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सच बात—देश की बात

75 साल बाद भी वो दर्द ज़िंदा है…..

prtition1947भारत और पाकिस्तान, आज़ादी की सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहे हैं. (पाकिस्तान में 14 अगस्त को यौमे-आज़ादी मनाया जाता है. वहीं भारत 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है.) भारत और पाकिस्तान का इतिहास एक है. सांस्कृतिक विरासत साझी है. मगर दोनों के बीच इतना अविश्वास है, इतनी कड़वाहट है, कि, वो एक-दूसरे को अपना प्रतिद्वंदी नहीं, दुश्मन मानते हैं.आज़ादी के बाद पिछले 75 सालों में भारत और पाकिस्तान के बीच तीन बार जंग हो चुकी है. वैसे कुछ लोग कहते हैं कि चार युद्ध हुए हैं. मगर आख़िरी बार 1999 में जब दोनों देशों की फौजें लड़ी थीं, तो जंग का औपचारिक एलान नहीं हुआ था.हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच जारी तनातनी, दुनिया की सबसे लंबे वक़्त तक चलने वाली सामरिक समस्या कही जा सकती है. इसी तनातनी का नतीजा है कि दोनों देशो ने एटमी हथियार विकसित किए. यानी आज की तारीख़ में भारत और पाकिस्तान के बीच जो विवाद है, उसे इलाक़ाई तनातनी कहकर अनदेखा नहीं किया जा सकता.

भारत और पाकिस्तान को आज़ादी एक साथ ही मिली थी. भारत, ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा उपनिवेश था. 15 अगस्त 1947 को हिंदुस्तान पर हुकूमते ब्रतानिया ख़त्म हो गई.आज़ादी से पहले कई महीनों तक मुल्क के बंटवारे को लेकर खींचतान चलती रही थी. आख़िर में विवाद को हिंसक होता देख, ब्रिटेन, भारत को दो हिस्सों में बांटकर आज़ादी देने को राज़ी हो गया. पाकिस्तान के तौर पर एक अलग मुस्लिम देश बना. पाकिस्तान बनाने का मक़सद मुसलमानों की उन चिंताओं को दूर करना था, कि वो आज़ाद भारत में हिंदुओं के बहुमत की वजह से नुक़सान में रहेंगे.जब देश का बंटवारा हुआ तो देश के दो बड़े सूबों पंजाब और बंगाल को भी मज़हबी आबादी की बुनियाद पर बांटा गया. इस बंटवारे की जानकारी, आज़ादी के दो दिन बाद उजागर की गई.बंटवारे ने लाखों लोगों को अपने ही देश में बेगाना बना दिया. उन्हें अपना घर-बार छोड़कर नए मुल्क जाना पड़ा. हालिया तारीख़ में इंसानों की ये सबसे बड़ी अदला-बदली थी. भारत और पाकिस्तान के बंटवारे की वजह से जितने लोग शरणार्थी बने, वो युद्ध और अकाल के अलावा किसी और वजह से शरणार्थी बनने वालों की सबसे बड़ी तादाद थी.

किसी को पक्के तौर पर तो नहीं पता, मगर क़रीब सवा करोड़ लोग भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत आए-गए. इस दौरान भयंकर सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी. हर समुदाय के लोग पीड़ित भी थे और हमलावर भी. देश के बंटवारे के दौरान मज़हबी फ़साद की वजह से पांच से दस लाख के बीच लोग मारे गए. हज़ारों महिलाओं को दूसरे समुदाय के मर्दों ने अगवा करके उनके साथ बलात्कार और दूसरे ज़ुल्म किए.हिंसा का सबसे ज़्यादा असर पंजाब सूबे पर पड़ा. यहां बरसों से सिख, मुसलमान और हिंदू आपस में मिल-जुलकर रहते आए थे. वो एक ज़बान बोलते थे. उनकी विरासत साझी थी. लेकिन, देश के बंटवारे के बाद ये लोग एक दूसरे के दुश्मन और ख़ून के प्यासे हो गए. पूर्वी पंजाब में रहने वाले मुसलमान, पश्चिमी पंजाब यानी पाकिस्तान भाग रहे थे. वहीं पश्चिमी पंजाब में रहने वाले हिंदू और सिख, पूर्वी पंजाब यानी भारत आने को मजबूर हुए.बंटवारे के वक़्त जो हिंसा हुई, उसे गृह युद्ध भी नहीं कहा जा सकता. क्योंकि दोनों ही तरफ़ सेनाओं ने मोर्चा नहीं संभाला था. लेकिन ये अपने-आप भड़क उठने वाला फ़साद भी नहीं था. हर समुदाय ने अपने-अपने हथियारबंद गिरोह और सेनाएं बना ली थीं. इनका मक़सद सिर्फ़ एक था, दूसरे मज़हब के ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को मारना, उन्हें नुक़सान पहुंचाना.

