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एक राष्ट्र एक चुनाव फार्मूले पर छिड़ी बहस

election-commissionसंसद में बजट सत्र के पहले दिन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने अपने अभिभाषण के आखिरी हिस्से में देश में एक साथ चुनाव कराए जाने के मुद्दे पर गंभीर बहस करने की बड़ी भावनात्मक गुहार लगाई. सत्ताधारी भाजपा लोकसभा चुनावों के साथ राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव कराने के ख्याल को लेकर काफी गंभीर है.

हालांकि विपक्ष की आपत्तियों के अलावा इस विचार को लेकर गहरी राजनैतिक और आर्थिक चिंता जताई जा चुकी है. देश के चुनावी इतिहास में अब तक चार बार दोनों चुनाव एक साथ हुए हैः पहली बार स्वतंत्रता पाने के बाद 1952 में और फिर 1967 तक अगले तीन चुनावों में.

दरअसल, कांग्रेस में 1969 में ऐतिहासिक विघटन के कारण लोकसभा समय से पहले भंग हो गई थी और इससे ही एक साथ चुनाव की व्यवस्था टूट गई थी. एक और चीज ने इसमें भूमिका निभाई और वह था कांग्रेस का राज्य सरकारों को बरखास्त करने और कार्यकाल खत्म होने से पहले ही विधानसभाओं को भंग करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 356 का खुले हाथ से इस्तेमाल. इन परिस्थितियों के चलते आगे चलकर एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं रहा.

भाजपा इस प्रस्ताव को फिर से लाने पर आमादा है, जिसे वह करीब एक दशक पहले राजनैतिक हलके में रख चुकी थी. उसका कहना है कि इसके दीर्घकालिक आर्थिक और अन्य हित हैं. इसके पीछे उसकी मंशा 2019 के चुनाव में मिशन 360 को पूरा करने की भी है, इस उम्मीद से कि उसे खुद और उसेसहयोगी दलों को भी ज्यादा सीटें मिल जाएंगी.

मोदी साफ कर चुके हैं कि वे एक साथ चुनाव के इरादे के पक्षधर हैं. अपने कार्यकाल के शुरू होने के महज सात माह के भीतर ही, जनवरी 2015 में कार्मिक, जनपरिवेदना, कानून और न्याय पर बनी संसदीय स्थायी समिति ने एक साथ चुनाव की व्यावहारिकता पर दलीलें पेश कर दी थीं. साल खत्म होते-होते उसने चुनाव आयोग के विचारों के साथ एक रिपोर्ट पेश कर दी थी.

इस दरम्यान क्या हुआ, इससे पीएम की रुचि का खुलासा हो जाता है. यह काम स्थायी समिति के सुपुर्द किया गया.

इसके तुरंत बाद ही तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त हरि शंकर ब्रह्मा ने यह दर्ज किया था कि मोदी के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र ने उन्हें जानकारी दी थी कि सारे चुनाव एक साथ कराए जाने के पक्ष में एक मजबूत धारणा है. (36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में) बार-बार विधानसभा चुनाव से सामाजिक-आर्थिक व्यवधान उत्पन्न होते हैं.

सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भी अड़ंगा लगता है. साल 2016 की शुरुआत में विधि मंत्रालय ने संसदीय समिति की रिपोर्ट पर चुनाव आयोग से राय मांगी थी.

फिर भाजपा नेताओं के साथ 19 मार्च को एक बैठक में मोदी ने एक साथ चुनाव के इरादे को बड़ी दृढ़तापूर्वक रखा था.

सामान्य प्रक्रिया में राजग को यह लड़ाई जीतने के लिए संविधान में संशोधन कराने के लिए दो-तिहाई राज्यों का समर्थन जुटाना होगा, जिनमें से वे राज्य भी हैं जहां उसके राजनैतिक विरोधी सत्ता में हैं.

तभी वह अपने इस मकसद को हासिल कर सकेगी जिसे तमाम संविधान विशेषज्ञों समेत ज्यादातर आलोचक बकवास बताते हुए खारिज कर रहे हैं.

कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद कहते हैं, ”लोकसभा और राज्य विधानसभाओं को आपात स्थिति में एक साल के विस्तार को छोड़ दें तो पांच साल से एक दिन भी ज्यादा का कार्यकाल न देने वाले चुनावी व्यवस्था से जुड़े अनुच्छेद 172 में किसी भी तरह के स्थायी बदलाव के लिए संविधान को गहराई से पढ़कर उसका संशोधन करना होगा.

इस बदलाव के साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विश्वास के सकारात्मक मत के बिना आप कोई अविश्वास प्रस्ताव न ला सकें. लेकिन इसके लिए राजनैतिक सहमति की खासी दरकार होगी.” प्रसाद के मुताबिक, संविधान में एक यह संशोधन भी अपनाया जाना होगा कि किसी सदन के पांच साल के कार्यकाल के भीतर अविश्वास प्रस्ताव केवल एक बार ही लाया जा सके.

लोगों की चिंताएं इस एहसास से बढ़ गई हैं कि अगर भाजपा चाहे तो सरकार के पास एक और आसान तरीका है. वह संविधान में संशोधन कराए बगैर ही 17 बड़े राज्यों में से 11 राज्यों में ”एक राष्ट्र, एक चुनाव” की व्यवस्था का पालन करा सकती है. इसके लिए भाजपा को सिर्फ इतना करना होगा कि दिसंबर 2018 में ही आम चुनाव करा दिए जाएं जब तीन बड़े राज्यों—छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं.

इसके साथ ही वह महाराष्ट्र और हरियाणा समेत भाजपा शासित कुछ अन्य राज्यों से भी समय से पहले चुनाव कराने को कह सकती है. यह हुआ तो चुनाव आयोग स्वतः अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करके आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में भी पहले चुनाव कराने की घोषणा कर सकता है, जहां 2014 में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभाओं के वोट पड़े थे.

पार्टी के भीतर आम धारणा यह है कि नियमित अंतराल पर चुनाव आचार संहिता लगने से 45 दिन तक सारे काम ठप हो जाते हैं. अगर लोकसभा चुनाव और राज्यों की विधानसभाओं के चुनावों के दौरान हर राज्य में 45-45 दिनों के दो अंतराल का व्यवधान आता है तो हर पांच साल के दौरान तीन माह तक देश का कामकाज ठप हो जाता है. लिहाजा, क्यों न इसे इसे बदलकर महज एक बार ही 45 दिन का अंतराल कर दिया जाए.

हालांकि, भाजपा के भी कुछ वरिष्ठ नेताओं का सुझाव है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को समन्वित करने की प्रक्रिया को एकमुश्त करने की बजाए दो चरणों में किया जाए तो बेहतर है, भले ही संविधान में संशोधन और आम सहमति सुनिश्चित ही क्यों न हो जाए. पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय कहते हैं, ”एक साथ चुनाव कराने के लिए जरूरी पर्याप्त पुलिस व अर्धसैनिक बल की व्यवस्था करना असंभव होगा.”

पार्टी के भीतर कई नेताओं का मानना है कि चुनावों को मिलाने की प्रक्रिया को चरणबद्ध कराने से भाजपा का ही फायदा होगा. कर्नाटक पहला बड़ा राज्य होगा जहां अप्रैल में चुनाव होने हैं. भाजपा को लोकसभा चुनाव में यहां अच्छी बढ़त मिली थी और उसने 28 में से 17 सीटें जीतीं थीं. अब वह राज्य की सिद्धारमैया सरकार को सत्ता से हटाने की ताक में है.

दिसंबर में छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव हैं, जो भाजपा के गढ़ तो हैं, लेकिन वहां सत्ता विरोधी लहर के हावी होने की आशंका है. इन राज्यों से पिछली बार भाजपा के 63 सांसद चुनकर आए थे. यानी लोकसभा में उसकी कुल ताकत का लगभग 25 फीसदी.

