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कांग्रेस का ‘हाथ’ आतंकियों के ‘साथ’

 P. Chidambaramकांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करीबी और सांसद अहमद पटेल ने ISIS आतंकियों से जुड़े आरोपों पर गृह मंत्रालय का दरवाजा खटखटाया है.अहमद पटेल ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह को चिट्ठी लिखकर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है.लिखी गई इस चिट्ठी में अहमद पटेल ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला बेहद गंभीर है और इस पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए. अहमद पटेल ने इसके लिए गुजरात की बीजेपी सरकार को घेरा और उस पर बेबुनियाद आरोप लगाने का दावा किया.चिट्ठी में अहमद पटेल ने गृहमंत्री राजनाथ सिंह से कहा कि वह संबंधित जांच एजेंसी से इस मामले की तहकीकात कराए और दोषियों को सख्त सजा दिलाई जाए.
अहमद पटेल ने ये भी कहा कि आतंक के इल्जाम तय करने का काम जांच एजेंसी और Ahmed_Patel_RSTVन्याय व्यवस्था का है. पार्टी हेडक्वार्टर में बैठकर आरोप तय करने का काम न करें. शुक्रवार (27 अक्टूबर) को ही मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने अपने सूबे के कांग्रेसी नेता अहमद पटेल पर गंभीर आरोप लगाया था. रुपाणी का आरोप है कि गुजरात आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) द्वारा गिरफ्तार आईएस आतंकी ने जिस अस्पताल में किया, उसे कांग्रेस नेता अहमद पटेल का संरक्षण प्राप्त था.उन्होंने कहा था कि ये आतंकी अहमदाबाद में बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में थे. इनमें संदिग्ध आतंकी मोहम्मद कासिम जिस भरुच अस्पताल में नौकरी करता था, उसके कर्ता-धर्ता अहमद पटेल ही हैं. हालांकि कांग्रेस ने सफाई दी है कि अहमद पटेल ने यहां से साल 2014 में इस्तीफा दे दिया है. अहमद पटेल ने खुद इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है.बता दें कि गुजरात में दिसंबर महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं. एक तरफ जहां कांग्रेस जीएसटी, नोटबंदी और रोजगार जैसे मुद्दे पर बीजेपी को घेर रही है, वहीं सत्ताधारी बीजेपी ने अब आतंक के नाम पर कांग्रेस को निशाने पर लिया है.
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अहमदाबाद के सरदार पटेल हॉस्पिटल से कांग्रेस नेता अहमद पटेल के इस्तीफे के बाद अब अस्पताल की ओर से जारी किया गया ऐफिडेविट सामने आया है. इस ऐफिडेविट में कहा गया है कि कांग्रेस नेता और उनके परिवार का अब अस्पताल से कोई लेना-देना नहीं है. अस्पताल से पटेल के इस्तीफे के बाद ये ऐफिडेविट जारी किया गया था और बतौर ट्रस्टी उनका नाम हटाया गया.

गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने शुक्रवार को मोहम्मद कासिम स्टिंबरवाला के साथ कथित संबंधों की वजह से पटेल के राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफे की मांग की थी. कासिम को गुजरात आतंक-रोधी दस्ते ने बुधवार को सूरत से गिरफ्तार किया था. गिरफ्तार युवक अहमदाबाद में कथित रूप से यहूदियों के पूजा स्थल को उड़ाने की साजिश रच रहा था. रूपाणी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी से भी इस मसले पर जवाब मांगा था.

रूपाणी के आरोपों को अहमद पटेल ने जोरदार तरीके से खारिज किया था और साल 2014 में अस्पताल से अपने इस्तीफे की बात कही थी. हालांकि बीजेपी लगातार पटेल के खिलाफ आक्रामक रूख अपनाए हुए है.

अहमद पटेल पर आरोप निराधार: कांग्रेस

रूपाणी के आरोपों के बाद कांग्रेस ने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह गुजरात चुनाव में हार से बचने के लिए घबराहट में राज्यसभा सांसद अहमद पटेल पर आतंकवादियों से संबंध होने का बेबुनियाद आरोप लगा रही है. पटेल के खिलाफ गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी के आरोप पर प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता सुरजेवाला ने कहा, “बीजेपी गुजरात में हार से डर रही है और इसलिए घबराहट में वह दूसरों पर मनगढ़ंत आरोप लगा रही है. सच्चाई की जीत होगी और गुजरात में बीजेपी की हार होगी.”

उन्होंने कहा कि बीजेपी कांग्रेस सांसद के खिलाफ षड्यंत्र रच रही है, जबकि बीजेपी को अपने अंदर झांकने की जरूरत है.

‘अहमद पटेल के खिलाफ बीजेपी की साजिश’

सुरजेवाला ने कहा, “सरदार पटेल अस्पताल एक चैरिटेबल अस्पताल है, जिसमें 150-200 कर्मचारी काम करते हैं. न ही अहमद पटेल और न ही उनके परिवार के अन्य सदस्य अस्पताल के ट्रस्टी हैं. वे लोग अस्पताल से होने वाले किसी फायदे से भी नहीं जुड़े हैं. स्टिंबरवाला वहां एक कर्मचारी था.” उन्होंने कहा कि अगर संदिग्ध आतंकवादी के खिलाफ सबूत है तो एटीएस इसकी जांच करे.

