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आम आदमी पार्टी में बार-बार इस्तीफ़े क्यों ?

kejriwalआम आदमी पार्टी से उसके वरिष्ठ सदस्य आशुतोष का इस्तीफ़ा ऐसी ख़बर नहीं है जिसके गहरे राजनीतिक निहितार्थ हों. इस्तीफे के पीछे व्यक्तिगत कारण नज़र आते हैं और समय पर सामने भी आ जाएंगे.अलबत्ता यह इस्तीफ़ा ऐसे मौके पर हुआ है जब इस पार्टी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं. एक सवाल यह भी है कि इस पार्टी में बार-बार इस्तीफ़े क्यों होते हैं?आशुतोष ने अपने इस्तीफ़े की घोषणा ट्विटर पर जिन शब्दों से की है, उनसे नहीं लगता कि किसी नाराज़गी में यह फ़ैसला किया गया है. दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल ने जिस अंदाज़ में ट्विटर पर उसका जवाब दिया है, उससे लगता है कि वे इस इस्तीफ़े के लिए तैयार नहीं थे.

आशुतोष ने अपने ट्वीट में कहा था, “हर यात्रा का एक अंत होता है.’आप’ के साथ मेरा जुड़ाव बहुत अच्छा/क्रांतिकारी था, उसका भी अंत आ गया है. इस ट्वीट के तीन मिनट ashuthosबाद उन्होंने एक और ट्वीट किया जिसमें मीडिया के दोस्तों से गुज़ारिश की, ‘मेरी निजता का सम्मान करें. मैं किसी तरह से कोई बाइट नहीं दूंगा.”आशुतोष अरविंद केजरीवाल के क़रीबी माने जाते रहे हैं. पिछले चार साल में कई लोगों ने पार्टी छोड़ी, पर आशुतोष ने कहीं क्षोभ व्यक्त नहीं किया. फिर भी तमाम तरह के कयास हैं. कहा जा रहा है कि पार्टी की ओर से राज्यसभा न भेजे जाने की वजह से वे नाराज़ चल रहे थे. शायद वे राजनीति को भी छोड़ेंगे वगैरह-वगैरह.आम आदमी पार्टी के ज़्यादातर संस्थापक सदस्यों की पृष्ठभूमि गैर-राजनीतिक है. ज़्यादा से ज़्यादा लोग एक्टिविस्ट हैं, पर आशुतोष की पृष्ठभूमि और भी अलग थी. वे खांटी पत्रकार थे और शायद उनका मन बीते दिनों को याद करता होगा.

उन्होंने ऐसा कभी कुछ नहीं कहा कि मुझे राजनीतिक जीवन रास नहीं आ रहा, पर लगता है कि वे अपने पत्रकारीय जीवन में वापस जाना चाहेंगे. ऐसा लगता है कि राजनीति में उनका करियर ठहर-सा गया था. ‘आप’ से परे उनके जीवन में राजनीति का मतलब वही है, जो एक पर्यवेक्षक के लिए होता है. इसलिए पत्रकारिता में उनकी वापसी सम्भव है.देश की पत्रकार बिरादरी अब राजनीतिक रंगत वाले साथियों को स्वीकार करती है. ख़ासतौर से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने एक नई पत्रकार विरादरी को जन्म दिया है. बहरहाल यह एक अलग डिबेट का विषय है, फ़िलहाल सवाल ‘आप’ के भविष्य को लेकर है.आशुतोष ने अपने ट्वीट में ‘आप’ के साथ रिश्तों का ज़िक्र करते हुए उसे सुंदर/क्रांतिकारी लिखा है. लेकिन उसका भी अंत हुआ. प्रकारांतर से यह बात ‘आप’ के पूरे आंदोलन पर लागू होती है. जिस वक्त यह आंदोलन था और पार्टी नहीं बनी थी, तब बहस का विषय यह था कि अब आगे क्या? और जब पार्टी बन गई और क़रीब पाँच साल में उसे सत्ता की ‘ख़ुशबू’ मिल गई तो सवाल है कि अब आगे क्या?पार्टी के विचारकों और सूत्रधारों को ऐसे सवालों का जवाब देना है. पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में ज़मीन तैयार की है. ‘आप’ को जो भी सफलता मिली है, वह परम्परागत राजनीति के ख़िलाफ़ जनता के मन में बैठे असंतोष के कारण है.

