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तो क्या जाति छोड़ रोजगार पर वोट देगा बिहार ?

manoj verma( मनोज वर्मा ) नई दिल्ली। तो क्या इस बार का बिहार विधानसभा चुनाव एक बार फिर इतिहास बनाएगा। जाति की राजनीति का गढ़ माने जाने वाले बिहार में इस बार युवा मतदाता रोजगार के मुद्दे को खूब तवज्जों दे रहे हैं। राजद नेता तेजस्वी यादव 10 लाख सरकारी नौकरी के वादे के बाद बीजेपी ने भी अपने घोषणात्र में 19 लाख रोजगार देने का वादा किया है। मतलब साफ है सभी दलों को पता है कि इस चुनाव में रोजगार एक बहुत बड़ा मुद्दा है। ऐसे में अगर इस बार के चुनाव इसका असर नतीजों पर दिखेगा तो पूरे देश को यह राह दिखाने वाला चुनाव होगा। हालांकि विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में जाति का मुद्दा इतनी जल्दी खत्म नहीं होने वाला है।बिहार में विकास और बिजली को मुद्दा बनाकर नीतीश कुमार शासन में आए थे और आरजेडी को सत्ता से उखाड़ फेका था। इसबार तेजस्वी यादव रोजगार के मुद्दे को इस चुनाव में पूरी तरह से भुनाने की कोशिश में जुटे हुए हैं। उनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ और रोजगार के मुद्दे पर युवाओं का उनको मिलता समर्थन भी साफ दिख रहा है।जाति की राजनीति के लिए जाने बिहार में युवा खुलकर रोजगार के मुद्दे पर मुखर हैं। तो क्या जाति का मुद्दा हो गया गौण? जाति छोड़ रोजगार के मुद्दे पर वोट देगा बिहार? यह ऐसे सवाल हैं जिस पर पूरे चुनाव विश्लेषकों की नजरें टिकी हैं।

बिहार के विधानसभा चुनाव परिणामों का जनादेश क्या होगा इसका पता तो 10 नवंबर को चलेगा जब परिणाम सामने आएंगे। लेकिन यदि चुनाव प्रचार की और मुदृे की बात करें तो पहले चरण के मतदान के बाद बिहार में रोजगार प्रमुख मुदृा बनकर उभरा है। चुनाव के नतीजों पर यदि इसका असर होता है तो फिर देश में आने वाले चुनावों में भी यह मुद्दा उभर सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि रोजगार के मुद्दे से बिहार में चुनावी हवा बदली है। रोजगार के मुद्दे विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, कभी भी केंद्र में नहीं रहे।विपक्ष रोजगार के मुद्दे उठाता जरूर है, लेकिन कभी ऐसा नहीं दिखा कि यह चुनाव का प्रमुख मुद्दा बना हो और चुनाव पर असर डाला हो, लेकिन बिहार में जिस प्रकार से रोजगार का मुद्दा केंद्र बिन्दु में आ चुका है, इससे स्पष्ट संकेत है कि रोजगार के मुद्दे पर बिहार की राजनीतिक हवा बदल रही है। भारत के संदर्भ में यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारी युवा आबादी बढ़ रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में करीब 35 फीसदी आबादी युवा है।शिक्षा और तकनीकी शिक्षा का दायरा बढ़ने से वह रोजगार योग्य भी है। युवाओं के लिए रोजगार का मुद्दा है। इस मामले में बिहार के चुनाव नतीजे अहम होंगे। यह देखना होगा कि रोजगार का मुद्दा नतीजों पर कितना असर डालता है। राजद के 10 लाख नौकरियों के वादे के बाद भाजपा ने 19 लाख रोजगार के अवसर पैदा करने का आश्वासन दिया, उससे साफ है कि राजनीतिक दल भी इस मुद्दे की अहमियत को समझ रहे हैं।राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा, पढ़ाई, कमाई, सिंचाई और दवाई, ये बिहार के असली मुद्दे हैं, मगर इस पर कभी नीतीश कुमार नहीं बोलते। हम वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में सोच रहे हैं लेकिन सीएम अतीत का हवाला देते रहना चाहते हैं। हम भाजपा अध्यक्ष नड्डा के साथ खुली बहस के लिए तैयार हैं।’