प्रवक्ता ने कहा, “गुजरात के मुख्यमंत्री ने अपनी अक्षमता छुपाने के लिए कांग्रेस नेता अहमद पटेल के खिलाफ साजिश रचने की कोशिश की है, जो काफी घृणित प्रयास है. पटेल के खिलाफ आरोप आधारहीन हैं.”

‘MP में गिरफ्तार IS एजेंटों के बीजेपी से संबंध’

सुरजेवाला ने कहा, “कांग्रेस ने हमेशा आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी है, जबकि बीजेपी का इसमें विपरीत रिकॉर्ड रहा है. क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह यह बता सकते हैं कि मार्च 2016 में कैसे उनकी नाक के नीचे से दाऊद इब्राहिम की पत्नी भारत आई और यहां से चली भी गई. कैसे महाराष्ट्र सरकार और खुफिया एजेंसी को इसकी भनक तक नहीं लगी और उनको गिरफ्तार नहीं कर पाई?”

सुरजेवाला ने कहा कि मध्यप्रदेश में गिरफ्तार कुछ आईएस एजेंटों के बीजेपी से संबंध थे. उनमें से एक ध्रुव सक्सेना बीजेपी के आईटी सेल का सदस्य था. लेकिन बीजेपी इस पर मौन है.

उन्होंने पूछा, “क्या यह सही नहीं है कि जम्मू एवं कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी गठबंधन ने दिसंबर 2016 में आतंकवादी बुरहान वानी के परिवार को सहायता राशि दी है?’ सुरजेवाला ने ध्यान दिलाते हुए कहा कि पिछली राजग सरकार ने कंधार विमान अपहरण मामले में कुख्यात आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर, मुस्ताक अहमद जरगर और अहमद उमर सईद शेख को भारत की हिरासत से रिहा किया था.

उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र के एक बीजेपी नेता एकनाथ खड़से को दाऊद के साथ कथित संबंधों के लिए इस्तीफा देना पड़ा था. इसलिए बीजेपी को दूसरों पर उंगली उठाने के बजाय खुद के अंदर झांकना चाहिए.”
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नई दिल्ली
गुजरात चुनाव से पहले दो संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच छिड़ा सियासी घमासान तेज हो गया है। बीजेपी ने इस मुद्दे पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी से जवाब मांगते हुए कहा कि यदि उन्होंने खुद को पाक साफ साबित नहीं किया तो यह उन्हें भ्रष्टाचार से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा। केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी अहमद पटेल पर आरोप दोहराते हुए कहा. ‘अबतक लोग कहते थे कांग्रेस का हाथ करप्शन के साथ लेकिन अब कह रहे हैं कांग्रेस का हाथ आतंकवादियों के साथ।’ उधर कांग्रेस ने इसे चुनाव जीतने के लिए बीजेपी का हथकंडा बताया है। पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने भी पटेल का बचाव किया है।गौरतलब है कि बुधवार को एटीएस ने आईएस के दो संदिग्ध आरोपियों को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक आतंकी कासिम टिंबरवाला की पहचान अंकलेश्वर के अस्पताल कर्मचारी के रूप में हुई है। वहीं दूसरा आतंकी उबैद पेशे से वकील है। बीजेपी का आरोप है कि इस अस्पताल से कांग्रेस के राज्यसभा सांसद और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल जुड़े हुए हैं। शुक्रवार रात गुजरात के सीएम विजय रुपानी ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अहमद पटेल पर गंभीर आरोप लगाए।

नकवी ने शनिवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, ‘कार्रवाई करने की बजाय कांग्रेस बीजेपी पर राजनीति का आरोप लगाने में व्यस्त है। इससे अहमद पटेल पर और भी अधिक सवाल उठते हैं। हम राजनीति नहीं कर रहे हैं यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला है। आतंकवाद का मुद्दा हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण है, देश की आंतरिक सुरक्षा पर भी हमारी हमेशा स्पष्ट नीति रही है। हम कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी से पूछना चाहते हैं कि राष्ट्र के सुरक्षा से जुड़े इस मसले पर उनका क्या कहना है?’नकवी ने कहा कि अहमद पटेल इस अस्पताल से जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा, ‘कांग्रेस मामले की लीपापोती कर रही है। कांग्रेस के दामन पर यह दाग काला धब्बा साबित होगा। आतंकवाद और आतंकवाद से जुड़े हुए कांग्रेस पार्टी और उनके नेताओं के जो तार हैं उसका दूध का दूध और पानी का पानी होगा। कांग्रेस को आतंकवाद के संरक्षण पर अपनी स्थिति साफ़ करनी चाहिए।’

‘हार को देख बीजेपी अपना रही है ओछे हथकंडे’
कांग्रेस ने पलटवार करते हुए कहा कि बीजेपी गुजरात में अपनी हार को देखते हुए ओछे हथकंडों और षड्यंत्रकारी हरकतों पर उतर आई है। पार्टी ने यह भी कहा कि पटेल या उनके परिवार का उस अस्पताल से कोई संबंध नहीं है, जहां पर काम कर चुके एक व्यक्ति को गुजरात एटीएस ने गिरफ्तार किया है। हालांकि पटेल ने आरोप को पूरी तरह बेबुनियाद बताकर कल ही खारिज कर दिया और बीजेपी से राष्ट्रीय सुरक्षा से जुडे मुद्दों का राजनीतिकरण न करने और गुजरात के शांति प्रिय लोगों को नहीं बांटने की अपील की थी। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने एक बयान में कहा, ‘साढे 6 करोड़ गुजरातियों द्वारा नकार दिए जाने से व्यथित और गुजरात चुनाव में हार देख बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी ओछे हथकंडों, षड्यंत्रकारी हरकतों और ऊलजलूल बयानबाजी पर उतर आए हैं। गुजरात के चुनाव में कामयाबी पाने के लिए बीजेपी नेता रोज नया स्वांग और प्रपंच रच रहे हैं।

