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अमित शाह ;एनडीए के दलों से मुलाकात क्यों?

uddhav-thackery_650x400_61504536831बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से उनके घर मातोश्री पर आखिर मिल ही लिए. दोनों नेताओं के बीच क्या बातचीत हुई, इसका खुलासा तो अभी पूरी तरह से नहीं हुआ. लेकिन सवाल यही है कि क्या इससे दोनों पार्टियों के बिगड़े रिश्ते पटरी पर वापस आ पाएंगे या नहीं? चाहे बीजेपी इस बैठक को लेकर बहुत आशान्वित हो लेकिन कम से कम शिवसेना के तेवर तो तीखे ही बने हुए हैं.  शिवसेना के मुखपत्र सामना में इस बैठक का भी मखौल बनाया गया. इससे पहले अमित शाह मातोश्री पिछले साल 18 जून को गए थे. तब वे राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के लिए समर्थन जुटा रहे थे. पिछले दो राष्ट्रपति चुनाव में शिवसेना बीजेपी को अंगूठा दिखा चुकी थी. इसलिए शाह शिवसेना के समर्थन को लेकर आश्वस्त होना चाहते थे. उद्धव ने उन्हें निराश नहीं किया.एक बार फिर काम अमित शाह को ही पड़ा है. लोकसभा उपचुनावों की करारी हार ने बीजेपी के मिशन 2019 पर सवालिया निशान लगा दिया है. नए सहयोगी मिलना तो दूर की बात, मौजूदा सहयोगी दलों ने ही आंखें दिखाना शुरू कर दिया है.

असल, सारी लड़ाई इसी बात पर है कि महाराष्ट्र में बड़ा भाई कौन है. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे बिहार में जेडीयू और बीजेपी के बीच फांस फंसी हुई है. 1999 से ही सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय था. विधानसभा चुनाव में यह 171-117 था. यानी शिवसेना 171 और बीजेपी 117. 2009 में दो सीटें कम-ज्यादा हुईं. यानी 169-119. जबकि लोक सभा चुनाव में बीजेपी अमूमन 26 और शिवसेना 22 सीटों पर चुनाव लड़ती आई हैं. लेकिन 2014 के लोक सभा चुनाव में अपने बूते बहुमत हासिल कर चुकी बीजेपी अब छोटा भाई रहने के लिए तैयार नहीं थी. उसने अक्टूबर के विधानसभा चुनाव में बड़ा हिस्सा मांगा. उत्तर भारतीय पार्टी मानी जाने वाली बीजेपी को लोक सभा चुनाव में बड़े पैमाने पर मराठा और गुजराती वोट भी मिले. बीजेपी को लगा कि उसका महाराष्ट्र में ज़्यादा फैलाव हुआ है इसलिए पचास ऐसी सीटें जहां शिवसेना कभी नहीं जीती, बीजेपी को मिलनी चाहिए. माना गया कि इसके पीछे अमित शाह का ही दिमाग था. शिवसेना इसके लिए तैयार नहीं हुई. बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन टूटा और दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ीं. बीजेपी को 122 सीटें मिलीं और वह बहुमत से दूर रही. लेकिन पहली बार मुख्यमंत्री बीजेपी का बना और शिवसेना का उप मुख्यमंत्री तक नहीं बन पाया. मातोश्री के हाथों से रिमोट कंट्रोल चला गया. केंद्र में भी शिवसेना का एक ही कैबिनेट मंत्री बना और जब अनिल देसाई को कैबिनेट मंत्री बनाने की बात नहीं मानी गई तो वे शपथ ग्रहण समारोह के दिन एयरपोर्ट से ही मुंबई वापस चले गए.बाला साहेब ठाकरे के वक्त बेहद मजबूत शिवसेना इतनी बेबस और लाचार कभी नहीं दिखी. बीएमसी में भी बीजेपी को शिवसेना से सिर्फ सात सीटें कम मिलीं. हालांकि बाद में बीजेपी ने वहां शिवसेना को समर्थन दे दिया.

अब शिवसेना बीजेपी को उसी की भाषा में जवाब देना चाहती है. विधानसभा में शिवसेना अपना वर्चस्व चाहती थी जो बीजेपी ने नहीं होने दिया. अब शिवसेना जानती है कि बीजेपी के लिए 2019 का लोक सभा चुनाव कितना महत्वपूर्ण है. यूपी के बाद महाराष्ट्र सबसे ज्यादा सांसद भेजता है. अब हिसाब चुकाने की बारी शिवसेना की है. हालांकि न्योते के बावजूद शिवसेना ने कुमारस्वामी के शपथग्रहण समारोह में विपक्षी एकता के प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लिया. हिंदुवादी राजनीति के ठप्पे के चलते कांग्रेस-एनसीपी उसके नजदीक नहीं आना चाह रहे. वैसे फेडरल फ्रंट का ढोल पीट रहीं ममता बनर्जी को शिवसेना से परहेज नहीं लगता. लेकिन शिवसेना अब अगर बीजेपी से गठबंधन के लिए तैयार भी होगी तो उसकी बड़ी कीमत वसूलेगी क्योंकि इस बार गरज बीजेपी की है. पर शिवसेना के भीतर से आवाज़ें भी उठ रही हैं. एक बड़ा खेमा चाहता है कि बीजेपी से रिश्ते न टूटें.

उधर, विपक्ष एकता की एक से एक नई नुमाइश कर रहा है तो वहीं उत्तर प्रदेश में केवल चार एमएलए वाले ओमप्रकाश राजभर बात-बात पर बीजेपी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खिल्ली उड़ाते नज़र आ रहे हैं. राज्य सभा चुनाव में वे बीजेपी का साथ तभी देते हैं जब उनकी मुलाकात सीधे अमित शाह से होती है. शाह को अब आगे आकर मोर्चा संभालना पड़ रहा है. वे पासवान पिता-पुत्र से मिल लिए.बादल पिता-पुत्र से चंडीगढ़ में मिले. बच गए नीतीश और उपेंकुशवाहा. उनसे भी जल्दी ही मुलाकात हो जाएगी. लेकिन क्या केवल इन मुलाकातों से रिश्तों की तल्खी दूर होगी? चार साल से हाशिए पर पड़े और अपमान का घूंट पी चुके सहयोगी दल अब सम्मान नहीं सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी की तलाश में हैं.

नीतीश और उद्धव दोनों चाहते हैं कि बिहार और महाराष्ट्र में बीजेपी उन्हें बड़ा भाई माने, यानी लोकसभा चुनाव में ज़्यादा सीटें उन्हें मिलें. ज़ाहिर है बीजेपी ऐसा नहीं करेगी. तो ऐसे में सुलह होगी या कलह यह बाद में पता चलेगा. लेकिन शिवसेना के मुखपत्र सामना के तेवर अलग इशारा कर रहे हैं.सामना ने पूछा कि उपचुनाव में हार के बाद ही एनडीए के दलों से मुलाकात क्यों? शिवसेना को किसी पोस्टर बॉय की जरूरत नहीं है. संपर्क बनाना और तोड़ना बीजेपी का व्यापारिक गणित है. सामना कड़वे अंदाज़ में लिखता है कि सरकार और जनता के बीच संपर्क टूट चुका है. पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ गए हैं और किसानों का आंदोलन जारी है. आखिर में सामना बीजेपी के मिशन 2019 का मज़ाक बनाकर लिखता है कि 2019 में अपने दम पर 350 सीटें जीतने की शाह की जिद को सलाम. लेकिन शिवसेना 2019 में अकेले ही चुनाव लड़ेगी.

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