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झारखंड में क्यों हारी भाजपा ?

रांची झारखंड में पहली बार लगातार 5 साल के लिए सीएम देने वाली बीजेपी को विधानसभा चुनाव में करारी हार के साथ सत्ता से बाहर होना पड़ा है। गैर-आदिवासी नेता रघुबर दास को सीएम बनाकर पीएम नरेंद्र मोदी ने बड़ा फैसला लिया था, लेकिन शायद यह कार्ड फेल रहा।रघुबर दास से जनता में खासी नाराजगी थी। बीजेपी के लिए भले ही उनको हटाना संभव नहीं था, लेकिन उन्हें फोकस से परे किया जा सकता था दास की अपने बड़े सहयोगी रहे सरयू राय के साथ अनबन ही रही और अंत में राय उनके खिलाफ ही चुनाव में उतरेबीजेपी ने अर्जुन मुंडा को केंद्रीय मंत्री बनाकर राज्य की राजनीति से दूर रखा, लेकिन यह भारी पड़ता दिखा हैबीजेपी को सूबे की 28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ 2 पर ही जीत मिली। यह हार का बड़ा कारण माना जा सकता हैझारखंड के फैसले से पता चलता है कि राज्य को बने-बनाए परंपरागत चेहरों की बजाय नये चेहरों और अलग अलग पृष्ठभूमि से आए नेताओं को प्राथमिकता दी है. झारखंड में 5 ऐसी महिलाएं हैं जो पहली बार विधायक बनी हैं. रघुबर दास खुद को गर्व से मजदूर का बेटा कहते थे। सोमवार को आए विधानसभा चुनाव के नतीजों में उन्हें सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा जबकि साल 2000 में राज्य बनने के बाद वह पहली स्थिर सरकार चला रहे थे। जमशेदपुर के टाटा स्टील प्लांट में मजदूरी करने से लेकर सीएम बनने तक का दास का सफर काफी तेज भरा रहा।

झारखंड में कैसे फेल रही बीजेपी की रणनीति…

जनता से बर्ताव को लेकर खराब थी रघुबर की छवि
रघुबर दास से जनता में खासी नाराजगी थी। बीजेपी के लिए भले ही उनको हटाना संभव नहीं था, लेकिन उन्हें फोकस से परे किया जा सकता था। लेकिन बीजेपी ने ऐसा नहीं किया। इसके चलते रघुबर दास के खिलाफ जो ऐंटी-इन्कम्बैंसी थी, वह बीजेपी को भी भारी पड़ी। झारखंड हमेशा से भ्रष्टाचार के चलते चर्चा में रहा है। भले ही रघुबर दास की ऐसी छवि नहीं थी, लेकिन पब्लिक के साथ उनके बर्ताव को पसंद नहीं किया गया।

गुटबाजी भी पड़ी भारी, सरयू में डूबी पार्टी
बीजेपी के लिए सूबे की राजनीति में गुटबाजी भी हार का कारण रही। सीएम रघुबर दास की कैबिनेट में अपने सहयोगी सरयू राय के साथ अनबन ही रही और अंत में राय उनके खिलाफ ही चुनाव में उतरे। यही नहीं उन्होंने रघुबर को 15,000 वोटों से जोरदार शिकस्त भी दी। कैबिनेट सदस्य सरयू राय समेत दूसरे कई विधायकों को टिकट नहीं दिए। इससे उनके खिलाफ बगावत होने लगी। एक बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा है, ‘बीजेपी नेता हर रैली में राम मंदिर की बात कर रहे थे, शायद वह रामायण भूल गए। रघुबर (राम का एक और नाम) ने सरयू नदी में समाधि ली थी। यही इस बार हुआ।’

अर्जुन मुंडा को किनारे लगाने का भी नुकसान
बीजेपी ने अर्जुन मुंडा को केंद्रीय मंत्री बनाकर राज्य की राजनीति से दूर रखा, लेकिन यह उसके लिए भारी पड़ता दिखा है। रघुबर दास गैर-आदिवासी सीएम थे और आदिवासी नेता मुंडा को बाहर रखने से पार्टी की संभावनाओं पर और असर पड़ा। पार्टी ने सूबे में मुंडा के मुकाबले रघुबर को ही आगे रखा।

28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ 2 पर जीत
बीजेपी को सूबे की 28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ 2 पर ही जीत मिली। यह उसकी हार का सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है। छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम में संशोधन के जरिए आदिवासी समाज का जमीन पर हक मजबूत हुआ है। लेकिन विपक्ष ने इसे आदिवासी इलाकों में जमीन कब्जाने का ऐक्ट बताया और वह इसे लोगों को समझाने में सफल भी दिखा।

