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पुडुचेरी जाते ही दक्षिण में खाली हुई कांग्रेस

congress old vs youngनई दिल्ली पुदुचेरी में सोमवार को सरकार गिरने के साथ ही कांग्रेस पार्टी की राज्यों पर सियासी पकड़ भी सिकुड़ती नजर आई। पार्टी अब अपने बूते सिर्फ पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सत्ता में बनी हुई है। पंजाब में शहरी स्थानीय निकाय के चुनावों में पिछले हफ्ते जीत के साथ मिली थोड़ी राहत को छोड़ दें तो कांग्रेस को चुनावी चुनौतियां काफी समय से घेरे हुए हैं।

महाराष्ट्र में शिवसेना और राकांपा तथा झारखंड में झामुमो के साथ हालांकि कांग्रेस सत्ता में है लेकिन इन दोनों राज्यों में भी उसकी स्थिति बहुत मजबूत नहीं है। कांग्रेस 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से कमोबेश चुनावों में लगभग लगातार निराशाजनक प्रदर्शन कर रही है। पिछले साल मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के पार्टी छोड़ने के साथ ही पार्टी इस राज्य में सत्ता से हाथ धो बैठी। यहां भाजपा ने सरकार बना ली। आंतरिक गुटबाजी कांग्रेस को मध्य प्रदेश में महंगी पड़ी और सिंधिया के पार्टी छोड़ने से वहां कमल नाथ सरकार गिर गई।

पिछले साल मार्च में मध्य प्रदेश में सत्ता गंवाने के बाद दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को शर्मनाक चुनावी हार का सामना करना पड़ा। दिल्ली में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल पाया और 70 सीटों में से 67 पर उसके उम्मीदवारों को जमानत जब्त हो गई, वहीं बिहार में ‘महागठबंधन’ के घटक के तौर पर उस पर राजद को पीछे खींचने का दोष आया। बिहार में वाम दलों का प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर था जबकि राजद को सबसे ज्यादा सीटें मिली। भाजपा को वहां चुनावी फायदा हुआ।
इससे पहले राजस्थान में पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट के बगावती तेवरों के कारण मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सरकार के लगभग गिरने की नौबत आ गई थी हालांकि आखिरी मौके पर मुख्यमंत्री ने अपनी रणनीति से संभावित विद्रोह को टाल कर अपनी सरकार बचा ली। राजस्थान में कांग्रेस की प्रदेश इकाई में अब भी खींचतान पूरी तरह खत्म हो गई हो यह नहीं कहा जा सकता और पायलट और गहलोत के बीच कहा जाता है कि अब भी वर्चस्व को लेकर तनातनी बरकरार है।

हार और निराशा के दौर के बाद अब कांग्रेस को तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम और केरल में होने वाले विधानसभा चुनावों से उम्मीद है और वह यहां अपना दायरा बढ़ाने की कोशिश करेगी हालांकि ये राह भी उतनी आसान दिख नहीं रही। इन राज्यों में जून से पहले चुनाव होने हैं। इन सभी चुनावी राज्यों में भाजपा की आक्रामक रणनीति और बंगाल में एआईएमआईएम की सियासी दस्तक से पूर्वी राज्य में कांग्रेस-वाम की संभावनाओं को चुनौती मिलेगी।वहीं असम में निवर्तमान भाजपा की मौजूदगी में मुकाबला सख्त होने की उम्मीद है। भाजपा को यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई कई विकास परियोजनाओं से काफी उम्मीद है। केरल में चुनाव में सरकार बदलने का इतिहास रहा है लेकिन इसके बावजूद यहां कांग्रेस की राह में कड़ी चुनौती लग रही है। भाजपा में ई श्रीधरन के शामिल होने के केरल के चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। पुदुचेरी में परंपरागत रूप से मजबूत रही कांग्रेस को वापसी की उम्मीद है, हालांकि आंकड़े उसके पक्ष में गवाही नहीं दे रहे।

यहां चुनावों से पहले कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे की झड़ी से पार्टी पर दबाव जरूर होगा, वहीं इन सबके बीच तमिलनाडु में पार्टी को द्रमुक के साथ मिलकर अच्छा प्रदर्शन करने की उम्मीद है। कांग्रेस के अंदरुनी लोग आलाकमान के कमजोर पड़ती पकड़ और गांधी परिवार के वोट बटोरने की अक्षमता को पार्टी के इस खराब प्रदर्शन के लिये दोष देते हैं। गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा जैसे वरिष्ठ नेताओं समेत 23 नेताओं का समूह कांग्रेस अध्यक्ष को यथा स्थिति के खिलाफ अगस्त से चेता रहा है लेकिन इसका कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा।सोनिया गांधी की तबीयत ठीक न होने और संपर्क में न रहने तथा राहुल गांधी के पार्टी प्रमुख का पद ग्रहण करने में संकोच दिखाने के कारण पार्टी नेतृत्व अस्थिर बना हुआ है। पार्टी के 23 नेताओं के समूह की आंतरिक चुनावों की मांग भी परवान चढ़ती नहीं दिख रही। पार्टी के वरिष्ठों का मानना है कि पार्टी को अब आगे आकर नेतृत्व करना चाहिए और उन्हें उम्मीद है कि जून में नए अध्यक्ष के पदभार संभालने के साथ ही यह हो सकता है।

