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बड़े राजनीतिक संकट से गुजर रही कांग्रेस

lead congress cwcनई दिल्‍ली: 135 वर्ष पुरानी कांग्रेस पार्टी के स्वास्थ्य का विश्लेषण करेंगे, जो असहमति और असहनशीलता जैसी गंभीर बीमारियों की शिकार है और कांग्रेस में गांधी परिवार के ख़िलाफ़ बोलने वालों के लिए अब शायद कोई जगह नहीं बची है और इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हैं,  कांग्रेस के बड़े नेता गुलाम नबी आज़ाद और आनंद शर्मा.

अंदरूनी झगड़ों और टकराव की वजह से पैदा हुआ राजनीतिक संकट 

2 मार्च को आनंद शर्मा ने पश्चिम बंगाल में Indian Secular Front के साथ कांग्रेस के गठबंधन की आलोचना की और इसे कट्टरपंथी पार्टी बताया. आनंद शर्मा ने ये सब बातें कह तो दीं लेकिन इसके बाद उनका विरोध शुरू हो गया और कई नेताओं ने उन पर कार्रवाई की भी मांग कर दी. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करने के लिए गुलाम नबी आज़ाद के भी पुतले फूंके गए और उनका अपमान किया गया.  सोचिए गुलाम नबी आज़ाद ने जिस पार्टी को अपने जीवन के 47 वर्ष समर्पित कर दिए, आज वही पार्टी उनकी असहमति का किस तरह अपमान कर रही है. ऐसे समय में जब पार्टी अंदरूनी झगड़ों और टकराव की वजह से अब तक के सबसे बड़े राजनीतिक संकट से गुज़र रही है, उस वक़्त राहुल गांधी क्या कर रहे हैं, ये समझना भी बेहद ज़रूरी है.

कांग्रेस का सेकुलरिज्‍म भी दिखावटी

राहुल गांधी इस समय तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी के दौरे पर हैं और विधान सभा चुनावों के प्रचार में जुटे हैं. लेकिन इस दौरे के बीच कांग्रेस में झगड़ा काफ़ी बढ़ गया है और इस झगड़े ने बता दिया है कि लोकतंत्र में असहमति और सहिष्णुता की बात करने वाली कांग्रेस पार्टी में इन दोनों ही शब्दों की कोई जगह नहीं है और कांग्रेस का सेकुलरिज्‍म भी दिखावटी है.

असल में धर्मनिरपेक्षता को लेकर कांग्रेस बातें तो बड़ी बड़ी करती है लेकिन पश्चिम बंगाल में उसने वहां की एक कट्टरपंथी पार्टी Indian Secular Front के साथ गठबंधन किया है. ये पार्टी कुछ ही दिनों पहले बनी थी. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि लेफ़्ट पार्टियों ने भी इसके साथ मिल कर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. सोचिए वैसे तो लेफ़्ट पार्टियां धर्म के नाम पर राजनीति का विरोध करती हैं और लोगों को गुमराह करती हैं लेकिन अपने फायदे के लिए ऐसी पार्टियों से हाथ मिला लेती हैं, जिनका राजनीतिक ढांचा ही साम्प्रदायिक विचारों से संक्रमित है.

इसे समझने के लिए आपको इस पार्टी के बारे में और जानना होगा.

Indian Secular Front नाम की ये पार्टी हुगली के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने बनाई है और वो फुरफुरा शरीफ़ मज़ार के धार्मिक गुरु हैं और उन पर कई बार भड़काऊ और साम्प्रदायिक भाषण देने के भी आरोप लग चुके हैं.

यहां महत्वपूर्ण बात ये है कि इस पार्टी ने पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM से भी गठबंधन करने की कोशिश की थी. लेकिन ये गठबंधन नहीं हुआ और बाद में इसमें कांग्रेस की एंट्री हो गई और लेफ़्ट पार्टियों और कांग्रेस का इसके साथ गठबंधन भी हो गया.

