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कांग्रेस में थम नहीं रही अंदरूनी खटपट

congress gujratकांग्रेस के जी-23 गुट के असंतुष्ट सदस्यों में इस बात को लेकर भारी नाराजगी है कि उन्‍हें पार्टी के महत्‍वपूर्ण फैसलों में शामिल नहीं किया जाता है। बता दें कि कांग्रेस के इसी जी-23 के सदस्‍यों ने बीते दिनों पार्टी में प्रभावी नेतृत्व के लिए एक पत्र लिखकर सियासी भूचाल ला दिया था।दरअसल राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद से सोनिया गांधी कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि सभी फैसले और बैठकें राहुल गांधी के आवास पर हो रही हैं। यह उनको पार्टी के सर्वोच्च नेता के तौर पर काबिज होने की ओर इशारा करती हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जी-23 गुट के कई नेताओं को पार्टी की विभिन्न समितियों में समायोजित किया गया था लेकिन इन्‍हें परामर्श प्रक्रियाओं में शामिल नहीं किया गया।इसी के चलते जी-23 गुट के सदस्यों में नाराजगी दिखाई दे रही है। समूह के सूत्रों का कहना है कि मौजूदा वक्‍त में यह मुद्दा बना हुआ है। पार्टी में हाल की सियासी गतिविधि‍यों पर नजर डाले तो छत्तीसगढ़ हो या पंजाब में अंदरूनी कलह का मसला सभी मुद्दों को लेकर बैठकों का केंद्र 12 तुगलक लेन यानी राहुल गांधी का आवास ही था। राहुल के आवास पर दो महत्वपूर्ण बैठकें हुईं जिनमें टीएस सिंहदेव और भूपेश बघेल मौजूद थे।मौजूदा वक्‍त में कांग्रेस का पूरा तंत्र राहुल गांधी के अधीन काम कर रहा है। सूत्रों की मानें तो जी-23 नेताओं को इस बात की नाराजगी है कि या तो राहुल पार्टी की पूरी जिम्मेदारी लें या किसी और के लिए रास्ता बनाएं। जी-23 नेताओं में से ज्यादातर चाहते हैं कि सोनिया गांधी ही पूर्णकालिक अध्यक्ष के तौर पर काम करें लेकिन सूत्रों की मानें तो स्वास्थ्य कारणों से वह इसमें दिलचस्‍पी नहीं ले रही हैं।

कठिन दौर से गुजर रही कांग्रेस

कांग्रेस में अधिकांश नेता केसी वेणुगोपाल के बढ़ते दबदबे से भी नाराज बताए जाते हैं। यही नहीं राजस्थान में अंदरूनी टकराव का मसला भी पिछले एक साल से लटका हुआ है। अब कहा जा रहा है कि राजस्‍थान में मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए इसे थामने की कोशिश होगी। भले ही कुछ नेता सबकुछ ठीक होने की बात कहें लेकिन लेकिन मौजूदा वक्‍त में कांग्रेस कठिन चुनौतियों का सामना कर रही है। कांग्रेस शासित राज्यों पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जबरदस्त उठापटक जारी है। केवल इन्हीं बड़े राज्यों में पार्टी की सरकार बची है और तीनों जगह पार्टी-संगठन, सरकार और शीर्ष नेतृत्व में घमासान मचा हुआ है। ऐसे में यदि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ की अवधारणा चरितार्थ हो जाए तो उसके लिए भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी से अधिक कांग्रेस स्वयं जिम्मेदार होगी। कांग्रेस में अंतर्कलह कोई नई बात नहीं। स्वतंत्रता पूर्व नरमपंथियों और गरमपंथियों में पार्टी बंटी थी जिसकी चरम परिणति 1939 में हुई जब गांधी जी समर्थित उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया गरमपंथी सुभाष चंद्र बोस के विरुद्ध कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव 203 मतों से हार गए। कालांतर में पार्टी नेहरू के नेतृत्व में वामपंथी और सरदार पटेल के नेतृत्व में दक्षिणपंथी गुटों में बंट गई। वर्ष 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट धड़े के नेता जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, डा. राममनोहर लोहिया और मीनू मसानी आदि ने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी बनाई। धीरे-धीरे राष्ट्रीय, प्रांतीय और स्थानीय स्तरों पर कांग्रेस में गुटबाजी बढ़ती गई।

परिणामस्वरूप 1967 में आठ राज्यों में कांग्रेस हार गई। वर्ष 1969 में निजलिंगप्पा, मोरारजी देसाई, सीबी गुप्ता, एसके पाटिल, नीलम संजीव रेड्डी आदि शीर्ष नेताओं ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पार्टी से निकाल दिया। इसके बाद इंदिरा गांधी को ‘कांग्रेस-आइ’ नाम से पार्टी बनानी पड़ी। साल 1978 में कांग्रेस में एक बार फिर विभाजन हुआ और कर्नाटक के क्षत्रप देवराज अर्स ने ‘अर्स-कांग्रेस’ बनाई। इसी प्रकार, अनेक नेता जैसे जगजीवन राम, पीए संगमा, शरद पवार, ममता बनर्जी आदि कांग्रेस से अलग होकर नई-नई पार्टी बनाते रहे। इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व या तो इस विखंडन की गंभीरता को समझ नहीं रहा था या वह जानबूझकर कांग्रेस को नष्ट करने पर तुला हुआ था।गत वर्ष कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और शशि थरूर सहित 23 बड़े नेताओं ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी में प्रभावी नेतृत्व के लिए ‘संस्थागत-प्रक्रिया’ बनाने का सुझाव दिया जो सामूहिक-नेतृत्व के आधार पर काम करे। इसका असर यही हुआ कि उलटे इन सभी नेताओं को हाशिये पर कर दिया गया। वहीं हिमंता बिस्व सरमा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और जितिन प्रसाद जैसे नेता अपने समर्थकों के साथ भाजपा में चले गए। यदि शीघ्र ही कांग्रेस नेतृत्व में गंभीर बदलाव नहीं हुआ तो भविष्य में अनेक नेता कांग्रेस छोड़ने को विवश हो जाएंगे।

