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एक लडाई फर्जी खबरों के खिलाफ…

manoj verma( मनोज वर्मा ) प्रेस किसी भी समाज का आईना होता है। प्रेस की आजादी से यह बात साबित होती है कि उस देश में अभिव्यक्ति की कितनी स्वतंत्रता है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में प्रेस की स्वतंत्रता एक मौलिक जरूरत है। प्रेस और मीडिया हमारे आसपास घटित होने वाली घटनाओं से हमें अवगत करवा कर हमारे लिए खबर वाहक का काम करती हैं, यही खबरें हमें दुनिया से जोड़े रखती हैं। 3 मई को दुनिया भर में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। यूनेस्को महासम्मेलन की अनुशंसा के बाद दिसंबर 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 3 मई को प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने की घोषणा की थी। तभी से हर साल 3 मई को ये दिन मनाया जाता है। इस बार इसकी थीम है ‘लोकतंत्र के लिए मीडिया: फर्जी खबरों और सूचनाओं के दौर में पत्रकारिता एवं चुनाव’। हर साल इसकी एक अलग थीम होती है। बीते साल फर्जी खबरों का मुद्दा दुनिया के सामने एक चुनौती बनकर उभरा था। लोकतंत्र,राजकाज की यदि सबसे अच्छी व वांछित प्रणाली मानी जा रही है तो स्वतंत्र प्रेस या मीडिया उसकी आत्मा और पहचान कही जा सकती है। विधायिका,कार्यपालिका और न्यायपालिका की एक समान व्यवस्था होने के बावजूद यदि प्रेस स्वतंत्र न हो तो उसे लोकतांत्रिक राज्य नहीं माना जा सकता। यही कारण है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है। राजनीतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में मीडिया की भूमिका को देखते हुए हर लोकत्रांत्रिक समाज में स्वतंत्र,निष्पक्षा एवं जीवंत प्रेस को मान्यता दी जाती है,उसके संरक्षण और प्रोत्साहन के कानूनी और दूसरे उपाय किए जाते हैं। प्रेस या मीडिया की स्वतंत्रता की गारंटी तभी हो सकती है जबकि उसका संचालन करने वाले और उसमें जुड़े संपादक, पत्रकार और संवाददाता अपने दायित्व व धर्म का निवाह करने को पूरी तरह स्वतंत्र हों। लेकिन आज एक तरफ जहां संचार क्रांति के चलते समाचारों के प्रचार प्रसार के नये नये माध्यम सामने आ रहे हैं वहीं नई चुनौतियां भी सामने आ रही है। पत्रकारिता के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती और संकट विश्वसनीयता का है।

fake news leadयह संकट फर्जी खबरों ने पैदा किया है। आज भी ऐसे लोग यह कहते हुुए मिल जाएंगे कि यह खबर समाचारपत्र या पत्रिका में छपी हैं इसलिए इस खबर पर उन्हें भरोसा है लेकिन सोशल मीडिया के प्रभाव ने पाठक के इस भरोसे को हिलाने का काम किया है। समय के चलते फर्जी खबरों का यह घंधा मुख्य धारा की मीडिया का भी जरिया बन रहा है जिसके चलते एजेंडा पत्रिकारिता एजेंडा तय करने का काम करती है। बिना यह सोचे समझे कि एजेंडा आधारित फेक न्यूज समाज और राष्ट्र को कितना नुकसान पहुंचाएगी। फर्जी खबरों का असर ना केवल चुनाव पर पड़ता है। बल्कि इससे अपराधों में भी वृद्धि होती है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र और समाज के लिए घातक हैं। आज हालात यह हो गई है कि किसी भी मीडिया प्लैटफॉर्म पर यह देख सकते हैं कि उस पर अलग से एक ऐसा कॉलम बना होता है जो फर्जी खबरों की पोल खोलता है। सोशल मीडिया के दौर में फर्जी खबरें तेजी से फैलती हैं और बड़ी संख्या में लोग इनपर विश्वास भी कर लेते हैं। क्योंकि एक साधारण पाठक को फर्जी और असली खबरों का अंतर नहीं पता होता। इसकी वजह भारतीय पत्रकारिता में पत्रकारिता और पत्रकारों के नाम पर हो रहा घालमेल भी है।