अब कांग्रेस और इसके गठबंधन का विरोध इसलिए हो रहा है, क्योंकि कांग्रेस खुद को एक धर्मनिरपेक्ष पार्टी बताती है और ऐसा दावा करती है कि उसकी राजनीतिक साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ है. लेकिन सच ये है कि उसने पश्चिम बंगाल में सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए एक ऐसी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया, जिसका झुकाव कट्टरपंथ की ओर है.

कांग्रेस में असहमति का कोई स्थान नहीं

आनंद शर्मा ने भी इसी पर सवाल उठाए, जिसके बाद लोक सभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी उन पर पलटवार किया. कल दिनभर कांग्रेस नेताओं के बीच ये झगड़ा चलता रहा और आनंद शर्मा पर हमले तेज हो गए. यानी जो पार्टी खुद को निष्पक्ष बताती है और अभिव्यक्ति की बातें करती है. उसे आनंद शर्मा की बातें अच्छी नहीं लगी और ऐसा क्यों हुआ ये भी समझिए.

आनंद शर्मा ने पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाया और उनका इशारा सीधे सीधे सोनिया गांधी की तरफ़ था और शायद यही वजह है कि वो पार्टी के कई नेताओं के निशाने पर आ गए.

यही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ करने के लिए कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद पर भी हमले हुए और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उनके पुतले फूंकने शुरू कर दिए. गुलाम नबी आज़ाद जैसे नेताओं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उन्हीं की पार्टी के लोग एक दिन उनका इस तरह अपमान करेंगे.

पार्टी का मौजूदा संकट क्‍यों है अलग?

यहां समझने वाली बात ये है कि कांग्रेस इस तरह के संकट पहले भी देख चुकी है और आज़ादी के बाद से पार्टी 50 बार टूट चुकी है. यानी इस हिसाब से औसतन हर 18 महीने में कांग्रेस में राजनीतिक उठा पटक होती है और पार्टी का एक धड़ा उससे अलग हो जाता है. हालांकि इसके बावजूद कांग्रेस का मौजूदा संकट कई मायनों में पहले से अलग है. इसे हम आपको 4 पॉइंट्स में समझाते हैं.

पहला पॉइंट आज़ादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, जब कांग्रेस 7 वर्षों से सत्ता से बाहर है और पार्टी में मनमुटाव और राजनीतिक टकराव की भी ये एक बड़ी वजह है. इससे पहले वर्ष 1996 से 2004 तक कांग्रेस सबसे अधिक 8 वर्षों तक सरकार से बाहर रही थी. हालांकि तब 1996 से 1998 तक देश में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी और इस सरकार को कांग्रेस ने बाहर से समर्थन दिया था.

दूसरा पॉइंट 2014 और 2019 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक हार मिली और ये हार ही पार्टी को गतिरोध की तरफ ले गई.

तीसरा पॉइंट भारत के सिर्फ तीन राज्यों में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार है. ये राज्य हैं, पंजाब, छत्तीसगढ़ और राजस्थान और यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि इन राज्यों की कांग्रेस इकाई में भी काफी झगड़ा है.

और आखिरी बात ये कि ऐसा पहली बार हुआ है जब कांग्रेस की कमान गांधी परिवार के हाथ में है लेकिन इसके बावजूद पार्टी के कई नेता उसकी नीतियों और फैसलों की आलोचना कर रहे है. 1969, 1977 और 1999 के कांग्रेस संकट में अहम बात ये थी कि उस समय कांग्रेस का नेतृत्व गांधी और नेहरु परिवार के पास नहीं था.

ये वो बड़ी वजह हैं, जिनसे पता चलता है कि कांग्रेस का मौजूदा संकट कई मायनों में पहले के संकट से अलग है.

कांग्रेस का अंदरुनी लोकतंत्र कैसे एक परिवार के हाथ में चला गया

पिछले 70 वर्षों में कांग्रेस का अंदरुनी लोकतंत्र कैसे एक परिवार के हाथ में चला गया, इसे अब आप कुछ आंकड़ों से समझिए.

