दो दिन बाद शिफ्ट होने की तैयारी में था परिवार
हादसे की जानकारी मिलने पर पहुंचे परिचित व रिश्तेदार मलवे में अपनों को तलाशते दिखे। साथ ही वे लोग भी पहुंचे जिन्होंने इन इमारतों में आशियाना बनाने के लिए बिल्डर को जीवन भर की कमाई सौंप दी है। इमारत को धराशायी देख उनका रो-रोकर बुरा हाल था। इमारत में फ्लैट लेने वाले एक पीड़ित ने बताया कि बिल्डर ने निर्माण कार्य पूरा होने के बाद कब्जा देना शुरू कर दिया था। एक इमारत में 20 फ्लैट बने थे। सभी फ्लैटों की बुकिंग भी हो चुकी थी। कब्जा मिलने के बाद कुछ परिवारों ने यहां रहना शुरू कर दिया। वहीं कुछ लोग जल्द ही शिफ्ट होने की तैयारी में थे। इन परिवार में शामिल दीपिका कंबोज को जैसे ही बिंल्डिग के धराशायी होने की जानकारी मिली, वह तुरंत घटना स्थल पर पहुंच गईं। दीपिका ने बताया कि शुक्रवार को गृह प्रवेश की योजना थी। परिवार मयूर विहार में किराये के मकान में रहता है। फ्लैट खरीदने के लिए उन्होंने सारी जमा पूंजी लगा दी थी।

मदद के लिए आगे आए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व अन्य संगठन
दो इमारतों के गिरने से जहां स्थानीय लोगों में रोष दिखा। वहीं गांव के लोग बचाव दल का सहयोग करने को भी आतुर दिखे। घटनास्थल पर लोगों का जन सैलाब पूरे दिन उमड़ा रहा। ग्रामीणों ने मलबा हटाने में सहयोग करने की अपील भी आलाधिकारियों से की। लेकिन अधिकारियों ने प्रशिक्षित न होने का हवाला देकर ग्रामीणों को पीछे हटा दिया। इसके बाद ग्रामीण केवल मूकदर्शक बने खड़े रहे। यदि बचाव दस्ते का बीच-बीच में काम रुकता तो मलबे के नीचे दबे लोगों की जिंदगी की आस लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती।

सहायता समूहों ने मदद को आगे बढ़ाए हाथ 
कई स्वयं सेवी संघ अपनों को तलाशने पहुंचे लोगों को ढांढस बंधाने व प्रशासन की मदद करने को आगे आए। सहायता समूहों का यह दल लोगों को पानी पिलाने के साथ बचाव दल का सहयोग करता दिखा। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आइटीबीपी, बचाव दल का सहयोग करते हुए स्वयं सहायता समूह व साह सतनाम ग्रीन फोर्स से जुड़े लोगों ने मौके पर पहुंचकर बचाव दल का सहयोग किया।

खराब रास्ता बना बाधा 
शाहबेरी गांव में ऊंची इमारतों के बीच संकरी गलियां व रास्तों में जल भराव बचाव दल के आगे बांधा बना रहा। मलबा डालकर रास्ता तैयार कर प्रशासन किसी तरह घटनास्थल तक पंपलेट पहुंचाने में कामयाब रहा।

फ्लैट बुकिंग निरस्त कर रहे खरीदार 
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के शाहबेरी गांव में अवैध तरीके से खड़ी की गई बहुमंजिला इमारतों में लोगों को फ्लैट बुक कराने का गौरख धंधा जोरों से चल रहा है। सस्ते दामों में घरौंदा दिलाने का सब्जबाग दिखाकर लोगों को ठगने के लिए बिल्डरों ने लंबी चौड़ी टीम बना रखी है। आसपास बनकर तैयार हो चुकी सोसायटियों में रह रहे लोगों ने कई रिश्तेदारों की निर्माणाधीन इमारतों में फ्लैट बुकिंग कराई थी। बुधवार को हादसा हो जाने के बाद कई लोग बिल्डरों को तलाशते निर्माणाधीन साइट पर पहुंचें। उन्होंने बिल्डरों के एजेंटों से फ्लैट बुकिंग निरस्त कर बुकिंग के पैसे वापस लौटाने की मांग की।