इसी उभरते परिप्रेक्ष्य में भाजपा एक साथ चुनाव की व्यवस्था पर जोर दे रही है और इसे इस साल के अंत तक लागू कराना चाहती है. उम्मीद लगाई जा रही है कि उस समय सारा प्रचार नरेंद्र मोदी के इर्दगिर्द रह जाएगा और राज्यों के अपने चुनावी मुद्दे गौण हो जाएंगे. इससे भाजपा को बढ़त मिल जाएगी.

भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि एक साथ चुनाव से पार्टी को छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर के बोझ से पार पाने में भी मदद मिलेगी. बाकी जगहों पर अच्छे नतीजे मिल जाएंगे तो इन राज्यों में हार का उतना महत्व नहीं रह जाएगा क्योंकि वह एक बड़ी जीत के दरम्यान होगी.

विश्लेषकों के मुताबिक, अगर ये विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के पहले होते हैं तो भाजपा के लिए आम चुनाव में मुश्किल खड़ी हो सकती है. अगर इन तीनों राज्यों में दिसंबर में लोकसभा के बगैर विधानसभा चुनाव होते हैं तो गुजरात जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है और भाजपा को उसकी इच्छा से कहीं कड़ी चुनौती से गुजरना होगा.

गुजरात तो प्रधानमंत्री का गृह राज्य था, लेकिन इन राज्यों में स्थानीय गौरव जैसा कोई मुद्दा भुनाने को नहीं बचेगा. इसके अलावा, मौजूदा मुख्यमंत्रियों—रमन सिंह, शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे सिंधिया की भूमिकाएं व व्यक्तित्व और अन्य स्थानीय मुद्दों के सामने मोदी का जादू या केंद्र सरकार की नीतियों का ढोल पीटना कोई काम नहीं आएगा.

भाजपा के लिए एक या कई राज्यों में हार का विकल्प ही नहीं है. इन तीनों राज्यों में कांग्रेस से उसकी सीधी टक्कर होगी और भाजपा की हार कांग्रेस का नैतिक मनोबल तो बढ़ाएगी ही, साथ ही वह उसके लिए अन्य विपक्षी दलों से समर्थन लेने में भी मददगार साबित होगी, खासकर उत्तर प्रदेश में, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं, जिनमें से 73 भाजपा और उसके साथियों ने बीते चुनाव में जीती थीं.

इससे ही राष्ट्रीय चुनाव के विजेता का फैसला हो जाएगा. चुनाव के समय अगर किसी राज्य में अपनी सरकार हो तो हमेशा थोड़ा फायदा होता है. इसलिए चुनावों को मिलाना और बाकी राज्यों को ऐसा करने के लिए लपेटे में ले लेना भाजपा-एनडीए के लिए चौतरफा जीत की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है.

जाहिर है कि एक साथ चुनाव होने से मोदी को भाजपा शासित प्रदेशों में चुनाव प्रचार को खुद तक सीमित रखने में आसानी होगी और वह राज्य सरकारों की नाकामियां छिपाकर बहस इस बात की ओर ले जाएंगे कि अगला प्रधानमंत्री कौन होना चाहिए. विश्लेषकों की राय में मोदी अपनी बेहतर भाषणबाजी का इस्तेमाल करके खुद को पीड़ित के रूप में दिखा सकते हैं और इस धारणा को इस मुकाम तक लेकर जा सकते हैं कि भारत को केवल वे ही बचा सकते हैं.

एक साथ चुनाव कराने का एक फायदा यह भी है कि इसमें मतदाताओं के अपने राज्य के लिए अलग और केंद्र में सरकार के लिए अलग पार्टी को वोट देने की आशंका कम है. यही कारण है कि अन्य भाजपा शासित राज्यों को भी चुनाव कराने को तैयार करके और फिर उन सारे राज्यों को शामिल करके जिनमें अगले छह महीने में चुनाव होने हैं, भाजपा-राजग को खासा लाभ मिल जाएगा.