चिदंबरम ने किया बचाव
पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने अहमद पटेल के इस्तीफे की मांग पर हैरानी जताते हुए कहा, ‘मैंने अपने दोस्तों से कुछ तथ्य जुटाए हैं। अहमद पटेल हॉस्पिटल के ट्रस्टी थे। मेरा मानना है कि 2015 में ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया या रिटायर हो गए। अब यदि कोई टेक्निशन के रूप में जॉइन करता है और उसका आईएसआईएस से जुड़ाव है तो 3 साल पहले के ट्रस्टी को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।’
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अहमदाबाद। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने भाजपा कार्यालय श्री कमलम में पत्रकारों को बताया की खूंखार आतंकी संगठन आइएस से जुड़ा आतंकी मुहम्मद कासिम टिम्बरवाला भरुच के जिस अस्पताल में लैब टेक्नीशिन रहा उसके ट्रस्टी खुद अहमद पटेल रह चुके हैं।

पटेल इस्तीफा देने के बाद भी पिछले साल अस्पताल के कार्यक्रम में बतौर मेजबान सक्रिय रहे थे। सीएम विजय रूपाणी ने कांग्रेस की अहमद पटेल के इस्तीफे की दलीलों को खारिज कर आरोप लगाया कि 2014 के अंत में अहमद पटेल ने ट्रस्टी के पद से इस्तीफा दे दिया।

2016 में अस्पताल के ही एक उद्घाटन कार्यक्रम में वे बतौर मेजबान सक्रिय रहे। इस कार्यक्रम में पटेल के आमंत्रण पर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी भी आए थे।
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चुनाव करीब आते ही गुजरात में सियासत तेज हो गई है और इसी क्रम में गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने कांग्रेस नेता अहमद पटेल पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए हैं।

उन्होंने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जिस अस्पताल से आईएस का आतंकी पकड़ा गया है वह अस्पताल कांग्रेसी नेता अहमद पटेल चला रहे हैं और उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए, साथ ही कांग्रेस को भी इस पूरे प्रकरण में सफाई देनी चाहिए।

वहीं दूसरी ओर खबरों के अनुसार अस्पताल का कहना है कि अहमद पटेल या उनका परिवार का कोई भी इस हॉस्पिटल का सदस्य ट्रस्टी नहीं है।

बुधवार को गुजरात एटीएस ने आतंकी संगठन आईएस के दो आतंकियों को गिरफ्तार किया था, इसमें कासिम सरदार पटेल अस्पताल में कार्डियोलॉजी तकनीशियन के तौर पर काम कर रहा था और दूसरा सूरत की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में एडवोकेट था।

गुजरात मुख्यमंत्री के आरोपों पर जवाब देते हुए अहमद पटेल ने कहा कि उनके आरोप पूरी तरह से निराधार है। मेरा मेरी अपील है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

वही गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरतसिंह सोलंकी ने कहा कि अगर कोई गुनाह गार है, आतंकवादी है, देश के खिलाफ काम कर रहा है तो ऐसे लोगों को फांसी की सजा दी जाए। भाजपा को राजनीति नहीं करनी चाहिए।

वहीं कांग्रेस के प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि भाजपा और गुजरात के मुख्यमंत्री अपनी कमियों को छुपाने के लिए इस तरह के आरोप लगा रहे हैं।
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सूरत गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कांग्रेस नेता अहमद पटेल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। रूपाणी ने शुक्रवार को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा, जिस अस्पताल से आइएस का आतंकी पकड़ा गया, उसके कर्ताधर्ता अहमद पटेल हैं। उन्हें इस्तीफा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस को इस बारे में सफाई देनी चाहिए।

उधर, अस्पताल का कहना है कि अहमद पटेल या उनके परिवार का कोई सदस्य ट्रस्टी नहीं है। बता दें कि बुधवार को गुजरात एटीएस ने खूंखार आतंकी संगठन आइएस के दो आतंकियों उबेद और कासिम को गिरफ्तार किया था। इसमें से कासिम सरदार पटेल अस्पताल में इको कार्डियोग्राम टेक्नीशियन के तौर पर काम करता था और उबेद सूरत की डिस्टि्रक्ट कोर्ट में एडवोकेट था।

गुजरात के सीएम के गंभीर आरोप

विजय रूपाणी ने कहा, 23 अक्टूबर 2016 को उस अस्पताल का उद्घाटन था। यहां अहमद पटेल के निमंत्रण पर राष्ट्रपति आए थे। मंच पर भी अहमद पटेल नजर आए थे। भले ही उन्होंने इस अस्पताल के ट्रस्टी के तौर पर इस्तीफा दे दिया था, लेकिन पटेल ही कार्यक्रम के मेजबान थे। उनकी जिम्मेदारी बनती है। हम केवल ये चाहते हैं कि कांग्रेस और अहमद पटेल इस पर सफाई दें।