दुर्भाग्य से इस पार्टी का आचरण उसी राजनीति जैसा है जिसके विरोध में यह खड़ी हुई है. ‘प्रचार-कामना’ इसकी दुश्मन है. इसमें बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हैं, जो बीजेपी, कांग्रेस या ऐसे ही दलों में जगह नहीं बना पाए.इस पार्टी ने अपने आंतरिक फ़ैसलों के लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों को विकसित नहीं होने दिया. यहाँ भी हाई कमान है. यह हाई कमान शैली वहीं काम करती है, जहाँ सत्ता की यथेष्ट शक्ति केंद्र के पास हो. दिल्ली में यह कुछ समय के लिए ताक़त ज़रूर बनी, पर भविष्य नज़र नहीं आ रहा.अब यह पार्टी किसी न किसी ग़ैर-ज़रूरी या अटपटी बात के कारण चर्चा में रहती है. पन्द्रह-बीस दिन में इससे जुड़ी कोई न कोई अनोखी बात होती रहती है. इसकी एक वजह यह है कि शुरू से ही इसकी दिशा अस्पष्ट रही है.पार्टी ने शुरुआत में ख़ुद को बीजेपी और कांग्रेस से अलग दिखाने की कोशिश की, पर 2014 के चुनाव में अनायास इसके नेतृत्व ने मोदी के समांतर खड़े होने की कोशिश की. संयोग से दिल्ली में उसे सफलता मिली.

दिल्ली की सफलता में काफ़ी बड़ी भूमिका कांग्रेस विरोधी वोटरों की भी थी. अब कांग्रेस ने दिल्ली में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली है. यह मज़बूती ‘आप’ की परेशानी का कारण है. पिछले कुछ समय से पार्टी कथित तौर पर कांग्रेस के साथ गठबंधन की मनुहार कर रही थी. कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं है.

केजरीवाल को विरोधी दलों की जमात में तो जगह मिल गई, पर कांग्रेस का साथ नहीं मिला. पिछले दिनों जब दिल्ली के एलजी के घर पर केजरीवाल सरकार धरने पर बैठी थी, तब चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनका समर्थन किया था. पर वह समर्थन दिल्ली में किसी काम का नहीं था.

कांग्रेस की झिड़की ‘आप’ पर भारी पड़ रही है. यहाँ तक कि राज्यसभा के उप-सभापति चुनाव में कांग्रेस ने बीके हरिप्रसाद के पक्ष में उससे वोट भी नहीं माँगा. इस बात से उत्तेजित होकर ‘आप’ ने चुनाव का बहिष्कार किया और फिर अरविंद केजरीवाल ने घोषणा की कि ‘हम अगले आम चुनाव में विपक्ष के प्रस्तावित गठबंधन में शामिल नहीं होंगे.’

उन्होंने यह भी कहा, ‘गठबंधन की राजनीति से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरे लिए राजनीति का मतलब जनता और उसका विकास है.’ सच यह है कि वे अकेले पड़ गए हैं, और आगे की उनकी डगर काफ़ी कठिन है. हो सकता है कि आशुतोष के इस्तीफ़े का इन बातों से कोई वास्ता न हो. शायद वे अब अपने बारे में सोचने लगे हों, पर अब पार्टी को भी अपने बारे में सोचना चाहिए.

नैतिक और राजनीतिक माफियां 

आम आदमी पार्टी का जन्म पिछले लोकसभा चुनाव से पहले 2012 में हुआ था. लगता था कि शहरी युवा वर्ग राजनीति में नई भूमिका निभाने के लिए उठ खड़ा हुआ है. वह भारतीय लोकतंत्र को नई परिभाषा देगासारी उम्मीदें अब टूटती नज़र आ रही हैं.संभव है कि अरविंद केजरीवाल माफी-प्रकरण के कारण फंसे धर्म-संकट से बाहर निकल आएं. पार्टी को क़ानूनी माफियां आसानी से मिल जाएंगी, पर नैतिक और राजनीतिक माफियां इतनी आसानी से नहीं मिलेंगी.क्या वे राजनीति के उसी घोड़े पर सवार हो पाएंगे जो उन्हें यहां तक लेकर आया है? अब उनकी यात्रा की दिशा क्या होगी? वे किस मुँह से जनता के बीच जाएंगे?