अपनों को दिनभर तलाशती रहीं आंखों को मिली मायूसी 
मलबे में दबे लोगों के परिजन बुधवार को दिन भर उन्हें तलाशते रहे। राहत व बचाव कार्य की धीमी गति के कारण उनकी आंखें पथरा गईं। मलबे में मैनपुरी के उदैतपुर अभई गांव के रहने वाले शिव कुमार त्रिवेदी, उनकी मां, भाभी व एक साल की भतीजी भी दब गई।

शिवम उर्फ शिव कुमार त्रिवेदी इजीकेयर पेस्ट एंड कंट्रोल कंपनी में प्रबंधक थे। शिव अच्छी नौकरी के लिए विदेश जाना चाहते थे। पिता व चाचा से इच्छा कई बार जाहिर कर चुके थे। टीवी चैनल व सोशल मीडिया पर इमारत गिरने की सूचना जैसे ही प्रसारित हुई। नोएडा के सेक्टर 121 में रहने वाली उनकी बहन नेहा हतप्रभ रह गईं। उन्होंने पिता सुरेंद्र व चाचा नरेंद्र को मैनपुरी में हादसे की सूचना दी। बुधवार करीब एक बजे सुरेंद्र व उनका बड़ा बेटा राम कुमार त्रिवेदी परिवार के सदस्यों की तलाश में मौके पर पहुंचे। देर शाम तक उनकी तलाश जारी थी।

राम कुमार त्रिवेदी ने बताया कि शिव कुमार ने दो बेडरूम का फ्लैट खरीदा था। अप्रैल में इसकी रजिस्ट्री कराई थी। 14 जुलाई को उन्होंने गृह प्रवेश किया था। गृह प्रवेश में ही उनकी मां राजकुमारी (50), पत्नी प्रियंका (28) व एक साल की बेटी पंखुड़ी आई थी। बीते 28 जून को ही उन्होंने मैनपुरी में परिवार के साथ पंखुड़ी का पहला जन्म दिन मनाया था।

शिव कुमार परिवार के साथ शुक्रवार को मैनपुरी लौटने वाले थे। मंगलवार रात को यह हादसा हो गया। राम कुमार ने बताया कि मलबे से गृह प्रवेश पर दी गई ज्वेलरी, नकदी व कुछ कपड़े मिले हैं। भाई को तलाशने पहुंचे फैजाबाद निवासी अकरम के लिए हादसा जिंदगी भर का जख्म दे गया। बचाव कर्मियों ने मलबे से उनके भाई शमशाद का शव बरामद किया। उनके परिवार के दो सदस्य अभी भी लापता हैं, मलबे में उनकी तलाश जारी है।

शिव को बहन ने किया था मना
शिव कुमार त्रिवेदी इससे पहले परिवार के साथ न्यू अशोक नगर में रहते थे। इमारत में कम परिवार होने के कारण नेहा ने शिव कुमार को यहां शिफ्ट करने से रोका था। शिव कुमार जल्द से जल्द अपने मकान में शिफ्ट होना चाहते थे। इसलिए बहन की इच्छा न होने के बावजूद उन्होंने 14 जुलाई को परिवार के साथ फ्लैट में गृह प्रवेश किया था।