-वर्ष 1950 से 2020 तक यानी पिछले 70 वर्षों में 39 वर्षों तक कांग्रेस का अध्यक्ष पद गांधी नेहरू परिवार के पास रहा.

-अगर बात सिर्फ़ पिछले 40 वर्षों की करें तो इनमें से 32 वर्षों तक कांग्रेस की कमान गांधी नेहरू परिवार के पास रही. जिनमें राजीव गांधी, उनकी पत्नी सोनिया गांधी और उनके सुपुत्र राहुल गांधी शामिल हैं.

-महत्वपूर्ण बात ये है कि इन 40 वर्षों में गांधी परिवार के बाहर के सिर्फ़ दो नेता ही कांग्रेस में अध्यक्ष पद तक पहुंच पाए.

-पहले थे पीवी नरसिम्हा राव और दूसरे थे सीताराम केसरी और इन दोनों नेताओं की ही बाद में अनदेखी हुई और पार्टी में उनके नियंत्रण को कमज़ोर कर दिया गया.

-सोनिया गांधी जो 1998 में ही भारत की सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनीं थी, वो मौजूदा समय में कांग्रेस में सबसे लम्बे समय तक अध्यक्ष रहने वाली इकलौती नेता हैं. लगातार 1998 से 2017 तक 19 वर्षों के लिए कांग्रेस की कमान उनके पास रही और इस समय भी वो कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हैं.

जिन नेताओं ने किया विरोध

अब हम आपको भारत के उन नेताओं के बारे में बताते हैं, जिन्होंने गांधी नेहरू परिवार का विरोध किया और इसकी वजह से उनका राजनीतिक करियर या तो समाप्त हो गया या भारतीय राजनीति में वो कहीं गुम हो गए.

सबसे पहला उदाहरण हैं, भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव. उन्होंने राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस को स्थिर नेतृत्व दिया. लेकिन इसके बावजूद जब दिसम्बर 2004 में उनकी मृत्यु हुई, तब उनके पार्थिव शरीर को कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय 24 अकबर रोड नहीं ले जाने दिया गया. यही नहीं उस समय उनका अंतिम संस्कार भी दिल्ली में नहीं होने दिया गया. तब पी.वी. नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार हैदराबाद में हुआ था.

-सोनिया गांधी जब वर्ष 1998 में भारत की सक्रिय राजनीति में शामिल होने वाली थीं, उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे. वो पार्टी के बड़े दलित नेता थे लेकिन गांधी परिवार के क़रीबियों ने सीताराम केसरी को पहले अध्यक्ष पद से हटाया, फिर कांग्रेस से भी दूर कर दिया.

-इसी तरह 1999 के लोक सभा चुनाव से ठीक पहले शरद पवार, पी.ए. संगमा और तारिक अनवर ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल की नागरिक होने पर सवाल उठाए थे. जिसके बाद इन तीनों नेताओं को पार्टी से बाहर कर दिया गया था.

-1984 में राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री रहे वी.पी. सिंह को भी गांधी परिवार के ख़िलाफ़ बोलना महंगा पड़ा था. उस समय वी.पी. सिंह ने जब बोफोर्स मामले पर सवाल उठाए तो राजीव गांधी ने उन्हें पहले कैबिनेट से बाहर किया और बाद में उन्हें पार्टी से भी निकाल दिया गया.  हालांकि बाद में वी.पी. सिंह कांग्रेस विरोधी पार्टियों के समर्थन से देश के प्रधानमंत्री बने और एक साल तक उन्होंने भारत की सरकार चलाई.

-इस सूची में आरिफ मोहम्मद ख़ान भी हैं, जिन्होंने 1986 के शाह बानो मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के फ़ैसले के आलोचना की थी. इसके बाद आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को भी पार्टी से निकाल दिया गया था.

