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अफगानिस्तान में शिया लड़कियों की मौत और मुस्लिम देशों की चुप्पी

kabul blastनई दिल्ली। फ़िलिस्तीन पर इजराइल की जवाबी कार्रवाई पर पाकिस्तानी सहित लगभग सभी मुस्लिम देशों ने चिल्लाना और इजराइल की आलोचना करनी शुरू की दी है लेकिन सवाल उठ रहा है कुछ दिन पहले रमजान के पवित्र महीने के 25 वें दिन पश्चिमी काबुल अफगानिस्तान में एक शिया लड़कियों के हाई स्कूल जिसे सैय्यद अल-शुहदा भी कहा जाता है, के सामने आतंकवादियों द्वारा जब छात्राऐं बाहर निकल रहीं थीं, तीन विस्फोट किए गए जिसमें 100 से अधिक लोगों की हत्या हो गई या घायल हो गए। प्रभावितों में अधिकांश इस स्कूल की लड़कियां हैं।इस घटना पर मुस्लिम देशों ने चुप्पी क्यों साध ली ? क्या यह निर्दोष मुस्लिम बच्चियों की हत्या नहीं थी? यदि आईएसआईएस द्वारा काबुल में शिया लड़कियों को मारने का अपराध यूरोप में हुआ था,तो पूरे यूरोप में एक सप्ताह का सार्वजनिक शोक घोषित किया गया होता और इतनी यूरोप के देश इतनी जोर से चिल्लाते कि दुनिया के सभी लोगों को पता चल जाता कि क्या अपराध afganistan girlsहुआ है लेकिन कैसे अफगानिस्तान के शियाओं पर जुल्म ढाए जा रहे हैं। इसे लेकर ना तो यूरोप के देशों की आवाज सुनाई दे रही है और ना ही मुस्लिम देश चिल्ला रहे हैं। आखिर क्यों। शियाओं की मौत पर मानवाधिकार वाले चुप हैं और संयुक्त राष्ट्र भी।गृह मंत्रालय ने बताया कि मरने वालों में अधिकतर 11 से 15 साल की लड़कियां हैं। शनिवार के इस हमले में घायलों की संख्या भी 100 के पार हो गई है। राजधानी के पश्चिमी इलाके दश्त-ए-बरची में जब परिजन मृतकों को दफना रहे थे तो उनके भीतर दुख के साथ ही आक्रोश भी था। मोहम्मद बारीक अलीज़ादा (41) ने कहा, ‘सरकार घटना के बाद प्रतिक्रिया देती है। वह घटना से पहले कुछ नहीं करती है।’ अलीज़ादा की सैयद अल-शाहदा स्कूल में 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली भतीजी लतीफा की हमले में मौत हुई है। अरियान ने बताया कि स्कूल की छुट्टी होने के बाद विद्यार्थी जब बाहर निकल रहे थे तब स्कूल के प्रवेश द्वार के बाहर तीन धमाके हुए। ये धमाके राजधानी के पश्चिम में स्थित शिया बहुल इलाके में हुए हैं।

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में सादत के ब्यूटी पार्लर में सुल्ताना करीमी ग्राहक के भौंहों को सावधानी के साथ बना रही हैं. 24 साल की सुल्ताना करीमी बड़े ही आत्मविश्वास के साथ इस ब्यूटी पार्लर में काम करती हैं और उन्हें मेकअप और हेयर स्टाइल करने का जुनून है. करीमी और अन्य युवा महिलाएं जो पार्लर में काम कर रही हैं, उन्होंने कभी तालिबान के शासन का अनुभव नहीं किया.लेकिन वे सभी यह चिंता करती हैं कि अगर तालिबान सत्ता हासिल कर लेता है, तो उनके सपने खत्म हो जाएंगे, भले ही वह शांति से एक के हिस्से के रूप में नई सरकार में शामिल हो जाए. करीमी कहती हैं, ”तालिबान की वापसी के साथ समाज बदल जाएगा और तबाह हो जाएगा. महिलाओं को छिपना पड़ेगा और उन्हें घर से बाहर जाने के लिए बुर्का पहनना पड़ेगा.”

