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पड़ोसी देशों में हिन्दुओं की हालत खराब, देश छोड़ने को मजबूर

human Rights Reportनई दिल्ली: सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज्म एंड ह्यूमन राइट्स (सी डी पी एच आर) द्वारा एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया । जिसमें ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट का विमोचन किया गया  । कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलन से किया गया । कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में डॉक्टर लोबसंग सेंगवे प्रेसिडेंट (सिकयोंग) सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन, तिब्बतन गवर्नमेंट  (exile),जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन जी ( भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ), प्रोफेसर परमजीत एस. जसवाल जी उपस्थित रहे । सलाहकार सी डी पी एच आर तथा पीजीडीएवी कॉलेज ( सांध्य ) के प्राचार्य डॉ. रवींद्र कुमार गुप्ता जी ने स्वागत भाषण में सभी अतिथियों का परिचय देते हुए स्वागत व अभिवादन किया । तत्पश्चात अतिथियों द्वारा  रिपोर्ट का विमोचन किया  गया।डॉ .प्रेरणा मल्होत्रा( प्रेसिडेंट सी डी पी एच आर)   ने सी डी पी एच आर तथा   ह्यूमन राइट्स रिपोर्ट का परिचय देते हुए रिपोर्ट के सभी आयामों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. लोबसंग सेंगवे जी (सिकयोंग)  ने सभा को संबोधित करते हुए रिपोर्ट पर अपने विचार व्यक्त किए । उन्होंने अपने वक्तव्य में चीन की मंशा को उजागर करते हुए बताया कि  चीन की सरकार तिब्बत के मानवाधिकारों की बात तो करती है लेकिन वास्तविक रूप में पॉवर्टी एलिवेशन प्रोग्राम  (गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम ) के नाम पर  तिब्बतियों को उनकी जड़ों से उखाड़ कर उनकी अस्मिता को नष्ट करना चाहती है ।  पत्रकारों के लिए तिब्बत में जाना उत्तरी कोरिया में जाने से भी अधिक मुश्किल है।चीन की 100:0 की नीति है चीन से तिब्बत के मानवाधिकारों को लेकर 100% प्रोपेगेंडा बाहर आता है जब कि बाहर वालों को 0% अंदर जाने की आजादी है। तिब्बत में मानवाधिकार के हनन के मुद्दे वास्तविक हैं ।

चीन का तिब्बत पर कब्जा हथेली पर कब्जा करने की तरह से है एक बार हथेली पर कब्जा हो गया तो  पांच उंगलियों के समान 5 देश तिब्बत,  भूटान , नेपाल , अरुणाचल और सिक्किम सभी पर कब्जा हो जाएगा।  चीन  संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार की परिभाषा बदलवा सकता है और वह ऐसा करने में सफल हो जाता है तो मानवाधिकार के क्षेत्र में बहुत बड़ी त्रासदी होगी । अंत में उन्होंने अपने वक्तव्य में देश के प्रत्येक विद्यालय व महाविद्यालय में  छात्रों को मानवाधिकारों  के प्रति जागरूक होने पर बल दिया साथ ही उन्होंने तिब्बत की भाषा को बढ़ावा देने पर जोर दिया । कार्यक्रम के दूसरे मुख्य अतिथि जस्टिस के.जी. बालकृष्णन ने महामारी के दौरान इस प्रकार के प्रयास की सराहना की व अपने वक्तव्य  के प्रारंभ में लिट्टे  पर बात करते  हुए बताया कि अफगानिस्तान व पाकिस्तान में किस प्रकार स्त्रियों एवं बच्चों के मानवधिकारों  का हनन किया जाता है, साथ ही पाकिस्तान में हिंदुओं की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डाला । मलेशिया की बात करते हुए बताया कि वहां बलपूर्वक शरणार्थियों का धर्म परिवर्तन किया जा रहा है अंत में उन्होंने कहा कि महिला – सशक्तिकरण किसी भी राष्ट्र की नींव है।  प्रोफेसर परमजीत एस. जसवाल ने कहानी के माध्यम से संदेश देते हुए कहा कि ” To be human is being human ” कार्यक्रम का सफल संचालन विवेकानंद नर्तम जी (जनरल सेक्रेटरी ,सी पी डी एच आर) द्वारा किया गया ।