-अगर इंदिरा गांधी के समय की बात करें तो उनकी राजनीति के दौरान ऐसा दो बार हुआ, जब कांग्रेस संगठन ऊपर से लेकर नीचे तक दो धड़ों में बंट गया और पार्टी को विभाजन का संघर्ष देखना पड़ा.

-वर्ष 1969 में जब तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन का निधन हुआ, तब नए राष्ट्रपति के चुनाव के मुद्दे पर इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी को ही विभाजित कर दिया. उन्होंने पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार नीलम संजीवा रेड्डी की जगह निर्दलीय उम्मीदवार वी.वी गिरी का समर्थन किया और वी.वी. गिरी उनके समर्थन से जीत भी गए. इस वजह से तब इंदिरा गांधी को कांग्रेस से बाहर कर दिया गया और इंदिरा गांधी ने अपने भरोमंद साथियों के साथ मिल कर नई पार्टी बना ली. इस पार्टी का नाम था कांग्रेस R.

-यही नहीं इमरजेंसी हटने के बाद जब 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह हार गई थी तो कांग्रेस के बड़े नेता वाई बी चव्हाण और के. ब्रह्मनंदा रेड्डी ने इंदिरा गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए और इसकी वजह से तब कांग्रेस का बंटवारा हो गया था.

-यही नहीं, भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के दौर में भी कांग्रेस का चरित्र ऐसा ही था. तब 1951 में भारत के पहले कानून मंत्री डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर को इस्तीफा देना पड़ा था और इस इस्तीफे की वजह थी, हिन्दू कोड बिल पर नेहरू का समर्थन नहीं मिलना.

-यही नहीं भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू के बीच भी कई मुद्दों पर टकराव था और इसी वजह से शायद सरदार पटेल को उनकी मृत्यु के 41 वर्षों के बाद मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया.  जबकि जवाहर लाल नेहरु ने ये पुरस्कार प्रधानमंत्री रहते हुए ही खुद को दे दिया था.  ये बात 1955 की है

कांग्रेस के डबल स्‍टैंडर्ड्स 

आज हम कांग्रेस के Double Standards के बारे में भी आपको बताना चाहते हैं. कांग्रेस के नेता और खुद राहुल गांधी अक्सर लोकतंत्र की बात करते हैं और साम्प्रदायिक राजनीति का विरोध करते हैं लेकिन हकीकत ये है कि कांग्रेस आज पूरी तरह साम्प्रदायिक राजनीति में लिप्त है.

-जम्मू और कश्मीर में कांग्रेस का नेशनल कॉन्‍फ्रेंस और महबूबा मुफ़्ती की PDP के साथ गठबंधन है.  यही नहीं कांग्रेस हाल ही में बने गुपकार अलायंस का भी हिस्सा है, जिसका मकसद जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल कराना है.

-पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने Indian Secular Front के साथ गठबंधन किया है, जो साम्प्रदायिक राजनीति करती है.

-असम में कांग्रेस का गठबंधन AIUDF के साथ है, जो मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करती है.

-केरल में Indian Union Muslim League के साथ कांग्रेस का राजनीतिक रिश्ता है और ये वही मुस्लिम लीग पार्टी है, जिसने 1947 में भारत के बंटवारे की नींव रखी थी.

-आंध्र प्रदेश में 2012 तक कांग्रेस का असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM पार्टी के साथ गठबंधन था.

-कर्नाटक में 2018 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने SDPI के साथ अनौपचारिक गठबंधन किया था, जिसके तहत SDPI ने कांग्रेस के खिलाफ़ अपने सभी उम्मीदवारों को वापस ले लिया था. ये पार्टी उसी Popular Front of India की एक इकाई है, जिस पर दिल्ली में दंगे भड़काने सहित कई गंभीर आरोप हैं.

-और पंजाब में भी एक समय शिरोमणि अकाली दल को कमज़ोर करने के लिए कांग्रेस ने खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को समर्थन दिया था और उस समय ऐसा करना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सबसे बड़ी भूल थी.

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