ख़ूबसूरत मौका खोया

दिल्ली जैसे छोटे प्रदेश से एक आदर्श नगर-केंद्रित राजनीति का मौक़ा आम आदमी पार्टी को मिला था उसने धीरे-धीरे काम किया होता तो इस मॉडल को सारे देश में लागू करने की बातें होतीं, पर पार्टी ने इस मौक़े को हाथ से निकल जाने दिया.उसके नेताओं की महत्वाकांक्षाओं का कैनवस इतना बड़ा था कि उसपर कोई तस्वीर बन ही नहीं सकती थी.ज़ाहिर है कि केजरीवाल अब बड़े नेताओं के ख़िलाफ़ बड़े आरोप नहीं लगाएंगे. लगाएँ भी तो विश्वास कोई नहीं करेगा.उन्होंने अपना भरोसा खोया है. पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती अब यह है कि वह अपनी राजनीति को किस दिशा में मोड़ेगी.चंद मुट्ठियों में क़ैद और विचारधारा-विहीन इस पार्टी का भविष्य अंधेरे की तरफ़ बढ़ रहा है.

केजरीवाल की बात छोड़ दें, पार्टी के तमाम कार्यकर्ता ऐसे हैं जिन्होंने इस किस्म की राजनीति के कारण मार खाई है, कष्ट सहे हैं.बहुतों पर मुक़दमे दायर हुए हैं या किसी दूसरे तरीक़े से अपमानित होना पड़ा. वे फिर भी अपने नेतृत्व को सही समझते रहे. धोखा उनके साथ हुआ.संदेश यह जा रहा है कि अब उन्हें बीच भँवर में छोड़कर केजरीवाल अपने लिए आराम का माहौल बनाना चाहते हैं. क्यों?बात केवल केजरीवाल की नहीं है. उनकी समूची राजनीति का सवाल है. ऐसा क्यों हो कि वे चुपके से माफी मांग कर निकले लें और बाकी लोग मार खाते रहें?ऐसी ही एक पूर्व सहयोगी हैं अंजलि दमनिया. शायद अंजलि की बातों पर यक़ीन करके अरविंद केजरीवाल ने नितिन गडकरी के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी थी.अंजलि दमनिया ने 2014 में गडकरी के ख़िलाफ़ चुनाव भी लड़ा.अंजलि और आम आदमी पार्टी का साथ ज़्यादा चला नहीं और उन्होंने 2015 में पार्टी छोड़ दी. उनका कहना है कि ‘मुझ पर 24 मुक़दमे हैं और मैं उन्हें लड़ूंगी.’ ऐसे बहुत से लोग होंगे.अरविंद केजरीवाल किसी एक मामले में माफ़ी मांग रहे होते तो मान लिया जाता कि उन्होंने ज़्यादा सोचा नहीं और भावना में बहकर आरोप लगा दिए.वास्तविकता यह है कि उनकी राजनीति का महत्वपूर्ण दौर आरोपों पर केंद्रित था. वह उनकी राजनीति थी. वे उन आरोपों से अपने को अलग कैसे कर सकते हैं?आरोप लगाना और माफ़ी मांग लेना क्या इतनी मामूली बात है? क्या आरोप लगाते वक्त वे अबोध थे, नादान थे? और अब समझदार हो गए हैं, आरोपों की गंभीरता को समझने लगे हैं? उन्हें राजनीतिक सफलता तो उनकी उसी मासूमियत की मदद से मिली थी. जनता ने तो उन्हें उसी ‘बहादुरी’ का पुरस्कार दिया था.

क़ानूनी-प्रक्रियाओं ने मारा

केजरीवाल के सहयोगी मनीष सिसोदिया कहते हैं कि ‘हम बेकार की बातों पर वक्त बर्बाद नहीं करना चाहते. हम काम करना चाहते हैं.’

अपराध की दुनिया में भटकने वालों की कहानी कुछ ऐसी ही होती है. एक वक़्त ऐसा आता है, जब वे उस दुनिया से भागना चाहते हैं, पर हालात उन्हें भागने नहीं देते.

पार्टी की एक नेता ने अपने ट्वीट में मानहानि के आपराधिक मुक़दमों को क़ानूनी तौर पर स्वीकृत दादागिरी बताया है. पार्टी के सूत्र बता रहे हैं कि क़ानूनी प्रक्रियाओं का सहारा लेकर दबाव बनाया जा रहा था.

व्यावहारिक सच यह है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले ज़्यादातर व्यक्ति इस स्थिति का सामना करते हैं.

राजनीति के लिए पैसा चाहिए और आम आदमी पार्टी सत्ता के उन स्रोतों तक पहुंचने में नाकाम रही जो प्राणवायु प्रदान करते हैं.

विडंबना है कि यह पार्टी इस प्राणवायु के स्रोत बंद करने के नाम पर आई थी और ख़ुद इस ‘ऑक्सीजन’ की कमी की शिकार हो गई.

केवल इसी प्रकरण की बात नहीं है, केजरीवाल पार्टी के भीतर लगातार चल रही उठा-पटक पर नियंत्रण पाने में भी सफल नहीं हुए हैं.

सब कुछ केवल उनके विरोधियों की साज़िश के कारण नहीं हुआ. उनकी नासमझी की भी इसमें भूमिका है.

इन मुक़दमों को एक झटके में ख़त्म करा डालने की कामना भी नासमझी है. वह भी ऐसे मौक़े पर जब उनकी पार्टी तूफ़ानों से घिरी हुई है.

शायद उनकी तरफ़ से इसकी पर्याप्त तैयारी भी नहीं थी. अचानक बिक्रम सिंह मजीठिया ने जब इसकी घोषणा की तो मामले ने बड़े ‘मीडिया झंझावात’ का रूप ले लिया.

अब दिल्ली विधानसभा की 20 सीटों पर उपचुनाव हुए तो केजरीवाल के पास अपने इन अंतर्विरोधों का जवाब नहीं होगा.

उन्हें केवल प्रभावशाली विरोधी नेताओं से माफ़ी नहीं मांगनी है. अपने समर्थकों, दिल्ली की जनता और उन पुराने दोस्तों से भी मांगनी होगी जो साथ छोड़कर चले गए.

इनमें योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे पुराने सहयोगी भी शामिल हैं. यह सूची लंबी है और सबके मन में केजरीवाल की राजनीति को लेकर भारी क्लेश है.

भरोसा टूटा

केजरीवाल की माफ़ी पर भी किसे भरोसा होगा? पिछले चार साल में उन्होंने कितने साथियों को बदला, कितनी तरह की बातें बदलीं और कितनी मुद्राएं अपनाईं?

संभव है कि दिल्ली की झुग्गियों में रहने वालों को उनपर अब भी भरोसा हो. पर समझदार तबके का भरोसा तो एकदम टूटा है.

यह पार्टी देश सार्वजनिक जीवन में छाए भ्रष्टाचार से लड़ने को आई थी. भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हुआ बल्कि अब वह ख़ुद सत्ता के गलियारों में घूम रही है.

इन्हें व्यावहारिकता का पता नहीं था तो वे सत्ता की राजनीति में कूदे ही क्यों? बदलाव की राजनीति और सत्ता की राजनीति के रास्ते अलग-अलग हैं.

दिल्ली के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री के आवास पर आधी रात को उनके साथ मारपीट की गई.

