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गुजरात: इन चुनौतियों से घिरी हैं कांग्रेस-BJP

aiyar-rahul-modiगुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी-कांग्रेस के बीच कांटे का मुकाबला नजर आ रहा है. बीजेपी छठी बार जीत का परचम लहराने के लिए मैदान में है, तो वहीं कांग्रेस दो दशक से जारी सत्ता के वनवास को तोड़ने की जद्दोजहद कर रही है. दूसरे चरण में 14 जिलों की 93 सीटों पर मतदान होने वाले हैं. इस दौर के मतदान में मध्य गुजरात और उत्तर गुजरात के इलाके शामिल हैं. ये दौर कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए काफी मुश्किलों भरा है और दोनों पार्टियां चुनौतियों से घिरी हुई हैं. यही वजह है कि दोनों की गुजरात में जीत की राह कांटों भरी नजर आ रही है.

चुनौतियों से घिरी कांग्रेस

कांग्रेस गुजरात में भले ही दो दशक से सत्ता से बाहर हो, लेकिन उत्तर गुजरात और मध्य गुजरात की ग्रामीण सीटों पर उसकी पकड़ हमेशा से मजबूत रही है. दूसरे दौर की 93 सीटों में से 54 सीटें ग्रामीण क्षेत्र की हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन दोनों इलाकों की ग्रामीण क्षेत्रों की सीटों पर काफी बेहतर नतीजे हासिल किए थे, लेकिन इस बार बदले हुए समीकरण में कई मुश्किलें खड़ी हो गई हैं.

कांग्रेस के सामने दूसरे दौर में सबसे बड़ा सिरदर्द बागी बने हुए हैं. उत्तर गुजरात में कांग्रेस के खिलाफ उसके 16 बागी मैदान में हैं. इससे कांग्रेस का समीकरण बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है. सबसे बड़ी चुनौती बनासकांठा जिले में है, जहां कांग्रेस नौ में से पांच सीटों पर बागियों का सामना कर रही है. बागियों के उतरने से कांग्रेस को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

पटेल एकजुट नहीं

दूसरे दौर में पटेल बाहुल्य सीटें भी हैं. कांग्रेस हार्दिक पटेल को साधकर बीजेपी के परंपरागत वोटों में सेंधमारी करने की जुगत कर रही थी, लेकिन पटेल एकजुट होकर कांग्रेस के पक्ष में खड़ा नजर नहीं आ रहा है. इससे कांग्रेस की जीत के समीकरण गड़बड़ा रहे हैं.

पटेलों की नजदीकियों से ओबीसी की दूरी

गुजरात में पटेल और ओबीसी एक दूसरे के विरोधी है. इन दिनों कांग्रेस का पटेलों के प्रति प्रेम काफी उमड़ा है, पार्टी के इस रवैए से ओबीसी दूरी बना सकता है. कांग्रेस ने अल्पेश ठाकोर को पार्टी में शामिल किया है, लेकिन वो भी बड़ा करिश्मा दिखाते नजर नहीं आ रहे हैं.

गठबंधन से डगमगाया समीकरण

कांग्रेस गुजरात में जेडीयू के बागी नेता छोटूभाई वसावा से गठबंधन करके मैदान में उतरी है. कांग्रेस ने वसावा की पार्टी भारतीय ट्राइबल पार्टी को सात सीटें दी हैं. इस तरह कांग्रेस के खाते में आने वाली सीट अब वसावा की पार्टी में जा सकती है. गठबंधन करने में कांग्रेस के कई राजनीतिक समीकरण बिगड़ गए हैं.

आदिवासियों में संघ के चलते बिगड़ा खेल

 गुजरात में कांग्रेस की सबसे ज्यादा पकड़ आदिवासियों में है. कांग्रेस ने पिछले चुनाव में आदिवासियों की 27 सुरक्षित सीटों में से कांग्रेस ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन पिछले दो सालों में आरएसएस के जरिए बीजेपी ने आदिवासियों के बीच पैठ बनाई है. आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा के लिए संघ के लोग स्कूल, आवास, यूनिफॉर्म और भोजन उपलब्ध कराते हैं.गुजरात की राजनीति में बीजेपी का दो दशक से जलवा कायम है. बीजेपी लगातार पांच विधानसभा चुनाव जीतती आ रही है, लेकिन छठी बार उसकी जीत की राह में काफी मुश्किलें खड़ी हो गई हैं.

शहरी सीट बचाने की चुनौती

दूसरे दौर में 39 शहरी सीटें हैं. इन सीटों पर बीजेपी का दबदबा है. पिछले चुनाव में अहमदाबाद और वड़ोदरा की ज्यादातर सीटें बीजेपी ने जीती थी. लेकिन इस बार नोटबंदी और जीएसटी के चलते व्यापारियों में नाराजगी बढ़ी है. ऐसे में बीजेपी के लिए इन सीटों को बचाने की चुनौती है.

बीजेपी का बिगड़ा जातीय समीकरण

कांग्रेस इस बार जातीय समीकरण सेट करके मैदान में उतरी है, जो बीजेपी के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है. कांग्रेस ने ओबीसी, दलित और पाटीदारों सहित मुस्लिमों का कॉम्बिनेशन बनाया है. बीजेपी कांग्रेस की काट तलाश नहीं पा रही है. कांग्रेस का जातीय समीकरण बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है.

पाटीदारों की नाराजगी

पाटीदार समाज बीजेपी का परंपरागत वोटबैंक माना जाता है, लेकिन 2015 में पटेल आरक्षण आंदोलन के चलते उनमें बीजेपी से नाराजगी बढ़ी है. दूसरे दौर में जिन क्षेत्रों में मतदान होने हैं, उन्हीं क्षेत्रों में पाटीदार आंदोलन हुआ था. पाटीदार नेता हार्दिक पटेल लगातार बीजेपी के खिलाफ माहौल बनाने में लगे हैं. ऐसे में बीजेपी के लिए ये संकट बना हुआ है.

दलितों के जख्म अभी भरे नहीं

गुजरात में बीजेपी के लिए दलित मतदाताओं को साधना मुश्किल हो रहा है. बीजेपी के ये परंपरागत वोटर्स हैं. पिछले चुनाव में बीजेपी 13 सुरक्षित सीटों में से 10 सीट जीतने में कामयाब रही थी, लेकिन दलित नेता जिग्नेश मेवाणी का कांग्रेस के पक्ष में समर्थन करना, बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.

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