Pages Navigation Menu

Breaking News

जेपी नड्डा बने भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष

जिनको जनता ने नकार दिया वे भ्रम और झूठ फैला रहे है; प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

भारत में शक्ति का केंद्र सिर्फ संविधान; मोहन भागवत

सुप्रीम कोर्ट राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद

premises-photo-camera-television-journalistसुप्रीम कोर्ट राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले में शनिवार (9 नवंबर 2019) को फैसला सुनाएगा। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चन्द्रचूड़़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पांच सदस्यीय संविधान पीठ शनिवार की सुबह साढ़े 10 बजे यह फैसला सुनाएगी। संविधान पीठ ने 16 अक्ट्रबर को इस मामले की सुनवाई पूरी की थी। पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले में सुनवाई की।इससे पहले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक से मुलाकात करके अयोध्या और राज्य के अन्य हिस्सों में कानून-व्यवस्था का जायजा लिया था। सूत्रों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री और मुख्य न्यायाधीश ने अयोध्या राम जन्म भूमि- बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले को लेकर अयोध्या और राज्य के अन्य संवेदनशील स्थानों में स्थिति की समीक्षा की। राज्य के शीर्ष अधिकारियों ने न्यायमूर्ति गोगोई को बताया कि वे पूरी तरह से तैयार हैं और कानून-व्यवस्था बनाये रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाये गए हैं।

पहला दिन
6 अगस्त को शुरू हुई रोजाना सुनवाई के पहले दिन निर्मोही अखाड़ा ने 2.77 एकड़ विवादित जमीन पर अपना दावा किया था। उन्होंने कहा कि पूरी विवादित भूमि पर 1934 से ही मुसलमानों को प्रवेश की मनाही है।

दूसरा दिन
सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े से जानना चाहा कि विवादित स्थल पर अपना कब्जा साबित करने के लिए क्या उसके पास कोई राजस्व रिकॉर्ड और मौखिक साक्ष्य है। इस पर निर्मोही अखाड़े ने कहा कि साल 1982 में डकैती हुई थी, जिसमें हमने सारे रिकॉर्ड खो दिए।

तीसरा दिन
संविधान पीठ ने पूछा कि एक देवता के जन्मस्थल को न्याय पाने का इच्छुक कैसे माना जाए, जो इस केस में पक्षकार भी हो। वकील ने कहा, हिंदू धर्म में किसी स्थान को पवित्र मानने और पूजा करने के लिए मूर्तियों की जरूरत नहीं है।

सातवां दिन
राम लला विराजमान की ओर से दलील दी गई कि विवादित स्थल पर देवताओं की अनेक आकृतियां मिली हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता सी एस वैद्यनाथन ने संविधान पीठ के समक्ष अपनी दलीलों के समर्थन में विवादित स्थल का निरीक्षण करने के लिए अदालत द्वारा नियुक्त कमिश्नर की रिपोर्ट के अंश पढ़े।

16वां दिन
अयोध्या मामले में हुई सुनवाई में उच्चतम न्यायालय ने शिया बोर्ड के वकील को भी सुना। इस दौरान शिया बोर्ड ने कहा कि हमने इमाम तो सुन्नी रखा लेकिन मुतवल्ली हम ही थे। पीठ ने वकील से सवाल किया कि जब 1946 में उनकी अपील खारिज हो गई थी तो उन्होंने अपील क्यों नहीं की। धींगरा ने कहा कि हम डरे हुए थे।

19वां दिन
मुस्लिम पक्षकारों ने दलील दी कि लगातार नमाज ना पढ़ने और मूर्तियां रख देने से मस्जिद के अस्तित्व पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। मुस्लिम पक्ष ने कहा कि यह सही है कि विवादित ढांचे का बाहरी अहाता शुरू से निर्मोही अखाड़े के कब्जे में रहा है।

24वां दिन
अयोध्या मामले की सुनवाई के 24वें दिन मुस्लिम पक्षकारों के वकील ने कहा है कि जन्मस्थान कानूनी व्यक्ति नहीं है। वहीं, हिंदू पक्षकार की ओर से आस्था और विश्वास के साथ-साथ जन्मस्थान और जन्मभूमि को लेकर दलील दी गई।

27वां दिन
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकारों की पैरवी करने पर अधिवक्ता राजीव धवन को आपत्तिजनक पत्र लिखने वाले 88 वर्षीय सेवानिवृत्त लोकसेवक के खिलाफ अवमानना का मामला बंद कर दिया। पीठ ने धवन को आगाह किया कि भविष्य में इस तरह की हरकत की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए।

31वां दिन
अयोध्या में खुदाई के बाद हिंदू मंदिरों के प्रमाण होने की संबंधी पुरातत्व विभाग (एएसआई) की रिपोर्ट पर सवाल उठाने पर उच्चतम न्यायालय ने सुन्नी बोर्ड को फटकारा और कहा वह इस रिपोर्ट पर सवाल नहीं उठा सकते।