आंखें मूंदे रहा प्राधिकरण, खड़े होते गए कच्चे किले 
ग्रेटर नोएडा वेस्ट के शाहबेरी गांव में लोगों की जिंदगी लीलने वाली मौत की इमारत रातों-रात खड़ी नहीं हुई। इसके आसपास 100 से अधिक अवैध बिल्डर प्रोजेक्ट हैं। इनमें दस हजार से अधिक फ्लैट बनाए जा चुके हैं। इनका निर्माण पिछले आठ वर्षों से हो रहा है। 2010 में गांव की जमीन का अधिग्रहण रद होने के बाद कालोनाइजर सक्रिय हो गए थे। इतनी बड़ी संख्या में अवैध इमारत खड़े होने से ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण भी सीधे कठघरे में खड़ा हो गया है। शहर से अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीबों की रोजी-रोटी छीनने वाले प्राधिकरण अधिकारियों ने शाहबेरी और उसके आसपास के गांवों में अवैध रूप से बनाए जा रहे फ्लैटों का निर्माण रोकने का कभी प्रयास नहीं किया। पिछले आठ वर्षों में मौत की अवैध इमारतें खड़ी होती रहीं और प्राधिकरण अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे। प्रतिदिन अधिकारियों का काफिला ग्रेटर नोएडा वेस्ट की सड़कों से गुजरता है। अधिकारियों की नजर कभी शाहबेरी गांव की तरफ नहीं पड़ी अथवा ये कहा जाए कि प्राधिकरण अधिकारियों और प्रबंधकों को आंख मूंदने के लिए उनकी जेब भर दी गईं। लोगों का सीधे-सीधे आरोप है कि इस हादसे में लोगों की मौत के लिए प्राधिकरण भी जिम्मेदार है।

दरअसल, किसानों से सस्ते में जमीन खरीदकर अवैध रूप से बनाए जा रहे फ्लैटों से कालोनाइजरों की अधिक बचत हो जाती है। उसका कुछ हिस्सा प्राधिकरण अधिकारी, प्रबंधक और पुलिस की जेब में भी जाता है, ताकि वे निर्माणाधीन इमारतों की तरफ ध्यान न दें। कालोनाइजरों द्वारा बनाए गए प्रोजेक्टों में चार से दस मंजिला करीब दस हजार हजार फ्लैट हैं। किसी भी प्रोजेक्ट के फ्लैटों की निर्माण सामग्री की गुणवत्ता ठीक नहीं है। कालोनाइजरों ने अधिक कमाई के लालच में कम लागत की घटिया निर्माण सामग्री का प्रयोग फ्लैट बनाने में किया।

इन गांवों में भी बनाए जा रहे हैं अवैध फ्लैट  शाहबेरी के अलावा इटेड़ा, पतवाड़ी, चिपियाना, तिगरी, बिसरख, जलपुरा, कुलेसरा, हल्दोनी, खेड़ा चौगानुपर, तुस्याना, खैरपुर गुर्जर आदि गांवों में बड़ी संख्या में अवैध फ्लैटों का निर्माण किया जा रहा है।

अधिकारियों ने बंद किए फोन 
हादसे के बाद ग्रेनो प्राधिकरण अधिकारियों ने फोन उठाने बंद कर दिए। प्राधिकरण कार्यालय में भी कोई अधिकारी बुधवार को मौजूद नहीं रहा। सिर्फ प्रबंधक, वरिष्ठ प्रबंधक, उप महाप्रबंधक व महाप्रबंधक स्तर के अधिकारी घटना स्थल पर पहुंचे। उनसे कालोनाइजरों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करने का सवाल किया तो उन्होंने कहा कि गांव की जमीन का अधिग्रहण रद हो गया था। प्राधिकरण को इसके बाद कार्रवाई का अधिकार नहीं रहा। जबकि प्राधिकरण के गजट में साफ लिखा है कि अधिसूचित क्षेत्र के गांवों में प्राधिकरण की अनुमति के बिना निर्माण नहीं हो सकता। शाहबेरी में प्राधिकरण ने अवैध निर्माण रुकवाने का प्रयास नहीं किया।

पीड़ित परिजन ने प्राधिकरण पर लगाया आरोप जमींदोज हुए फ्लैटों में मैनपुरी का शिवकुमार का परिवार भी फंसा हुआ है। शिवम कुमार के पिता सुरेंद्र त्रिवेदी ने कहा कि उनके परिवार के सदस्य मलबे में दबे हैं। उनके साथ कोई अनहोनी हुई तो इसके लिए ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण भी जिम्मेदार है। प्राधिकरण ने कैसे अवैध फ्लैटों का निर्माण होने दिया। उन्होंने कहा कि प्राधिकरण अधिकारियों पर भी मामला दर्ज होना चाहिए। प्राधिकरण की ही लापवाही से कई परिवार पूरी तरह से तबाह हो गएं है। इन सब की मौत का जिम्मेदार ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण है।