कांग्रेस ने जवाब दिया

अहमद पटेल ने कहा, रूपाणी के आरोप पूरी तरह से निराधार हैं। मेरी अपील है कि चुनाव को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीति ना की जाए। गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी ने कहा, अगर कोई गुनहगार है, आतंकवादी है, देश के खिलाफ काम कर रहा है तो ऐसे लोगों को फांसी की सजा दी जाए। आप लोग राजनीति ना करें, देश नीति करें और आतंकियों पर कड़ी कार्रवाई करें। रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, भाजपा और गुजरात के सीएम अपनी कमियों को छिपाने के लिए इस तरह के निराधार आरोप लगा रहे हैं।

अहमदाबाद और बेंगलुरू में ब्लास्ट की थी साजिश

एटीएस की पूछताछ में आतंकियों ने खुलासा किया कि उनके निशाने पर अहमदाबाद और बेंगलुरु के यहूदी धर्मस्थल थे। इन लोगों ने रेकी भी की थी। -एक साल पहले एटीएस को इनके आइएस से जुड़े होने की और जिहादी विचारधारा से प्रेरित होने के सुबूत मिले थे। यह जानकारी उबेद के 17 दिसंबर 2016 को किए फेसबुक पोस्ट से मिली थी। तब एटीएस ने अहमदाबाद क्राइम ब्रांच के थाने की स्टेशन डायरी में फेसबुक पोस्ट के बारे में नोट किया था।-एटीएस सूत्रों के मुताबिक, उबेद और कासिम ने पिछले साढ़े तीन साल में सूरत के बाहर अंकलेश्वर, अहमदाबाद, मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई और बेंगलुरु जाकर भी मुलाकात की। एटीएस ने एक-एक टीम इन शहरों में भेजी है। आशंका है कि कहीं ये शहर भी तो इनके निशाने पर नहीं थे।
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चेन्नई: केंद्रीय मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने आज कांग्रेस पर आतंकवाद का इस्तेमाल वोट बैंक की राजनीति के लिए करने का आरोप लगाया और संसद हमले के दोषी अफजल गुरु पर बयान देने के लिए कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम की आलोचना की। उन्होंने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘क्या अफजल गुरु का कोई धर्म है? आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। वह आतंकवादी है।

आतंकवादी आतंकवादी होता है। उसकी कोई भाषा, कोई धर्म नहीं होता। लेकिन दुर्भाग्य से अल्पसंख्यकों को वोट बैंक के तौर पर देखा जाता है। कांग्रेस आतंकवाद का इस्तेमाल भी वोट बैंक की राजनीति के लिए कर रही है।’’ उन्होंने कांग्रेस को निशाना बनाने के लिए इशरत जहां और बटला हाउस मुठभेड़ जैसे विवादों का भी जिक्र किया। उन्होंने पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लै के बयान को उद्धृत किया कि इशरत जहां मामले के हलफनामे में विवादास्पद बदलाव ‘‘राजनीतिक स्तर’’ पर किया गया।

नायडू ने कहा, ‘‘ये खुलासे संप्रग और कांग्रेस की गंदी राजनीति को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि अपने विरोधियों के खिलाफ राजनीतिक बदले के लिए वे राष्ट्रीय सुरक्षा से भी समझौता करने को तैयार हैं।’’ उन्होंने कहा कि मुंबई विस्फोट मामले के आरोपी डेविड हेडली ने पुष्टि की कि इशरत जहां आतंकवादी थी और लश्कर ए तैयबा की वेबसाइट पर भी उसकी मौत पर मातम मनाया गया था।

केंद्र की तरफ से पहले के एक हलफनामे में भी उसे आतंकवादी बताया गया था। बहरहाल इसके बाद के हलफनामे बदल दिए गए। उन्होंने कहा, ‘‘उन्होंने सीबीआई, आईबी का मनोबल तोड़ा।’’ इसी तरह पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने 2012 में कहा था कि बटला हाउस मुठभेड़ को लेकर सोनिया गांधी ‘‘काफी दुखी’’ थीं।
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इशरत जहां को आतंकी साबित न होने देने के लिए कांग्रेसनीत संप्रग सरकार के दौरान गृहमंत्री रहे चिदंबरम द्वारा किए गए कारनामें अब जगजाहिर हो चुके हैं। बाटला हाउस एनकाउंटर पर सोनिया गांधी के आंसुओं की कहानी कांग्रेस के सलमान खुर्शीद सुना ही चुके हैं। सर्जिकल स्ट्राइक जैसी आतंक के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई पर सवाल उठाने का काम भी कांग्रेस के द्वारा किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सत्ता हो या विपक्ष दोनों ही भूमिकाओं में आतंक के विरुद्ध कांग्रेस रुख बेहद लचर रहा है। ताज़ा मामले में भी कांग्रेस अपने उसी रुख का परिचय दे रही है। आतंकवाद के खिलाफ देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का यह रुख न केवल शर्मनाक है, बल्कि चिंताजनक भी है।
राजकोट/नई दिल्ली: कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने जम्मू-कश्मीर को अधिक स्वायत्तता देने की मांग उठाई, जिसकी भाजपा ने कड़ी आलोचना की है. गुजरात के राजकोट में चिदंबरम ने संवाददाताओं से कहा, ‘कश्मीर घाटी में अनुच्छेद 370 का अक्षरश: सम्मान करने की मांग की जाती है, जिसका मतलब है कि वे अधिक स्वायत्तता चाहते हैं.’ चिदंबरम ने कहा कि अधिक स्वायत्तता के सवाल पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और इस पर गौर करना चाहिए कि किन क्षेत्रों में स्वायत्तता दी जा सकती है. उन्होंने कहा, ‘उसकी स्वायत्तता पूरी तरह से भारत के संविधान के अंतर्गत है. जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा रहेगा, लेकिन उसे अधिक शक्तियां देनी चाहिए जिसका अनुच्छेद 370 के तहत वादा किया गया था.’ चिदंबरम ने जुलाई, 2016 में भी जम्मू-कश्मीर को अधिक स्वायत्तता देने की हिमायत की थी. कांग्रेस ने चिदंबरम के ताजा बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि यह जरूरी नहीं है कि किसी व्यक्ति का विचार पार्टी की राय भी हो.