36वां दिन
मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पांच जजों की पीठ ने रामजन्मस्थान पुनरोद्धार समिति को नया तथ्य रखने से रोक दिया। पीठ ने कहा, भरोसा रखिए, हम ऐसा फैसला देंगे जिसे हमें देने की जरूरत है।

39वां दिन
कोर्ट ने कहा कि हिन्दू और मुस्लिम के पास विवादित स्थल के टाइटल के ठोस और पर्याप्त सबूत नहीं हैं। ऐसे में क्या भूमि किसी तीसरे पक्ष यानी सरकार को जमीन दी जा सकती है।

40वां दिन
उच्चतम न्यायालय ने अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले की सुनवाई पूरी कर ली और कहा, फैसला बाद में सुनाएगा।

अयोध्या सुनवाई 31वां दिन: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- सुन्नी बोर्ड एएसआई रिपोर्ट पर सवाल नहीं उठा सकता

अयोध्या में खुदाई के बाद हिंदू मंदिरों के प्रमाण होने की संबंधी पुरातत्व विभाग (एएसआई) की रिपोर्ट पर सवाल उठाने पर उच्चतम न्यायालय ने सुन्नी बोर्ड को फटकारा और कहा वह इस रिपोर्ट पर सवाल नहीं उठा सकते। उन्हें ट्रायल कोर्ट में सवाल उठाने चाहिए थे तब उठाए नहीं, अब उन्हें अपीलीय अदालत में ऐसा नहीं करने दिया जा सकता। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने कहा कि सुन्नी सेंट्रल बोर्ड की वकील मीनाक्षी अरोड़ा से कहा कि एएसआई की रिपोर्ट और उसके निष्कर्षों पर सवाल उठाने का हक नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट में वह दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 26, रूल 10(2) के तहत इस रिपोर्ट पर सवाल उठा सकते थे। लेकिन इस अधिकार को उन्होंने हाईकोर्ट में नहीं इस्तेमाल किया, इसलिए अब उन्हें इस रिपोर्ट की सत्यता पर सवाल नहीं उठाने दिया जा सकता।

यह किया था सवाल

बोर्ड की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने सवाल किया था कि हाईकोर्ट में दी गई एएसआई रिपोर्ट के निष्कर्षों पर रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञों (बीआर मनी और हरिमांझी) के हस्ताक्षर नहीं हैं। और निष्कर्ष तथा मुख्य रिपोर्ट में एकरूपता का अभाव है।

विशेषज्ञ सबूत

र्हाइकोर्ट ने 2003 में पुरातत्व विभाग से अयोध्या में विवादित स्थल की खुदाई कर यह पता लगाने के लिए कहा था कि यहां कोई मंदिर था या नहीं। इस रिपोर्ट को कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट माना और इस पर सवाल जवाब करने की अनुमति नहीं दी। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सीपीसी के आदेश 26, रूल 10 के अनुसार कोर्ट द्वारा मांगी गई रिपोर्ट कोर्ट का रिकॉर्ड हो जाती है जिस पर सवाल जवाब करने के लिए पक्षों को अनुमति नहीं है। फिर भी आप हमें इस बात पर संतुष्ट कीजिए कि पहली अपील पर हम आपको क्यों सुने, क्योंकि नियम के मुताबिक ये विशेषज्ञ सबूत हैं।

निर्माण काल का पता

मीनाक्षी अरोड़ा कल इस पर अपनी बात रखेंगी। अरोड़ा ने कहा कि रिपोर्ट में यह नहीं बताया कि वहां मंदिर किसने और किस काल मे बनाया। विक्रमादित्य कई राजाओं की पदवी रही है। ये दावा ठोस नहीं है। खुदाई के दौरान मिले सबूतों के कालखंड निर्णय करना ज़रूरी है जिससे निर्माण काल का पता चलता है।

ईदगाह मुद्दा लिखित दलीलों में नहीं था

जस्टिस एसए बोबड़े ने कहा कि यहां इसकी क्या अहमियत होगी। नीचे मंदिर का ढांचा तो मिला है। उसके निर्माण किस कालखंड में हुआ यह अहम नहीं है। सुनवाई के दौरान अरोड़ा ने कहा कि यहां पहले ईदगाह थी जिसे बाद में मस्जिद में तब्दील किया गया। क्योंकि 1523 में बाबर के आने से पहले भारत में दिल्ली सल्तनत का राज था और इस हिस्से में मुस्लिम मौजूद थे। इस पर जस्टिस भूषण ने कहा कि ईदगाह का मुद्दा आपकी लिखित दलीलों में नहीं था, यह बात गवाहों ने कही है जिसका कोई अर्थ नहीं है।