15 मिनट में परिवार समेत मुख्य आरोपित फरार
शाहबेरी में गिरी दो बिल्डिंग गाजियाबाद निवासी बिल्डर भाइयों ने बनाई थी। हादसे के बाद से ही आरोपित भाई परिवार के साथ फरार हो गए। दोनों नेहरूनगर थर्ड के एफ ब्लॉक में 151 नंबर के मकान में रहते हैं। मनीष गोयल, पंकज गोयल, पत्नी व बच्चों, पिता अनिल गोयल, माता और छोटे भाई के साथ सिहानी गेट थाना इलाके के नेहरूनगर थर्ड में रहते हैं। दोनों जीके होम्स नाम से र्बिंल्डग बनाने का काम करते हैं। हालांकि ,घर के बाहर मनीष गोयल एडवोकेट का बोर्ड भी लगा है।

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण कुंभकर्णी नींद सोया रहा
ग्रेनो प्राधिकरण ने 2008 में शाहबेरी गांव की 156 हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया था। प्राधिकरण ने जमीन के बदले किसानों को करीब 110 करोड़ रुपये मुआवजे का दिया था। पहले 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट और बाद में 12 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने गांव की जमीन का अधिग्रहण रद कर दिया था। हैरत की बात यह है कि प्राधिकरण ने मुआवजे को भी वापस लेने का प्रयास नहीं किया। सिर्फ चार किसानों ने पांच करोड़ रुपये की मुआवजा राशि वापस की है। जमीन अधिग्रहण रद होने के बाद प्राधिकरण ने फिर से अधिग्रहण का प्रस्ताव शासन को भेजा।

इनके खिलाफ दर्ज हुई एफआइआर
पंकज गोयल, मनीष गोयल, एलिन गुप्ता, कांट्रेक्टर सरदार, आर्किटेक्ट सत्यप्रकाश, डॉक्टर सलीम, सलमुद्दीन, ठेकेदार कासिम व सहयोगी बिल्डर साथी, नितिन त्यागी, कैलाश त्यागी, प्रशांत शर्मा, बिल्डर मान, चेतन त्यागी, सोनू पाठक, हाजी तुरकान, हरेंद्र नागर, मोमीन, नजमू, मुन्तजर हुसैन, अनीस खान, अतुल त्यागी, दिनेश, संजीव कुमार, गंगा शंकर द्विवेदी व अन्य बिल्डर साथी, पंकज व मनीष ने बनाए थे फ्लैट। पुलिस को जांच के दौरान पता चला है कि जिस जमीन पर दुर्घटना हुई वह गंगा शंकर द्विवेदी के नाम है, लेकिन पंकज गोयल व मनीष गोयल ने मिलकर फ्लैट बनाए थे। इसके लिए अलग-अलग लोगों को कांट्रेक्ट दिए गए थे। पंकज व मनीष दोनों रिश्तेदार बताए जा रहे हैं।

तत्कालीन सीईओ के निर्देश पर भी नहीं हुई कार्रवाई
करीब दस माह पहले ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के तत्कालीन सीईओ देबाशीष पंडा ने शाहबेरी, बिसरख आदि सभी गांवों में बनाए जा रहे अवैध फ्लैटों का निर्माण कार्य बंद कराने के निर्देश दिए थे। इसके लिए उन्होंने पांच कमेटी बनाकर कड़ी कार्रवाई करने को कहा था। फ्लैट बनाने वालों की पहचान कर थाने में मामला दर्ज कराने के भी निर्देश दिए गए थे। सीईओ के निर्देश पर कमेटी बनी, गांवों का दौरा हुआ। फ्लैट बनाने वालों की सूची बनी। करीब 70 कालोनाइजरों के नाम सामने आए थे, लेकिन मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इससे आगे कार्रवाई नहीं बढ़ी।

