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जनादेश 2022: विपक्ष के लिए करो या मरो

up spयह जंग कितनी बड़ी है, और किस कदर यह समूचे देश की सियासत को प्रभावित करने की ताकत रखती है, इसका अंदाजा इसकी तैयारियों से ही लग जाता है। केंद्र जिन तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को अपनी आन-बान का सवाल बना चुका था और जिसे आपदा में अवसर की तरह देखा गया था, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों से माफी के साथ वापस ले लिया। अरसे बाद पेट्रोल-डीजल से उत्पाद शुल्क में कमी लाकर राहत देने की फिजा तैयार की गई। फिर दूसरे प्रतीकों को देखें। वाराणसी में काशी विश्वनाथ कॉरीडोर के उद्घाटन और प्रधानमंत्री की गंगा में डुबकी का ऐसा भव्य आयोजन हुआ कि देश ही नहीं, दुनिया देखती रह गई। उत्तर प्रदेश में ही पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के उद्घाटन को विशेष बनाने के लिए वायु सेना ने हवाई करतब दिखाए। ऐसा ही भव्य सैन्य आयोजन झांसी में हुआ। यही नहीं, केंद्र में मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के पहले फेरबदल में पिछड़ी जातियों और दलितों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया तो बाकायदा जातिवार सूची जाहिर हुई। तैयारियां सत्ता पक्ष में ही नहीं, विपक्ष के खेमे में भी खूब हुईं और कोरोना महामारी के दौर में पहली बार उसके नेता खुलकर सड़कों पर उतरे और अपनी रणनीतियों के सार-संजाम जुटाए। इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए कि पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में फरवरी-मार्च के विधानसभा चुनावों में सबसे अहम गंगा के मैदान का हिंदी हृदय प्रदेश ही है। यानी उत्तर प्रदेश महज एक राज्य का चुनाव नहीं, बल्कि केंद्र की सत्ता के लिए भी खास है। यानी यह ‘डबल इंजन’ के लिए महती चुनौती है। यहां से जो हवा बहेगी, उसका असर दूर तलक होगा। आखिर इसी साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे और अगले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ में चुनाव होंगे। उसके बाद तो 2024 के शुरू में लोकसभा के चुनाव होने हैं। यानी ये चुनाव वह सदर दरवाजा हैं, जिनसे आगे की राह खुलेगी। गौरतलब यह भी है कि इनमें से करीब तीन-चौथाई राज्यों में भाजपा सत्ता में है और उसके तकरीबन दो-तिहाई सांसद भी इन्हीं राज्यों से आते हैं। इससे भी स्पष्ट है कि ‘‘डबल इंजन सरकारों’’ की अग्निपरीक्षा का सिलसिला मौजूदा चुनावों से ही शुरू हो रहा है।

परीक्षा सिर्फ इतनी ही नहीं है। इसी वर्ष जुलाई-अगस्त में राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के चुनाव होने वाले हैं। उनमें मौजदा चुनावों, खासकर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में प्रदर्शन काफी मायने रखता है। खासकर इसलिए कि भाजपा या एनडीए के विधायकों की संख्या घटती है तो उसका सीधा असर राष्ट्रपति चुनाव पर पड़ेगा। इसके अलावा जुलाई के पहले ही करीब 73 राज्यसभा सदस्य रिटायर हो रहे हैं। ऐसे में विधायकों की संख्या घटने का सीधा असर राज्यसभा सदस्यों पर पड़ेगी, जिससे राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनाव तो प्रभावित होंगे ही, राज्यसभा में भाजपा या एनडीए की संख्या भी घट जाएगी (देखें राज्य चुनाव तय करेंगे महामहिम)। ये दोनों ही मामले सत्तारूढ़ भाजपा के लिए किसी महा मुकाबले से कम नहीं है, जिसमें हारना वह कतई नहीं झेल सकती। उसे शर्तिया जीत चाहिए और जहां तक संभव है, बड़ी जीत चाहिए। मामूली अंतर से जीत उसे अपनी सियासत का रंग-ढंग बदलने पर मजबूर करेगी और हार से तो उसके सामने बड़ी मुश्किलात आ सकती हैं।

चुनौती इतनी भर नहीं है। भाजपा और संघ परिवार के लिए 2025 का भी खास महत्व है, जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपने गठन का शताब्दी वर्ष मना रहा होगा। यह उसके और उसकी हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए बेहद अहम मुकाम है। उसके तमाम संगठन शताब्दी वर्ष मनाने की भव्य तैयारियां भी कर चुके हैं। इसलिए इन चुनावों में प्रदर्शन फीका रहता है तो भाजपा और संघ परिवार के लिए मायूसी का सबब होगा। उसकी हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए भी यह पहाड़ से ढलान की ओर बढ़ने जैसा होगा। लेकिन इसकी चर्चा से पहले जरा विपक्ष की टोह भी ले ली जाए और फिर चिंता और चुनौती की वजहों पर लौटा जाए।