लोकतंत्र में मीडिया की आलोचनात्मक भूमिका पर कोई विवाद नहीं रहा है लेकिन पिछले सालों में पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में भी उसकी भूमिका पर सवाल उठाए जाने लगे हैं। उसे लोकतंत्र में सूचना का माध्यम या सरकारी नीतियों की आलोचनात्मक विवेचना का वाहक समझने के बदले राजनीतिक दलों और राजनीतिज्ञों के समर्थन या विरोध का मंच समझा जाने लगा है।भारत भी इसका अपवाद नहीं है। एक ओर परंपरागत मीडिया समाचार का पहला स्रोत नहीं रह गया है और दूसरी ओर आमदनी गिरने से रिपोर्ट पर रिसर्च के संसाधन कम हुए हैं। नतीजा मीडियाकर्मियों की संख्या में कटौतियों और अखबारों की बिक्री में कमी के रूप में सामने आ रहा है। जर्नलिस्टस के रूप में एक्टिविस्ट के मुदृे ने भी फर्जी खबरों का संकट पैदा किया है। मीडिया का कार्य केवल जो समाज में हो रहा है वे दिखाना ही नहीं है वरन् उससे आगे बढ़कर श्रेष्ठ समाज के निर्माण में जो होना चाहिए वह दिखाना भी होना चाहिए। सैटेलाइट्स तथा उससे संचालित इंटरनेट तथा स्मार्ट मोबाइल फोन ने प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक तथा सोशल मीडिया के क्षेत्र में क्रान्ति ला दी है।टेक्नोलॉजी ने आर्थिक और सामाजिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है लेकिन यह भी सच है कि इसके चलते घृणा फैलाने, फेक न्यूज और समाज विरोधी गतिविधियों की संख्या में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। लिहाजा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मर्यादाओं को लांघ कर सोशल मीडिया का दुरूपयोग सभ्य समाज के समक्ष गंभीर संकट पैदा कर रहा है।

मसजन सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक ने अपने प्लेटफॉर्म से करीब 5.40 करोड़ खाते हटा दिए।निष्क्रिए किए गए ये सभी खाते फर्जी थे और फेक न्यूज फैलाने में लिप्त पाए गए।दूसरी ओर पाकिस्तान ने इस बात को स्वीकार किया कि उसके 333 ट्विटर अकाउंट कश्मीर मुद्दे पर लिखने के चलते निलंबित कर दिए गए।जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने और राज्य से विशेष राज्य का दर्जा वापस लिए जाने के बाद भारत विरोधी प्रचार के लिए इन अकाउंट का इस्तेमाल किया जा रहा था।अकाउंट के माध्यम से प्रचारित की जा रही झूठी और उत्तेजक सामग्री के मद्देनजर भारतीय अधिकारियों की जताई गई आपत्ति के बाद ट्विटर ने इन हैंडल्स को निलंबित कर दिया।कश्मीर मामले में भ्रामक और फर्जी खबरें फैलाने के मामले में सोशल मीडिया साइट ट्विटर ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी को नोटिस तक दिया। कश्मीर मामले में भारत विरोधी प्रचार के लिए पाकिस्तान और उसके इशारे पर काम करने वालों सोशल मीडिया को जरिया बनाया। यह बात पूरी दुनिया को पता है। भारत की लगभग सभी जांच एजेंसियों के पास भी इसकी रिपोर्ट भी है। पूरी दुनिया में इस्लामिक चरमपंथियों और आतंकवादियों ने इंटरनेट के जरिया ई पत्रकारिता को आतंक और नफरत का हथियार बनाया है लिहाजा फर्जी खबरों का खतरा मानवता के लिए है।

पत्रकारिता के मानवीय सरोकार को केंद्र में रखते हुए विश्व प्रेस दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट के जरिए अपने संदेश में कहा कि एक स्वतंत्र प्रेस एक जीवंत लोकतंत्र की नींव है। हम सभी प्रकारों में प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।भारतीयों की कौशल, ताकत और रचनात्मकता दिखाने के लिए हमारी मीडिया का अधिक से अधिक इस्तेमाल किया जा सकता है। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ में मीडिया का योगदान रहा है। मीडिया के योगदान को इसलिए माना जाता है क्योंकि मीडिया का जन सरोकार का पक्ष है। फर्जी खबरों का नहीं। स्वच्छ मीडिया के लिए फर्जी खबरों पर अंकुश,सफाई जरूरी है और इस काम को विभिन्न स्तर पर पत्रकार,पत्रकार संगठन और मीडिया संस्थान कर भी रहे हैं। नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्टस इंडिया ने भारतीय जन संचार संस्थान एंव भारत प्रकाशन के साथ मिलकर राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन भी किया। कश्मीर मीडिया में फर्जी खबरों को आतंक का खुलासा भी नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्टस इंडिया ने कश्मीर का सच नामक एक रिपोर्ट में किया और अब फर्जी खबरों की इस जालसाजी का इस रिपोर्ट के जरिए खुलासा कर रहे हैं। कारण कोरोन संक्रमण के इस संकट में फर्जी खबरों का धंधा मानवता विरोधी और पत्रकारिता के जनसरोकर के सिद्धांत के खिलाफ है।इसलिए सरकार को फर्जी खबरों की रोकथाम के लिए सख्त कानून बनाने चाहिए हैं ताकि पत्रकारिता की विश्वनियता बनी रहे। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बचा रहे है।

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