रामचबूतरे पर स्वीकारोक्ति से पलटा बोर्ड  

मंगलवार को यह स्वीकारने के बाद कि विविादित स्थल पर रामचबूतरा ही रामजन्म स्थान है सुन्नी व×क्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी गुरुवार को कहा कि रामचबूतरे को भगवान राम का जन्मस्थान नहीं मानते। उन्होंने कहा कि मंगलवार को वह 1886 के जिला अदालत का आदेश की जानकारी दे रहे थे जिसमें यह कहा गया है। इस पर जस्टिस बोबड़े ने कहा कि इसका मतलब 1886 का जिला जज का फैसला आज भी बरकरार है। क्योंकि इसे किसी ने चुनौती नहीं दी।

अयोध्या सुनवाई का 27वां दिन: मुस्लिम पक्ष के वकील की संविधान पीठ से हुई नोकझोंक, मांगी माफी

उच्चतम न्यायालय में गुरुवार को रामजन्मभूमि विवाद की सुनवाई के दौरान केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्ति के मुद्दे पर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन की संविधान पीठ से नोकझोंक हो गई। हालांकि, बाद में धवन ने मांफी मांगी और सुनवाई आगे बढ़ी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ के सामने सुनवाई शुरू होते ही धवन ने कहा, ‘इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि विवादित स्थल पर केंद्रीय गुंबद के नीचे मूर्ति थी। जो भी गवाह इस बारे में सामने आए हैं, उन्होंने किसी और से सुनी हुई बातें ही अदालत में कही हैं। वे खुद कभी विवादित स्थल पर नहीं गए। उनके बयानों में विरोधाभास है। ऐसे में उन्हें सबूत नहीं माना जा सकता।’

इस पर पीठ में शामिल जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, ‘ऐसा नहीं है। इस बात के सूबत हैं। इलाहाबद उच्च न्यायालय ने इन सबूतों को स्वीकार किया है।’ जस्टिस भूषण ने धवन से एक विशेष पेज पढ़ने को कहा, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। साथ ही रूखे स्वर में कहा, ‘यह सबूत ही नहीं है। हिंदू पक्ष के वकील वैद्यनाथन ने भी इसे नहीं पढ़ा है।’ जस्टिस भूषण ने इस पर थोड़े सख्त लहजे में कहा, ‘यह क्या बात हुई? आप सिर्फ इसलिए यह सबूत नहीं पढ़ना चाहते, क्योंकि इसे दूसरे पक्ष ने नहीं पढ़ा है। आप इसे पढ़ें, इसे जजों ने स्वीकार किया है। इस पर विश्वास किया जाए या नहीं, यह मुद्दा नहीं है।’

जस्टिस भूषण के इतना कहने पर धवन ने कहा कि उनसे आक्रमक तरीके से नहीं बोला जा सकता। यह ठीक नहीं है। इस पर हिंदू पक्ष के वकील सीएस वैद्यनाथन खड़े हो गए और कहा कि यह पीठ का अपमान है। उन्हें जज के लिए ऐसे शब्द कहने का कोई अधिकार नहीं है। बीच में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि धवन को सबूत पढ़ना चाहिए, इसमें कोई समस्या नहीं है। चारों ओर से घिरता देख धवन ने माफी मांगी और सबूत को पढ़ना शुरू किया।

सबूत में क्या है

यह सबूत 1934 में एक 80 वर्षीय गवाह के अपने नाना के साथ विवादित स्थल पर जाने की घटना से जुड़ा था। तब उसकी उम्र 15 वर्ष थी। गवाह ने 2000 में दिए बयानों में कहा था कि लोहे की रेलिंग के पीछे उसने मूर्ति के दर्शन किए थे। यह नौ से दस इंच ऊंची थी। उसने कहा था कि वहां एक चित्र था।

धवन की दलील

धवन ने कहा, गवाह ने पहले बताया कि केंद्रीय गुंबद के नीचे चित्र था और बाद में कहा कि नाना ने बताया था कि वहां मूर्ति भी थी। यही नहीं, वह वहा किस रास्ते से गया, किससे वापस आया, परिक्रमा कैसे की, यह भी स्पष्ट नहीं बताया है। साफ है कि गवाह ने सुनकर यह कहा है। इसे सबूत नहीं माना जा सकता।

पीठ का पक्ष

जस्टिस भूषण ने कहा कि हम यह नहीं कह रहे कि इसे सबूत माना जाए या नहीं। हमारा यही कहना है कि मूर्तियों के बारे में गवाह व साक्ष्य हैं।  यह नहीं कहा जा सकता कि इस बारे  में सबूत नहीं हैं।

‘वाजिद अली शाह के जमाने में लगी ग्रिल’ 

मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव ने कहा कि विवादित स्थल पर ग्रिल वर्ष 1855 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के जमाने में लगाई गई थी। बाहरी अहाते में राम चबूतरा ही स्थान माना जाता रहा है। जन्मभूमि शब्द वर्ष 1885 के बाद आया। अंदरूनी हिस्से में मूर्तियों बारे में सिर्फ इन्हीं गवाहों ने ही बताया है। इसके बाद सुनवाई दो बजे के लिए स्थगित हो गई। दो बजे बताया गया कि मुख्य न्यायाधीश की तबीयत ठीक नहीं होने के कारण बेंच नहीं बैठेगी। मामले में अब सुनवाई शुक्रवार को होगी।

अयोध्या सुनवाई 32वां दिन: मुस्लिम पक्ष की दलील- विवादित ढांचे के नीचे हो सकता है ईदगाह

राम जन्मभूमि विवाद मामले में 32वें दिन मुस्लिम पक्ष कि ओर से भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) की रिपोर्ट पर उठाए गए सवालों पर उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अदालत विशेषज्ञों के निष्कर्ष पर कोई राय नहीं रख सकती। मुस्लिम पक्ष की वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एसए बोब्डे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नजीर की पीठ के समक्ष दलील दी कि विवादित ढांचे के नीचे एक ईदगाह हो सकता है। वहां एएसआई की खुदाई में मिले दीवारों के अवशेष ईदगाह के हो सकते हैं। हिंदू मंदिर के नहीं। पूरी रिपोर्ट विरोधाभासों से भरी है। इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि विशेषज्ञों की निष्कर्षों पर कोर्ट अपनी राय नहीं रख सकता।

जस्टिस अशोक भूषण ने कहा, मुस्लिम पक्ष का ये मानना रहा है कि मस्जिद खाली जगह पर बनाई गई, पर अब आप कह रही हैं कि उसके नीचे ईदगाह थी, ऐसा था तो आपकी दलीलों में ये शामिल क्यों नही था। मीनाक्षी ने कहा ये बात तो 1989 में सामने आई, जब हिंदू पक्ष ने मुकदमा दायर कर दावा किया कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी। अरोड़ा ने कहा कि पुरातत्व विभाग ने खुद स्वीकार किया था कि उसे खुदी सतहों की स्ट्रेटोग्राफिक पहचान करने में दिक्कत हुई थी। उन्होंने नौ संस्कृतियों के आधार पर नौ कालखंडों के बारे में बताया लेकिन इन सभ्यताओं का मन्दिर से कोई लेना देना नहीं है।

विभाग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि वहां हर जगह अवशेष थे और बाबरी मस्जिद के बारे में कुछ नहीं बताया लेकिन उन्होंने रामचबूतरे के स्थान को रामचबूतरा बताया है। खुदाई में मिले ढांचे के निर्माण में सुरखी-चूने का प्रयोग किया गया है जिसे मुसलमान भारत लाए थे। वहीं जिसे एएसआई ने शिवालय बताया है उसके चित्र देखकर नहीं लगता कि यह शिवालय रहा होगा, क्योंकि इसमें परनाला कटा हुआ दिख रहा है।

रिपोर्ट बताती है कि नीचे यह चार मंजिला भवन था। लेकिन ये मंजिलें एक के बाद एक बनी हैं क्योंकि पहली जमीन में धंसती गई और उसके ऊपर और बना दिया गया। उस पर खंबे जुड़ते गए। जस्टिस बोब्डे ने कहा कि जो पुरावशेषों से किसी ढांचे की मूल संरचना को फिर से नहीं बुना जा सकती।  सुनवाई कल शुक्रवार को जारी रहेगी।

रिपोर्ट पर सवाल उचित नहीं 

वकील राजीव धवन ने कहा कि मुझे पुरातत्व विभाग कि रिपोर्ट पर कुछ बातें कोर्ट के सामने रखना चाहता हूं। धवन ने कहा कि ट्रायल के दौरान पुरातत्व विभाग कि रिपोर्ट के खिलाफ आपत्ति की गईं थी, लेकिन कोर्ट ने उसे स्वीकार नहीं किया। धवन ने कहा कि दीवानी संहिता आदेश 26 रूल 10 में किसी भी तरह के दखल से दूसरे मामलों पर असर होगा, यह संहिता के तहत बनाये जाने वाले कमिश्नर की अवधारणा को प्रभावित करेगा। लेकिन कोर्ट रिपोर्ट में विरोधाभासों पर सुनवाई कर सकता है।

नवम्बर तक फैसला आने की उम्मीद से प्रसन्न हैं संत   

सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि मामले की सुनवाई के दौरान गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की ओर से सभी पक्षों को 18 तक अपनी बहस पूरी कर लेने की स्पष्ट हिदायत के बाद तय हो गया है कि कोर्ट 17 नवम्बर के पहले अपना फैसला सुनाने का पूरा मन बना चुकी है। इसके लिए मुख्य न्यायाधीश के कड़े रुख के बाद रामनगरी का संत समाज मुदित है कि अब नवम्बर तक हर हाल में फैसला आ ही जाना है। संत समाज का यह भी दृढ़ मत है कि फैसला तो रामलला के ही हक में आएगा।

 

रामजन्मभूमि केस: विवादित स्थल पर ही जन्म हुआ, सबूत पेश करें

उच्चतम न्यायालय में बुधवार को रामजन्मभूमि विवाद पर सुनवाई के नौवें दिन रामजन्म पुनरोद्धार समिति के वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि अथर्व वेद में अयोध्या की पवित्रता का जिक्र किया गया है। इसमें कहा गया है कि अयोध्या में एक मंदिर है, जिसमें पूजा करने से मुक्ति मिलती है। इस पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि अयोध्या की पवित्रता पर कोई संदेह नहीं। आप विवादित स्थल के ही जनस्थान होने के साक्ष्य पेश करें।

जन्मस्थान नहीं बांटा जा सकता

मिश्रा से पहले रामलला विराजमान के वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन ने अपनी बहस पूरी की। उन्होंने कहा कि भगवान राम शाश्वत बालक हैं। लिहाजा भूमि पर किसी अन्य के स्वामित्व का सवाल नहीं उठता और उनके जन्मस्थान को बांटा नहीं जा सकता है। उच्च न्यायालय ने प्रतिकूल कब्जा होने के आधार पर मुस्लिम पक्ष और निर्मोही अखाड़े को दो हिस्से जमीन दे दी, जबकि ये प्रतिकूल कब्जा कभी था ही नहीं।

स्कंद पुराण में जन्मस्थान का जिक्र

इसके बाद वरिष्ठ अधिवक्ता मिश्रा ने रामजन्म पुनरोद्धार समिति की ओर से बहस शुरू की। उन्होंने कहा कि स्कंद पुराण में स्पष्ट रूप से जन्म के स्थान का जिक्र किया गया है। इसमें इसकी सटीक दिशा और स्थल तक बताया गया है। यह पुराण पहली से दूसरी शति ईसापूर्व का है। उन्होंने कहा कि अथर्व वेद में भी अयोध्या की पवित्रता का जिक्र किया गया है। साथ ही बताया गया है कि वहां एक मंदिर है, जिसके शिखर पर अमल है और जिसमें पूजा करने से जीवन में मुक्ति मिलती है। इस पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने उनसे कहा कि अध्योध्या के पवित्र होने पर कोई संदेह ही नहीं है। विरोधी पक्ष भी इस बात को मानता है। यहां सवाल राम के जन्मस्थान का है। आप इस बारे में सबूत दिखाकर प्रदर्शित करें कि विवादित स्थल ही जन्मस्थान है।

सरयू नदी ने मार्ग बदला या नहीं

मिश्रा ने कहा कि स्कंद पुराण में एक नक्शा भी है, जिसमें बताया गया है कि सरयू नदी के किनारे मंदिर है और उसके उत्तर पूर्व में राम का जन्मस्थान है। इस नक्शे से बड़ा कोई और सबूत नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि पुराणों का संपादन महर्षि वेदव्यास ने किया था। आदिकाल से अयोध्या को राम का जन्मस्थान माना जाता है। इस नक्शे के तथ्य को हाईकोर्ट ने भी माना है और उसका न्यायिक संज्ञान लिया है। इस पर मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि स्कंद पुराण आठवीं सदी ईसापूर्व का है और तब से लेकर अब तक नदी ने अपना मार्ग नहीं बदला होगा, यह नहीं कहा जा सकता। यह देखना होगा कि आज सरयू नदी जहां बह रही है, क्या ईसापूर्व आठवीं सदी में भी वहीं बहती थी। अदालत को इस पर विचार करना होगा।

हिंदू महासभा के वकील नहीं कर सके बहस

मुख्य न्यायाधीश गोगोई ने मिश्र की बहस बीच में ही रोक दी। साथ ही कहा कि वह इस नक्शे के बारे में और तथ्य जुटाएं, फिर अपने तर्क पेश करें। इसके बाद गोगोई ने हिंदू महासभा से जिरह के लिए कहा, लेकिन उसके वकील भी तैयार नहीं थे। हिंदू महासभा ने कहा कि उसे नहीं लग रहा था कि उसका नंबर आज आ जाएगा। अंत में न्यायालय ने मुख्य वादकर्ता गोपाल सिंह विशारद के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता रंजीत कुमार को बहस के लिए कहा। कुमार ने कहा कि वह राम के श्रद्धालु हैं। इस नाते 1949 में मुकदमा दायर किया था। उन्होंने बताया कि गोपाल सिंह की मृत्यु 1985 में हो गई थी। उनकी जगह उनके बेटे राजेंद्र सिंह वादी हैं।