विपक्ष के लिए तो यकीनन ये चुनाव करो या मरो से भी ज्यादा वजन रखते हैं। देश में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिए तो अपने वजूद में नई जान डालने जैसा है। मौजूदा चुनावों में उत्तर प्रदेश को छोड़कर पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर में मुख्य दावेदार कांग्रेस है। पंजाब में तो उसकी सरकार ही है। पंजाब वह राज्य है, जिसमें 2014 में भी मोदी लहर घुस नहीं पाई थी। 2017 में उस राज्य ने कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता से नवाजा। हालांकि साढ़े चार साल बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह को सरकार से हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला उसके लिए वरदान साबित हुआ या अभिशाप, यह देखना होगा। वहां अमरिंदर सिंह के साथ भाजपा का गठजोड़ तो खास मुसीबत पैदा करता नहीं दिखता, मगर आम आदमी पार्टी और किसान संगठनों का संयुक्त समाज मोर्चा चुनौती का सबब बन सकता है (देखें पंजाब की रिपोर्ट)। अगर कांग्रेस पंजाब में सत्ता गंवा बैठी तो वह अपना एक और गढ़ खो देगी, जो उसे इस सबसे मायूस वक्त में स्फूर्ति देता रहा है। बाकी उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर भी उसके परंपरागत गढ़ की तरह रहे हैं और इन तीनों ही राज्यों में उसके नेताओं को ही बड़े पैमाने पर तोड़कर भाजपा को सत्ता नसीब हुई है। अब सवाल है कि क्या वह अपने इन गढ़ों में वापसी कर सकती है? वापसी नहीं तो कुछ ठीक-ठाक प्रदर्शन भी आने वाले चुनावों में उसे हिम्मत दे सकता है, जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से है।

कांग्रेस के लिए ये चुनाव पार्टी में कांग्रेस नेतृत्व खासकर राहुल गांधी के लिए भी अहम हैं। अगर अच्छा प्रदर्शन हुआ तो उनके लिए पार्टी में उभर रहीं, खासकर जी-23 नेताओं से चुनौतियां भी कम हो जाएंगी और पार्टी अध्यक्ष पद पर दोबारा ताजपोशी भी आसान हो जाएगी, जिसकी संभावना जुलाई-अगस्त में पार्टी के संगठनात्मक चुनावों के साथ जताई जा रही है। उत्तर प्रदेश भी यकीनन कांग्रेस के लिए अहम है, क्योंकि इस प्रदेश में पुनर्जीवन ही उसमें ऐसा दमखम भर सकता है, जिससे वह फिर जी उठे। इस अहम सूबे में इसीलिए प्रियंका गांधी बेहद सक्रिय हैं और अपना कुछ जनाधार, खासकर संगठन आधार खड़ा करने की कोशिश में जुटी हैं। उन्होंने संघर्षशील और महिला उम्मीदवारों को टिकट देकर यह कोशिश तो की है, लेकिन अभी इसमें समय लग सकता है (देखें उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट)। प्रियंका के लिए 2022 के चुनाव 2024 के लोकसभा चुनावों में अपने परिवार की परंपरागत सीट रायबरेली को बचाने और अमेठी को वापस पाने की भी चुनौती है। उनकी यह कोशिश रायबरेली में भी दिख रही है, जहां वे पार्टी से टूटकर भाजपा में गईं मौजूदा विधायक अदिति सिंह के मुकाबले उनकी भाभी को टिकट देने की कोशिश में हैं। यह पूर्व कंग्रेसी नेता अखिलेश सिंह का परिवार है, जिसकी वापसी की कोशिश हो रही है।

उधर, उत्तर प्रदेश बाकी विपक्ष के लिए भी आखिर लड़ाई का मैदान हो गया है, जिसमें कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़नी है। यानी समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, राष्ट्रीय लोकदल के जयंत चौधरी, पिछड़े नेताओं ओमप्रकाश राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, धर्म सिंह सैनी, दारा सिंह चौहान, अपना दल (सोनेलाल) की कृष्णा पटेल, महान दल के केशव मौर्य जैसे तमाम नेताओं के लिए अपनी राजनीति की जमीन दोबारा वापस पाने का सबसे अच्छा मौका लग रहा है। बेशक, यह मौका उसे मोटे तौर पर किसान आंदोलन से उपजी भावना और महंगाई, बेरोजगारी, पिछड़ों और दलितों की कथित उपेक्षा ने मुहैया कराया है। पिछड़ों और दलितों के आरक्षण के मुद्दों पर राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार और केंद्र की मोदी सरकार के ढुलमुल रवैयों से भी यह मामला गरमा गया है।

