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बाबर को अयोध्या में जमीन न तो किसी ने दान में दी थी और न ही बेची

हिन्दू पक्ष का तर्क है कि यह जमीन हिन्दुओं की है क्योंकि आस्था और मान्यता है कि यही राम का जन्मस्थान है। किसी का जन्म स्थान बदल नहीं सकता। वह एक ही रहता है। सदियों से हिन्दू मानता है कि श्री राम का जन्म यहीं हुआ। इस पर मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि मस्जिद भी कभी बदली नहीं जा सकती। जहां एक बार मस्जिद बनी वह हमेशा मस्जिद रहती है।इसके जवाब में हिन्दू पक्ष के वकीलों की दलील है कि जिसे बाबरी मस्जिद कहते हैं वह कभी मस्जिद थी ही नहीं। इस्लाम में मस्जिद, दान की गई या खरीदी गई जमीन पर ही बनाई जा सकती है। बाबर को अयोध्या में न तो किसी ने जमीन दान में दी थी और न ही किसी ने बेची थी।इसका कोई सबूत मुस्लिम पक्ष सर्वोच्च न्यायालय में नहीं दे पाया। इतना ही नहीं इस्लाम के हिसाब से भी बाबरी मस्जिद नहीं हो सकती। इस्लाम कहता है कि विवादित भूमि पर मस्जिद जायज नहीं है। यह बात इतिहास और सबूतों से भी अब साबित हो गई है कि इस स्थान को लेकर हिन्दू कई सदियों से लगातार संघर्ष करते रहे हैं।इससे यह साबित होता है कि यह स्थान शुरू से ही विवादित जगह रही है। ऐसे में इस्लाम के हिसाब से भी यह मस्जिद नहीं हो सकती।

दूसरी बात मिनार के बिना कोई मस्जिद नहीं होती। इस मस्जिद में मिनार कभी थी ही नहीं, इसलिए हिन्दुओं ने इसे कभी मस्जिद नहीं माना। वहां मस्जिद के नाम पर जो भी इमारत बनी वह तोड़ी गई। ये इमारत कई बार तोड़ी और बनाई गई। दो बार तो 1885 और 1913 में मस्जिद गिराने व फिर बनाने के ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद हैं।1992 में बाबरी मस्जिद की इमारत ढह गई। इसके जवाब में मुस्लिम वकीलों का तर्क है कि बाबर शासक था। उसके अधिकार क्षेत्र की सारी जमीन का मालिक उसकी सरकार होती है। उसे ये जमीन दान में लेने या खरीदने की जरूरत नहीं ,इस पर हिन्दू वकीलों का तर्क है कि बाबर आक्रमणकारी था और उसने वहां मौजूद मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनवाई। यहां के मूल निवासियों की भावनाओं के साथ उसने खिलवाड़ किया। ये एक आक्रान्ता की भूल थी। हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट की विशेष पीठ के एक सदस्य जस्टिस एस.यू. खान ने यह नहीं माना कि मस्जिद बनाने के लिए वहां कोई मंदिर ढहाया गया। लेकिन अपने फैसले में उन्होंने यह माना कि मस्जिद मंदिर के अवशेषों पर जरूर बनाई गई। मगर ये अवशेष मस्जिद के निर्माण से पहले ही एक लंबे समय से बेहद बरबाद और उजाड़ स्थिति में वहां पड़े हुए थे।

यही वजह है कि निर्माण में इनकी भी कुछ सामग्री का इस्तेमाल किया गया। जस्टिस खान ने यह भी माना कि1855 से बहुत पहले ही राम चबूतरा और सीता रसोई अस्तित्व में आ चुके थे और हिंदू उसकी पूजा कर रहे थे। उन्होंने फैसले में इसे “बेहद ही विचित्र और अभूतपूर्व स्थिति” बताया। उन्होंने लिखा- “मस्जिद के अहाते और चहारदीवारी के भीतर हिंदूओं के धार्मिक स्थान भी थे। जहां पूजा होती थी और मस्जिद भी थी। जहां नमाज होती थी।”इसी तथ्य की रोशनी में उन्होंने दोनों ही पक्षों को पूरे ही विवादित परिसर का संयुक्त ‘टाइटल होल्डर’ घोषित किया था। केन्द्रीय गुम्बद के ठीक नीचे के हिस्से को जहां फिलहाल अस्थायी मंदिर स्थित है, उसे हिंदुओं के हिस्से में देने का फैसला सुनाया।

मुसलमानों को राहत देने के लिए बाकी दो जजों जस्टिस अग्रवाल और जस्टिस शर्मा ने भी इसे अपनी स्वीकृति दे दी, और विवादित जमीन को तीन टुकड़ों में बांट दिया गया। हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि में से वह जगह, जहां आज रामलला की मूर्ति स्थापित है, रामलला विराजमान को सौंप दी। यह जमीन का पहला हिस्सा था।राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़ा को दे दिया गया, जबकि बचा हुआ तीसरा हिस्सा सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड को सुपुर्द कर दिया गया। यह तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड के किसी काम का नहीं इसलिए वह इस फैसले से असंतुष्ट सुप्रीम कोर्ट गया।दरअसल, वह चाहता है कि उसे पूरी विवादित जमीन मिले जहां वे फिर बाबरी मस्जिद तामीर कर सकें। विवादित स्थल का एक बड़ा हिस्सा जीतने के बाद भी हिन्दू पक्ष इसलिए खुश और संतुष्ट नहीं था कि उसे वहां एक भव्य राम मंदिर बनवाना है, जिसमें सुन्नी वक्फ बोर्ड के हिस्से की जमीन मुश्किल पैदा करती है। इसलिए वे भी सुप्रीम कोर्ट गए।सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पहले कहा था कि यह मुकदमा मालिकना हक के मुकदमें की तरह सुना जाएगा। इसे हिन्दू वकीलों ने सिरे से खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा कि यह अस्था और विश्वास का मुकदमा है। हम इसी पर मुकदमा लड़ेंगे।हाईकोर्ट में भी मुकदमा इसी आधार पर लड़ा गया कि हमने तो कभी जमीन के बंटवारे की बात ही नहीं की। हाईकोर्ट का फैसला ‘न्यायिक फैसला’ नहीं बल्कि ‘सुलह का फैसला’ है, जो हमें नहीं चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि वह वाकई में रामजन्म भूमि मानी जानी चाहिए या नहीं।दरअसल, यह पूरा मामला दिलचस्प लेकिन अंतिसंवेदनशील है, क्योंकि यह फैसला दूरगामी होगा। इस पर पूरे देश की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की नजर है।

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