हिंदी दस्तावेज पढ़ने की अनुमति नहीं

कुमार ने बहस शुरू करने के लिए हिंदी में कुछ पढ़ना चाहा, लेकिन अदालत ने इसकी अनुमति नहीं दी। साथ ही कहा कि उन्हें इसका अंग्रेजी अनुवाद लाना चाहिए था, क्योंकि बेंच के जज एएस नजीर हिंदी नहीं समझते। जस्टिस नजीर कर्नाटक से हैं। कुमार ने कहा कि अंग्रेजी अनुवाद है, लेकिन वह स्पष्ट नहीं है। हालांकि बाद में उन्होंने इसी अनुवाद को पढ़कर बहस शुरू की, लेकिन अदालत का समय पूरा होने के कारण सुनवाई गुरुवार के लिए स्थगित हो गई।

 

नरसिम्हा राव अगर ये कदम उठाते तो बच सकती थी बाबरी मस्जिद, आखिर क्या थी उनकी मजबूरी

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ दिनों में आ सकता है. इसे लेकर यूपी सहित देशभर में सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं. विवादित भूमि पर स्थ‍ित बाबरी मस्जिद के ढांचे को 6 दिसंबर 1992 को गिरा दिया गया था. तब देश में नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी. अयोध्या मामले में नरसिम्हा राव बुरी तरह से फंस चुके थे. हालांकि, अगर वे समय रहते कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर देते तो शायद मस्जिद बच जाती, लेकिन राव ने ऐसा नहीं किया. आखिर उनके सामने ऐसी क्या मजबूरी थी?

बाबरी मस्जिद पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव का समाधान बहुत सीधा था. वे यह चाहते थे कि दोनों धार्मिक समूहों को आपस में बात करके मस्जिद के पास ही एक मंदिर का निर्माण करना चाहिए और मस्जिद को सही-सलामत छोड़ देना चाहिए. उनका कहना था कि दोनों पक्षों में से कोई अगर इस पर सहमत नहीं होता है, तो अदालत का फैसला अंतिम होगा.

जब VHP ने की कारसेवा की घोषणा

30 अक्टूबर 1992 को विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने यह धमाकेदार घोषणा की थी कि 6 दिसंबर को विवादित ढांचे की बगल में मौजूद यूपी सरकार द्वारा अधिगृहीत भूमि पर कार सेवा की जाएगी. वीएचपी ने वादा किया था कि मस्जिद को हाथ नहीं लगाया जाएगा और प्रतीकात्मक पूजा बाहरी अहाते तक ही सीमित रहेगी. लेकिन इससे यह तय हो गया था कि 6 दिसंबर 1992 को करीब एक लाख हिंदू कारसेवक मस्जिद के नजदीक जमा होने वाले थे. तब यूपी में कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली बीेजेपी की सरकार थी.

इंडिया टुडे मैगजीन के अनुसार, उस साल 19 नवंबर के बाद से ही खुफिया एजेंसियों की तरफ से यह दबाव आने लगा था कि राव को यूपी सरकार बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू कर देना चाहिए. राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति (CCPA) की 19 और 22 नवंबर को हुई दो बैठकों में इंटेलीजेंस ब्यूरो (IB) ने यह रिपोर्ट दी थी कि आरएसएस के लोग ढांचे को गिराना चाहते हैं. इसलिए आईबी ने कहा था कि कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर हालात संभाल लेना चाहिए, क्योंकि 22 और 24 नवंबर को ही कोई सख्त कार्रवाई की जा सकती है, उसके बाद कोई कार्रवाई की गई तो देश में बड़े पैमाने पर टकराव हो जाएगा.

तब कांग्रेस के दिग्गज नेता अर्जुन सिंह भी इस बात के लिए दबाव बना रहे थे. तब राव ने सिर्फ कानूनी पहलुओं पर ही ध्यान दिया, लेकिन उन कानूनी पहलुओं पर नहीं जो संविधान के मुताबिक उन्हें राज्य सरकार को बर्खास्त करने की क्षमता के रूप में मिला था.

कल्याण सिंह और संघ ने राव को बेवकूफ बनाया!

संघ परिवार के लोग यह चाहते थे कि किसी बड़ी कार्रवाई होने तक कल्याण सिंह की सरकार बनी रहे. इसलिए कल्याण सिंह ने अपने को नरम दिखाने की कोशिश की. उन्होंने 3 दिसंबर से ही नरसिम्हा राव सरकार को यह संदेश देना शुरू किया कि उनकी पार्टी पीएम के साथ पूरा सहयोग करने को तैयार हैं. राव की इस बात के लिए भी आलोचना की जाती है कि आखिर उन्होंने संघ परिवार के आश्वासन पर भरोसा कैसे कर लिया. क्या वे वास्तव में इतने भोले थे, या उन्होंने जानबूझकर एक चुप्पी साध रखी थी?