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इस पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी ने ट्वीट कर कहा, ‘पी. चिदंबरम का अलगाववादियों और ‘आजादी’ का समर्थन करना हैरान करने वाला है. हालांकि मैं आश्चर्यचकित नहीं हूं क्योंकि उनके नेता ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ नारे का समर्थन करते हैं.’ उन्होंने कहा, ‘यह शर्मनाक है कि चिदंबरम ने सरदार पटेल के जन्म स्थल गुजरात में यह बोला, जिन्होंने भारत की एकता एवं खुशहाली के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया.’ वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कांग्रेस पर जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और उन्होंने कहा कि चिदंबरम का बयान भारत के राष्ट्रीय हित को ‘नुकसान’ पहुंचाता है जो एक गंभीर मुद्दा है. उन्होंने मुंबई में कहा, ‘कांग्रेस पार्टी के एक प्रतिष्ठित नेता की ओर से आया यह बयान पार्टी का अधिकारिक बयान है या नहीं? मुझे लगता है कि पार्टी को तुरंत यह स्पष्ट करना चाहिए.’इसके बाद कांग्रेस ने चिदंबरम के बयान से खुद को अलग करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति की राय जरूरी नहीं कि वह पार्टी की राय हो. कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने संवाददाताओं से कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है और हमेशा यह निर्विवाद रूप से बना रहेगा.
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कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदम्बरम अपने बयान को लेकर विवाद के केंद्र में है.
दशकों से आतंकवाद का दंश झेल रहे जम्मू-कश्मीर को ‘ज्यादा स्वायत्तता’ देने के उनके विचार ने जहां एक तरफ भाजपा को को हमलावर होने का मौका दे दिया है तो वहीं उनकी पार्टी कांग्रेस को बैकफुट पर ला दिया है. ऐसा नहीं है कि राज्य को ज्यादा आजादी देने का फितूर उनके दिमाग में पहली बार आया है. इससे पहले भी वह स्वायत्तता देने की मांग देकर खुद और पार्टी दोनों की किरकिरी करा चुके हैं.

हकीकत में ऐसे बयान अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देने का ही काम करते हैं. लिहाजा खुद उनकी पार्टी ने चिदम्बरम के बयान से खुद को अलग कर लिया. पिछले साल जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने राज्य की स्वायत्तता के मसले पर जो फैसला सुनाया था, उस पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की थी. हाईकोर्ट ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर का संविधान देश के संविधान के बराबर है.तब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जम्मू-कश्मीर राज्य भारतीय संविधान के दायरे से बाहर नहीं है. उसे भारत के संविधान के बाहर कोई संप्रभुता हासिल नहीं है. जम्मू-कश्मीर के नागरिकों पर पहले देश का संविधान लागू होता है. इससे जाहिर होता है कि देश की शीर्ष अदालत इस संवेदनशील मामले के प्रति कितनी संजीदा है.

लेकिन चिदम्बरक का बयान राष्ट्रीय हितों को आहत करने जैसा है. और अलगाववाद को बढ़ाने वाले भी. आजादी की बात करने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है रोजगार की बात करना. कांग्रेस या उसके नेता विकास की बात करेंगे तो न केवल राज्य में उनकी स्वीकार्यता बढ़ेगी बल्कि देश भर में अच्छा और सुखद संदेश का प्रसार होगा. लेकिन क्षुद्र राजनीति के लिए दिए गए ऐसे बयान से बरसों से अमन की लालसा रखने वाली कश्मीर की जनता को कुछ भी हासिल नहीं हो सकेगा.

