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मानवाधिकारों की रक्षा भारत की प्राथमिकता

sashankसंयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की बैठक में पाकिस्तान ने कई रणनीतियों के साथ भारत को घेरने की कोशिश की थी। उसकी मंशा थी कि कश्मीर में मानवाधिकार हनन के आरोप लगाकर नई दिल्ली पर दबाव बनाया जाए। इस तरह के तीर इन दिनों निशाने पर लगते भी हैं, क्योंकि दुनिया भर में मानवाधिकारों का उल्लंघन एक बड़ा मसला बनकर उभरा है। फिर चाहे वह इराक, सीरिया या लीबिया से जान बचाकर भागे शरणार्थियों के मानवाधिकारों का मामला हो या फिर म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों का। ‘रिस्पॉन्सिबिलिटी टु प्रोटेक्ट’ (आर2पी) के तहत पश्चिमी देश इन मसलों को गंभीरता से लेते हैं। अपनी सामरिक ताकत उन्होंने इसी में झोंक रखी है। पाकिस्तान का मानना था कि वह कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन की तोहमत भारत पर लगाए और पश्चिमी देशों को नई दिल्ली के खिलाफ खड़ा कर दे।

उसकी यह भी सोच थी कि ऐसा करने से खासतौर से घाटी में पाकिस्तानपरस्त आतंकियों की करतूत छिप जाएगी और वहां के आम जनता की कथित मुश्किलों पर दुनिया भर का ध्यान टिक जाएगा। इससे बलूचिस्तान, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर, सिंध जैसे इलाकों में पाकिस्तानी फौज के दमन को भी कोई याद नहीं करेगा। यही वजह थी कि जिनेवा में मौजूद पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने अपने बयान में जान-बूझकर जम्मू-कश्मीर को ‘भारत का राज्य’ कहा। ऐसा पहली बार कहा गया है। इसके पीछे की रणनीति यही थी कि बैठक में पाकिस्तान सिर्फ मानवाधिकारों के हनन को तवज्जो देना चाहता था, अपने यहां पल रहे आतंकवाद को नहीं। सुखद है कि भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने अपने जवाब से पाकिस्तान के तमाम झूठ को बेपरदा कर दिया और उसकी मंशा धरी की धरी रह गई।

भारत के हाथों बार-बार मात खाने के बाद भी पाकिस्तान ने कश्मीर मसले को हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की कोशिश की है। इसकी मूल वजह यही है कि वह इन दिनों कई चुनौतियों से जूझ रहा है। अपने यहां से आतंकियों को खत्म करने का बड़ा दबाव उस पर है। भले ही, अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की जल्द वापसी को मुमकिन बनाने में डोनाल्ड ट्रंप उसकी महत्वपूर्ण भूमिका देख रहे हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति पहले यह कह चुके हैं कि आतंकवाद से जंग के नाम पर इस्लामाबाद वाशिंगटन को वेबकूफ बनाता रहा है। उन्होंने पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद भी रोक दी थी। मगर अब बदलते घटनाक्रम से पाकिस्तान को लगने लगा है कि उसका वह सुनहरा दौर लौट आया है, जब इस्लामी मुल्कों और पश्चिम के लिए वह आंखों का तारा हुआ करता था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद- 370 हटाने के फैसले पर बुरी तरह बौखलाना उसके इसी भ्रम का संकेत है।

भारत पर दबाव बनाने के लिए पाकिस्तान ने पहले सुरक्षा परिषद में शिकायत की। यहां चीन की मदद से वह कश्मीर मसले पर एक विशेष बैठक करवाने में जरूर सफल रहा, लेकिन बाकी तमाम देशों ने इसमें अपनी अनिच्छा जताई। वे तो आज भी जम्मू-कश्मीर में किए गए सांविधानिक बदलाव को भारत का आंतरिक मामला मानते हैं। यहां से मुंह की खाने के बाद पाकिस्तान ने मानवाधिकार हनन के आरोप लगाने का फैसला किया। मगर इसमें भी उसे सफलता नहीं मिल सकी। अब लगता है कि सितंबर के अंत में होने वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान फिर से भारत के खिलाफ झूठे आरोप परोसेंगे।

सुरक्षा परिषद से ज्यादा समर्थन पाकिस्तान को मानवाधिकार परिषद की बैठक में मिला है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मानवाधिकारों का हनन कोई देश नहीं चाहता। मगर विडंबना है कि चीन, पाकिस्तान जैसे राष्ट्र दूसरों पर तो उंगली उठाते हैं, लेकिन अपने गिरेबान में झांकना नहीं चाहते। बीजिंग को हांगकांग के बिगड़ते हालात नहीं दिखते, लेकिन आम कश्मीरियों की कथित दुर्दशा उसकी नजरों में आ जाती है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी की इस्लामाबाद यात्रा के बाद जारी पाकिस्तान-चीन संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर का जिक्र होना कुछ-कुछ ऐसा ही है। भारत ने उचित ही इस बयान पर गहरी आपत्ति जताई है। चीन के साथ हमारे कई तरह के द्विपक्षीय रिश्ते हैं, इसलिए संभव है कि कुछ हद तक भारत समझौते का रुख अपनाए, लेकिन उचित समय पर इसका माकूल जवाब देना हमारी सरकार जानती है।

मानवाधिकार परिषद में अपना पक्ष पूरी तरह रखना भारत के लिए जरूरी था। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने इसके लिए खास रणनीति बनाई। एक तरफ तो उसने पाकिस्तान के तथ्यहीन आरोपों का उचित जवाब दिया, तो दूसरी तरफ उसके घरेलू हालात को पूरी तरह जाहिर भी नहीं किया। दरअसल, भारत सरकार मानती है कि पाकिस्तान को एक और मौका मिलना चाहिए। संभव है, आतंकवाद के खिलाफ वह काम करने को तैयार हो जाए। अमेरिकी या अन्य देशों का दबाव उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकता है। इसीलिए उसके कच्चे-चिट्ठे को हम अभी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नहीं खोल रहे। हमारा यही मानना है कि द्विपक्षीय रिश्तों को बेहतर बनाने की हरसंभव कोशिश की जानी चाहिए। बेशक यह रास्ता तंग है, लेकिन इसे पूरी तरह बंद करने से एशिया महाद्वीप की स्थिरता प्रभावित हो सकती है।

रही बात मानवाधिकारों के हनन के आरोपों की, तो इस मामले में भारत के दामन पर कोई दाग नहीं है। मानवाधिकारों की रक्षा भारत की प्राथमिकता में शामिल है। मानवाधिकार परिषद की बैठक में कुछ देशों ने यदि हमारी आलोचना की भी, तो इसलिए कि मानवाधिकार के मानक काफी ऊंचे हैं और जम्मू-कश्मीर में जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, वे इन मानकों पर खरे नहीं उतरते। हालांकि सच यह भी है कि जम्मू-कश्मीर में कफ्र्यू लगाना जरूरी था, ताकि आतंकी गतिविधियों की कमर तोड़ी जा सके। घाटी को लेकर भारत की मंशा स्पष्ट है- आतंकी घटनाएं न हों और अलग-थलग पड़े यहां के लोगों को मुख्यधारा में शामिल किया जाए। पश्चिमी देश इसे बखूबी समझते भी हैं, लेकिन कूटनीति का तकाजा है, अपने-अपने हितों को तवज्जो देना। संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य देश इसी नीति का पोषण कर रहे हैं।

शशांक, पूर्व विदेश सचिव

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