राष्ट्रपति शासन के बारे में राव ने क्या कहा

इसके बाद जनवरी 1993 में नरसिम्हा राव के एक इंटरव्यू में जब इंडिया टुडे ने उनसे यह सवाल किया कि उन्होंने सख्त कार्रवाई करते हुए प्रदेश सरकार को बर्खास्त क्यों नहीं किया तो उन्होंने कहा था, ‘अगर उन्हें मस्जिद ध्वस्त ही करना था, इसका कोई भी तरीका हो सकता था. हमारे पहुंचने से पहले ही उसे उड़ाया जा सकता था. राष्ट्रपति के दस्तखत से उन्हें नहीं समझाया जा सकता था. तब किसी राज्य सरकार की जिम्मेदारी भी नहीं रहती.’

राव ने कहा, ‘मुझे मस्जिद की अधिक चिंता थी. मुझे आश्वासनों पर भरोसा करना ही पड़ता. संविधान की मर्यादा की रक्षा भी आवश्यक थी. सभी वर्गों के लिए जो बात सही होती मुझे उसका ध्यान रखना था. मैं इन सबकी अनदेखी कर अपनी पर ही कायम नहीं रह सकता था. मैं नहीं समझता कि किसी दूसरे प्रधानमंत्री ने ऐसी हालात में इससे भिन्न रवैया अपनाया होता.’

राव ने आपात योजना बनाने को कहा था

पत्रकार विनय सीतापति ने अपनी किताब ‘आधा शेर’ में कहा है कि बिगड़ते हालात में नरसिम्हा राव ने गृह सचिव माधव गोडबले को मस्जिद का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की आपात योजना बनाने को कहा था. उन्होंने राव को एक गुप्त योजना भेजी भी. इस योजना में केंद्रीय बलों द्वारा बाबरी मस्जिद पर अधिकार के तरीकों का उल्लेख था. इसमें लिखा था कि अनुच्छेद 356 को लागू करना होगा. साथ ही इसमें यह चेतावनी भी दी गई थी कि ढांचे की सुरक्षा को कुछ घंटों के लिए खतरा हो सकता है. तब एसबी चव्हाण गृह मंत्री थे. गृह मंत्रालय ने अपनी राय रखी कि यदि यूपी में राष्ट्रपति शासन लागू करना है तो इसे 6 दिसंबर से पहले करना होगा.

शायद ये थीं राव की मजबूरियां

इंदिरा गांधी के विपरीत नरसिम्हा राव हिंसक टकराव से बचने को प्राथमिकता देते थे. असल में कल्याण सिंह ने पूरे नवंबर महीने में कोई गलती नहीं की थी. अगर राव उस समय 356 का इस्तेमाल करते तो सुप्रीम कोर्ट उनके फैसले को यह कहकर असंवैधानिक करार दे सकता था कि अभी कानून-व्यवस्था की स्थ‍िति बिगड़ी नहीं  है.

इसके अलावा कुछ स्रोतों में यह भी कहा गया है कि राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCPA) में इस बात को लेकर आमराय नहीं थी. ‘आधा शेर’ के मुताबिक उस समय के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा से राव के रिश्ते भी अच्छे नहीं थे. अगर शर्मा पीएम राव की यह सिफारिश पुनर्विचार के लिए वापस कर देते तो इन आरोपों को बल मिलता कि केंद्र सरकार संविधान के खिलाफ काम कर रही है.

एक और गलत समीकरण था उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का. यूपी के राज्यपाल यदि राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश करते तो नरसिम्हा राव यूपी सरकार को बर्खास्त करने के लिए इसको आधार बना सकते थे. लेकिन तत्कालीन राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी की नियुक्ति राव के पूर्ववर्ती पीएम वी.पी. सिंह ने की थी. इसलिए इस बात की आशंका थी कि वह केंद्र के प्रभाव में नहीं आते. 1 दिसंबर 1992 को रेड्डी ने केंद्र को भेजी अपनी रिपोर्ट में कहा था, ‘सामान्य कानून-व्यवस्था की स्थ‍िति विशेषकर सांप्रदायिक मोर्चे पर संतोषजनक है.’ शायद यही वे समीकरण थे जिसकी वजह से राव अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल करने से हिचक गए.

