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भारतीय अंतरिक्ष; कामयाबी की उड़ान

isroभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की इस उपलब्धि पर पूरे देश को गर्व है।  इसरो ने 100 वां उपग्रह लॉन्च किया। उसने पीएसएलवी सी-40 रॉकेट के जरिए एक साथ सफलतापूर्वक 31 सैटलाइट्स लॉन्च किए। 31 सैटलाइट्स में 28 विदेशी और 3 स्वदेशी उपग्रह शामिल हैं। विदेशी सैटलाइट्स में कनाडा, फिनलैंड, फ्रांस, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन और अमेरिका के उपग्रह शामिल हैं। यह इसरो के सबसे लंबे मिशनों में से एक हैं

हमारे उपग्रहों में कार्टोसैट 2 सैटलाइट सीरीज एक निगरानी उपग्रह है, जिसकी मदद से रक्षा और कृषि क्षेत्र की तत्काल जानकारी मिलेगी। कार्टोसैट 2 के जरिए तटीय क्षेत्रों और शहरों पर नजर रखी जा सकेगी। 1969 में अपनी स्थापना के बाद इसरो ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने अंतरिक्ष में छलांग लगाना शुरू किया और साल दर साल तमाम देशी और विदेशी सैटलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाकर नई ऊंचाइयां छूता गया। बीच-बीच में उसे असफलताएं भी मिलीं लेकिन उसके वैज्ञानिकों ने नाकामयाबी से भी सबक लिए और आगे बढ़ते गए। उसी का नतीजा है कि आज भारत अंतरिक्ष में एक बड़ी ताकत बन गया है। सैटलाइट्स और अंतरिक्ष यानों में वह अमेरिका, रूस और चीन को टक्कर दे रहा है।

आज तमाम विकसित देश अपने उपग्रहों को इसरो से प्रक्षेपित करवाना फायदेमंद और सुरक्षित मानते हैं। दरअसल, इसरो भारतीय वैज्ञानिकों की अटूट निष्ठा और लगन का एक उदाहरण है। इसरो में कई ऐसे वैज्ञानिक हुए, जिन्होंने अपना पूरा जीवन संगठन को समर्पित कर दिया। जब 15 अगस्त 1969 को डॉ. विक्रम साराभाई ने इसरो की स्थापना की थी, तब इसके पास मामूली साधन और सहूलियतें भी नहीं थीं। वैज्ञानिक पहले रॉकेट को साइकिल पर लादकर प्रक्षेपण स्थल तक ले गए थे। इस मिशन का दूसरा रॉकेट काफी बड़ा और भारी था, जिसे बैलगाड़ी के सहारे प्रक्षेपण स्थल पर ले जाया गया था। पहले रॉकेट के लिए नारियल के पेड़ों को लांचिंग पैड बनाया गया था। वैज्ञानिकों के पास अपना दफ्तर तक नहीं था। आज पूरे भारत में इसरो के 13 सेंटर हैं। दरअसल वैज्ञानिकों के उत्साह और काम करने की ललक ने सरकार को भी प्रेरित किया। उसने इसरो को सिर आंखों पर बिठाया।

आज तक सिर्फ प्रधानमंत्री ही इस विभाग के मंत्री रहे हैं, इससे इसरो को बहुत फायदा हुआ है। इसरो की कार्य संस्कृति में बेहद खुलापन और प्रफेशनलिजम है। उसमें छोटे से छोटे पद पर काम करने वाला इंजिनियर या वैज्ञानिक सीधे इसरो चैयरमैन से कोई भी सवाल खुल कर पूछ सकता है। इसरो की कार्य संस्कृति में युवाओं और महिलाओं को प्राथमिकता दी जाती है। बहरहाल, इसरो की हर कामयाबी यह सवाल भी उठाती है कि देश के बाकी वैज्ञानिक संस्थान इस स्तर का प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहे? वक्त आ गया है जब इस पर गंभीरता से विचार किया जाए।

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