पर, आंकड़े क्या कहते हैं? आंकड़े कहते हैं कि बिहार आज भी देश के बाकी राज्यों से पिछड़ा हुआ है। ये आंकड़े बताते हैं कि बिहार में आज हर आदमी रोज सिर्फ 120 रुपए ही कमाता है। जबकि, झारखंड का आदमी रोज 220 रुपए तक की कमाई कर रहा। बिहार से 100 रुपए ज्यादा। सिर्फ कमाई ही नहीं, बेरोजगारी के मामले में भी बिहार, झारखंड से कोसों आगे है। यहां बिहार की तुलना झारखंड से इसलिए, क्योंकि आज भले ही बिहार और झारखंड की पहचान दो अलग-अलग राज्यों की हो, लेकिन 20 साल पहले तक दोनों एक ही तो थे।इकोनॉमिक सर्वे और RBI के आंकड़े बताते हैं कि 15 साल में बिहार में हर आदमी की कमाई 5 गुना बढ़ी है। नीतीश जब 2005 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, तब यहां हर आदमी की सालाना कमाई 7914 रुपए थी। आज 43,822 रुपए है। यानी रोज की कमाई 120 रुपए और महीने की कमाई 3651 रुपए। इसकी तुलना जब झारखंड से करेंगे, तो यहां बिहार की तुलना में लोगों की कमाई 4 गुना से ज्यादा बढ़ी है। लेकिन, फिर भी झारखंड का आदमी बिहार के आदमी से हर साल करीब दोगुना कमाई करता है। झारखंड में हर आदमी की सालाना कमाई 79,873 रुपए है। वहीं, 15 साल में देश में हर आदमी की सालाना कमाई एक लाख रुपए से ज्यादा बढ़ गई, पर बिहार में सिर्फ 35,000 रुपए।देश में बेरोजगारी दर के आंकड़े अब केंद्र सरकार जारी करती है। 2011-12 तक नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस सर्वे करता था, लेकिन अब पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे होता है। इसका डेटा बताता है कि बिहार और झारखंड ही नहीं, बल्कि देश में ही बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। 2004-05 बिहार के गांवों में बेरोजगारी दर 1.5% और शहरों में 6.4% थी। अब यहां के गांवों में 10.2% और शहरों में 10.5% बेरोजगारी दर है। बेरोजगारी दर झारखंड और देश में भी बढ़ी है। बिहार के लिए ये इसलिए भी चिंताजनक हो जाती है, क्योंकि यहां की करीब 90% आबादी आज भी गांवों में ही रहती है।नीतीश 15 साल पहले जब सत्ता में आए थे, तब बिहार की 54% से ज्यादा यानी 4.93 करोड़ आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी। गरीबी रेखा के सबसे ताजा आंकड़े 2011-12 के हैं। इसके मुताबिक, 2011-12 में बिहार में गरीबी रेखा के नीचे आने वाली आबादी 3.58 करोड़ यानी 33.7% है।15 साल में बिहार की GDP 7.5 गुना बढ़ गई। RBI का डेटा बताता है कि 2005-06 में बिहार की GDP 82 हजार 490 करोड़ रुपए थी, जो 2019-20 में बढ़कर 6.11 लाख करोड़ रुपए हो गई।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कह रहे हैं कि पहले जंगलराज हुआ करता था। उधर, केंद्र सरकार की ही एजेंसी एनसीआरबी का डेटा बताता है कि नीतीश सरकार के आने के बाद बिहार में क्राइम बढ़ा है।एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, 2005 में बिहार में 1.07 लाख क्रिमिनल केस दर्ज किए गए थे, यानी रोजाना 293 मामले। लेकिन, 2019 में बिहार में 2.69 लाख मामले सामने आए हैं यानी, रोज 737 केस। ये आंकड़े ये भी बताते हैं कि 15 सालों में देश में क्राइम बढ़ा तो था, लेकिन बाद में कम भी होने लगा, लेकिन बिहार और झारखंड में लगातार केस बढ़ रहे हैं।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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