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जम्मू-कश्मीर को लेकर बदली सोच

kashmir-trip-2019-10-30जम्मू-कश्मीर। केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर प्रदेश को लेकर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलाव साफ नजर आने लगा है। जम्मू-कश्मीर के भीतर भी सोच में बदलाव महसूस किया जा रहा है। अब कश्मीर मुद्दे और जम्मू कश्मीर की सियासत दोनों की चर्चा होती है, हंगामा नहीं। कश्मीर, जिसे कल तक पाकिस्तान एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय मुद्दा करार देता रहा और इसकी मध्यस्थता पर जोर देता था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को अलग-थलग पाकर, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भी कह दिया कि हिंदुस्तान को कश्मीरियों को स्वायत्तता देनी चाहिए।

मतलब यह कि वह कश्मीर से खुद को अलग रखने के लिए कोई ‘सेफ पैसेज’ तलाश रहा है। अनुच्छेद 370 की समाप्ति और जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 को लागू किए जाने का ही असर है कि कश्मीर का दौरा करने वाले किसी भी विदेशी राजदूत या राजनयिक ने कश्मीर मुद्दे पर अलगाववादियों और पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली टिप्पणी नहीं की। बीते छह माह में इन सभी प्रतिनिधियों ने पाकिस्तान को अपना रवैया बदलने और कश्मीर में हस्तक्षेप न करने की नसीहत ही दी। करीब 70 विदेशी राजनयिक और राजदूत बीते छह माह में कश्मीर का दौरा कर चुके हैं। इनमें से करीब डेढ़ दर्जन विदेशी राजदूतों और राजनयिकों के दल ने इसी माह जम्मू-कश्मीर की यात्रा की। उन्होंने कश्मीर के हालात को देखा और समझा भी है। इनमें से किसी ने भी हुर्रियत कांफ्रेंस के किसी नेता से ना तो मुलाकात की और ना ही उनका जिक्र किया।अमेरिका, जिस पर अक्सर दो गुटों में बंटी हुर्रियत कांफ्रेंस के उदारवादी गुट के चेयरमैन मीरवाइज मौलवी उमर फारुक और कट्टरपंथी सईद अली शाह गिलानी और जेकेएलएफ चेयरमैन मोहम्मद यासीन मलिक मध्यस्थता के लिए जोर देते थे, उसके राजदूत भी कश्मीर का जायजा लेकर लौट गए। उन्होंने भी अलगाववादियों का जिक्र नहीं किया। जर्मनी के राजदूत ने भी अलगाववादी खेमे से दूरी बनाए रखी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जम्मू-कश्मीर को लेकर बदली सोच का असर कश्मीर की आंतरिक सियासत पर भी हुआ है। अलगाववादी खेमा जहां अब पूरी तरह से खामोश होकर अपने लिए कोई जगह तलाश रहा है, तो वहीं छद्म अलगाववाद के नाम पर सियासत करने वाली कश्मीर केंद्रित पार्टियां भी अब अपने रवैये में बदलाव ला रही हैं। जम्मू-कश्मीर में रिक्त पड़े लगभग 13 हजार पंच-सरपंच हल्कों के लिए चुनावी प्रक्रिया शुरू करने का कुछ दिन पहले मुख्य चुनाव अधिकारी शैलेंद्र कुमार ने एलान किया।

वर्ष 2018 में जम्मू-कश्मीर में हुए पंचायत चुनावों के दौरान आतंकियों की धमकी और नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के बहिष्कार के चलते कई सीटों पर चुनाव नहीं हो पाया था। अब हालात बदलने के साथ ही इन सीटों पर अगले महीने चुनाव होने जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर की पूर्व स्थिति की बहाली तक किसी प्रकार के चुनाव में हिस्सा न लेने का एलान करने वाली नेशनल कांफ्रेंस अब अपने नेताओं की रिहाई की शर्त पर चुनाव लड़ने को तैयार है। अपनी पार्टी का वजूद बचाने के लिए संघर्ष कर रही महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने चुनावों से दूर रहने का कोई स्पष्ट संकेत देने के बजाय चुप्पी साधना बेहतर समझा है।बीते चार-पांच दिनों में जो संकेत मिले हैं, यह अब स्वायत्तता और सेल्फ रूल जैसे राजनीतिक एजेंडे से कहीं ज्यादा अपने कैडर को पार्टी के झंडे तले जमा रखने को लेकर ज्यादा फिक्रमंद हैं। बीते दो वर्षों में जिस तरह से पंचायतों को सशक्त बनाया गया है, उसके बाद इन दलों का अधिकांश कैडर, जो ग्रामीण पृष्ठभूमि का है, नहीं चाहता कि वह लोकतंत्र में हाशिए पर खड़ा रहे। वह 2018 की गलती को दोहराने के मूड में नहीं है, बल्कि आगे बढ़ना चाहता है। अगले माह कई चरणों में संपन्न होने वाली पंचायत चुनावों की प्रक्रिया कश्मीर केंद्रित दलों को खुद को संभालने और छद्म अलगाववाद का लबादा उतारने का मौका दे रही है। अब देखना यह है कि वह इस लबादे को कब और कैसे उतारते हैं।

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