आशंका इस बात की है कि पिछली बार जब वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के दौरान भाजपा ने जल्द लोकसभा चुनाव कराने की घोषणा की थी, तो वह हार गई थी. इसलिए कांग्रेस और अन्य बड़े विपक्षी दलों के पास इस विचार का विरोध करने की बेहतर वजह है. खासकर कांग्रेस के लिए सारे चुनावों को एक साथ कराना आदर्श स्थिति नहीं होगी क्योंकि उसके लिए जरूरी वित्तीय संसाधन जुटाना फिलहाल उसकी सीमाओं के बाहर है.

कांग्रेस को इसमें खराब नीयत भी नजर आती है. पूर्व केंद्रीय मंत्री एस. जयपाल रेड्डी कहते हैं, ”भाजपा ने यह पेशकश हमेशा उस समय की है जब वह सत्ता में रही है. साल 2003 में भी वह पहली बार यह प्रस्ताव लाई थी तो उस समय मैंने इसका पुरजोर विरोध किया था.

यह मध्य वर्ग के मतदाताओं को रिझाने की कोशिश है लेकिन कानूनी चुनौती में यह नहीं टिक पाएगी. किसी विधायक के कार्यकाल को समय से पहले खत्म कर देना जबकि उसे पांच साल के लिए चुना गया है तो उसे कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है. यह प्रस्ताव बकवास है. यह दीर्घकाल में किसी भी पार्टी को फायदा पहुंचाने वाला नहीं है.”

कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं, ”असली चालाकी तो मामले की गहराई में छिपी है. इसके लिए संविधान में किए जाने वाले जरूरी 10 बदलावों में से सात पर आम सहमति कहां है? क्या विधानसभाओं और लोकसभा के लिए तय कार्यकाल होंगे? तमाम हितधारकों से कोई राय भी नहीं ली गई.”

पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी कहते हैं, ”अगर विधानसभा-लोकसभा चुनाव साथ होते हैं तो राज्यों के और राष्ट्रीय मुद्दे आपस में टकराएंगे और राज्य के लिए महत्वपूर्ण विषय नजरअंदाज हो जाएंगे या फिर इसका उलटा भी हो सकता है. संविधान की संरचना इसकी गुंजाइश नहीं देती. बहुत कम दलों के पास ही लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए एक साथ प्रचार का खर्च करने और संसाधन जुटाने की क्षमता होगी.”

यह भी आशंका है कि इस व्यवस्था से क्षेत्रीय दल हाशिए पर चले जाएंगे. सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक प्रो. संजय कुमार के मुताबिक, ”अगर चुनाव अलग-अलग होंगे तो उसमें क्षेत्रीय दलों के जीतने की संभावना बनी रहेगी.

एक साथ चुनाव उनके दायरे को सीमित करेंगे क्योंकि वे स्थानीय आकांक्षाओं और मुद्दों का प्रतिनिधित्व करते हैं. इससे लोकतंत्र के गहराई में जाने की प्रक्रिया उलट जाएगी.” प्रो. कुमार का सुझाव है कि कानून बनाकर एक साथ चुनाव कराने की कोशिश करने की बजाए उन्हीं राज्यों में साथ-साथ चुनाव कराने की कोशिश होनी चाहिए जहां की विधानसभाओं के कार्यकाल लगभग साथ-साथ पूरे होने वाले हैं.

सीएसडीएस ने 1989 से 2014 के बीच जहां-जहां लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभाओं में भी वोट पड़े, ऐसे 31 राज्यों में चुनावों का अध्ययन किया है. इनमें से 24 मामलों में बड़े राजनैतिक दलों का मत अनुपात लोकसभा और विधानसभा चुनाव, दोनों में एक-सा था. महज सात मामलों में ही वोटरों का अलग मूड देखने को मिला.

इसी तरह साथ हुए चुनावों में कुल 2,600 विधानसभा क्षेत्रों में मतदाताओं के व्यवहार के बारे में एक और अध्ययन में पता चला कि 77 फीसदी मामलों में उस विधानसभा क्षेत्र से लोकसभा व विधानसभा चुनाव जीतने वाली पार्टी एक ही थी. जबकि अलग-अलग होने वाले चुनावों में महज 61 फीसदी मामलों में ही वह पार्टी विधानसभा चुनाव भी जीती जिसका उस इलाके में मौजूदा सांसद था.

