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सात साल पहले दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन ने किया था अयोध्या में जनसर्वे….

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मनोज वर्मा
नई दिल्ली।देश की आजादी के बाद श्रीरामजन्मभूमि को लेकर चले जनआंदोलन में मीडिया की भूमिका अहम रही।अयोध्या के आंदोलन को मिली मीडिया कवरेज ने तथ्यों और जनभावनाओं को अलग अलग स्तर पर  सामने लाने का काम किया।वहीं अयोध्या से जुडी हर घटना को मीडिया में प्रमुखता मिली तो श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन एक वृहद जनआंदोलन के रूप में उभर कर सामने आया।अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं यह जानने के लिए दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन ने भी सात साल पहले  2011—12 में अयोध्या के लोग के बीच जनसर्वे  किया था। दो अलग अलग चरणों में पांच हजार लोग के बीच यह सर्वे  किया गया था। रामजन्मभूमि आंदोलन ने देश की राजनीति और सामाजिक तानेबाने को खासा प्रभावित किया इसलिए दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन ने भी अपने स्तर पर कई कार्यक्रमों का आयोजन किया ताकि समाज में सदभाव बना रहे और लोगों की आस्था और विश्वास के साथ न्याय हो। हाल ही में मन्दिर मस्जिद भूमि विवाद पर सर्वोच्च न्यायालय का जो फैसला आया वह जनभावनाओं के अनुरूप आया, यह तथ्य पत्रकारों के अयोध्या में जनसर्वे और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में कई समानताओं से प्रमाणित भी होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर 2019 को अयोध्या मामले में जो फैसला सुनाया उसे मीडिया में वृहद संतुलित कवरेज मिली। सात साल पहले दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के अयोध्या मुदृे पर किए गए जनसर्वे पर एक नजर…..  (फाइल फोटो — अयोध्या में सर्वे के दौरान के फोटो )

जनसर्वे में 93 फीसदी अयोध्यावासियों ने किया था भूमि बंटवारे का विरोध

लोग ने सर्वे में कहा था जहां रामलला विराजमान हैं वही रामजन्मभूमि हैं

पांच हजार लोगों के बीच दो चरणों में किया गया था सर्वे
सर्वोच्च न्यायालय का फैसला अयोध्यावासियों की जनभावना के अनुरूप
कई बिन्दुओं पर पत्रकारों के जनसर्वे और सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में समानताएं

DJAAyodhyaसर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने ऐतिहासिक निर्णय में कहा कि जहां रामलला विराजमान हैं मन्दिर वहीं बनेगा। कारण उसी विवादित स्थान का हिन्दू रामजन्मभूमि मानते आए हैं। इतना ही नहीं सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए रामलला जहां विराजमान हैं उस भूमि पर न तो निर्मोही आखडे को कोई हिस्सा दिया और न ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को। सर्वोच्च न्यायालय ने मस्जिद,मन्दिर स्थल से कहीं दूर अलग अन्य स्थान पर बनाने का फैसला सुनाया।सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में जहां पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण माना वहीं रामजन्मभूमि को लेकर लोगों की आस्था और मान्यताओं का उल्लेख भी अपने फैसले में किया। (फाइल फोटो- वरिष्ठ पत्रकार श्री राजेन्द्र प्रभु,श्री राम बहादुर और श्री आलोक मेहता की मौजूदगी में दिल्ली में अयोध्या और मीडिया विषय पर पत्रकारों की गोष्ठी का आयोजन  किया गया था )

