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भारत में इस्लाम को कोई खतरा नहीं, लिंचिंग करने वाले हिन्दुत्व के खिलाफ: मोहन भागवत

देश में समान नागरिक संहिता हो; दिल्ली हाईकोर्ट

सच बात—देश की बात

” देश में गृह युद्ध छेड़ने का खतरनाक प्रयोग था दिल्ली दंगा ”

delhi roits 1नई दिल्ली। सिक्किम हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश जस्टिस प्रमोद कोहली और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एमसी गर्ग ने दिल्ली दंगों के पीछे सुनियोजित साजिश होने का दावा करती  किताब  एनाटॉमी ऑफ ए प्लान्ड रॉयट्स  का विमोचन किया। इस अवसर पर रिटायर्ड जस्टिस कोहली ने कहा कि जम्मू कश्मीर से होने के नाते वो जानते हैं कि दंगा क्या होता है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में बहन-बेटियों की अस्मत लूटी गई।तमाम लोगों की हत्याएं हुईं। दिल्ली दंगा पीड़ितों की दास्तां सुनकर ऐसा लग रहा है कि इनके साथ इंसाफ नहीं हो रहा है। हम न्याय और आर्थिक सहायता के लिए पीड़ित लोगों की बात सरकार तक पहुंचाएंगे। वहीं दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एमसी गर्ग ने कहा कि वे दिल्ली दंगा के पीड़ित परिवारों की लड़ाई लड़ेंगे।लेखक और वरिष्ठ टीवी पत्रकार मनोज वर्मा द्वारा लिखी गयी किताब  एनाटॉमी आफ ए प्लांड रायट पुस्तक दिल्ली में हुए दंगों पर शोध आधारित तथ्यात्मक सामग्री है।यश पब्लिकेशन ने इसे प्रकाशित किया है। यह पुस्तक दंगे की खतरनाक अर्बन नक्सल-जिहादी गठजोड़ को परत दर परत खोलती है। यह किताब दंगों के पीछे की एक बड़ी साजिश का खुलासा करने का दावा करती है. महापात्रा जहां सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं, मनोज वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं और मौजूदा समय में लोकसभा टीवी के लिए काम कर रहे हैं.इस किताब, में कहा गया है, ‘घोषित तथ्यों से हमने जो पाया….उसके मुताबिक सीएए विरोधी प्रदर्शन और दिल्ली दंगों का घटनाक्रम पूरी तौर पर एक-दूसरे से जुड़ा है. इसके मुताबिक, ‘दंगों और प्रदर्शनों में आगे नजर आने वाले चेहरे दरअसल शतरंज के मोहरों की तरह हैं जिन्हें नियंत्रित करने वाले राजा या वजीर सामान्य तौर पर पर्दे के पीछे ही रहते हैं.’ इसमें कहा गया है, ‘सावधानी से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि रेडिकल इस्लामिक धीरे-धीरे भारतीय जमीन में अपनी राह बनाने की कोशिश कर रहे हैं.’ इसमें आगे कहा गया है, ‘विभिन्न चरमपंथी इस्लामी संगठनों के ऐलान यह बताते हैं कि आने वाले समय में विलायत-ए-हिंद या गजवा-ए-हिंद की स्थापना का सपना काफी समय से देखा जा रहा है. कश्मीर में प्रदर्शन की शुरुआत से लेकर केरल में कट्टरता फैलाने तक और फिर पूरी मजबूती से सीएए विरोधी हिंसा को आर्थिक और वैचारिक समर्थन ने इसमें संदेह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि खिलाफत स्थापित करने की पुरजोर कोशिशें जारी हैं. भारत के एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते क्या हम अभी भी यह नहीं समझ पा रहे कि भारत विरोधी इन ताकतों का असली मकसद क्या है? क्या हमें अब भी अपने राष्ट्र, अपनी संस्कृति और अपने धर्म पर आसन्न खतरों के प्रति अनजान बने रहना चाहिए.’गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लेकर जारी विरोध के बीच ही पिछले साल 23 फरवरी को उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़क उठे थे, जिस दिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक दिन की आधिकारिक यात्रा पर राष्ट्रीय राजधानी पहुंचे थे. हालिया वर्षों में हिंसा की सबसे घटनाओं में से एक माने जाने वाले इन दंगों के दौरान 53 लोग मारे गए और 500 से अधिक घायल हुए.दिल्ली पुलिस ने इस मामले में 700 से ज्यादा एफआईआर दर्ज की हैं और हिंसा में कथित भूमिका के लिए 200 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है.

देश में गृह युद्ध छेड़ने का खतरनाक प्रयोग था दिल्ली दंगा -मनोज वर्मा

delhi roits 2लेखक और वरिष्ठ टीवी पत्रकार मनोज वर्मा द्वारा लिखित किताब का विमोचन
किताब के लेखक और वरिष्ठ टीवी पत्रकार मनोज वर्मा ने बताया कि एनोटोमी आफ ए  प्लांड  रायट को लिखने के पीछे उन तथ्यों को लोगों के सामने लाना है जो यह साबित करता है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे संयोग नहीं भारत विरोधी प्रयोग थे और इसकी प्रयोगशाला बनी दिल्ली।सीएए विरोध के नाम पर दिल्ली में हिंसक प्रदर्शन,दंगे,पुलिस कर्मियों पर हमले गृह युद्ध जैसा प्रयोग थे। इस प्रयोगशाला में नफरत थी। हार की हताश थी और राष्ट्र हित में एक एक कर हो रहे फैसलों से उपजी कुंठा  थी। यह हताशा थी 2019 के चुनाव परिणाम की। दिल्ली का दंगा सामान्य दंगा नहीं था। भारत विरोधी षडयंत्र था। इसके तीन कोण नजर आते हैं पहला देश के खिलाफ षडयंत्र, दूसरा देश की लोकतांत्रिक संसदीय और संवैधानिक व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह और तीसरा मीडिया। यह घटना  मीडिया के एक वर्ग की फेक नकारात्मक भूमिका की ओर संकेत करता है दिल्ली के दंगों के पीछे अंतर्राष्ट्रीय साजिश थी। साजिश कई महीने पहले रची गई थी।

योजनाबद्ध तरीके से कराए गए दंगे -संदीप महापात्रा(लेखक एवं अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट)

delhi roits 3किताब  के दूसरे लेखक सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संदीप महापात्रा ने बताया कि जब कोर्ट में सीएए को लेकर 150 से ज्यादा पिटिशन लगी हुई थी, तो उस समय योजनाबद्ध तरीके से कराए गए दंगे कानून को प्रभावित करने की कोशिश थी।वहीं अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने कहा कि जिस तरह दिल्ली में दंगे भड़काए गए, उसी तरह इस साल कृषि कानूनों को लेकर भी किसानों को भड़काया जा रहा है। ग्रेटा थनबर्ग की टूलकिट अगर बाजार में नहीं आई होती तो फिर से दिल्ली दंगों जैसी स्थिति पैदा हो सकती थी। दिल्ली दंगों और किसान आंदोलन के बीच काफी समानता है।दोनों में एक ही तरह का नेतृत्व काम कर रहा है। इन दोनों आंदोलनों में कई चेहरे एक जैसे हैं।फॉर जस्टिस के संयोजक नीरज अरोड़ा ने दिल्ली दंगों की साजिश और उसके कारणों के बारे में विस्तार से बताया।

दंगों के बारे में बताएंगे साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ

दिल्ली में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पुस्तक के विमोचन और पब्लिक हियरिंग के अलावा जाने-माने साइबर फोरेंसिक एक्सपर्ट नीरज अरोड़ा भी सीएए विरोधी प्रदर्शनों और कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन के बीच संबंध होने पर अपनी बात रखने वाले हैं.अरोड़ा एक गैरसरकारी संगठन कॉल फॉर जस्टिस से जुड़े हैं, जिसने दिल्ली के दंगों पर अपनी तथ्यात्मक रिपोर्ट पिछले साल केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सौंपी थी.रिपोर्ट एक फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने तैयार की थी जिसकी अध्यक्षता बांबे हाईकोर्ट के एक सेवानिवृत्त जज जस्टिस अंबादास जोशी ने की थी और इसके अन्य सदस्यों में शामिल थे सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी एम.एल. मीणा, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी विवेक दुबे, एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. टी.डी. डोगरा और सोशल इंटरप्रेन्योर नीरा मिश्रा. अरोड़ा समिति के सदस्य सचिव थे.

दिल्ली में पिछले साल फरवरी महीने में हुए दंगों पर लिखी गई ‘दिल्ली दंगे- साजिश का खुलासा’ शीर्षक से किताब लॉन्च हो चुकी है। इस किताब में उत्तर-पूर्व Delhi-riots-book-दिल्ली में 23 फरवरी 2020 से लेकर 26 फरवरी 2020 तक घटी घटनाओं का जिक्र किया गया है। किताब के संपादक आदित्य भारद्वाज और आशीष कुमार अंशु हैं। उन्होंने इस किताब के जरिए लोगों को बताने की कोशिश की है कि किस तरह से सुनियोजित तरीक से देश की राजधानी को जलाने की तैयारी की गई थी। किताब के लेखक आदित्य भारद्वाज ने इसे लेकर कहा – “किताब में आप को साजिश का पता चलेगा, पुलिस चार्जशीट में भी यही तथ्य सामने आ रहे हैं, इस किताब को पढ़कर आप खुद ये भी सोच सकेंगे कि अगर आप उस इलाके की भौगोलिक परिस्थिति में रह रहे हैं तो क्या करें, जो संकट की घड़ी में काम आए। दिल्ली में दंगे सुनियोजित तरीके से हुए।”मोनिका अरोड़ा ने कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि जिस तरह दिल्ली दंगे भड़काए गए। उसी तरह इस साल कृषि कानूनों को लेकर भी किसानों को भड़काया जा रहा है। ग्रेटा थनबर्ग की टूलकिट यदि बाजार में नहीं आई होती तो फिर से दिल्ली दंगों जैसी स्थिति पैदा हो सकती थी। यह शुक्र है कि इस बार ऐसा नहीं हो पाया है। दिल्ली दंगों और किसान आंदोलन के बीच काफी समानता है। दोनों में एक ही तरह का नेतृत्व काम कर रहा था। इन दोनों आंदोलनों में कई चेहरे एक जैसे हैं।पत्रकार आदित्य भारद्वाज ने बताया कि, वो खुद उस इलाके में रहते हैं जहां ये दंगे हुए थे। उनके मुताबिक दंगों की प्लानिंग बहुत ही बेहतर तरीके से की गई थी। दंगा उस समय शुरू किया गया, जब घरों में पुरूष नहीं थे। जबकि जिन दुकानों और जगहों पर हमला किया जाना था, वो पहले से ही तय किया गया था। उसके लिए सारे हथियारों का बंदोबस्त भी किया गया था।

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