वैसे भी राज्य को विभिन्न स्तरीय स्वायत्तता पैकेज की ज्यादा जरूरत है. मसलन राज्य से लेकर क्षेत्रों और पंचायत स्तर तक सत्ता का विकेंद्रीकरण हो. अगर ऐसा नहीं होता तो विघटनकारी ताकतें ज्यादा ताकतवर हो जाएंगी. चिदम्बरम ने जो कुछ कहा है वह बिल्कुल स्वीकार योग्य नहीं है. ऐसी अनर्गल और फिजूल की बयानबाजी से बेहतर होगा कि वो राज्य की वस्तुस्थिति को फिर से देखें, परखें और समझें.
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स्वायत्तता की मांग का तेज होना

दिल्ली संधि के तहत पूर्ण एकीकरण की अवधारणा के फायदे नुकसान को ले कर माथापच्ची करने के बाद अब्दुल्ला को यह लगने लगा था कि सीमित स्वायत्तता का उसका सपना नष्ट हो रहा है। इसके बाद उसके क्रिया-कलापों ने उसकी राष्ट्रवादी शख्सियत को पूरी तरह झुठला दिया। जल्दी ही एक बेहद नाटकीय घटनाक्रम में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के निदेशक बीएन मलिक के एक ऑपरेशन के तहत उन्हें गुलमर्ग में गिरफ्तार कर लिया गया। 1990 के मध्य तक स्वायत्तता की मांग तेज होने लगी और ज्यादातर लोग इस बात पर सहमत थे कि अगर इस समस्या का समाधान निकालना है तो स्वायत्तता की पुनर्स्थापना करनी होगी। 1994 के अपने प्रस्ताव में नेशनल कांफ्रेंस ने साफ तौर पर कहा, “इस संवेदनशील मौके पर हम भारत सरकार को याद दिलाना चाहते हैं कि राज्य के लोगों ने भारतीय संघ में शामिल होने का फैसला कुछ साझा सिद्धांतों के आधार पर लिया था। संविधान को तब स्थायित्व मिला जब 1952 में जम्मू-कश्मीर राज्य और भारतीय संघ के बीच एक समझौता हुआ जिसे दिल्ली संधि के नाम से जाना जाता है। उसके बाद रिश्ते खराब हुए, क्योंकि भारतीय संघ ने अपने वादे को पूरा नहीं किया जिसका नतीजा यह हुआ कि स्वायत्तता कमजोर होती गई।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा में लंबी और गर्मागरम बहस के बाद तैयार हुई राज्य स्वायत्तता समिति की वर्ष 2000 की रिपोर्ट अपने आप में ही अस्पष्ट है। यह 1954 से 1986 के बीच केंद्रीय विधायिका की ओर से राज्य पर लागू किए गए 42 संवैधानिक प्रावधानों की ओर यह कहते हुए इशारा तो करती है कि यह ‘स्वायत्तता के क्षरण’ का प्रमाण है। लेकिन साथ ही यह भी कहती है कि हालांकि इनमें से ‘सभी पर एतराज नहीं किया जा सकता’। लेकिन यह सिद्धांतों का सवाल है। सिद्धांतों के इस सवाल पर केंद्र सरकार के लिए यह मानना मुश्किल हो सकता था कि 1953 में शेख अब्दुल्ला को वजीर-ए-आजम के पद से हटा दिए जाने और जेल भेज दिए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की वैधानिक मान्यता समाप्त हो गई थी। यही वह कारण था कि शेख अब्दुल्ला और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बीच 1975 में किए गए समझौते में संवैधानिक समीक्षा के दायरे को बहुत सीमित रखा गया था। इसने जम्मू-कश्मीर पर लागू होने वाले संवैधानिक संशोधनों की समीक्षा को नए रूप में मंजूरी दी लेकिन साथ ही कहा कि ‘बिना स्वीकृत या परिवर्तित’ किए गए सभी संशोधन ‘स्थायी’ होंगे।
चार जुलाई, 2000 को हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में फारुक अबदुल्ला की स्वायत्तता की मांग को अस्वीकार्य बता कर कचरे की पेटी में डाल दिया गया। जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता और संघीय ढांचे की पुनर्रचना पर जवाब में भाजपा के तब के महासचिव और जम्मू-कश्मीर के प्रभारी नरेंद्र मोदी ने नारा दिया– ‘विकास, लोकतंत्र, संवाद और सुरक्षा बलों का उपयोग।’ वही पार्टी महासचिव मोदी अब प्रधानमंत्री हैं जो अब निर्णायक फैसला ले सकते हैं।

निम्न हिस्से में हम कश्मीर की स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों की समीक्षा करेंगे –

‘व्यापक स्वायत्तता’ या 1953 से पूर्व की स्थिति क्या है? इस मामले पर जम्मू-कश्मीर विधानसभा में हुई चर्चा में यह बिंदू सामने आते हैं-

कांग्रेस नेता और खास तौर पर नेहरू ने यह धारणा पैदा कि थी कि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति की वजह से इसे विशेष दर्जा दिया जाना जरूरी था।

‘विशेष परिस्थिति’ शब्द ने सांप्रदायिक शक्तियों को यह कहने का मौका दिया कि कांग्रेस ने सैद्धांतिक रूप से यह स्वीकार कर लिया है कि राज्य की मुस्लिम बहुल स्थिति को हर हालत में बनाए रखना है।

संविधान सभा में बिना व्यापक चर्चा के ही भारतीय संविधान में धारा 370 के तहत राज्य को विशेष दर्जा दे दिया गया।

1952 में नेहरू और शेख के बीच दिल्ली संधि इस विशेष दर्जे को व्यवहारिक आकार देने के लिए की गई।

समझौते के तहत राज्य को अलग संविधान दिया गया और इसका अपना झंडा दिया गया। राज्य के प्रमुख और सरकार के प्रमुख के पद को क्रमशः सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम का नाम दिया गया।

राज्य में प्रवेश करने के इच्छुक लोगों और यहां से बाहर जाने के इच्छुक लोगों को राज्य से इजाजत लेनी होती।

जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलय को सिर्फ तीन लिहाज से मंजूरी दी गई- रक्षा, विदेश और संचार।

इन परिस्थितियों में जम्मू-कश्मीर प्रजा परिषद ने ‘एक प्रधान, एक विधान और एक निशान’ की मांग करते हुए आंदोलन छेड़ दिया। एक दर्जन से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई और हजारों गिरफ्तार किए गए।

भारतीय जनसंघ ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में इस आंदोलन के समर्थन में देश भर में सत्याग्रह चलाया। डॉ. मुखर्जी ने आठ मई, 1953 को बिना परमिट के राज्य में प्रवेश किया। उन्हें श्रीनगर में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, जहां 23 जून 1953 को संदेहास्पद परिस्थितियों में उनका निधन हो गया।

राज्य के लिए अधिकतम स्वायत्तता हासिल करने में कायमाब रहे शेख अब्दुल्ला पर आरोप लगाया गया कि वे अमेरिका और पाकिस्तान के साथ मिल कर कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रच रहे हैं। उन्हें नौ अगस्त, 1953 को गिरफ्तार कर लिया गया और इस तरह राज्य में अलगाववाद का एक चरण समाप्त हुआ।

1953 से 1975 के बीच राज्य की दब्बू सरकारें केंद्र की हर बातें मानती रहीं और राज्य की स्वायत्तता में कमी आती रही। इस अवधि के दौरान 13 ऐसे कदम उठाए गए जिनसे व्यवस्थित रूप से भारतीय संविधान की व्यवस्थाओं को राज्य में लागू किया जा सके। इनमें से कुछ खास ये हैं-

1954 के राष्ट्रपति के आदेश से केंद्रीय उत्पाद और सीमा शुल्क, नागरिक उड्डयन, डाक और टेलीग्राफ पर संघीय व्यवस्था को राज्य में लागू कर दिया गया।

1958 के अखिल भारतीय सेवा के तहत आईएएस और आईपीएस शुरू कर दिए गए और नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) के कार्यक्षेत्र को विस्तार दे दिया गया।

1959 में जनगणना के लिए अधिकार दे दिए गए ताकि 1961 की जनगणना केंद्रीय कानून के तहत हो सके।

1960 में जम्मू-कश्मीर को सुप्रीम कोर्ट के कार्यक्षेत्र के दायरे में लाया गया और चुनाव आयोग का दायरा भी बढ़ा दिया गया।

1964 में संविधान की धारा 356 और 357 को लागू कर दिया गया ताकि आपात स्थितियों में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सके।

1965 में श्रमिकों, ट्रेड यूनिनयों, सामाजिक सुरक्षा और सामाजिक बीमा से जुड़े कई विधेयकों का दायरा बढ़ा दिया गया।

1966 में लोकसभा के प्रत्यक्ष निर्वाचन के प्रावधान लागू किए गए।

1953 से 337 कानूनों को राज्य में लागू किया गया जिनमें चार्टर्ड एकाउंटेंड कानून, विदेशी मुद्रा कानून, अदालत की अवमानना का कानून, कॉपी राइट कानून और परिसीमन आदि शामिल हैं।

वीजा की तरह की परमिट की व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया।

घाटी में उदासी का माहौल छा गया और लोगों को लगने लगा कि उन्हें और कमजोर कर दिया गया है। उधर, नई दिल्ली ने लिफाफे भेजना और धारा 370 को कमजोर करना जारी रखा। यही रवैया दिल्ली संधि को ले कर भी दिखाया गया, जो वास्तव में देखा जाए तो सीमित स्वायत्तता की बजाय पूर्ण एकीकरण का पहला प्रयास था। कुल मिला कर लब्बोलुआब यह है कि शेख अब्दुल्ला ने दिल्ली संधि पर दस्तखत करने के बाद पाया कि स्वायत्त और यहां तक कि अर्ध-स्वतंत्र कश्मीर की बात भी महज एक भ्रम था।

राज्य स्वायत्तता समिति की सिफारिशों में क्या खतरे निहित थे? केंद्रीय मंत्रीमंडल ने इसे पूरी तरह कचरे के डब्बे में क्यों फेंक दिया?
इसकी सिफारिशों में यह भी शामिल था कि धारा 370 जिसे तात्कालिक प्रावधान के रूप में शामिल किया गया था, उसे विशेष धारा के तौर पर मंजूरी दी जाए।
जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को फिर से रक्षा, विदेश और संचार के तीन विषयों तक सीमित किया जाए। बाकी सभी विषयों में राज्य स्वतंत्र रहे।
राज्यपाल (गवर्नर) और मुख्य मंत्री (चीफ मिनिस्टर) के पदनाम को फिर से सदर-ए-रियासत और प्रधान मंत्री (प्राइम मिनिस्टर) किया जाए।
इस सदर-ए-रियासत का चयन राज्य विधायिका करे ना कि केंद्र। इसी तरह वह भारत के राट्रपति के प्रति नहीं बल्कि राज्य विधानसभा के प्रति उत्तरदायी हो।
सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय चुनाव आयोग और सीएजी के अधिकार क्षेत्र से राज्य को बाहर किया जाए।
समिति ने मौलिक अधिकारों से जुड़ी धारा 12 से 35 को भी समाप्त करने की सिफारिश की थी।
आईएएस और आईपीएस जैसी संघीय सेवाओं के दायरे से राज्य को बाहर किया जाए।
धारा 356 और 357 को जम्मू-कश्मीर पर प्रभावी नहीं माना जाए।