hindu pakपाकिस्तान में माइनॉरिटी की स्थिति बहुत ख़राब है पाकिस्तान में जो एथनिक माइनॉरिटी है न तो उनके मानवाधिकार की रक्षा हो रही है न ही रिलिजियस अल्पसंख्यकों की, हमने ने अपनी रिपोर्ट में पाया की पाकिस्तान में जो मुस्लिम अल्पसंख्यक है उनको तक नहीं बख्शा जा रहा है उनके लिए अल्पसंख्यक का मतलब हिन्दू सिख या क्रिश्चियन नहीं है बाकी जो बलोच है अहमदिया उन सब के लिए मानवाधिकार का मतलब कुछ नहीं है. एक इस्लामिक स्टेट के अंदर वैसे भी अल्पसंख्यक समुदाय के लिए को मानवाधिकार नहीं होता है बांग्लादेश में इस्लाम एक स्टेट रिलीजन बना है. पाकिस्तान की तरह बांग्लादेश इस्लामिक स्टेट नहीं है लेकिन वहाँ भी फंडामेंटलिस्म बढ़ रहा है और वहाँ माइनॉरिटी सुरक्षित नहीं रह सकती, जब 1947 में भारत के दो टुकड़े हुए तब पाकिस्तान में 12.5 परसेंट हिन्दू थे, उसमें से अकेले 23 परसेंट बांगलादेश में थे , ये डाटा 1951 का है. आज साल 2011 का डेटा देखते हैं तो 8 परसेंट हिन्दू बचे हैं बांग्लादेश में बाकी हिन्दू कहाँ गए , या तो वो मर गए या कन्वर्ट हो गए आखिर क्या हुआ उनके साथ. पाकिस्तान में आज जितना हिन्दू होना चाहिए था. आज उतना हिन्दू नहीं है पाकिस्तान में ,पाकिस्तान में हिन्दू की स्थिति बहुत ख़राब है महिलाओं का ख़ास तौर ( हिन्दू सिख ) जो छोटी लड़कियां है उनका रेप और कंवर्जन हो रहा है और इसको एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे वो कंवर्ट हो जाये. ढाका यूनिवर्सिटीज के प्रोफेसर अबुल बरकत ने एक रिपोर्ट दी है जिसमें कहा है कि रोज 632 हिन्दू बांग्लादेश छोड़कर जा रहा है  ऐसे में 30 साल बाद बांग्लादेश में कोई हिन्दू नहीं बचेगा. आज साल 2021 है , अगले 25 साल बाद कोई हिन्दू नहीं बचेगा. प्रेरणा मल्होत्रा कहते हैं कि 1.65 परसेंट हिन्दू है सिर्फ पाकिस्तान में यहां उनकी आबादी को लेकर हालात बेहद चिंताजनक है.

tibatसेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार, सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स ने तिब्बत सहित पाकिस्तान ,बांग्लादेश ,अफगानिस्तान, मलेशिया ,इंडोनेशिया और श्रीलंका की मानवाधिकार को लेकर एक रिपोर्ट जारी की है. रिपोर्ट को सभी देशों में नागरिक समानता, उनकी गरिमा, न्याय और लोकतंत्र को आधार में रख कर तैयार किया गया है.यह रिपोर्ट शिक्षाविद, अधिवक्ता, न्यायाधीश, मीडियाकर्मी और अनुसंधानकर्ताओं के एक समूह ने तैयार किया है. सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट में पाकिस्तान में मानवाधिकार की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई है. रिपोर्ट के अनुसार वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यको के साथ साथ अल्पसंख्यक शिया और अहमदिया की स्थिति भी काफ़ी ख़राब है. वहाँ धारा 298 बी-2 के मुताबिक अहमदिया मुसलमानों द्वारा अज़ान शब्द का उपयोग भी अपराध है. इसके साथ साथ पाकिस्तान का कानूनी ढाँचा भी अंतरराष्ट्रीय नागरिक और राजनीतिक अधिकारियों के अनुरूप नहीं है. वहाँ धार्मिक अल्पसंख्यकों- हिंदू, सिख और ईसाई धर्म की युबा महिलाओं के साथ अपहरण, बलात्कार, जबरन धर्मपरिवर्तन आदि घटनाएं काफी है. इसके साथ साथ धार्मिक अल्पसंख्यक को डराया और धमकाया भी जाता है.

तिब्बत

रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न प्रतिबंधों के माध्यम से चीन तिब्बत में मानवाधिकार की स्थिति को छुपाने की कोशिश करता रहा है. इसके साथ साथ चीन तिब्बत की सामाजिक, धार्मिक, संस्कृतिक और भाषाई  पहचान भी खत्म करने की कोशिश कर रहा है.

बांग्लादेश

बांग्लादेश में भी मानवाधिकार और धार्मिक अल्पसंख्यको की स्थिति भी बेहतर नहीं है. ढाका यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अबुल बरकत की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 4 दशकों में 230612 लोग प्रत्येक वर्ष पलायन को मजबूर हो रहे है जिसका औसत 632 लोग प्रतिदिन है. इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इसी गति के पलायन वहाँ होता रहा तो 25 साल बाद वहां कोई भी हिंदू नहीं रहेगा. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 1975 में वहाँ संविधान संशोधित के मध्यम से सेकुलरिज्म शब्द को हटाकर कुरान की पंक्तियों को रखा गया और 1988 में इस्लाम को देश का धर्म घोषित कर दिया गया. साथ ही चटगांव पर्वतीय क्षेत्र के डेमोग्राफी को भी योजनाबद्ध तरीके से बदल दिया गया. 1951 में 90 फ़ीसदी लोग यहाँ बौद्ध थे जो 2011 में घटकर55 फीसदी रह गया.

मलेशिया

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार मलेशिया में भूमिपुत्र के पक्ष में विभेदकारी कानून है. यह सजातीय अल्पसंख्यको के भी अधिकारों का हनन हो रहा है.

अफगानिस्तान

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में भी मानवाधिकार और अल्पसंख्यको के प्रति विभेदकारी नीति पर चिंता व्यक्त की गई है. अफगानिस्तान के संविधान के अनुसार कोई मुस्लिम व्यक्ति की देश का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री बन सकता है. 1970 की जनसंख्या के अनुसार वहाँ 700000 हिंदू और सिख थे जो कि हालिया दिनों में सिमटकर सिर्फ 200 हिंदू और सिख परिवार रहा गया है.

श्रीलंका

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स ने श्रीलंका में भी मानवाधिकार और धार्मिक अल्पसंख्यको की स्थिति पर चिंता जताई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 26 साल तक चले गृह युद्ध मे 100000 लोगों की जान गई और 20,000 तमिल गायब हो गए.

इंडोनेशिया

सेंटर फॉर डेमोक्रेसी प्लूरेलिज़्म एंड ह्यूमन राइट्स की रिपोर्ट के अनुसार इंडोनेशिया में भी पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक कट्टरता और असहिष्णुता बढ़ी है. यहाँ सिर्फ6 देशों को ही पहचान दी गई है. 2002 में बाली में हुए धमाके में भी देश के ही एक बड़े धार्मिक इस्लामिक नेता का नाम आया था. 2012 में बालीनुर्गा हिंदुओं पर हमला सहित कई घटनाएं धार्मिक अल्पसंख्यको के ख़िलाफ़ देखने को मिली है.

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