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तालिबानी आतंकियों ने की फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी की हत्या

danish-siddiqui_1626421972नई दिल्ली अफगानिस्तान में मारे गए फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी का पार्थिव शरीर रविवार शाम को दिल्ली लाया गया। उन्हें जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-खाक किया । यह जानकारी विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने दी। उन्होंने बताया, ‘एयर इंडिया का विमान दानिश सिद्दीकी का शव लेकर दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरा।’ सिद्दीकी जामिया मिल्लिया इस्लामिया के पूर्व छात्र थे।सिद्दीकी को वर्ष 2018 में समाचार एजेंसी रॉयटर्स के लिए काम करने के दौरान पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और गत शुक्रवार को पाकिस्तान की सीमा से लगते अफगानिस्तान के कस्बे स्पीन बोल्दक में उनकी हत्या कर दी गई थी। हत्या के समय वह अफगान विशेष बल के साथ जुड़े थे। इससे पहले दिन में विश्वविद्यालय ने एक बयान में कहा, ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया की कुलपति ने फोटो जर्नलिस्ट दानिश सिद्दीकी के परिवार की उनके शव को विश्वविद्यालय के कब्रिस्तान में दफनाने के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। यह कब्रिस्तान विशेष तौर पर विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, उनके जीवनसाथी और नाबालिग बच्चों के लिए बनाया गया है।’ सिद्दीकी ने इस विश्वविद्यालय से परास्नातक की उपाधि प्राप्त की थी और उनके पिता अख्तर सिद्दीकी विश्वविद्यालय में शिक्षा संकाय के डीन थे।

दानिश सिद्दकी को खोने का कष्ट सभी को है। हर शख्स उनकी मौत पर दुखी है। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग हैं जोकि उनकी मौत का कसूरवार उन गोलियों को बता रहे हैं जिन्होंने दानिश के जिस्म को छलनी कर दिया। सोशल मीडिया में ऐसी बड़ी तादाद है जो तालिबान का नाम लेने से बच रहे हैं और दानिश को सलाम कर रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने पिछले दिनों एक पत्रकार की मौत पर जश्न मना रहे थे। समझ नहीं आता कि आखिरकार ये अपने दिमाग में क्या लेकर पैदा हुए हैं। किसी की मौत पर भी इन लोगों को शांति नहीं है। क्यों हम तालिबान का नाम लेने से कतरा रहे हैं। क्या इससे भारत के रिश्ते सुगम हो जाएंगे। क्या भारत और तालिबान में गहरी दोस्ती है। कौन सी ऐसी वो वजह हो सकती है जो तालिबान का नाम लेने से रोक रही है।ये बात सच है कि आखिरकार जिस आतंकी देश के आतंकियों ने हमारे दानिश की जान ले ली आप उसका नाम भी नहीं ले सकते हैं। आखिरकार क्यों ? किस बात का संकोच था। किस बात का डर था। दानिश तो निडर था जो मोर्चे पर रहकर आतंकियों की करतूतों को अपने कैमरे में कैद कर दुनिया के सामने लाना चाहते थे मगर उनको सलाम करने वालों पर इतनी भी हिम्मत नहीं हुई कि उस मुल्क का नाम ले लेते जिसने दानिश की जान ली। फिर भी तालिबान की मजम्मत से परहेज किया जा रहा है। कौन हैं ये लोग जो एक दर्दनाक हादसे पर भी मजहब खोज निकालते हैं।

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