लेकिन सवाल है कि अगर 1989 में भारत के राष्ट्रपति ने राज्य में राष्ट्रपति शासन नहीं घोषित किया होता तो यहां की क्या हालत होती, जब पाकिस्तान ने ‘हजार जख्म की मौत’ की नीति पर काम करते हुए पूरी घाटी को आतंकवाद से भर दिया था? इसी तरह शेख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस ने 1950 में स्वायत्तता हासिल करने के बाद खुद को गौरवान्वित नहीं किया था। आज के समय में निम्न बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी है-

सितंबर 1951 में हुआ राज्य की संविधान सभा का चुनाव राज्य के कानून के तहत हुआ था। इसमें सभी 75 सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों के नामांकन को रद्द करते हुए नेशनल कांफ्रेंस का कब्जा हुआ था।

कश्मीरी नेतृत्व ने खुद को मिले विशेषाधिकार का जम कर दुरुपयोग कर जम्मू और लद्दाख के लोग (जो 50 फीसदी हैं) को उनके अधिकारों से वंचित रखा। इन लोगों को पिछले 50 साल से दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह जीना पड़ा है।

जम्मू और लद्दाख क्षेत्र को भी मुस्लिम बहुल बनाने के पाकिस्तान की आईएसआई के इरादे को पूरा करने में एनसी सरकार ने कभी छुप कर और कभी खुल कर पूरा सहयोग किया है। पिछले दो-तीन साल के अंदर कश्मीर के 25 हजार परिवारों ने जम्मू क्षेत्र में सरकारी जमीन पर कब्जा कर मकान बना लिए हैं।

1975 के इंदिरा-शेख समझौते के तहत सत्ता में आने के बाद एनसी सरकार ने पुनर्वास कानून पारित किया जिसके तहत 1947 में पाकिस्तान जा बसे हजारों परिवारों के वापस आ कर बसने का रास्ता साफ हो गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदी लगाई। अगर राज्य पर सुप्रीम कोर्ट का अधिकार क्षेत्र नहीं होता तो सोचिए कि क्या स्थिति होती?

व्यापक स्वायत्तता की कल्पना करने वाले लोगों की सोच के उलट स्वायत्तता ने घाटी को भारत के करीब लाने में कोई भूमिका नहीं निभाई। उल्टा इसकी वजह से राज्य में आईएसआई को अपनी फसल उगाने में मदद मिली और आतंकवादी मुस्लिम अलगाववाद को बढ़ावा देने में इसने अहम भूमिका निभाई।

1996 के चुनाव में एनसी को कुल वोट का 15 फीसदी से भी कम मिला था। उन चुनावों में लोगों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए वोट डाला था। उससे भी खास बात यह है कि यह व्यापक स्वायत्तता पर लोगों की मुहर नहीं थी, जैसा कि एनसी दावा करती है।

कुछेक को छोड़ कर पूरे कश्मीरी समुदाय ने एनसी के अधिक स्वायत्तता की मांग को ठुकरा दिया है। जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के लोगों के साथ ही गुर्जर, शिया, सिख और कश्मीरी हिंदू भी इसी विचार के हैं।

1975 में सत्ता में आने के बाद शेख अब्दुल्ला ने भी अपने वरिष्ठ मंत्री डीडी ठाकुर के नेतृत्व में ऐसी ही समिति गठित की थी। इसे 1953 से 1975 के दौरान राज्य में लागू किए गए केंद्रीय प्रावधानों की समीक्षा करनी थी। इस समिति ने कहा था कि इस दौरान किए गए सभी प्रावधान राज्य के लोगों के हित में हैं और उनसे कोई छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। शेख अब्दुल्ला ने उस रिपोर्ट को मान भी लिया था।
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नई दिल्ली। कश्मीर पर पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम के बयान पर गरमाई सियासत को देखते हुए कांग्रेस ने उन्हें इस मुद्दे पर बयानबाजी से बचने को कहा है। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस में चिदंबरम के इस बयान को लेकर नाखुशी है। पार्टी ने चिदंबरम को अब कश्मीर पर बयानबाजी करने से मना किया है। सोमवार को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बाद चिदंबरम ने न तो मीडिया से बात की और न ही किसी सवाल का जवाब दिया। सूत्रों के अनुसार, आलाकमान चिदंबरम के कश्मीर पर दिए बयान से नाखुश है।

कांग्रेस ने चिदंबरम के बयान से किनारा कर लिया है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारतीय संघ का अभिन्न अंग है और निश्चित रूप से हमेशा रहेंगे। किसी का व्यक्तिगत विचार कांग्रेस का विचार नहीं है। लोकतंत्र में हरेक व्यक्ति को अपना विचार रखने का अधिकार है।

पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने एक कार्यक्रम के दौरान जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता की मांग को जायज ठहराया था। उन्होंने साफ किया कि कश्मीरियों की आजादी कहने का मतलब स्वायत्तता है। चिदंबरम ने कहा कि जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय स्वायत्तता देने के बारे में विचार करना चाहिए। स्वायत्तता देने के बावजूद वे भारत का ही हिस्सा रहेंगे।

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