इन बेहद गंभीर आरोपों के बाद दिल्ली पुलिस ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आधिकारिक आवास पर छानबीन की है और सीसीटीवी फुटेज ज़ब्त किए हैं. हमले के आरोप में गिरफ़्तार आम आदमी पार्टी के दो विधायकों अमानतउल्लाह ख़ान और प्रकाश जारवाल को ज़मानत नहीं मिली है.वहीं, आम आदमी पार्टी का कहना है कि मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के आरोप झूठे हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या इस स्तर का अधिकारी झूठे आरोप लगाएगा?कम से कम दिल्ली के पूर्व मुख्य सचिव उमेश सहगल को तो ऐसा नहीं लगता.सहगल कहते हैं, “वो नेता नहीं हैं, ज़रा सा झूठ उनकी नौकरी ले सकता है. उन्होंने मुक़दमा दर्ज करवाया है जिसकी न्यायिक जांच होगी, हो सकता है कि सुनवाई उच्च अदालत में भी हो जाए. वो भली-भांति जानते हैं कि ऐसी स्थिति में झूठ बोलने से वो मुश्किल में पड़ सकते हैं.”उमेश सहगल कहते हैं, “मेरा मानना है कि ये पूरी परिस्थिति बनाई गई है. मुख्य सचिव की नियुक्ति गृह मंत्रालय करता है और ये कोई नया नियम नहीं है. लेकिन पिछले तीन सालों में पहले दिन से ये टकराव की राजनीति कर रहे हैं. हर मुद्दे पर टकराव किया जा रहा है. लेफ़्टिनेंट गवर्नर कुछ कहते हैं तो उन्हें बीजेपी का एजेंट बता दिया जाता है. दरअसल आम आदमी पार्टी ने वादे इतने ज़्यादा कर लिए थे जिन्हें पूरा करना उनके बस का नहीं हैं और वो ये बात जानते हैं. टकराव की राजनीति इस नौबत तक पहुंच गई है कि आज ब्यूरोक्रेट और नेता आपस में लड़ रहे हैं.”

उमेश कहते हैं, “कई बार गुस्से में अपशब्द भी निकल जाते हैं. लेकिन जब ऐसा मुख्यमंत्री जैसे वरिष्ठ व्यक्ति के सामने होता है तो वो स्थिति को संभाल सकते थे. वो अधिकारी से कहते हैं कि डोंट माइंड और नेताओं को भी चुपा देते हैं. हमारे साथ भी कई बार ऐसा हुआ. लेकिन अगर मुख्यमंत्री ही इसमें शामिल हो जाएं तो कोई क्या कर सकता है. मानना बहुत मुश्किल है कि ऐसा हुआ होगा. ”

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं कि ये घटनाक्रम बता रहा है कि दिल्ली की राजनीति ख़राब दिशा में जा रही है.

प्रमोद जोशी कहते हैं, “पिछले तीन साल से हम राजनीतिक टकराव तो देख ही रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी केजरीवाल के निशाने पर रहे लेकिन अगर ब्यूरोक्रेसी को भी इसमें शामिल करेंगे तो इससे राजनीति बेहद ख़राब रास्ते पर चली जाएगी. ”

वो कहते हैं, “मुझे नहीं लगता कि मुख्य सचिव किसी राजनीतिक कारण से ऐसा आरोप लगाएंगे. हो सकता है मारपीट न भी हुई बदतमीज़ी ही हुई हो, लेकिन ये भी ठीक नहीं है.”

आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों की सदस्यता रद्द होने के बाद दिल्ली में उपचुनावों की संभावना भी जताई जा रही है. प्रमोद जोशी कहते हैं, “यदि जल्दी ही कोई उपचुनाव होते हैं तो आम आदमी पार्टी टकराव के माध्यम से ये संदेश देना चाहती है कि हमें काम नहीं करने दिया जा रहा है.”

सत्ता में आने के बाद से ही आम आदमी पार्टी केंद्र की भारतीय जनता पार्टी, केंद्र की ओर से नियुक्त लेफ़्टिनेंट गवर्नर और अधिकारियों पर काम में सहयोग न करने के आरोप लगाती रही है. आम आदमी पार्टी का तर्क है कि वो जनहित में काम करना चाहती है, लेकिन केंद्र सरकार और एलजी उसे काम नहीं करने दे रहे हैं.