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला आया था।जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुरातत्व रिपोर्ट, साक्ष्य,आस्था और दस्तावेजों के आधार पर यह माना था कि जहां रामलला विराजमान हैं वही जन्मभूमि हैं। जहां पर बाबरी ढांचा था उसके नीचे मन्दिरनुमा संरचना है। पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बांट दिया था। एक हिस्सा रामलला विराजमान को, दूसरा हिस्सा निर्मोही आखडे को और तीसरे हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया था। लेकिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद भूमि के तीन हिस्सों में बंटवारे का मुदृा विवाद कारण बन गया और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट पक्षकार न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए। देशभर में यह सवाल भी उठने लगा कि विवादित भूमि को लेकर अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं। लिहाजा दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन ने मीडिया एसोसिएशन फॉर सोशल सर्विस,उत्तर प्रदेश जर्नलिस्टस एसोसिएशन की फैजाबाद अयोध्या इकाई और अयोध्या फाउंडेशन नामक संस्थाओं के साथ मिलकर वर्ष 2011—12 में दो अलग अलग चरणों में अयोध्या के स्थानीय लोगों के बीच सर्वे किया। लोगों से लिखित फार्म भरवाकर सर्वे का काम किया गया। सर्वे के तहत पहले सवाल तो यही लोगों से पूछा गया था कि विवादित भूमि पर अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं? वहां मन्दिर बने या कुछ और? जहां रामलला विराजमान हैं क्या वहीं जन्मस्थान है? अयोध्या का मुद्दा राजनीतिक है या आस्था का? राजनीतिकरण के लिए कौन जिम्मेदार है? इलाहाबाद हाई कोर्ट के तीन हिस्सों में भूमि बंटबारे के फैसले से  संतुष्ट हैं या असंतुष्ट? इन सवालों के साथ अयोध्या के विभिन्न वर्गो के पांच हजार लोगों के बीच इस सर्वे को किया गया था।

20191112_223520 (1)दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के अयोध्या में किए गए सर्वे के करीब सात साल बाद अब जब सर्वोच्च न्यायालय का कानूनी फैसला सामने आया तो जनभावना के अनुरूप आया।कई बिन्दुओं पर पत्रकारों के जनसर्वे और न्यायालय के फैसले में में एक सी राय निकली मसलन…

1 अयोध्या के लोगों से यह सवाल किया था कि अयोध्या के लोग क्या चाहते हैं? वहां मन्दिर बने या मस्जिद या कुछ और?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय- 95 फीसदी लोगों ने कहा कि जहां रामलला विराजमान हैं वही उसी स्थान पर राम मन्दिर  है। चार फीसदी लोगों ने सर्वधर्म स्थल के निर्माण की बात कहीं थी तो एक फीसदी ने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया।

2  अयोध्या के लोगों से सवाल पूछा गया था कि जहां रामलला विराजमान हैं क्या वहीं रामजन्मस्थान है? यह मुदृा आस्था का है या राजनीति का?  

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय— 98 फीसदी लोग ने सर्वे में कहा था कि जहां रामलला विराजमान हैं वह उसे ही रामजन्मभूमि मानते हैं। जबकि 98 फीसदी लोग ने अयोध्या के मुद्दे को आस्था का विषय बताया था। जबकि मात्र दो फीसदी लोगों ने इसे राजनीतिक मुद्दा बताया था

20191112_222528 (1)3 सर्वे में लोगों से पूछा गया था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के विवादित भूमि को रामलला विराजमान, निर्मोही आखडे और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच तीन हिस्सों में बांटने के फैसले से संतुष्ट हैं या असंतुष्ट ?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय— सर्वे में 93 फीसदी अयोध्यावासियों ने भूमि बंटवारे के इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर असहमति जताई थी।लोगों ने सर्वे में भूमि के तीन हिस्सों में बंटवारे के खिलाफ राय दी थी । भूमि बंटवारे को न्याय की दृष्टि से उचित नहीं माना था।

4 सर्वे में अयोध्यावासियों से यह भी पूछा गया था कि वे विवाद का समाधान कैसे चाहते हैं कानून से, वार्ता से या किसी और प्रकार से?

दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे में लोगों की राय—  42 फीसदी लोग ने जहां कानून से फैसले की बात कहीं थी तो 40 फीसदी लोग ने वार्ता के जरिए विवाद को सुलझाने के पक्ष में अपनी राय दी थी। 18 फीसदी  ने किसी भी तरह से समाधान की बात कही थी।

 

जाहिर है न्यायपालिका और मीडिया लोकतंत्र के दो मजबूत आधार स्तंभ हैं और लोकतंत्र में जब न्यायपालिका और मीडिया तटस्था और पारदर्शिता के साथ अपना अपना दायित्व निभाते हैं तो अयोध्या जैसे मामलों के समाधान भी निकल आते हैं।अयोध्या पर पत्रकारों की प्रमुख संस्था दिल्ली जर्नलिस्टस एसोसिएशन के सर्वे के रूप में जनभावना का प्रकटीकरण कानूनी फैसले के रूप में भी स्पष्ट दिखाई दिया। यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया की विश्वनियता को भी प्रमाणित करता है।

 

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