भविष्य में हादसे की आशंका बरकरार
ग्रेटर नोएडा वेस्ट में अवैध फ्लैटों का निर्माण नहीं रूका तो भविष्य में भी हादसे हो सकते हैं। इनमें जान-माल की भारी हानि हो सकती है। अधिकांश फ्लैटों का निर्माण मानकों के अनुसार नहीं किया जा रहा। फ्लैटों की नींव मजबूत नहीं है। दो से तीन फीट मिट्टी खोदकर नींव रख दी गई है। सीमेंट और सरिया का भी समुचित प्रयोग नहीं किया गया है। ईट, रोड़ी, बदरपुर में रेत और राख की मिलावट है। इससे इमारतों के गिरने की अंदेशा बना हुआ है।

छज्जे पर खड़ी कर दी आठ मंजिला इमारत
अवैध फ्लैटों के निर्माण में मानकों का कोई ध्यान नहीं रखा गया है। मैदानी तल की किसी भी दिवार पर ऊपरी मंजिल की दीवार नहीं रखी गई है। छज्जे पर आठ से दस मंजिला फ्लैटों का निर्माण कर दिया गया है। अधिक भार के दबाव में छज्जा कभी भी गिरा सकता है। इससे ऊपरी मंजिल के सभी फ्लैट चंद सेकेंडों में जमींदोज हो जाएंगे। इससे भारी जान-माल की हानि होगी।

नौ बिंदुओं पर होगी मजिस्ट्रेटी जांच
जिलाधिकारी बीएन सिंह ने हादसे की मजिस्ट्रेटी जांच के आदेश दिए हैं। एडीएम प्रशासन कुमार विनीत को नौ बिंदुओं पर जांच कर 15 दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं। उसमें घटना के कारण, दोनों भवन प्राधिकरण के अधिसूचित क्षेत्र में होने तथा भवन नियमावली के तहत अनापत्ति प्रमाण पत्र की स्थिति, प्रमाण पत्र जारी होने की स्थिति में नियमों का पालन न होने, निर्माण में कार्यरत मजदूरों के श्रम अधिनियम में पंजीकरण की स्थिति, गुणवत्ता को लेकर जिम्मेदारी तय करने, जिम्मेदारों पर आपराधिक लापरवाही का मामला लागू होने या न होने, अवैध निर्माण रोकने के लिए प्रयास आदि शामिल हैं।

सिर्फ एक जूनियर इंजीनियर दोषी 
जब हादसे होते हैं तो हर कोई सजग हो जाता है। संबंधित महकमा उस समय अत्यधिक सक्रियता दिखाता है। पूरे मामले की पड़ताल की जाती है और प्रारंभिक नजर में आने वाले दोषियों को आनन-फानन में निलंबित करने और तबादला करने की कार्रवाई की जाती है और जांच बिठा दी जाती है। लेकिन, घटना के बाद हर कोई उसे भूल जाता है। जांच किस तरह की जाती है और किस तरह जिम्मेदार व्यक्ति को सजा दी जाती है, यह लक्ष्मीनगर के ललिता पार्क हादसे की जांच के हश्र को देखा जा सकता है। आठ साल चले जांच में सिर्फ एक जूनियर इंजीनियर को जिम्मेदार माना गया है।

ललिता पार्क में हुई दुर्घटना की गिनती देश के भीषण हादसों में की जाती है। यहां नवंबर 2010 में पांच मंजिला इमारत के गिरने से 70 लोगों की मौत हो गई थी और 77 लोग घायल हो गए थे। गलत तरीके से किए गए निर्माण की वजह से यह हादसा हुआ था। इस हादसे की नगर निगम के सतर्कता विभाग ने आठ साल तक जांच की। लेकिन, जब इसकी अंतिम रिपोर्ट आई तो सब हतप्रभ रह गए। लेकिन, निगम के अधिकारियों व नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़ा। इस रिपोर्ट में सिर्फ एक जूनियर इंजीनियर राजेंद्र कौशिक को जिम्मेदार माना गया कि 2005 में इस इमारत की तीसरी व चौथी मंजिल का गलत तरीके से निर्माण किया गया था और उस समय कौशिक इलाके के जूनियर इंजीनियर थे।