बंटवारे का वो ज़ख़्म आज तक नहीं भरा है. उस दौरान भड़की हिंसा के लिए किसी के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई. किसी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया. तीनों संप्रदायों के बीच मेल-मिलाप की कोई कोशिश नहीं की गई.ये इंसानियत की तारीख़ की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी. लेकिन बंटवारे के वक़्त जो भी हुआ, उस पर दोनों ही देशों ने ख़ामोशी अख़्तियार कर ली. किसी ने भी पूरा सच न जानने की कोशिश की, न किसी को बताने की.बाद के दिनों में सिनेमा, थिएटर और साहित्य के ज़रिए बंटवारे की भयंकर हिंसा के दर्द भरे क़िस्से बताए और सुनाए गए. इतिहासकारों ने भी बंटवारे के बाद, इस मसले के राजनीतिक पहलू पर ही ज़्यादा ज़ोर दिया. उन्हें भी उपमहाद्वीप की तारीख़ के इस काले और ख़ूनी पन्ने के इंसानी पहलू पर ग़ौर करने में बहुत वक़्त लग गया.पिछले कुछ सालों में इतिहासकारों ने बंटवारे की त्रासदी को लेकर कई प्रोजेक्ट शुरू किए हैं. मगर शायद इसमें उन्होंने बहुत देर कर दी. बंटवारे का दर्द झेलने वाले अब बहुत कम लोग बचे हैं. वो भी अपनी ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव पर हैं.बंटवारे की हिंसा के शिकार लोगों की याद में कोई विशाल स्मारक नहीं बना. कोई इमारत नहीं तामीर की गई. बंटवारे की कहानी बताने वाला पहला संग्रहालय हाल ही में भारतीय पंजाब के अमृतसर में खुला है.मुसलमानों में सिखों के प्रति गुस्सा था

बंटवारे ने ऐसा ज़हर घोला है कि 75 साल बाद भी आज भारत-पाकिस्तान के रिश्ते उसी की बुनियाद पर तय होते हैं. और भारत-पाकिस्तान के ताल्लुक़ की तासीर ही दक्षिण एशिया का सामरिक माहौल तय करती हैं.महीनों की क़वायद और तनातनी के बाद 1947 में भारत-पाकिस्तान के बीच जो सरहदें तय हुईं, वो एक पीढ़ी भी नहीं चल सकीं. आज़ादी के 25 सालों के भीतर ही पाकिस्तान को एक और बंटवारे के दर्द से गुज़रना पड़ा. जब अंग्रेज़ों ने देश का बंटवारा किया था, तो पाकिस्तान के दो टुकड़े थे. पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच दो हज़ार किलोमीटर का फ़ासला था. 1971 में पूर्वी पाकिस्तान, पश्चिमी पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश के रूप में नया देश बन गया. बांग्लादेश की आज़ादी की लड़ाई में भारत ने भी अपनी फौज की मदद दी थी.बंटवारे के बाद जो मुद्दे अनसुलझे रह गए थे उनमें कश्मीर का मसला भी था.  कश्मीर के राजा हिंदू थे. कश्मीर के राजा ने अपनी रियासत को भारत में विलय करने का फ़ैसला किया. नतीजा ये हुआ कि बंटवारे के कुछ महीनों के भीतर ही, भारत और पाकिस्तान की सेनाएं, कश्मीर के मोर्चे पर आमने-सामने थीं. आज भी कश्मीर का मसला अनसुलझा है.

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