पिछले कुछ वर्षों में दलितों और दूसरी जातियों के उत्पीड़न की हाथरस जैसी घटनाओं ने भी यह भावना मजबूत की है। यही नहीं, खासकर योगी सरकार की केंद्रीकृत शासन-शैली से भी बसपा-सपा छोड़कर आए भाजपा नेताओं में नाराजगी बढ़ी है। सबसे बढ़कर यह कि खासकर ऊंची जातियों में भी यह भावना घर कर गई या फैलाने की कोशिश की गई कि एक विशेष जाति की ही चल रही है। इसके अलावा लखनऊ में यह मुहावरा भी चल पड़ा था कि टीम-11 का राज चल रहा है, यानी मुख्यमंत्री के अधीन सिर्फ अफसरों का राज है। भाजपा सरकार से इस्तीफा देने वाले मंत्रियों की भी यही शिकायत थी कि उनके पास कोई काम नहीं दिया जाता था।मतलब यह कि सारे समीकरण मुफीद बैठ रहे हैं। अब इस मौके को विपक्ष और खासकर सपा गठजोड़ नहीं भुना पाया तो उसे दूसरा ऐसा मौका मिलना मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि अखिलेश यादव अपने तरकश से ऐसे तीर निकाल रहे हैं, जिससे कई बार भाजपा को उस पर जवाबी कार्रवाई करनी पड़ रही है।

यह भाजपा के लिए हाल के वर्षों में सबसे असहज स्थिति है। अमूमन वह कुछ करती रही है, जिस पर बाकी दल प्रतिक्रिया देते रहे हैं। लेकिन अब हालात यह हैं कि 2014 के बाद बड़े करीने से बनाई गई सभी जातियों की विशाल छतरी की कमानियां टूट रही हैं। सवर्ण, पिछड़ी और दलित जातियों को मिलाकर बनाई गई छतरी के नाते उसे मंडलवादी और दूसरे मध्यमार्गी दलों पर बढ़त हासिल हो गई थी। याद करें जब 2014 में पहली बार नरेंद्र मोदी ने यह कहा कि उन्हें नीच इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि वे पिछड़ी जाति के हैं, तो खासकर हिंदी प्रदेशों में पिछड़ी, अति पिछड़ी और दलित जातियों में भाजपा का आधार व्यापक हुआ। इसी के बूते वह सत्ता में लगातार बनी हुई है। इससे संघ परिवार को अपना विस्तार करने और हिंदुत्ववादी राजनीति को आगे बढ़ाने का भी मौका मिला।इसी राजनीति के तहत भाजपा ने आंबेडकर और तमाम पिछड़े-दलित नेताओं को आत्मसात किया और नेहरू पर हमले तेज कर दिए। रह-रहकर महात्मा गांधी के खिलाफ कट्टर हिंदुत्व संगठनों से उठने वाला उभार भी इसी राजनीति का हिस्सा कह सकते हैं। तो, इन तमाम वजहों से पिछड़ों और दलितों को लाकर व्यापक की गई छतरी में छेद किसी भी पैमाने पर मौजूदा शासक बिरादरी के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश भाजपा के अब तक घोषित उम्मीदवारों की फेहरिस्त में पिछड़ों की तादाद सबसे ज्यादा है।

मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के लिए भी यह अच्छा शगुन नहीं होगा ‌कि पिछड़ों-दलितों में उनके प्रति बेरुखी बढ़े। हाल के कई सर्वे में यह दावा किया गया है कि कोरोना की दूसरी लहर के बाद उनकी लोकप्रियता में भारी गिरावट आई है। यही नहीं, मोदी सरकार को नोटबंदी, जीएसटी जैसे कड़े फैसलों के बाद उभरी नाकामियों से भी निजात दिलाने का काम उत्तर प्रदेश के 2017 के चुनावों ने किया था। इसलिए ये चुनाव उनकी सियासत के लिए शर्तिया बड़ी चुनौती की तरह हैं। पश्चिम बंगाल में चुनावी जंग में पस्त होने के बाद उनकी और भाजपा की छवि पर वैसे भी कुछ बट्टा तो लगा है। इससे उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि भी प्रभावित हो सकती है, क्योंकि उनकी मजबूत नेता की छवि ही विश्व जगत में भी उन्हें मान-मर्यादा दिलाती है।

इसी वजह से भले कोई दलील दे कि तीन केंद्रीय कृषि कानून इसलिए रद्द किए गए कि पिछले साल नवंबर में कुछ उपचुनावों, खासकर हिमाचल प्रदेश के एक संसदीय और तीन विधानसभा उपचुनाव भाजपा हार गई, वे असली मुकाबले के संकेत भर हो सकते हैं, जिससे बड़ी जंग की तैयारी की रणनीति को धार दी जाती। चाहे समाजवादी पार्टी के प्रमुख का यह दावा भले न मानें, लेकिन तय है कि अखिलेश और जयंत की रैलियों में उमड़ती भीड़ और सपा की पिछड़े नेताओं की लामबंदी ने ही कानूनों की वापसी और भाजपा को अपनी चुनावी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है।लब्बोलुआब यह कि ये चुनाव सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए करो या मरो का ऐलान-ए-जंग की तरह हैं। अब यह तो 10 मार्च को ही जनादेश मिलेगा कि सियासत किधर जा रही है।

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