पुडुचेरी में पिछले कई दिन से चल रहा राजनीतिक संकट सोमवार को कांग्रेस की सरकार गिरने के साथ ही खत्म हो गया। कांग्रेस नीत वी नारायणसामी सरकार को सदन मे  बहुमत साबित करना था। वोटिंग से पहले ही कांग्रेस और डीएमके के विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। इसके बाद स्पीकर ने ऐलान किया कि सरकार बहुमत साबित करने में विफल रही है। पुडुचेरी में सरकार गिरने के बाद कांग्रेस ने दक्षिण भारत में कर्नाटक के बाद दूसरा राज्य गंवा दिया। कभी कांग्रेस के मजबूत गढ़ के रूप में माने जाने वाले दक्षिण भारत में आज पार्टी सभी राज्यों में सत्ता से बाहर हो चुकी है।

सिर्फ पांच राज्यों में सत्ता में रह गई पार्टी
2014 में लोकसभा चुनावों में हार के बाद से कांग्रेस के सत्ता की लड़ाई में लगातार भाजपा से पिछड़ती जा रही है। पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड को छोड़कर आज पूरे देशभर में पार्टी सत्ता से बाहर है। महाराष्ट्र और झारखंड में कांग्रेस भले ही सत्ता में हो लेकिन यहां पार्टी की भूमिका क्रमशः नंबर तीन और नंबर दो की ही है।

पार्टी में अंदरुनी कलह और बदलाव की मांग
कभी वटवृक्ष की तरह पूरे हिंदुस्तान में फैली पार्टी की मौजूदा हालत के लिए पार्टी के कमजोर होते संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं की कमी को अहम रूप से जिम्मेदार माना जा रहा है। पार्टी में अंदरुनी कलह और राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व को लेकर असंतोष सार्वजनिक हो चुका है। पार्टी के भीतर ही दो धड़े हो गए हैं। पार्टी में आंतरिक चुनाव को लेकर गुलाम नबी आजाद, कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा समेत 23 वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी को पत्र लिख पार्टी में बड़े बदलाव की मांग की थी।

15 साल बाद बनी सरकार 15 महीनें भी नहीं टिकी
मध्यप्रदेश में कांग्रेस 15 साल बाद सत्ता में लौटी थी लेकिन यह सरकार 15 महीने भी नहीं टिक पाई। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद मार्च 2020 में, कांग्रेस पार्टी के 25 विधायकों के राज्य विधानसभा से इस्तीफा दे दिया। मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा। फ्लोर टेस्ट के आदेश के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सदन में बहुमत साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 15 महीने पुरानी कांग्रेस सरकार नाटकीय रूप से सत्ता से बाहर हो गई।

जुलाई 2019 में कांग्रेस को उस समय झटका लगा था कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के 17 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था। जब कर्नाटक में जेडीएस के साथ उनकी गठबंधन सरकार सदन में विश्वास मत साबित करने में असफल रही थी। पार्टी ने इसके लिए विधायकों के विश्वासघात को जिम्मेदार माना था। इसे कर्नाटक में भाजपा के ऑपरेशन लोटस की सफलता माना गया। इसके बाद यहां भाजपा की सरकार बनी। 15 सीटों पर उप चुनाव हुए में भाजपा ने 13 दल बदलुओं को टिकट दिया। बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की थी।

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं चुनौती
इस साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इन चुनावों में पार्टी के लिए जीत हासिल करना बड़ी चुनौती है। पश्चिम बंगाल में तो मुख्य लड़ाई इस बार भाजपा और तृणमूल के बीच ही मानी जा रही है। यहां पार्टी लेफ्ट के साथ गठबंधन में है। वहीं तमिलनाडु में पार्टी डीएमके के साथ गठबंधन के जरिये सत्ता में आने की कोशिश करेगी। केरल में पार्टी का वाम नीत एलडीएफ से मुकाबला है। असम में भाजपा को फिर से सत्ता में आने से रोकना चाहेगी।

आर्थिक संकट से गुजर रही पार्टी
कांग्रेस इन दिनों भारी आर्थिक संकट से गुजर रही है। पार्टी ने स्टेट में अपने नेताओं को इस संकट से जल्द निपटने के लिए कहा है। इससे पहले कांग्रेस को साल 2019-20 में 139 करोड़ रुपये से अधिक का चंदा मिला था। निर्वाचन आयोग ने 2019-20 में कांग्रेस को मिले चंदे से जुड़ी एक रिपोर्ट को सार्वजनिक किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘आईटीसी’ और इससे जुड़ी कंपनियों ने 19 करोड़ रुपये से अधिक राशि चंदे में दी, जबकि ‘प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट’ ने 31 करोड़ रुपये का चंदा दिया।

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