वाम दल समर्थित केरल से पूर्व निर्दलीय सांसद व राजनैतिक विश्लेषक डॉ. सेबस्टियन पॉल के मुताबिक, यह कदम बेतुका और लोकतंत्र की विचारधारा के विपरीत होगा. वह इसकी विसंगतियां गिनाते हैं कि पहला तो यह कि कोई भी उस स्थिति में लोकसभा या किसी राज्य विधानसभा या सरकार के कार्यकाल की गारंटी नहीं दे सकता जहां किसी एक दल को शासन करने के लिए साधारण बहुमत नहीं मिलता. अगर किसी राज्य में सरकार गिर जाती है और केंद्र में सरकार सत्ता में बनी रहती है तो राज्य में शासन का भविष्य क्या होगा? तब तो केंद्र सरकार राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा देगी और अगले आम चुनाव तक विधानसभा चुनाव टाल देगी.

पॉल का कहना है, ”एक चुनाव के विचार के पीछे दरअसल भारत में राष्ट्रपति केंद्रित शासन प्रणाली की सरकार लाने की मंशा है जिसमें छिपा एजेंडा संघवाद और राज्यों की स्वायत्तता को अस्थिर करने का है. यह हमारे लोकतंत्र को वेंटिलेटर पर लाने और हमारे संविधान की मूल भावना—अनेकता में एकता को ही छिन्न-भिन्न करने की कोशिश है.”

अन्य लोगों की दलील है कि नए नियमों की मदद से एक साथ चुनाव कराने का यह विचार अविश्वास प्रस्तावों और कार्यकाल के बीच में ही केंद्र सरकार के गिर जाने जैसी स्थितियों के खिलाफ सुरक्षा के तौर पर काम करेगा. इससे राष्ट्रीय पटल पर ज्यादा स्थिर शासन सुनिश्चित होगा और नई राजनैतिक संस्कृति के पनपने की संभावना रहेगी.

चूंकि भाजपा के दिग्गज नेता पहले ही यह दावा कर रहे हैं कि यह अब तक का सबसे बड़ा चुनाव सुधार होगा, ऐसे में मोदी के अपने इस नारे के साथ इसको आगे बढ़ाने की उम्मीद है कि ”सबसे बड़े लोकतंत्र को सबसे महान लोकतंत्र में तब्दील कर दिया जाए.”

चुनाव सुधारों की वकालत करने वाले तमाम लोग एक साथ चुनाव को गलत बताते हैं. उनके मुताबिक, जररूत तो रेस में सबसे आगे रहने वाले को जीत देने की प्रणाली की विसंगतियों में सुधार करने की है जहां राजनैतिक अल्पसंख्यक—दल या व्यक्ति महज 25 से 30 फीसदी वोट पाकर चुनाव जीत जाते हैं. उनकी दलील है कि कि जर्मनी के प्रत्यक्ष सह सूची आधारित आनुपातिक प्रणाली पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है.

फोरम फॉर इलेक्टोरल इंटीग्रिटी के संयोजक एम.जी. देवश्याम के मुताबिक, चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र में ईमानदारी लाने के लिए दी गई सिफारिशों और सुझावों को शामिल करके नया जनप्रतिनिधित्व कानून बनाना ही पहला सुधार होगा. वे कहते हैं, ”आनुपातिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. राजनैतिक दल, उनका संविधान, अनुशासन, आचरण, प्रत्याशियों का नामांकन और फंडिंग को इस कानून का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.”

फाउंडेशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के महासचिव डॉ. जयप्रकाश नारायण का कहना है कि ”एक साथ चुनाव सैद्धांतिक रूप से तो सही हैं क्योंकि निरंतर चुनाव शासन के कामकाज में खलल डालते हैं और पार्टियों के बीच प्रतिस्पर्धी लोकप्रिय वादों-तोहफों को बढ़ावा देते हैं.”

