Pages Navigation Menu

Breaking News

झारखंड: दूसरे चरण का मतदान,20 सीटों पर 62.40 फीसदी वोटिंग
रेप केस को 2 महीने में निपटाने की तैयारी में सरकार: रविशंकर प्रसाद  
उन्नाव रेप पीड़िता के परिजनों को 25 लाख और घर देगी योगी सरकार

रामलला को कोर्ट ने दिया जमीन का हक

ram-mandir-ayodhya-shaurya-diwasआखिरकार 134 साल पुराने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को सुप्रीम कोर्ट ने सुलझा दिया. 1045 पेज के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के पांचों जजों की सहमति थी. सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, अगले चीफ जस्टिस एसए बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एसए नजीर ने 9 नवंबर को फैसला सुनाया कि 2.77 एकड़ की विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंप दिया जाए. एक ट्रस्ट बनाकर राम मंदिर का निर्माण किया जाए. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 के फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि विवादित जमीन के तीन हिस्से करके निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया जाए.

फैसले को दो नजरिए से देख रहे हैं आलोचक

अब इस फैसले को आलोचक दो तरीके से देख रहे हैं. कुछ आलोचक कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला कानून और कारणों के बजाय आस्था के आधार पर लिया है. कुछ आलोचक कह रहे हैं कि यह आदेश बहुसंख्यकवाद को देखकर दिया गया है. लेकिन दोनों ही नजरिए सही नहीं हैं.

सदियों से चल रही वास्तविक पूजा को ध्यान में रखकर दिया फैसला

सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस बात को प्रमाणित कर दिया है कि यह बहुसंख्यकवाद या अल्पसंख्यकवाद से कहीं ऊपर जाकर दिया गया है. यह फैसला कानून से ज्यादा समानता के उच्च सिद्धांत को लेकर दिया गया है. एक समुदाय को विवादित जमीन मिली तो दूसरे को पांच एकड़ का प्लॉट. लेकिन यह बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक को देखकर या आस्था के आधार पर नहीं दिया गया. कोर्ट ने यह फैसला सदियों से चली आ रही वास्तविक पूजा की परंपरा को ध्यान में रखकर दी है.पांचे जजों की संविधान पीठ ने यह बताया कि दोनों पक्षकारों यानी रामलला विराजमान और सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकीलों ने मजबूत सबूत और तथ्य दिए. लेकिन रामलला विराजमान के वकीलों के तथ्य ज्यादा मजबूत थे. फैसले में साफ लिखा है कि यह मामला पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर चल रहा है. इसका फैसला यह बताता है कि हमारा कानून बहुसांस्कृतिक समाज के आधार पर बना है. संविधान के केंद्र में हमेशा से समानता को अधिकार दिया गया है. इस फैसले से स्पष्ट है कि कानून किसी भी एक धार्मिक हिस्से की आस्था को वरीयता नहीं देता.

फैसले में पुराने यात्रा वृतांतों का जिक्र

फैसले में 1607 से 1611 के बीच विलियम फिंच और 1766 से 1771 के बीच फादर जोसेफ टिफेनथेलर की यात्रा वृतांत का जिक्र है, जिसमें कहा गया है कि विवादित स्थान भगवान राम का जन्म स्थान है. यहां हमेशा से पूरा होती आ रही है.

पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को बनाया आधार

फैसले में भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के ढांचे के नीचे 12वीं सदी के ढांचे के अवशेष मिले थे. जिनका स्थापत्य हिंदू सभ्यता का है. जबकि, मुस्लिम पक्ष यह सबूत नहीं दे पाई कि 1528 के बाद से तीन सदियों तक मस्जिद की मिल्कीयत किसकी थी. या कभी वहां नमाज पढ़ा गया. इसी आधार पर इस स्थल को भगवान राम का जन्मस्थल माना गया.

अंतिम फैसला क्या निकला?

हिंदू पक्ष ने यह साबित कर दिया कि उस स्थान पर मस्जिद से पहले भी भगवान राम की पूजा होती थी. साथ ही हिंदू पक्ष ने बाहरी बरामदे में मौजूद राम चबूतरे की मिल्कीयत को भी साबित किया. जबकि, निर्मोही अखाड़े और शिया वक्फ बोर्ड के केस को रद्द कर दिया. मस्जिद में 1949 में मूर्ति रखने और 1992 में मस्जिद को तोड़ना गैर-कानूनी था. समानता को ध्यान में रखते हुए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में ही पांच एकड़ जमीन देने का आदेश दिया. सुप्रीम कोर्ट ने सभी फैसला सबूतों और तथ्यों के आधार पर दिया है न कि आस्था या विश्वास पर.

