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राम जन्‍मभूमि-बाबरी विवाद पर SC में आज से सुनवाई

supreme-court-of-indiaनई दिल्ली : अयोध्‍या में राम जन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई गुरुवार से एक बार फिर शुरू हो रही है, जिस पर पूरे देश की नजर है। इससे पहले 5 दिसंबर को भी इस मसले पर सुनवाई हुई थी, लेकिन तब सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की ओर से पूरे दस्‍तावेज जमा नहीं कराए जाने के कारण कोर्ट ने सुनवाई की तारीफ दो महीने के लिए और बढ़ा दी थी।

उस वक्‍त बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा था कि यह केस सिर्फ भूमि विवाद नहीं, राजनीतिक मुद्दा भी है और यह चुनाव पर असर डालने वाला है, इसलिए इस मामले की सुनवाई 2019 के आम चुनाव के बाद ही की जाए। हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों को बेतुका बताते हुए कहा कि वह राजनीति नहीं, केस के तथ्‍यों के आधार पर सुनवाई करती है और फैसले देती है।

कोर्ट ने 5 दिसंबर की पिछली सुनवाई में कहा था कि वह 8 फरवरी से इन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। उसने सभी पक्षों से इस बीच जरूरी संबंधित कानूनी कागजात सौंपने को कहा था।

इससे पहले 11 अगस्त को जब मामले की सुनवाई हुई थी, तब यूपी सरकार क ओर से अडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि मामले की सुनवाई के लिए जल्दी तारीख लगनी चाहिए। वहीं सुन्नी बक्फ बोर्ड और अन्य मुस्लिम पक्षकारों की ओर से पेश वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन और अनूप चौधरी आदि ने कहा था कि पहले हजारों पेज के दस्तावेज का अंग्रेजी में अनुवाद किया जाए। अदालत ने दस्तावेज के अनुवाद के लिए 3 महीने का वक्त दिया था।

इससे भी पहले 21 जुलाई 2017 को बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में मामला उठाते हुए कहा था कि अयोध्या केस की सुनवाई जल्‍द की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 7 अगस्त को विशेष पीठ का गठन किया गया, जिसमें चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर हैं।सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के साल 2010 के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसने विवादित जमीन को 3 हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। अदालत ने रामलला की मूर्ति वाली जगह रामलला विराजमान को दी। सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को और बाकी हिस्सा मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया था। कोर्ट ने बहुमत से लिए फैसले में रामलला की मूर्ति वाली जगह रामलला विराजमान को, सीता रसोई और राम चबूतरा निर्मोही अखाड़े को और बाकी हिस्सा मस्जिद निर्माण के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पास मामले पहुंचने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।

नई दिल्‍ली : राम जन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद दशकों पुराना विवाद है, जो समय-समय पर धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष की वजह बनता रहा है। आइये, जानते हैं इस जटिल विवाद में कब कहां क्‍या मोड़ आया।

1949 – बाबरी मस्जिद के भीतर भगवान राम की मूर्तियां देखी गईं। सरकार ने उस स्‍थल को विवादित घोषित कर दिया और उस परिसर के भीतर जाने वाले द्वार बंद कर दिए गए।

1950 – एक याचिका दायर कर हिन्‍दुओं को मस्जिद के भीतर पूजा करने की अनुमति देने की मांग की गई। हिन्‍दुओं को मस्जिद परिसर के भीतर पूजा करने की अनुमति दी गई और भीतरी प्रांगण को बंद कर दिया गया।

1959 – निर्मोही अखाड़ा ने एक मामला दायर कर मस्जिद पर नियंत्रण की मांग की।

1961 – सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड ने याचिका दायर मूर्तियों को मस्जिद से हटाने की मांग की।

1984 – विश्‍व हिन्‍दू परिषद (VHP) ने बाबरी मस्जिद तक हिन्‍दुओं की पहुंच सुनिश्‍चित करने के उद्देश्‍य से जनसमर्थन जुटाने के लिए अभियान शुरू किया।

1986 – फैजाबाद की अदालत ने मस्जिद के द्वार खोलने के आदेश दिए, ताकि हिन्‍दू पूजा-अर्चना कर सकें। उसी साल मामले के निपटारे के लिए बाबरी मस्जिद एक्‍शन कमेटी का गठन हुआ।

1989 – प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विहिप को विवादित स्‍थल के करीब भूमि पूजन की अनुमति दी।

1990 – वरिष्‍ठ बीजेपी नेता लालकृष्‍ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली। वे अयोध्‍या की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन बिहार के समस्‍तीपुर में तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री लालू प्रसाद की सरकार ने उन्‍हें रोक दिया और गिरफ्तार कर लिया।

1992 – बीजेपी, विहिप और आरएसएस के कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद को ढहा दिया और वहां एक अस्‍थाई मंदिर का निर्माण किया। इसके बाद देशभर में दंगे हुए, जिसमें 2,000 से अधिक लोगों की जान चली गई। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्‍हा राव के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस सरकार ने न्‍यायमूर्ति एम एस लिब्रहान की अध्‍यक्षता में एक आयोग का गठन किया।

2003 – इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण (ASI) को विवादित स्‍थल की खुदाई करने को कहा। ASI ने रिपोर्ट सौंपी, जिसमें कहा गया कि मस्जिद के नीचे 10वीं सदी के मंदिर होने के संकेत मिले हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पसर्नल लॉ बोर्ड ने कहा कि वह ASI की रिपोर्ट को चुनौती देगा।

2010 – इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने विवादित स्‍थल को तीन भागों में बांटने का आदेश दिया। जमीन का एक हिस्‍सा सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा राम लला, जिसका प्रतिनिधित्‍व हिन्‍दू महासभा ने किया, को देने का निर्देश दिया गया।
2016 – सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सुब्रमण्‍यम स्‍वामी को लंबित मामलों में दखल की अनुमति दी। उन्‍होंने विवादित स्‍थल पर मंदिर निर्माण और दूसरी तरफ सरयू नदी के किनारे मस्जिद बनाने का प्रस्‍ताव रखा।।

2017 – सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने सभी पक्षकारों से आपसी बातचीत के जरिये और सौहार्दपूर्ण तरीके से इस मामले के निपटारे पर जोर दिया।

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