जो तीन राज्य कांग्रेस के पास बचे हैं, वहां भी पार्टी नेतृत्व सरकारों को अस्थिर करने पर तुला है। पंजाब में सोनिया-राहुल ने विस्फोटक स्थिति पैदा कर दी है। वहां मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के बीच जुबानी जंग जारी है। अकाली दल और भाजपा में कृषि कानूनों को लेकर मतभेद के बाद मुख्यमंत्री अमरिंदर के लिए आगामी विधानसभा चुनाव जीतना आसान लगने लगा था, लेकिन उनकी कार्यप्रणाली सोनिया-राहुल को रास नहीं आई। उन्होंने सिद्धू के माध्यम से उनकी राह में अवरोध पैदा कर दिए। वहीं, सिद्धू तो दोधारी तलवार निकले। एक ओर वह मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के विरुद्ध ताल ठोक रहे तो दूसरी ओर उन्होंने शीर्ष नेतृत्व को भी चुनौती दे डाली कि यदि उन्हें स्वतंत्र निर्णय नहीं लेने दिए गए तो वह किसी को नहीं छोड़ेंगे। जब सरकार और संगठन के बीच ऐसे संबंध हों तो उस सूरत में पार्टी के जीतने की आखिर क्या संभावना बनेगी?

छत्तीसगढ़ दूसरा राज्य है, जहां कांग्रेसी गुटबाजी चरम पर है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बीच छत्तीस का आंकड़ा कायम है। यह अदावत पिछले विधानसभा चुनाव और फिर सरकार गठन के समय से ही जारी है। दोनों मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। सिंहदेव के अनुसार राहुल गांधी की उपस्थिति में दोनों के ढाई-ढाई वर्ष मुख्यमंत्री बनने पर सहमति बनी थी। इस साल जून में बघेल के वह कथित ढाई वर्ष समाप्त हो गए तो उसके बाद से ही सिंहदेव सक्रिय हो गए हैं। अव्वल तो कांग्रेस नेतृत्व को ऐसा कोई निर्णय लेना नहीं चाहिए था और यदि ले ही लिया तो उसे लागू कराना चाहिए। यह नेतृत्व में दूरदर्शिता और राजनीतिक सूझबूझ की कमी को दर्शाता है। ऐसा रवैया सामंती कार्यसंस्कृति से उपजता है। इस प्रकार भारतीय लोकतंत्र वह विडंबना भी दिखती है कि यहां सभी दल राज्य से तो लोकतांत्रिक मूल्यों की अपेक्षा करते हैं, परंतु स्वयं उन्हें आत्मसात नहीं करते।

तीसरे राज्य राजस्थान में कांग्रेसी सत्ता बस किसी तरह चल रही है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत नाराज सचिन पायलट को थोड़ी भी गुंजाइश देने को राजी नहीं। कुछ मान-मनौव्वल के बाद पायलट ने फिलहाल पार्टी तो नहीं छोड़ी, परंतु उनके साथ जैसा व्यवहार हुआ उससे युवा नेताओं और कर्मठ कार्यकर्ताओं का मनोबल अवश्य टूटता है जिसका खामियाजा आखिर में पार्टी को भुगतना पड़ता है।

यह शीर्ष नेतृत्व की दिशाहीनता और गलत रणनीतियों का परिणाम है कि कांग्रेस अपनी सरकारों, संगठन और कार्यकर्ताओं को ही नहीं साध पा रहा है। तिस पर तेजी से घटता जनाधार उसकी महत्वाकांक्षाओं पर तुषारापात कर रहा है। बंगाल विधानसभा चुनाव इसका सटीक उदाहरण है। पिछले चुनाव में जहां उसे 44 सीटें मिली थीं वहीं इस बार उसका खाता तक नहीं खुल पाया। कुल मिलाकर कांग्रेस केवल सोनिया और राहुल को ही बचाने में लगी है, जबकि उनके नेतृत्व में ही पार्टी मटियामेट हुई है। क्या पार्टी में योग्य नेताओं का अभाव हो गया है?

अधिकांश पार्टी नेता भी इस पर मौन हैं, जो मुखर भी हैं उनकी बातों का कोई असर नहीं। पार्टी छोड़ना आसान विकल्प है, मगर पार्टी में रहकर पार्टी को सुधारना ही असली चुनौती है। अब कांग्रेस संभवत: प्रियंका वाड्रा पर दांव लगाना चाहती है, जिसकी शुरुआत पिछले चुनावों में उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी और पार्टी महासचिव बनाकर हो गई है। प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस वंशवाद का परित्याग कर जनवाद की ओर बढ़ेगी? और बढ़ेगी तो कब? कांग्रेस नेता इन प्रश्नों से भाग रहे हैं, मगर यह पलायन आत्मघाती है जो न केवल कांग्रेस वरन भारतीय लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहा है।

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