अभी जिस तरह के कपड़े करीमी पहनती हैं उस तरह के कपड़े तालिबान के शासन के दौरान नामुमकिन थे. तालिबान ने अपने शासन के दौरान ब्यूटी पार्लर पर बैन लगा दिया था. यही नहीं उसने लड़कियों और महिलाओं के पढ़ने तक पर रोक लगा दी थी, तालिबान की कट्टर विचारधारा की शिकार सबसे अधिक लड़कियां और महिलाएं हुईं.महिलाओं को परिवार के पुरुष सदस्य के बिना घर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी. अब जब अमेरिकी सैनिकों की वापसी का समय नजदीक आ रहा है, देश की महिलाएं तालिबान और अफगान सरकार के बीच रुकी पड़ी बातचीत पर नजरें टिकाई हुईं हैं. वे अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अपने भविष्य को लेकर चिंतत हैं.महिला अधिकार कार्यकर्ता महबूबा सिराज कहती हैं, ”मैं निराश नहीं हूं कि अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से जा रहे हैं. उनके जाने का समय आ रहा था.” वे अमेरिका और नाटो बल के लिए आगे कहती हैं, ”हम चिल्ला रहे हैं और कह रहे हैं कि खुदा के वास्ते कम से कम तालिबान के साथ कुछ करो. उनसे किसी तरह का आश्वासन लो. एक ऐसा तंत्र बने जो महिलाओं के अधिकारों की गारंटी दे.”

तालिबान पर महिलाओं को नहीं भरोसा

पिछले हफ्ते तालिबान ने एक बयान में कहा कि वह किस तरह की सरकार चाहता है. उसने वादा किया कि महिलाएं ”शिक्षा के क्षेत्र में सेवा दे सकती हैं, व्यापार, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र में काम कर सकती हैं. इसके लिए उन्हें इस्लामी हिजाब का सही ढंग से इस्तेमाल करना होगा.” साथ ही उसने वादा किया कि लड़कियों को अपनी पसंद का पति चुनने का विकल्प होगा, अफगानिस्तान के रूढ़िवादी और कबीलों वाले समाज में इसे अस्वीकार्य माना जाता है.लेकिन बयान में कुछ ही विवरणों की पेशकश की गई, बयान में यह नहीं बताया गया कि क्या महिलाओं की राजनीति में शामिल होने की गारंटी होगी या उन्हें एक पुरुष रिश्तेदार के बिना घर से बाहर जाने की आजादी होगी. ब्यूटी पार्लर की मालकिन सादत बताती हैं कि वह ईरान में पैदा हुई थी, उनके माता-पिता ने उस समय ईरान में शरण ली हुई थी. वह ईरान में बिजनेस करने के लिए वर्जित थी, इसलिए उन्होंने 10 साल पहले अपने देश लौटने का फैसला किया, जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा था. हाल के दिनों में अफगानिस्तान में हिंसा की घटनाएं बढ़ने से वे चिंतित हो गई हैं और अब ज्यादा सतर्क हो गई हैं. सादत कभी अपनी कार चलाती थी लेकिन अब वे ऐसा नहीं करती हैं.

”सिर्फ तालिबान का नाम ही हमारे मन में खौफ भर देता है.”

ब्यूटी पार्लर में काम करने वाली एक और युवती कहती है, ”सिर्फ तालिबान का नाम ही हमारे मन में खौफ भर देता है.” तमिला पाजमान कहती हैं कि वह पुराना अफगानिस्तान नहीं चाहती हैं लेकिन वे शांति चाहती हैं. वे कहती हैं, ”अगर हमे यकीन हो कि हमारे पास शांति होगी, तो हम हिजाब पहनेंगे, काम करेंगे और पढ़ाई करेंगे लेकिन शांति होनी चाहिए.”20 साल की आयु वर्ग की युवतियां तालिबान के शासन के बिना बड़ी हुईं, अफगानिस्तान में इस दौरान महिलाओं ने कई अहम तरक्की हासिल की. लड़कियां स्कूल जाती हैं, महिलाएं सांसद बन चुकी हैं और वे कारोबार में भी हैं. वे यह भी जानती हैं कि इन लाभों का उलट जाना पुरुष-प्रधान और रूढ़िवादी समाज में आसान है. करीमी कहती हैं, ”अफगानिस्तान में जिन महिलाओं ने आवाज उठाई, उनकी आवाज दबा दी गई, उन्हें कुचल दिया गया.” करीमी कहती हैं कि ज्यादातर महिलाएं चुप रहेंगी क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें कभी समर्थन हासिल नहीं होगा.जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय की सूचकांक के मुताबिक अफगानिस्तान महिलाओं के लिए दुनिया के सबसे खराब देशों में से एक है, अफगानिस्तान के बाद सीरिया और यमन का नंबर आता है. संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के मुताबिक अफगानिस्तान में तीन में से एक लड़की की शादी 18 साल से कम उम्र में करा दी जाती है. ज्यादातर शादियां जबरन होती है.

 

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