मुख्य सचिव के आरोपों के बाद भी आम आदमी पार्टी यही तर्क दे रही है. लेकिन आम आदमी पार्टी के इस तर्क में कितना दम है?

प्रमोद जोशी कहते हैं, “दिल्ली की स्थिति अलग है, ये एक केंद्र शासित प्रदेश भी है. अगर कोई विवाद का विषय है तो उसमें अदालत की व्यवस्था का इंतज़ार करना चाहिए. झगड़े फसाद करके, मारपीट करके या आरोप लगाकर वो हल नहीं होगा. 1993 में संवैधानिक संशोधन हुआ था, तब से कोई विवाद नहीं हुआ तो फिर अब ही इस तरह के विवाद क्यों हो रहे हैं?”

प्रमोद जोशी ये भी कहते हैं कि आम आदमी पार्टी जिन मूल्यों को लेकर राजनीति में आई थी और जो बहुमत लेकर आई थी उसको ध्यान में रखते हुए इस तरह की बातें पार्टी को शोभा नहीं देती.

वो कहते हैं, “इस पूरे प्रकरण से आम आदमी पार्टी को कोई फ़ायदा होता नहीं दिख रहा है लेकिन यदि ये अदालत में साबित हो गया कि मुख्य सचिव झूठ बोल रहे थे तब ज़रूर आप को फ़ायदा होगा. लेकिन मुख्य सचिव कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हैं. ये मानना मुश्किल है कि वो झूठ बोल रहे होंगे.”

दिल्ली से भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी कहती हैं कि ये घटनाक्रम अरविंद केजरीवाल की तानाशाही राजनीति की ही झलक है.

लेखी कहती हैं, “लोकतंत्र के अंदर राजनीति लोकतांत्रिक भाषा में होती है. केजरीवाल के चार सालों के क्रियाकलापों को देखा जाए तो समझ आता है कि उनकी राजनीति तानाशाही की राजनीति है. इस तरह का खिलवाड़ वही लोग कर सकते हैं जिनका क़ायदे क़ानून या लोकतंत्र में कोई विश्वास ही न हो.”

लेखी कहती हैं, “केजरीवाल काम करने की नीयत से आए ही नहीं हैं, बल्कि ये अपने आप को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना चाहते थे. दिल्ली का तो बस ये इस्तेमाल कर रहे हैं. इन्होंने वादे बहुत ज़्यादा कर लिए और अब उन्हें पूरा नहीं कर पा रहे हैं तो जनता का ध्यान भटकाने के लिए विवादों का सहारा ले रहे हैं.”

दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी सभी आरोपों को खारिज करते हुए तर्क दे रही है कि केंद्र की भाजपा सरकार दिल्ली में उनकी सरकार को बर्खास्त करने के बहाने खोज रही है. आप विधायक सौरभ भारद्वाज कहते हैं, “सब जानते हैं कि हमें काम नहीं करने दिया जा रहा है. हम जो भी करना चाह रहे हैं उसमें हर स्तर पर रोड़े अटकाए जा रहे हैं और अब बात यहां तक आ गई है कि मुख्य सचिव से झूठ बुलवाया गया.”

सौरभ भारद्वाज कहते हैं, “बीजेपी इस समय दिल्ली में गुप्त सर्वे करवा रही होगी. अगर उन्हें लगेगा कि दिल्ली सरकार को बर्खास्त करके वो चुनाव जीत सकते हैं तो वो दिल्ली सरकार को बर्खास्त कर देंगे और अगर उन्हें लगेगा कि अब भी केजरीवाल जीत जाएगा तो वो सरकार को बर्खास्त नहीं करेंगे. ये मामला बस इतना ही है.”

सौरभ भारद्वाज कहते हैं, “जब शुरू-शुरू में हमारे साथ ये सब होता था तो हम सोचते थे, लेकिन अब ये सब हमारे लिए आम बात हो गई है. हमें उच्च वर्ग की राय की परवाह नहीं हैं. हम दिल्ली के आम लोगों के लिए काम कर रहे हैं और लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं हमें बस इससे फ़र्क पड़ता है, हमें बस लोगों के लिए काम करना है.”

 

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