भुगतना पड़ा खामियाजा
दास को आदिवासियों से जुड़े किरायेदारी कानून में संशोधन लाने में असफलता का सामना करना पड़ा। इस कानून से आदिवासियों को उनकी जमीन पर विशेष अधिकार मिले थे। इसके अलावा झारखंड धर्म की आजादी ऐक्ट, 2017 लाकर आदिवासियों का धर्म परिवर्तन रोकने, सरकारी स्कूलों को विलय जैसे फैसलों को खामियाजा भी भुगतना पड़ा। इनके अलावा जमशेदपुर और सरायकेला-खरसावां में उत्पादन की छोटी इकाइयों को बंद करने से नौकरियां चली गईं, प्याज के बढ़ते दाम और भूख और मॉब लिन्चिंग के कारण गईं जानों ने भी दास की लोकप्रियता को ऊंचाई से उतार दिया।जल-जंगल-जमीन के सवाल पर आदिवासी सरकार से नाराज थे। राज्य में उद्योगों के लिए लैंड बैंक बनाए जा रहे थे। आदिवासी इस जमीन को अपना मानते थे। छोटा नागपुर टेनेंसी एक्ट और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट में सरकार ने संशोधन की कोशिश की थी। आदिवासी मान रहे थे कि उनकी जमीन उद्योगों को देने के लिए यह कोशिश हो रही है। भारी विरोध के चलते इन कानूनों में संशोधन तो नहीं हुआ, लेकिन आदिवासियों की नाराजगी बढ़ गई। अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित 28 सीटों में 20 झामुमो-कांग्रेस गठजोड़ के खाते में गईं। भाजपा को यहां 5 सीटों का सीधा नुकसान हुआ। सत्ता में रहते हुए पारा शिक्षकों, आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका की नाराजगी केंद्रीय योजनाओं के बूते हुए विकास के काम पर कुछ ऐसी भारी पड़ती दिखी कि प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री की डबल इंजन की सरकार की गुहार काम नहीं आई।

भाजपा का वोट शेयर लोकसभा चुनाव में 51% था, विधानसभा चुनाव में 33% रह गया
7 महीने पहले मई 2019 में जब लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे, तो भाजपा ने 51% वोट हासिल कर 54 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त बनाई थी। 35 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की लीड 50 हजार से अधिक थी। इनमें 16 विधानसभा क्षेत्रों में लीड मार्जिन 90 हजार से ज्यादा था। भाजपा ने राज्य की 14 में से 11 लोकसभा सीटें भी जीती थीं। आजसू भी उसके साथ जिसे 1 सीट मिली थी। इसी वजह से भाजपा को झारखंड में सत्ता में वापसी की उम्मीद थी। झारखंड का ट्रेंड भी बताता है कि लोकसभा चुनाव की तुलना में विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर लगभग 10% गिरता है। इस हिसाब से भाजपा का वोट शेयर 51% से घटकर 41% पर टिकता, तो भी वह सत्ता में वापसी कर लेती। लेकिन कुर्मी-कोयरी समेत पिछड़े और दलितों के बीच ठीक-ठाक आधार रखने वाली सहयोगी पार्टी आजसू उससे छिटक गई। उसे चुनाव में 8% वोट मिले। नतीजा यह हुआ कि भाजपा का वोट शेयर भी अनुमानित 41% से 8 फीसदी और कम होकर 33% पर रह गया।

 महागठबंधन पहले से तैयार था,भाजपा से दूर हुई आजसू
झामुमो-कांग्रेस-राजद गठजोड़ ने चुनाव घोषणा से पहले ही सीटों का बंटवारा कर जमीन पर कवायद शुरू कर दी थी। वहीं, भाजपा-आजसू गठजोड़ चुनाव घोषणा के बाद टूटा। आजसू पिछले 5 साल भाजपा के साथ सत्ता में थी। सीटों के बंटवारे के सवाल पर भाजपा ने पुराने सहयोगी आजसू पार्टी को खोया। भाजपा ने मंत्री सरयू राय का टिकट काट दिया। दूसरे दलों से आए नेताओं को भी टिकट दिए गए। ये दोनों ऐसी चूक थीं, जो चुनावी हवा का रुख भाजपा के खिलाफ करने में मददगार साबित हुईं।

महागठबंधन ने गुरिल्ला प्रचार शैली अपनाई, बड़ी रैलियां नहीं कीं
भाजपा के बड़े नेताओं की कारपेट बॉम्बिंग शैली में किए गए प्रचार के उलट गठबंधन के नेताओं ने प्रचार की गुरिल्ला शैली अपनाई। बड़ी सभाएं नहीं कीं। सुदूर इलाकों में कई-कई बार हेलिकॉप्टर से उतरे। अलग-अलग प्रचार किए। मौका देख मंच साझा किया। उनकी रणनीति कामयाब रही।

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