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शादी-तलाक के उलझते मामले

maregeपारिवारिक मामलों, खासकर शादी और तलाक से जुड़े मामलों में अदालतों के नित नए न्यायिक फैसले इस समस्या की गंभीरता को उजागर कर रहे हैं।  देश की अलग अलग अदालतों ने वैध शादी के जो आधार पेश किए, वे प्रतीकवादी भारतीय समाज के लिए चुनौती बन रहे हैं।इसमें शादी के पारंपरिक संस्कारों को ही हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत शादी की मूल शर्त मानना, सिंदूर और मंगलसूत्र को महज प्रतीक मानते हुए संस्कार के दायरे से बाहर मानने जैसे फैसले शामिल हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने विधि विधान पूरा किए बिना एक साथ रह रहे युगल को हिंदू विवाह के तहत दंपति मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि महज एक शपथपत्र की शर्तें हिंदू शादी के संस्कार होने की मूल शर्त को पूरा नहीं करतीं। हिंदू कानून में शादी एक संस्कार है, मुस्लिम लॉ की तरह करार नहीं।

दूसरे मामले में बंबई हाई कोर्ट ने कहा कि मंगलसूत्र पहनना, सिंदूर लगाना और शारीरिक संबंध कायम होना वैध हिंदू विवाह का आधार नहीं है। यहां भी अदालत ने शादी के पारंपरिक संस्कारों का विधि विधान से पूरा करने को शादी की अनिवार्य शर्त करार दिया। तीसरा मामला दो कदम और आगे जाकर तलाक का रोचक आधार पेश करता है। हनीमून पर मलेशिया गए पति के लिए एक मॉल के सामने फोटोग्राफी निषिद्ध क्षेत्र में फोटो खिंचाने की पत्नी की जिद तलाक का वैध आधार बन गई। हनीमून से लौट कर पत्नी ने पति को फोटो खिंचाने की जिद पूरी न करने के लिए इतना परेशान कर डाला कि खुदकुशी के प्रयास में उसने हाथों की नस काट ली। पति को अदालत की शरण लेनी पड़ी। दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी के इस रवैये को शोषण मानते हुए पति को तलाक की अर्जी का आधार करार दिया।

ये मामले समाज में आ रहे बदलाव की महज एक बानगी हैं। इससे इतर न्यायिक फैसलों की कानूनी मान्यता के कारण इनका असर अन्य पारिवारिक अदालतों में लंबित लाखों मुकदमों पर तो पड़ता ही है, साथ ही समाज में विमर्श के स्तर पर भी ये फैसले व्यापक असर डालते हैं। इन फैसलों की वैधानिकता बेशक असंदिग्ध है, लेकिन इनके सकारात्मक और नकारात्मक असर की हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है। ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के बढ़ते चलन के बीच अदालतें बिन फेरे हम तेरे कल्चर को विशेष विवाह अधिनियम के तहत मान्यता दे रही हैं, जिससे महिलाओं के वैवाहिक अधिकारों को सुनश्चित किया जा सके। वहीं पर्सनल लॉ के तहत शादी करने वालों को कठोर शर्तों का पालन करने की कानूनी बाध्यता न्यायिक असंतुलन पैदा करने का खतरा उत्पन्न करती है।

ऐसे में संसद को इस असंतुलन से बचाने के लिए कानून को समय की बदलती मांग के अनुरूप स्पष्ट बनाने की अपनी जिम्मेदारी को राजनीतिक नफा नुकसान के चश्मे से नहीं देखना चाहिए। सदियों पुराने कानून को समय के माकूल बनाने का जो काम संसद को करना चाहिए वह अदालती फैसलों के मार्फत मुकदमा दर मुकदमा हो रहा है।

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