सजा के तौर पर उसकी पेंशन राशि में से महज पांच प्रतिशत एक साल के लिए काटने के आदेश हुए। यह राशि पूरे साल की करीब 21 हजार रुपये बैठती है। निगम प्रशासन द्वारा जो सजा मुकर्रर की गई थी उसे गत 11 जुलाई को पूर्वी दिल्ली नगर निगम की नियुक्ति, पदोन्नति व अनुशासनात्मक मामलों की समिति ने भी स्वीकृति दे दी थी। इस मामले को लेकर काफी विरोध भी हुआ था और सवाल भी उठाए गए थे कि इतना बड़ा हादसा हुआ और निगम ने सिर्फ एक को ही जिम्मेदार माना। इस मसले को लेकर अभी तक निगम अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं। निगम के नेताओं ने भी इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया है।

लाखों लोगों के लिए कब्रगाह बन सकती हैं कमजोर इमारतें 
प्रशासन और प्राधिकरण की नाक के नीचे बिल्डरों ने बहुमंजिला इमारतों के रूप में लाखों लोगों की कब्रगाह तैयार कर दी है। कमजोर ढांचे के साथ खड़ी ये इमारतें प्रकृति के रौद्र को शायद ही बर्दाश्त कर सकें। अधिकारियों ने अपनी तिजोरी भरने के लिए लोगों की जान की परवाह तक नहीं की और इमारतों की मजबूती को जांचे बगैर उन्हें पूर्णता प्रमाण पत्र जारी कर दिए हैं। भूकंप की दृष्टि से बेहद संवेदनशील इलाके में बनी इन सैकड़ों इमारतों के धराशायी होने से बड़े स्तर पर जानमाल की हानि हो सकती है। ग्रेटर नोएडा वेस्ट के शाहबेरी में छह मंजिला इमारत के जमींदोज होना सिर्फ एक हादसा भर नहीं है। बल्कि इस हादसे ने धराशायी हो चुके सरकारी सिस्टम को भी उजागर किया है। हालांकि धराशायी हुई इमारतें अवैध थी पर ग्रेटर नोएडा वेस्ट में बनी सैकड़ों इमारतों की भी कमोबेश यही स्थिति है।

बिल्डर परियोजनाओं में खरीदारों को कब्जे के साथ ही फ्लैट में प्लास्टर व दीवार गिरने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इन घटनाओं से बहुमंजिला इमारतों में रहने वाले दशहत में आ चुके हैं। बिल्डरों ने अधिक से अधिक फायदा कमाने के लिए मानकों को दरकिनार कर घटिया निर्माण सामग्री लगाई है। फ्लैट खरीदार आए दिन बिल्डरों के खिलाफ घटिया निर्माण सामग्री लगाने को लेकर धरना प्रदर्शन करते रहते हैं। लेकिन लोगों की इस आवाज को न तो आज तक प्रशासन और न ही प्राधिकरण ने गंभीरता से लिया है। इमारतों के निर्माण के दौरान भी सरकारी मशीनरी का यही रवैया रहा। इमारतों का निर्माण पूरा होने पर प्राधिकरण ने उनकी मजबूती का आकलन करने तक के कदम नहीं उठाए। अधिकारियों ने कार्यालय में बैठकर ही बिल्डरों को पूर्णता प्रमाण पत्र

जारी कर दिए। इसके एवज में अधिकारियों ने अपनी जेब गरम कीं। प्रशासन का भी पूरा फोकस राजस्व जुटाने के लिए फ्लैटों की रजिस्ट्री तक ही सीमित रहा है। जबकि नेशनल र्बिंल्डग कोड में इमारतों के निर्माण के लिए मानक तय हैं। बिल्डरों की तैयार इमारतें इन मानकों पर कितनी खरी हैं, यह जांच की आज तक जरूरत नहीं समझी गई हैं।