राम लला विराजमान को अयोध्या की विवादित जमीन को असली मालिक माना 

सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायमूर्तियों की पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए भगवान राम के बाल स्वरूप राम लला विराजमान को अयोध्या की विवादित जमीन को असली मालिक माना है.सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाने का फरमान भी सुनाया है. वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में सुन्नी सेंट्रल वफ्फ बोर्ड को अयोध्या में ही मस्जिद निर्माण के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश दिया.

क्या भगवान को है संपत्ति अर्जित करने का अधिकार?

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद से चर्चा हो रही है कि क्या भगवान को संपत्ति अर्जित करने और केस करने का कानूनी अधिकार है? इस पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और सीनियर एडवोकेट जितेंद्र मोहन शर्मा का कहना है कि भारत में हिंदुओं के देवी-देवताओं को जूरिस्टिक पर्सन यानी लीगल व्यक्ति माना जाता है और इनको आम लोगों की तरह सभी कानूनी अधिकार होते हैं. उन्होंने बताया कि देवी-देवताओं को संपत्ति अर्जित करने, बेचने, खरीदने, ट्रांसफर करने और न्यायालय केस लड़ने समेत सभी कानूनी अधिकार होते हैं.

क्या कोर्ट में केस कर सकते हैं हिंदुओं के देवी-देवता?

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट शर्मा के मुताबिक आम लोगों की तरह हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ भी केस किया जा सकता है. जब उनसे सवाल किया गया कि देवी-देवता आम इंसानों की तरह सोच और विचार नहीं कर सकता है, तो वो कैसे संपत्ति का हस्तांतरण करेंगे, तो सीनिर एडवोकेट जितेंद्र मोहन शर्मा ने कहा कि जिस तरह कंपनी लीगल पर्सन होती है और अपने डायरेक्टर या ट्रस्टी के जरिए संपत्ति अर्जित करती है और कामकाज करती है, उसी तरह हिंदू देवी-देवता भी अपने प्रतिनिधि के जरिए अपने कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं.उन्होंने बताया कि हिंदुओं के देवी-देवता भी कंपनी या नाबालिग की तरह संपत्ति अर्जित करते हैं और प्रतिनिधि के जरिए कोर्ट में केस लड़ते हैं. हिंदुओं के देवी-देवताओं को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति के अधिकार मिलते हैं. हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ सिविल केस किए जा सकते हैं, लेकिन क्रिमिनल केस नहीं किए जा सकते हैं.

राम लला विराजमान को सुप्रीम कोर्ट में हुई लंबी बहस

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट जितेंद्र मोहन शर्मा ने बताया कि अयोध्या मामले में भी राम लला विराजमान के केस करने और संपत्ति अर्जित करने समेत सभी कानूनी अधिकार को लेकर लंबी बहस हुई थी. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राम लला विराजमान और स्थल श्रीराम जन्मभूमि को लीगल पर्सन माना.सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष शर्मा ने यह भी बताया कि हिंदुओं के देवी-देवताओं यानी जूरिस्टिक पर्सन को नेचुरल पर्सन यानी आम इंसानों की तरह मौलिक अधिकार नहीं दिए गए हैं. इसका मतलब यह है कि नेचुरल पर्सन को संविधान में दिए गए मौलिक अधिकार और कानूनी अधिकार दोनों दिए जाते हैं, जबकि जूरिस्टिक पर्सन यानी लीगल इंटिटी को सिर्फ कानूनी अधिकार ही दिए जाते हैं.

भारत में कब से हिंदू देवी-देवताओं को मिला कानूनी अधिकार?

भारत में हिंदू देवी-देवताओं को पहली बार साल 1888 में ब्रिटिश काल में जूरिस्टिक पर्सन माना गया था. हिंदू देवी-देवताओं को स्कूल, कॉलेज चलाने और ट्रस्ट बनाने का भी कानूनी अधिकार मिला है.मनोहर गणेश तमबेकर बनाम लखमीरम गोविंद्रम, भूपति नाथ स्मृतितीर्थ बनाम राम लाल मैत्र, रामपत बनाम दुर्गा भारती, राम ब्रह्म बनाम केदारनाथ समेत दर्जनों मामलों में पहले ही न्यायालय हिंदू देवी-देवताओं को लीगल पर्सन मान चुका है. हालांकि सभी मंदिर के देवी-देवताओं को जूरिस्टिक पर्सन नहीं माना जाता है. इसके लिए जरूरी है कि उस देवी या देवता का पूरे विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा कराई गई हो.

Share

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *