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किसान आंदोलन की आड़ में हिंसा और दंगा फैलाने की योजना….

yogaendr yadav tikkat firआपको याद होगा, जब नए नागरिकता कानून को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे थे तब उसमें भी एक खास धर्म के लोगों को जोड़ दिया गया था और उन्हें ये कहकर डराया गया था कि उनकी नागरिकता चली जाएगी  और इस आंदोलन में भी एक खास धर्म और एक खास क्षेत्र के लोगों को ये कहकर डराया जा रहा है कि उनकी ज़मीनें छीन ली जाएंगी.  ये वो फॉर्मूला है जिसका इस्तेमाल वामपंथी और देश विरोधी ताकतें आज से नहीं, बल्कि देश की आजादी के बाद से ही करती आ रही हैं और अब इसी डर के सहारे चीन को फायदा पहुंचाने की भी कोशिश हो रही है.

किसान आंदोलन  की आड़ में भारत को बदनाम करने की विदेशी साजिश का खुलासा हुआ है. दिल्ली पुलिस  ने किसान आंदोलन और ट्रैक्टर परेड में हुई हिंसा के पीछे पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन (Poetic Justice Foundation) का हाथ बताया है. ये फाउंडेशन खालिस्तान समर्थक है. 

अंतरराष्ट्रीय साजिश का खुलासा कर दिया, जो भारत को तोड़ने के लिए महीनों से चल रही है.

दरअसल, खुद को पर्यावरण कार्यकर्ता बताने वाली ग्रेटा थनबर्ग ने गलती से दूसरी बार उस अंतरराष्ट्रीय साजिश का खुलासा कर दिया, जो भारत को तोड़ने के लिए महीनों से चल रही है. ग्रेटा ने 2 जनवरी को किसान आंदोलन के समर्थन में एक ट्वीट किया था. इस ट्वीट में उन्होंने कहा था, ‘हम भारत में जारी किसान आंदोलन के साथ एकजुटता के साथ खड़े हैं.’इस ट्वीट के बाद ग्रेटा थनबर्ग ने एक और ट्वीट किया और गलती से उन्होंने सोशल मीडिया पर एक डॉक्यूमेंट शेयर कर दिया. इस डॉक्यूमेंट में किसान आंदोलन के नाम पर 26 जनवरी की हिंसा से लेकर 6 फरवरी को होने चक्काजाम के नाम पर अंतरराष्ट्रीय साजिश का पूरा ब्योरा था. ये ग्रेटा की पहली गलती थी, जिसका कुछ ही देर में ग्रेटा को अहसास हुआ और उन्होंने किसान आंदोलन पर टूलकिट वाला डॉक्यूमेंट डिलीट कर दिया. लेकिन इसके बाद ग्रेटा ने फिर एक गलती की. उन्होंने एक और ट्वीट किया और इस ट्वीट ने किसान आंदोलन के नाम पर बहुत

बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश का खुलासा कर दिया.

ग्रेटा ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘अगर आप भारत के लोगों की मदद करना चाहते हैं, तो ये अपडेटेड टूलकिट है. पिछला टूलकिट हटा दिया गया. क्योंकि वो पुराना टूलकिट था. इस ट्वीट में #StandWithFarmers और #FarmersProtest के साथ एक लिंक और शेयर किया था, और ये लिंक ही किसान आंदोलन के नाम पर सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश की तह में ले गया. ग्रेटा थनबर्ग ने सोशल मीडिया पर जो लिंक शेयर किया है, उसपर क्लिक करने से एक पेज खुला. उस पेज में किसान आंदोलन के बारे में कुछ बातों के अलावा #AskIndiaWhy भी दिया गया था. #AskIndiaWhy को कॉपी करने के बाद हमने इसके बारे में Google पर जानकारी ढूंढनी शुरू की. तो हमें AskIndiaWhy नाम से एक वेबसाइट मिली.#AskIndiaWhy की वेबसाइट के मुख्य पेज पर 26 जनवरी को दिल्ली हिंसा के समर्थन में कुछ बातें लिखी हुई थीं. वेबसाइट पर एक संगठन पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन का नाम लिखा था. पोएटिक जस्टिस फाउंडेशन के बारे में Google पर जब हमने जानकारी जुटाने की कोशिश की, तो हमें इस नाम से एक वेबसाइट और वेबसाइट पर एक लिंक मिला. ये लिंक ही भारत के खिलाफ सबसे बडी साजिश का दस्तावेज है. इस लिंक में सुबूत है कि 26 जनवरी को हुई दिल्ली हिंसा भारत के खिलाफ एक अंतरराष्ट्रीय प्लान था और ये लिंक सुबूत है कि किसान आंदोलन के नाम पर भारत को तोड़ने की बड़ी तैयारी हो रही है.

किसान आंदोलन के ज़रिए देश विरोधी ताकतें देश को कैसे कमज़ोर करना चाहती हैं. हक़ के लिए चलाए जा रहे एक आंदोलन में अचानक टुकड़े टुकड़े गैंग, JNU गैंग, अवाॅर्ड वापसी गैंग और अर्बन नक्सलियों की एंट्री कैसे हो गई है ये समझने के लिए आपको इतिहास में थोड़ा पीछे चलना होगा.

आज से करीब सवा दो सौ साल पहले भारत में अंग्रेज़ों के शासन की शुरुआत हुई थी. उससे पहले दुनिया की GDP में भारत की हिस्सेदारी करीब 25 प्रतिशत हुआ करती थी और इसमें सबसे बड़ी भूमिका भारत के किसानों की थी. भारत के किसान जो भी उगाते थे. उसकी मांग पूरी दुनिया में हुआ करती थी लेकिन जब 1947 में अंग्रेज़ भारत से गए तब दुनिया की GDP में भारत की हिस्सेदारी घटकर 4 प्रतिशत से भी कम हो गई थी और सबसे बुरा हाल देश के किसानों का था.क्या आप जानते हैं कि दो सौ वर्षों में ऐसा क्या हुआ कि देश के साथ-साथ भारत का खुशहाल किसान भी बदहाल हो गया. हुआ ये था कि अंग्रेज़ों ने भारत के लोगों में फूट डाल दी थी. धर्म के नाम पर लोग आपस में लड़ने लगे थे. मौके का फ़ायदा उठाकर अंग्रज़ों ने किसानों का ज़बरदस्त शोषण शुरू कर दिया और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ क्रांति कमज़ोर पड़ने लगी थी.देश को बांटने वालों ने क्रांति में नफ़रत की मिलावट कर दी थी और इसमें अंग्रेज़ों का साथ दे रहे थे वो लोग, जो देश के टुकड़े टुकड़े करना चाहते थे और आख़िरकार 15 अगस्त 1947 को देश के ओरिजनल टुकड़े टुकड़े गैंग का सपना पूरा हो गया और भारत दो हिस्सों में बंट गया. लेकिन आज दो सौ वर्षों के बाद भी स्थिति बदली हुई नहीं लग रही है. देश का किसान सड़कों पर आंदोलन कर रहा है और किसानों की क्रांति को कमज़ोर करने के लिए इस आंदोलन में वर्तमान भारत के टुकड़े टुकड़े गैंग की एंट्री करा दी गई है. इस किसान आंदोलन को शाहीन बाग में बदला जा रहा है. दिल्ली के पास बहादुर गढ़ से एक तस्वीर सामने आई है. इस तस्वीर में किसान आंदोलन वाली जगह पर आप उन लोगों के पोस्टर्स देख सकते हैं जो देश को नुकसान पहुंचाने के आरोप में इस समय देश की अलग अलग जेलों में बंद हैं. इनमें टुकड़े टुकड़े गैंग के लोग भी शामिल हैं JNU को देश विरोधी ताकतों का गढ़ बनाने वाले लोग भी हैं

अर्बन नक्सली भी हैं, दिल्ली दंगों की साज़िश करने वाले भी हैं, खालिस्तानी भी हैं, अवाॅर्ड वापसी गैंग भी है, नए नागरिकता कानून का विरोध करने वाले भी हैं और कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने का विरोध करने वाले भी हैं. इनमें उमर ख़ालिद, शरजील इमाम, वरवरा राव, जीएन साईं बाबा, और सुधा भारद्वाज जैसे CAA-NRCprotestलोगों के नाम शामिल हैं. ज़्यादातर पर Unlawful Activities (Prevention) Act यानी UAPA के तहत आरोप दर्ज़ हैं. किसी पर भीमा कोरोगांव में हिंसा भड़काने का आरोप है तो कई दिल्ली दंगों की साज़िश के आरोप में जेल में बंद है. ज़ाहिर है इनमें से ज़्यादातर लोग देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं लेकिन इसे नज़रअंदाज़ करते हुए भोले भाले किसानों के हाथ में इनकी तस्वीरों वाले पोस्टर्स पकड़ा दिए गए. संभव है कि इनमें से ज़्यादातर किसानों को शायद अंदाज़ा भी नहीं होगा कि जिन लोगों की रिहाई की मांग वो कर रहे हैं उन पर कितने गंभीर आरोप हैं.10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस था और तर्क दिया जा रहा है कि इसी मौके पर जेल में बंद इन लोगों की रिहाई की मांग, इन पोस्टर्स के ज़रिए की गई थी. हालांकि जिन किसान आंदोलन वाली जगहों पर ये पोस्टर्स लगाए गए थे. उन किसान संगठनों का कहना है कि ये कोई राजनैतिक कदम नहीं है जबकि सिंघु बॉर्डर पर मौजूद किसान संगठनों का कहना है कि उन्हें ये जानकारी नहीं है कि इन पोस्टर्स का मकसद क्या था? लेकिन कुल मिलाकर किसानों के इस आंदोलन में बात बात पर प्रदर्शन करने वाले उन परजीवी प्रदर्शनकारियों की एंट्री हो चुकी है जो देश के हर आंदोलन को शाहीन बाग में बदलना चाहते हैं. ये ऐसे परजीवी हैं जो हर आंदोलन की सवारी करने लगते हैं और आंदोलन कर रहे किसानों को शायद इस बात का एहसास भी नहीं होगा कि ये लोग देश के लिए खून पसीना बहाने वाले किसानों का खून चूसकर खुद को शक्तिशाली बना रहे हैं.एक तरफ़ देश विरोधी ताक़तें इस आंदोलन को हाईजैक करने का प्रयास कर रही हैं तो दूसरी तरफ़ इस आंदोलन के नाम पर देश के लोगों को बंधक बनाया जा रहा है.

 

आंदोलन की आड़ में हिंसा और दंगा फैलाने की योजना
अलगाववादी ताकतें इस आंदोलन की आड़ में हिंसा और दंगा फैलाने की योजना बना रही हैं और ऐसी आशंका है कि आने वाले कई दिनों में देश भर में हिंसक घटनाएं हो सकती हैं, ये ठीक वैसा ही है जैसा नागरिकता कानून के बाद दिल्ली दंगों के दौरान हुआ था. इसलिए आज हम पूरे देश को और सरकार को भी सावधान करना चाहते हैं. लेकिन ये योजना कैसे बनाई जा रही है इसका जवाब आपको दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर नहीं बल्कि दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर दुनिया के अलग-अलग देशों में मिलेगा.

ब्रिटेन के बर्मिंघम में खालिस्तानी समर्थकों की रैलियां
कनाडा और अमेरिका में कैसे खालिस्तानी समर्थक किसानों के सपोर्ट में रैलियां निकाल रहे हैं. ये हम आपको दिखा चुके हैं. लेकिन आपको ब्रिटेन के बर्मिंघम शहर से आई कुछ तस्वीरें देखनी चाहिए. यहां भी कल किसानों के समर्थन में रैलियां निकाली गईं और यहां भी इन रैलियों में खालिस्तान के झंडे नज़र आए. एक ट्रक पर तो कृषि कानूनों के साथ-साथ वर्ष 1984 के सिख दंगों का भी ज़िक्र था और इस पर भी खालिस्तान का झंडा लगा हुआ था, जब ये रैली निकाली जा रही थीं, तब बर्मिंघम की सड़कों पर पुलिस भी मौजूद थी. लेकिन किसी ने इन खालिस्तानियों को रोका नहीं. इतना ही नहीं, इन लोगों ने वहां भारत के उच्चायोग को भी बंद कराने की कोशिश की.बर्मिंघम, ब्रिटेन का एक ऐसा शहर है जहां 200 से भी ज़्यादा देशों से आए लोग रहते हैं. अभी यहां कि बहुसंख्यक आबादी अंग्रेज़ों की है. लेकिन कहा जा रहा है कि जल्द ही यहां रहने वाले अंग्रेज़ी मूल के लोग अल्पसंख्यक बन जाएंगे. वर्ष 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक बर्मिंघम की 42 प्रतिशत आबादी आज की तारीख़ में ग़ैर ब्रिटिश है. जिनमें से 21 प्रतिशत मुसलमान हैं और इनमें भी सबसे ज़्यादा संख्या पाकिस्तान और बांग्लादेश से आए मुसलमानों की है.

खालिस्तान को सबसे ज़्यादा मदद पाकिस्तान से
अब आप इस कनेक्शन को समझिए, खालिस्तान को सबसे ज़्यादा मदद पाकिस्तान से ही मिलती है और बर्मिंघम में इतनी बड़ी संख्या में पाकिस्तानी मूल के लोगों की मौजूदगी ये साफ़ करती है कि वहां अब इन्हें रोकने वाला कोई नहीं है और इसीलिए अब इस शहर की सड़कों पर खुले आम खालिस्तान के झंडे लहराए जा रहे हैं.ऐसा ही कुछ इन दिनों कनाडा  में हो रहा है. जहां बड़ी संख्या में खालिस्तान समर्थक रहते हैं और इन्हें कनाडा की सरकार का संरक्षण भी हासिल है.

सोशल मीडिया पर खालिस्तान के लिए हमदर्दी
इस बीच महाराष्ट्र पुलिस की साइबर सेल ने ये ख़ुलासा किया है कि पिछले 15 दिनों में किसान आंदोलन के नाम पर सोशल मीडिया पर करीब 13 हज़ार ऐसे पोस्ट लिखे गए हैं जिनमें खालिस्तान का ज़िक्र है, जिनमें खालिस्तान के लिए हमदर्दी दिखाई गई है या फिर खालिस्तान की मांग की गई है.इससे आप समझ सकते हैं कि कैसे दुनिया भर के देशों की सड़कों से लेकर सोशल मीडिया पर खालिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा है.

देश को कमज़ोर करने की कोशिश

विरोध प्रदर्शन करना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन इस आंदोलन की आड़ में जिस तरह से देश को कमज़ोर करने की कोशिश हो रही है.  किसानों के आंदोलन की वजह से अब तक सिर्फ पंजाब को ही 30 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. एक और अनुमान के मुताबिक, इस आंदोलन की वजह से पंजाब, हरियाणा, जम्मू कश्मीर और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों को हर दिन औसतन साढ़े तीन हजार करोड़  रुपये का नुकसान हो रहा है. पंजाब में तो इस आंदोलन के दौरान कई टेलीकॉम कंपनियों के टावर्स को भी नुकसान पहुंचाया गया.  प्रदर्शनकारी किसानों ने करीब 1500 टॉवरों की बिजली काट दी और उन्हें क्षतिग्रस्त कर दिया.  भारत में वाहनों का प्रोडक्‍शन भी इस आंदोलन की वजह से प्रभावित हो रहा है. चीन अभी इस मामले में पूरी दुनिया में पहले नंबर पर है, जबकि भारत चौथे नंबर पर है.  दुनिया की बड़ी बड़ी वाहन निर्माता कंपनियां अब ज्यादा से ज्यादा संख्या में भारत में गाड़ियों का निर्माण करना चाहती हैं और चीन से बाहर निकलना चाहती हैं..लेकिन इस आंदोलन की वजह से इस क्षेत्र को बहुत नुकसान हो रहा है. इसी तरह मोबाइल फोन  के निर्माण के मामले में भारत चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है. लेकिन आंदोलन की वजह से इसमें भी बाधा पड़ सकती है.  भारत के छोटे और बड़े व्यापारियों को इस आंदोलन की वजह से पिछले कुछ दिनों में 5 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है. किसी देश में जब इस तरह के आंदोलन होते हैं तो उस देश की अंतरराष्‍ट्रीय छवि पर भी असर पड़ता है और बड़ी बड़ी कंपनियां वहां निवेश करने से बचने लगती हैं.  जाहिर है अगर भारत की छवि को चोट पहुंचेगी तो इसका सबसे ज्यादा फायदा चीन को ही पहुंचेगा. भारत के जो वामपंथी चीन को अपना वैचारिक पूर्वज मानते हैं वो शायद ऐसा ही चाहते हैं इसलिए ये वामपंथी एक बार फिर उसी फॉर्मूले पर काम कर रहे हैं जो इन्होंने वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के दौरान अपनाया था.

नए तरीके आजमा रहा चीन

चीन भी जानता हे कि ये 1962 का नहीं, बल्कि 2020 का भारत है और चीन के लिए भारत से युद्ध जीतना इतना आसान नहीं है.  चीन, लद्दाख और डोकलाम में ऐसा नहीं कर पाया.  इसलिए चीन अब नए तरीके आजमा रहा है और उसने भारत में बैठे अपने एजेंट्स यानी वापमंथियों का रिमोट कंट्रोल चीन ने अब पूरी तरह से अपने हाथ में ले लिया है और वो इनके सहारे बिना युद्ध लड़े भारत को कमज़ोर कर रहा है.वर्ष 1959 में जब भारत की तत्कालीन सरकार ने इस बात का खुलासा किया कि लद्दाख के आस पास चीन भारत की जमीन पर अतिक्रमण कर रहा है तो चीन का विरोध करने की बजाय वामपंथियों ने बिल्कुल चुप्पी साध ली थी और यहां तक कि उस दौरान वापमंथी पार्टियों ने कुछ ऐसे बयान भी जारी किए, जो चीन के तो हित में थे लेकिन भारत की संप्रभुता के लिए खतरा थे. यहां तक कि 60 वर्ष पहले जब चीन की सेना ने तिब्बत पर जबर्दस्ती कब्जा किया तब भी वामपंथियों ने चीन का साथ दिया और कहा कि चीन, तिब्बत के लोगों को अंधकार से बाहर निकालने का काम कर रहा है. यहां तक भी ठीक था लेकिन जब 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया. तब भी कई वामपंथी नेताओं ने भारत की जगह चीन का साथ दिया. यहां तक कि जो वामपंथी भारत के सैनिकों के लिए खून देना चाहते थे या पैसों से भारतीय सेना की मदद करना चाहते थे, उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया. जब कुछ बड़े वामपंथी नेताओं ने इसका विरोध किया तो पार्टी में उनका पद घटाकर उन्हें सज़ा दी गई. यहां तक कि उस समय कई वामपंथी नेता चीन के समर्थन में रैलियां तक कर रहे थे.  1962 के युद्ध में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI चीन का इस तरह से समर्थन कर रही थी कि तत्कालीन सरकार को इस पार्टी के नेताओं को जेल भेजना पड़ा था और इसी बीच CPI टूट गई और CPIM का गठन हुआ.  वामपंथी भारत की जगह चीन का साथ तब दे रहे थे, जब वो भारत में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी थे.  ऐसा लगता है कि आज भी कई वामपंथी चीन को फायदा पहुंचाने के लिए 1962 के फॉर्मूले पर ही काम कर रहे हैं.

लद्दाख में चीन के साथ ताज़ा सीमा विवाद अब भी पूरी तरह से सुलझा नहीं है और दोनों देशों की सेनाओं ने भीषण ठंड के बावजूद सीमा पर डेरा डाला हुआ है.  ऐसे में भारत के सैनिकों को लगातार रसद पहुंचाया जाना जरूरी है. लद्दाख में तैनात सैनिकों तक रसद पहुंचाने के लिए पंजाब के रास्ते ही जाना होता है.  लेकिन आंदोलन के नाम पर तमाम रास्तों को बंद किया जा चुका है और यहां तक कि ट्रेनों को भी नहीं चलने दिया जा रहा. इस बात का जिक्र कुछ दिनों पहले देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने किसानों के नाम अपनी एक चिट्ठी में भी किया था.  अब देश के लोगों को सोचना चाहिए कि अगर चीन के साथ सीमा पर तैनात सैनिकों के पास खाने पीने का सामान और कपड़े नहीं पहुंचेंगे तो इसका सबसे ज्यादा फायदा किसे होगा ? इस सवाल का जवाब भी चीन ही है.

वामपंथी कैसे अपने फायदे के लिए इस आंदोलन को हाईजैक कर रहे हैं. इसका जिक्र कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भाषण में भी किया था. कहा जाता है कि 1962 के युद्ध के दौरान अगर चीन और रूस  के रिश्ते अच्छे होते, तो शायद अपने देश का साथ देने वाले वामपंथियों की संख्या न के बराबर होती है.  उस दौरान चीन और रूस एक दूसरे के कट्टर दुश्मन थे. उस समय भारत के कई वामपंथी चीन की राजधानी बीजिंग से आदेश आने का इंतज़ार करते थे, जबकि बाकी के वामपंथी रूस  की राजधानी मॉस्को  की तरफ देखते थे.  लेकिन वामपंथियों के दोनों ही धड़ों में से राष्ट्र की परवाह शायद ही किसी को थी.चीन के इशारे पर अपनी नीति तय करने का काम वापमंथी आज भी करते हैं. इसी साल जब गलवान में भारत और चीन के सैनिकों के बीच लड़ाई हुई तो CPI(M) पोलित ब्यूरो ने एक बयान जारी करके इस घटना को दुर्भाग्य पूर्ण बताया, लेकिन इस बयान में कहीं भी चीन का नाम नहीं लिया.

इसी तरह 2017 में जब भारत का चीन के साथ डोकलम विवाद हुआ था. तब भी CPI(M) ने एक बयान जारी करके कहा था कि ये स्थिति इसलिए पैदा हुई है क्योंकि भारत तिब्बत के धर्म गुरू दलाई लामा को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दे रहा है.  यानी चीन का विरोध करने की बजाय, वामपंथी उस समय भारत सरकार की नीतियों पर ही सवाल उठा रहे थे वामपंथियों की तरह कांग्रेस के कई नेताओं पर भी ये आरोप लगते हैं कि समय आने पर ये नेता भारत का साथ देने की बजाय चीन का साथ देने लगते हैं और अगर ये खुलकर चीन का साथ नहीं दे पाते, तो भारत पर ही सवाल उठाने लगते हैं. उदाहरण के लिए डोकलाम और गलवान विवाद के बाद, वायनाड से कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने ये दावा किया था कि चीन ने भारत की ज़मीन पर कब्जा कर लिया है.  अब आप सोचिए कि अगर ये भारत की सेना का अपमान नहीं है तो और क्या है ? 2008 में कांग्रेस और चीन की Communist Party के बीच एक MOU पर हस्ताक्षर हुए थे.  जिसका उद्देश्य दोनों पार्टियों के संबंधों को मजबूत बनाना था.  बीजिंग में हुए इस समझौते पर खुद राहुल गांधी ने हस्ताक्षर किए थे और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इस कार्यक्रम में मौजूद थीं.

गांधी परिवार की संस्था राजीव गांधी फाउंडेशन पर चीन से चंदा लेने के आरोप लग चुके हैं.  ये तथ्य हमने आज आपके सामने इसलिए रखे हैं ताकि देश के आम लोग ही नहीं, बल्कि आंदोलन कर रहे किसान भी ये समझ सकें कि उनके साथ कितना बड़ा छल किया जा रहा है. भारत में आंदोलनों का इतिहास सैंकड़ों वर्ष पुराना है. लेकिन दुर्भाग्य ये है जो भारत में जिन पार्टियों का जन्म आंदोलन से हुआ, उनके नेता सत्ता के लालच में आंदोलनों को डिजाइनर बनाने पर तुल गए और आंदोलन अपने असली उद्देश्‍यों से भटकने लगे. नए कृषि कानूनों और सरकार के प्रति पैदा हुए असंतोष का परिणाम नहीं है, बल्कि एक सोची समझी योजना है.  जो किसान खेतों में सिर्फ फसल नहीं, बल्कि अपना दिल उगाते हैं उनके साथ आज कुछ ताकतें बहुत बड़ा धोखा कर रही हैं. हमारी टीम पिछले कई दिनों से सिंघू बॉर्डर से रिपोर्टिंग कर रही है. इस दौरान हमें पता चला है कि किसानों को लगातार ये कहकर भड़काया जा रहा है कि तीनों नए कृषि कानून पूरी तरह से किसानों के खिलाफ हैं.  किसान दिल्ली के अलग अलग बॉर्डर्स पर प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन ऐसा लगता है कि सिंघू बॉर्डर पर इस आंदोलन के लिए विशेष तैयारी की गई है.  धार्मिक और भावनात्मक रूप से किसानों को उकसाने के लिए कई तरह के आयोजन भी किए जा रहे हैं.  इस सुनियोजित आंदोलन की कुछ तस्वीराें में जो किसान आंदोलन में हिस्सा ले रहे हैं वो सबसे पहले वहां ट्रैक्टर ट्राली को खड़ा कर देते हैं.  इसके बाद इन ट्रैक्‍टर्स को ही एक मकान में बदल दिया जाता है.  रातों रात वहां कंबल और दूसरे जरूरी सामान पहुंचा दिए जाते हैं. खाने पीने की व्यवस्था कर दी जाती है.  यहां पहुंचकर आपको ऐसा लगेगा जैसे आप किसी मेले में आ गए हैं.

मनोरंजन का भी इंतजाम होता है, किसानों की थकावट मिटाने के लिए मसाज चेयर्स  का भी इस्तेमाल किया जाता है.  Pizza और Dry Fruits की व्यवस्था की जाती है और यहां तक कि दिल्ली सरकार ने आंदोलन कर रहे किसानों को फ्री  WiFi भी उपलब्ध कराने की घोषणा कर दी है. पिछले कुछ दिनों से हमारे रिपोर्ट्स ग्राउंड पर जाकर ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि 6 महीने तक आंदोलन करने की तैयारी करके आए किसानों के लिए इन सभी सुविधाओं का इस्तेमाल कैसे होता है.

पंजाब के किसानों के आंदोलन में लेफ्ट पार्टियों की इतनी दिलचस्पी क्यों हैं.

भारत की आजादी की मांग के साथ. वर्ष 1913 में अमेरिका में गदर पार्टी की स्थापना हुई थी.  पंजाब में लाला हरदयाल के नेतृत्व में गदर मूवमेंट शुरू हुआ.  गदर पार्टी, रूस  की बोलशेविक क्रांति से बहुत प्रभावित थी. रूस  में हुई ये क्रांति वामपंथी विचारधारा पर ही आधारित थी.  इसके अलावा पंजाब के शहीद भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी भी समाजवाद की विचारधारा से बहुत प्रभावित थे.  लेकिन पंजाब में वामपंथ की जिस विचारधारा का मकसद देश को आजाद कराना था. उसका स्वरूप समय के साथ-साथ सत्ता के लालच और चीन और रूस जैसे वामपंथी देशों के दबाव में बिगड़ने लगा. भारत में वर्ष 1951 में जब पहले आम चुनाव हुए थे. तब पंजाब में लेफ्ट पार्टियों का वोट शेयर 16 प्रतिशत था. 1977 में पंजाब विधानसभा में 17 विधायक लेफ्ट पार्टियों के थे. एक समय में पंजाब में हरकिशन सिंह सुरजीत, विमला डांग और सतपाल डांग जैसे बड़े वापमंथी नेता बहुत प्रभावशाली थे. सतपाल डांग तो वर्ष 1966 में पंजाब में बनी पहली गैर कांग्रेसी सरकार में मंत्री भी थे. एक ज़माने में पंजाब के ग्रामीण इलाकों में वापमंथी पार्टियां बहुत मजबूत थी, यहां तक कि वामपंथियों के विरोध की वजह से पंजाब में कई फैक्ट्रियों को बंद भी करना पड़ा था. लेकिन इन बड़े नेताओं की मृत्यु के बाद धीरे-धीरे पंजाब में वामपंथियों की पकड़ कमज़ोर होने लगी और पिछले 20 वर्षों में तो पंजाब से लेफ्ट की पॉलिटिक्स लगभग गायब हो गई. अकाली दल जैसी पार्टियों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई, अकाली दल ने धर्म को पंजाब में राजनीति का मुख्य मुद्दा बनाया और लेफ्ट पार्टियां इसकी काट नहीं खोज पाई.

लेफ्ट पार्टियों को आंदोलन में अपने लिए संजीवनी बूटी नज़र आ रही

लेकिन अब इस आंदोलन में लेफ्ट पार्टियों को अपने लिए एक संजीवनी बूटी नज़र आ रही है और वोटों की फसल बोने के लिए ये पार्टियां किसानों के आंदोलन की सवारी कर रही हैं. हमारे कुछ रिपोर्टर्स पंजाब के गांव गांव में घूमकर ये समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इस आंदोलन पर राजनीति पार्टियों का कितना प्रभाव है.  इस दौरान हमें पंजाब के एक गांव से इस आंदोलन में शामिल हुए 18 युवकों के बारे में पता चला. जब हमने जानकारी जुटाई तो पता चला कि इनमें से कोई युवा लेफ्ट पार्टियों जुड़ा है, कोई कांग्रेस से, तो कोई आम आदमी पार्टी से.  हमें ये जानकारी भी मिली कि इन युवकों को कल अपने गांव वापस लौटना था. लेकिन इन्हें आंदोलन में ही रुकने की सलाह दी गई और कहा गया कि अभी गांव से 30 लोग और एक बस में बैठकर आंदोलन वाली जगह पर पहुंच रहे हैं. पंजाब में एक वर्ग ऐसा भी है, जो पिछले विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ था. लेकिन आम आदमी पार्टी पंजाब में कुछ खास कर नहीं पाई और वामपंथी विचारधारा से प्रभावित ये वर्ग अब किसानों के आंदोलन में अपनी ज़मीन तलाश रहा है और आंदोलन के लिए सुनियोजित रणनीति तैयार कर रहा है.  कुल मिलाकर वामपंथी अब इस आंदोलन के ज़रिए खुद को पंजाब में पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ वामपंथी तो इसके लिए पाकिस्तान और चीन जैसे देशों की मदद लेने के लिए भी तैयार हैं.

नेताओं ने चीन जैसे देशों के इशारे पर अपने सिद्धांतों की  नीलामी कर दी

आंदोलन से उपजी कांग्रेस को देश की आजादी के बाद भंग किया जाना था और गांधी जी कांग्रेस को एक समाज सेवी संस्था में बदलना चाहते थे.  लेकिन सत्ता के लालच में कुछ नेताओं ने कांग्रेस को परिवार सेवी पार्टी में बदल दिया.  इसी तरह 2011 में जनलोकपाल बिल के लिए चलाए गए आंदोलन से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ और आज इस पार्टी की दिल्ली में सरकार है और ये पार्टी भी अब किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर चला रही है.  इसी तरह वामपंथ की जो विचारधारा, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बनी और जिस विचारधारा के आधार पर पंजाब से देश की आजादी के लिए आंदोलन चलाया गया उस विचारधारा को मानने वाले नेताओं ने अपने सिद्धांतों की चीन जैसे देशों के इशारे पर नीलामी कर दी है और आज हम आंदोलन कर रहे किसानों को इन्हीं मौका परस्त लोगों से सावधान कर रहे हैं.

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