अगर दिसंबर में विधानसभाओं के चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव कराए जाते हैं तो कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए चुनाव प्रचार और वोटरों को लुभाने के लिए संसाधन जुटाना असंभव-सा होगा. बहस को मोदी के इर्द-गिर्द मोड़कर भाजपा और उसके साथी दल पहले ही माहौल काफी हद तक अपने पक्ष में मोड़ सकते हैं.

बड़ी चुनौती

भारतीय आम चुनाव धरती पर ईवेंट मैनेजमेंट का सबसे बड़ा और असाधारण आयोजन हैं. लोकसभा की 543 सीटों पर लगभग एक ही समय चुनाव कराना, जिसमें 9.30 लाख मतदान केंद्रों का प्रबंधन करना होता है, जहां 90 करोड़ वोटर आते हैं.इसे दुनिया में सबसे भरोसेमंद चुनाव माना जाता है. भारत में किसी भी देश के मुकाबले सबसे ज्यादा मतदाता हैं. साथ ही चुनाव निश्चित रूप से संसाधनों  के अधिकतम उपयोग की संभावनाएं खोलेंगे लेकिन जहां कुछ की जरूरतों में जबरदस्त इजाफा (संभवतः दुगना या उससे ज्यादा) होगा, वहीं कुछ में आनुपातिक रूप से उतना इजाफा नहीं होगा. फिलहाल 2019 की चुनौतियां इस प्रकार हैः

-वर्ष 2019 में वोट डालने वाले मतदाताओं की अनुमानित संख्या 90 करोड़ होगी.

-16 लाख वीवीपैट (वोटर वेरीफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) स्लिप का इस्तेमाल होगा.

-मतदान केंद्रों की 9,30,000 संख्या है.

-01करोड़ सरकारी मुलाजिमों की जरूरत होगी जो बतौर चुनाव अधिकारी चुनाव का सुपरविजन करेंगे.

एक साथ चुनाव के दूसरे पहलू

फायदे

-चुनावी चक्र का अंत, जहां हर साल औसतन पांच से ज्यादा राज्यों के चुनाव होते रहते हैं और इसके कारण पार्टियों व चुनावी मशीनरी पर बहुत ज्यादा बोझ पड़ता है

-चुनावों पर लगातार बढ़ता खर्च घटेगा. चुनाव के लिए सरकारी कर्मचारियों को बार-बार नहीं भेजना होगा

-सुरक्षा संसाधनों/शांतिपूर्ण चुनाव कराने के लिए पुलिसकर्मियों के इस्तेमाल में कमी

-कुछ ही समय के लिए चुनावी आचार संहिता लागू होगी जिससे सामान्य सरकारी कामकाज में बार-बार रुकावट नहीं आएगी. जबकि बार-बार चुनाव होने से इस तरह की बाधाएं ज्यादा आती हैं

-कम संख्या में चुनाव होने से भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगाने में मदद मिलती है और दलालों की संख्या व काले धन में कमी आती है

-सरकारी प्रक्रिया बाधित होने के अवसर कम हो जाएंगे

नुक्सान

-विविधता और गठबंधन राजनीति का दम घुट जाएगा जबकि इससे लोकतंत्र को मुखरता मिलती है और यह वोटरों के व्यवहार व चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है

-अगर केंद्र में बहुमत वाली सरकार होती है तो यह राज्यों में सत्ता विरोधी भावना को बेअसर करेगा और केंद्र व राज्यों के रिश्ते मालिक और ग्राहक के हो जाएंगे

-प्रादेशिक पार्टियों की भूमिका घट जाएगी

-किसी सरकार को बेदखल करने के लिए विधान मंडल की शक्तियों में कमी आ सकती है क्योंकि कोई भी विपक्ष तब तक अविश्वास प्रस्ताव नहीं रख सकता है जब तक कि उस समय उसके पास नई सरकार बनाने की ताकत न हो

-यह संसदीय व्यवस्था और संघवाद की भावना की उपेक्षा करता है, संविधान के सिद्धांतों से छेड़छाड़ करता है.

-राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों पर लोगों के विचार और निर्णय को मिला देता है जबकि दोनों बिल्कुल अलग हैं

-गरीबों के वोट के अधिकार को कम करता है

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