ही उनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और उनके इस ऐलान के बाद सब के सब हैरान रह गए थे। अटल जी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब रही। इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी में पितृ पुरुष कहे जाने वाले कुशाभाऊ ठाकरे की बीजेपी के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी होती है। 2000 में आंध्र प्रदेश से आने वाले बंगारू लक्ष्मण बीजेपी के अध्यक्ष बनाए जाते हैं। लेकिन बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण तहलका कांड में फंसते हैं जिसके बाद न सिर्फ उनकी कुर्सी गई बल्कि पार्टी की छवि पर भी सवाल उठा। जेना कृष्णमूर्ती के बाद बीजेपी की कमान 2002 में वेंकैया नायडू को सौंपी गई थी। साल 2004 में इंडिया शाइनिंग के बुरी तरह फेल होने के बाद एक बार फिर से बीजेपी की कमान लालकृष्ण आडवाणी के हाथों में आ जाती है। लेकिन आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी को 2009 के चुनाव में भी शिकस्त ही मिलती है। इस दौरान बीजेपी ने राजनाथ सिंह से लेकर नितिन गडकरी तक अपने अध्यक्ष बदलते गए। 2004 से सत्ता से बाहर भाजपा ने 2013 में अटल-आडवाणी के दौर के बाद नए नेता के रूप में अपना चेहरा बनाया था। उस दौर में यह शायद पहला ऐसा मौका था जब भाजपा के किसी अध्यक्ष ने अपने टीम के गठन में इतने बड़े स्तर पर बदलाव किए थे। जिनमें 12 में से दस उपाध्यक्ष और सभी महासचिव नए थेl। छह साल पहले संसदीय बोर्ड से हटाए गए नरेंद्र मोदी को फिर बोर्ड में शामिल कर भाजपा ने अपने इरादे साफ़ जाहिर कर दिए थे। जिसके बाद मोदी को सेंट्रल इलेक्शन कैंपेन कमिटी का चेयरमैन बनाया गया। वो एकमात्र ऐसे पदासीन मुख्यमंत्री थे, जिन्हें संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया था। याद कीजिए 2014 की मोदी की यात्राएं और सभाएं। भ्रष्टाचार के आरोपों से धूमिल मनमोहन के मंत्रिमंडल के मुकाबले उन्होंने राजनीति में अलादीन का चिराग रख दिया। गुजरात की चौहद्दी से निकले मोदी ने 2014 के चुनाव में उतरते ही एक इतनी बड़ी लकीर खींच दी थी जिसके सामने सब अपने आप छोटे हो गए थे। बीजेपी तो पहले भी जीत चुकी है लेकिन ऐसी जीत पहले कभी नहीं मिली। 182 की चौखट पर हांफने वाली बीजेपी अपने बूते बहुमत के आंकड़े को पार किया। एक चाय वाले ने भारतीय राजनीति के प्याले में तूफान ला दिया। दसों दिशाओं से आने वाली जीत मोदी की इस शख्सियत के सामने झुकती चली गई। वो आए तो सबने कहा आने दो देख लेंगे, उसने देखा तो सबने कहा देखने दो कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन उसने जीत लिया तो सबने कहा भारतीय लोकतंत्र का इतिहास नेपोलियन हिटलर को देख रहा है। लेकिन इन सब बातों से बेपरवाह उसने वो पुरानी कहावत को सोलह आने सच साबित करके दिखाया कि ‘वो आया, उसने देखा और जीत लिया’। सोलहवीं लोकसभा अपनी सोलहों कलाओं के साथ उस शख्स पर कुर्बान हो गई और पार्टी की कमान बीजेपी की जीत के सूत्रधार अमित शाह को पार्टी की कमान सौंपी गई। 17वीं लोकसभा में नरेंद्र मोदी ने खुद को प्रधानमंत्री और निरंतर प्रधानमंत्री के दोराहे पर मूर्धन्य की तरह स्थापित कर दिया। वहीं राम से आगे बढ़ चुकी बीजेपी आज जेपी नड्डा के नेतृत्व में विकास के अखाड़े में सारे विरोधियों को धूल चटा चुकी है। एक के बाद एक चुनावी नतीजों ने सिद्ध कर दिया कि जनता बीजेपी पर उठे हर सवालों को खारिज कर चुकी है और इतनी ही नहीं उसे हर सवाल का जवाब मान चुकी है। वर्तमान दौर में बीजेपी के करिश्मे ने देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को इतिहास की राजनीति का डब्बा बना दिया और गुजरती हुई सत्ता और आती हुई सत्ता के संधिस्थल पर खुद को सियासी सफलता का साम्राज्य।

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