राजीव गांधी और अशोक सिंघल के रिश्ते ने अयोध्या में राम मंदिर की जमीन की राह तैयार की

नई दिल्ली. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ताला खुलवाकर अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के राम मंदिर आंदोलन को आधार दिया, तो तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह की एक अहम सलाह ने जन्मभूमि की जमीन हासिल करने की राह आसान कर दी।

वाकया यह था कि 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के सिविल जज के सामने राम जन्मभूमि में पूजा की अनुमति मांगी थी। 1961 में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने विवादित क्षेत्र का मालिकाना हक मस्जिद के पक्ष में मांगा था। इससे पहले निर्मोही अखाड़े ने 1959 में मंदिर का प्रबंधन अपने हाथ में लेने को लेकर केस दाखिल किया था। यानी हिंदू पक्ष की ओर से जो भी केस दायर हुआ था, उसमें कहीं भी जमीन के मालिकाना हक की मांग नहीं थी, बल्कि सिर्फ पूजा-पाठ और प्रबंधन को लेकर केस दाखिल हुए थे।

जब राम मंदिर का आंदोलन तेजी पकड़ने लगा और राजीव गांधी ने ताला खुलवाया, तब सरकार के गृह मंत्री बूटा सिंह ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता दिवंगत शीला दीक्षित के जरिए विहिप के अशोक सिंघल को संदेश भेजा था कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल किसी केस में जमीन का मालिकाना हक नहीं मांगा गया है और ऐसे में उनका केस हारना लाजिमी है।

प्रयागराज में पड़ोसी थे गांधी-नेहरू और सिंघल परिवार
इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में नेहरू परिवार और अशोक सिंघल के परिवार का घर आमने-सामने था और दोनों परिवारों में बेहद घनिष्ठता थी। इसी घनिष्ठता की वहज से राजीव ने परोक्ष रूप से इसमें सहयोग किया। विहिप के उपाध्यक्ष और मंदिर आंदोलन को बेहद करीब से जानने वाले चंपत राय का कहना है कि शीला दीक्षित ही राजीव गांधी और अशोक सिंघल के बीच सेतु का काम कर रहीं थी। यहीं से तीसरी अहम याचिका दाखिल करने की पटकथा शुरू हुई। बूटा सिंह की सलाह काम कर गई और आंदोलन से जुड़े नेता देवकीनंदन अग्रवाल और कुछ लोगों को पटना भेजा गया। यहां कानून के जानकार लाल नारायण सिन्हा और 5-6 लोग जमा हुए और तीसरे मुकदमे की पटकथा बनी। इसमें रामलला विराजमान और स्थान श्री रामजन्मभूमि को कानूनी अस्तित्व देने की मांग की गई।

1989 में जमीन पर मालिकाना हक की लड़ाई शुरू हुई
जुलाई 1989 में रामलला विराजमान मुकदमे का हिस्सा बने, जिससे जमीन पर मालिकाना हक की कानूनी लड़ाई शुरू हुई। लेकिन निर्मोही अखाड़ा यहां विहिप के खिलाफ खड़ा हो गया। 1950 में जब पूजा की अनुमति मिल गई थी, तब चढ़ावा आने लगा था जिसके प्रबंधन का काम अयोध्या की नगरपालिका को रिसीवर बनाकर किया जाने लगा था। इसके खिलाफ 9 साल बाद निर्मोही अखाड़ा अदालत गया था। यहां भी अखाड़े ने रिसीवर हटाने की मांग की, लेकिन जन्मभूमि को लेकर कोई दावा नहीं किया।

ये सभी केस के ऐसे पहलू थे, जो हिंदू पक्ष के खिलाफ जा रहे थे। बूटा सिंह ने समय रहते वह सलाह नहीं दी होती तो जमीन के मालिकाना हक का फैसला इतना आसान नहीं था। सिर्फ बूटा सिंह ही नहीं, विहिप बाबरी ढांचा विध्वंस के समय प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंह राव की भूमिका की भी मुरीद है। राय का कहना है कि जिस तरह से 6 दिसंबर 1992 को ढांचा गिराया गया और 8 दिसंबर की दोपहर तक कोई कार्रवाई नहीं हुई, उससे मंदिर आंदोलनकारियों को भगवान राम का चबूतरा तैयार करने और तिरपाल लगाने का समय मिल गया।

अयोध्या मामले पर पुस्तक लेकर आएगी विहिप
विहिप के चंपत राय और ओमप्रकाश सिंघल ऐसे व्यक्ति हैं जो अयोध्या मामले पर 40 दिन चली सुनवाई के दौरान लगातार सुप्रीम कोर्ट में डटे रहे। राय का कहना है कि जजों के हाव-भाव, सवाल-जवाब और भाव भंगिमा के आधार पर वह आखिरी सुनवाई के दिन यह भांप गया था कि मंदिर के पक्ष में यह फैसला 5-0 से आएगा। अब विहिप इस पूरी सुनवाई पर मीडिया में आई खबरों को पुस्तक का आकार देने जा रहा है, जिसकी तैयारी शुरू हो चुकी है।

Share

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *