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अजमल -अब्बास से दोस्ती कांग्रेस को पड़ सकती है महंगी?

rahul-gandhiकोलकाता पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में दो राज्य ऐसे हैं, जहां कांग्रेस का काफी कुछ दांव पर है। ये राज्य हैं असम और पश्चिम बंगाल। असम में कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल  की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रैटिक फ्रंट  से गठबंधन किया है। वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-लेफ्ट के अलायंस में फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी  की पार्टी इंडियन सेक्युलर फ्रंट  हिस्सेदार है। माना जा रहा है कि मुस्लिम वोट बैंक पर दावेदारी जताने के लिए कांग्रेस ने दोनों को दोस्त बनाया है। लेकिन क्या ये दोस्ती चुनाव में पार्टी को भारी पड़ सकती है? क्या रिवर्स पोलराइजेशन (उल्टा ध्रुवीकरण) जैसी सूरत बन सकती है? 

असम में पिछली बार अजमल की पार्टी को मिलीं 13 सीटें
पहले बात असम की। असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF से कांग्रेस ने अलायंस किया है। उनकी पार्टी मुस्लिमों के हित में काम करने की हिमायत और दावा दोनों करती है। असम की कुल आबादी तकरीबन साढ़े 3 करोड़ है। इसमें मुसलमानों की आबादी लगभग 34 प्रतिशत यानी एक तिहाई के आसपास है। राज्य की 33 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं। 2016 के विधानसभा चुनाव में अजमल की पार्टी ने 13.05 प्रतिशत वोट शेयर के साथ राज्य की 126 में से 13 सीटें जीती थीं। वहीं कांग्रेस ने 30.96 प्रतिशत वोटों के साथ 26 सीटों पर जीत हासिल की थी। बीजेपी ने कांग्रेस के तकरीबन बराबर 29.51 प्रतिशत वोट के साथ 60 सीटों पर कब्जा जमाया था। हालांकि सियासी विश्लेषक यह अंदाजा भी जता रहे हैं कि अजमल और कांग्रेस के अलायंस से बीजेपी को रिवर्स पोलराइजेशन का मौका मिलेगा।

अजमल से दोस्ती कांग्रेस को क्यों पड़ सकती है महंगी?
चुनावी रैली में अमित शाह ने सवाल उठाया था कि घुसपैठिए असम के गौरव गैंडों का शिकार करते थे लेकिन कांग्रेस ने कभी कुछ नहीं किया, क्योंकि उन्हें वोटबैंक का लालच था। बदरुद्दीन अजमल के साथ बैठकर घुसपैठ नहीं रोक सकते। असम में क्या कांग्रेस को इसका नुकसान हो सकता है, इस पर वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल नेबताया, ‘ये कांग्रेस का डेस्परेट मूव है। असम में कांग्रेस और बीजेपी की लड़ाई है। बदरुद्दीन के साथ पहले भी कांग्रेस का गठबंधन रहा है। कांग्रेस अजमल का वोट शेयर लेना चाहती है। अगर हिंदू वोट एकजुट हो गया तो मुश्किल हो सकती है। कांग्रेस का तो हिंदू और मुस्लिम दोनों वोट है। इसलिए कांग्रेस को दिक्कत हो जाती है। ज्यादा ध्रुवीकरण हुआ तो नुकसान है। बीजेपी तो वही चाहती है।’

बंगाल में कांग्रेस जीरो इसलिए पीरजादा से अलायंस’
बंगाल में पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने ओवैसी का साथ छोड़कर कांग्रेस-लेफ्ट अलायंस का दामन थामा है। पहले वह ममता बनर्जी के लिए मददगार रह चुके थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा ने बंगाल में पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ गठबंधन और पार्टी की रणनीति पर सवाल उठाए थे। बंगाल की राजनीति पर पैनी पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल कहते हैं, ‘असम और बंगाल में थोड़ा अंतर है। बंगाल में कांग्रेस जीरो हो गई है। पार्टी की छवि बिगड़ गई है। पीरजादा से गठबंधन को लेकर आनंद शर्मा ने भी यही बात बोली। असम में कांग्रेस और बीजेपी की टक्कर है। लेकिन बंगाल में कांग्रेस चौथी पार्टी है। मुझे लगता नहीं कि राहुल और प्रियंका ज्यादा मुस्लिम-मुस्लिम करेंगे। लेकिन लोअर लेवल पर पार्टी कोशिश में है कि थोड़ा मुस्लिम वोट मिले। राहुल गांधी मंदिर-मंदिर जाएंगे। बीजेपी की वजह से ममता भी उसी राह पर हैं। बीजेपी पूरा हिंदू वोट (एंटी माइनॉरिटी) वोट लेना चाहती है। कांग्रेस के लिए दिक्कत है लेकिन उसके पास ऑप्शन क्या है?’

‘अजमल-कांग्रेस की दोस्ती बीजेपी के लिए कैंपेन पॉइंट बना’
अमित शाह ने रैली में कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा था कि अजमल के साथ बैठे लोगों से क्या उम्मीद की जा सकती है। इस पर वरिष्ठ पत्रकार जयंत घोषाल ने बताया, ‘यह बीजेपी के लिए कैंपेन का पॉइंट बन गया है। योगी आदित्यनाथ अभी मालदा में गए थे। असम में भी जाएंगे। बीजेपी ये सब क्यों इस्तेमाल कर रही है? पार्टी हिंदू कार्ड खेल रही है। बीजेपी की स्ट्रैटिजी से ये लोग परेशान हो गए हैं।’

बंगाल में दीदी के साथ कांग्रेस को भी सता रहा है डर
बंगाल में मुस्लिम समुदाय की आबादी करीब 30 प्रतिशत है। लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन में इन्हें साधने की होड़ लगी है। ऊपर से असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM की भी एंट्री हो चुकी है। कभी ममता के बेहद करीबी रहे पीरजादा का इस बार टीएमसी के खिलाफ ताल ठोकना दीदी की मुश्किलें बढ़ाने वाला है। अगर मुस्लिम वोटों में बिखराव हुआ तो सीधा फायदा बीजेपी को पहुंचेगा। मुस्लिम वोटों की होड़ कहीं ध्रुवीकरण को न जन्म दे दे, यह डर ममता के साथ-साथ कांग्रेस को भी है। लेकिन फिलहाल पार्टी के पास कोई खास रणनीति नहीं दिख रही है।

क्यों अहम हैं मुस्लिम मतदाता
पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में हैं। 46 विधानसभा सीटें तो ऐसी हैं जहां 50 प्रतिशत से भी ज्यादा मुसलमान हैं। 16 सीटें ऐसी हैं जहां इनकी तादाद 40 से 50 प्रतिशत के बीच है। 33 सीटों पर मुस्लिम आबादी 30 से 40 प्रतिशत और 50 सीटों पर 20 से 30 प्रतिशत है। इस तरह करीब 145 सीटों पर मुस्लिम वोटर जीत और हार तय करने में निर्णायक भूमिका में हैं। मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर जिलों में मुस्लिम आबादी हिंदुओं से ज्यादा है। दक्षिण-24 परगना, नादिया और बीरभूम जिले में भी इनकी अच्छी-खासी आबादी है।

यूपी के नतीजे कांग्रेस के लिए नजीर
जाहिर है कांग्रेस की नजर मुस्लिम वोट बैंक पर है। लेकिन हाल के चुनावों में बार-बार यह देखने को मिला है कि कांग्रेस को ऐसे दांव से फायदा कम नुकसान ज्यादा हुआ है। 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में रिवर्स पोलराइजेशन का असर साफ दिखा था। यहां समाजवादी पार्टी जैसे मजबूत दल के साथ अलायंस के बाद भी कांग्रेस सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गई थी। वहीं अखिलेश यादव को भी 403 में से महज 47 सीटें हासिल हुई थीं। मालदा रैली के जरिए योगी आदित्यनाथ ने साफ कर दिया है कि बंगाल में भी यूपी चुनाव वाली टोन सेट रहेगी। ऐसे में कांग्रेस को दुश्मनों से ज्यादा क्यों दोस्तों से डर है, समझना मुश्किल नहीं।पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का जो मुक़ाबला अब तक त्रिकोणीय लग रहा था, क्या वो ओवैसी और सिद्दीकी की एंट्री से बदल जाएगा?

टीएमसी को नुक़सान

यही समझने के लिए हमने बात की वरिष्ठ पत्रकार महुआ चटर्जी से.महुआ कहती हैं, “ओवैसी और सिद्दीक़ी दोनों बिल्कुल अलग भूमिका में है. ओवैसी का पश्चिम बंगाल में कोई दख़ल नहीं है. ना तो उनकी भाषा बंगाली मुसलमानों जैसी है और ना ही बंगाल के बारे में उनको ज़्यादा पता है, ना ही वो वहाँ के रहने वाले हैं. ऐसे में सोचने वाली बात है कि बंगाली मुसलमान उनको वोट क्यों देंगे?फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ का मामला अलग है. वो बंगाली मुसलमान हैं. उनका कुछ दख़ल हुगली ज़िले की सीटों पर हैं जहाँ से वो ताल्लुक़ रखते हैं. उसके बाहर उनका कोई प्रभुत्व नहीं है. लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा बहुत बड़ी है. सीटों के बंटवारे में उनको हिस्सा भी बड़ा चाहिए. आने वाले दिनों में सीटों के बंटवारे को लेकर मामला फंस सकता है. इसलिए ओवैसी और सिद्दीक़ी को एक नहीं कहा जा सकता क्योंकि दोनों का प्रभाव का स्तर अलग है.”ओवौसी और सिद्दीक़ी के बीच के इस अंतर को कांग्रेस और लेफ़्ट भी समझती हैं. शायद इसलिए उन्होंने फ़ुरफ़ुरा शरीफ़ के अब्बास सिद्दीक़ी के साथ गठबंधन किया है.पिछले चुनाव में लेफ़्ट का हिंदू वोट बीजेपी के साथ चला गया और मुसलमान वोट टीएमसी के साथ. इसलिए इस बार अब्बास सिद्दीक़ी को अपने साथ लाकर लेफ़्ट गठबंधन, मुसलमान वोट अपने साथ करना चाहती है, ताकि टीएमसी को नुक़सान पहुँचाया जा सके.बंगाल में बीजेपी भी मुसलमान वोटरों की अहमियत समझती है और इसलिए स्थानीय जानकार मानते हैं कि ओवैसी उनकी चुनावी रणनीति का ही एक हिस्सा हैं. टीएमसी भी ओवैसी को बीजेपी की ही ‘बी टीम’ क़रार देती है.महुआ कहती हैं कि बीजेपी वैसे तो किसी चुनाव में मुसलमान उम्मीदवार ना के बराबर उतारती है. लेकिन इस बार देखने वाली बात होगी कि बंगाल चुनाव में बीजेपी कुछ मुसलमान उम्मीदवार को उतारती है या नहीं.उनका मानना है कि ओवैसी की पश्चिम बंगाल चुनाव में एंट्री ही बीजेपी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए हुई है ताकि उनकी पार्टी टीएमसी के मुसलमान वोट काट सके. ओवैसी पर इस तरह के आरोप कई लोग लगाते हैं कि उनकी राजनीति बीजेपी को चुनावी फ़ायदा पहुँचाने के लिए होती है लेकिन मुसलमानों का एक बहुत बड़ा तबक़ा संसद में मुसलमानों के मुद्दे पर बेबाकी से अपनी बात रखने वाले नेता के तौर पर भी देखता है.हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में भी उन पर इस तरह के आरोप लगे लेकिन उनकी पार्टी का प्रदर्शन अच्छा रहा और उनकी पार्टी ने पाँच सीटें हासिल की.यानी लेफ्ट गठबंधन अब्बास सिद्दीक़ी के सहारे और बीजेपी ओवौसी के सहारे टीएमसी के मुसलमान वोटर में सेंधमारी की कोशिश में जुटी है.

पश्चिम बंगाल में मुसलमान वोटर कुछ इलाक़ों में केंद्रीत ही नहीं है, बल्कि जगह-जगह फैले हुए भी है.बांग्लादेश सीमा से लगे राज्य के ज़िलों में मुस्लिमों की आबादी बहुतायत में है. मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में तो कहीं-कहीं इनकी आबादी 50 फ़ीसद से ज़्यादा है. इनके अलावा दक्षिण और उत्तर 24-परगना ज़िलों में भी इनका ख़ासा असर है.विधानसभा की 294 सीटों में से 70 से 100 सीटों पर इस तबक़े के वोट निर्णायक हैं.साल 2006 तक राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर वाममोर्चा का क़ब्ज़ा था. लेकिन उसके बाद इस तबक़े के वोटर धीरे-धीरे ममता की तृणमूल कांग्रेस की ओर आकर्षित हुए और साल 2011 और 2016 में इसी वोट बैंक की बदौलत ममता सत्ता में बनी रहीं.ऐसे में सवाल उठता है कि क्या टीएमसी का नुक़सान बीजेपी को फ़ायदा पहुँचा सकता है?जैसे चिराग ने बिहार चुनाव में सीटें भले ही ना जीती हों, लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी की सीटें ज़रूर घटा दीं थी. वैसे ही इस बार ओवैसी भले ही बंगाल चुनाव में जीत ना दर्ज करें. लेकिन टीएमसी का खेल ख़राब कर सकते हैं.वो बताती हैं कि लेफ़्ट कांग्रेस और अब्बास सिद्दीक़ी की पार्टी की संयुक्त रैली के बाद लेफ्ट के वोटर बहुत उत्साहित नज़र नहीं आ रहे. ऐसे में देखना होगा कि बंगाल में लेफ़्ट का प्रदर्शन कैसा रहेगा. लेफ़्ट और कांग्रेस के साथ आने से जो चुनाव त्रिकोणीय लगने लगा था, वो अब दोबारा से ममता – मोदी के बीच का मुक़ाबला बनता जा रहा है.एक दूसरी बात भी है जिस पर ध्यान देने की ज़रूरत है. ओवैसी और सिद्दीक़ी के आने से वोटों का ध्रुवीकरण ज़रूर होगा, हिंदू वोट और ज़्यादा संगठित होंगे और इसका फ़ायदा बीजेपी को हमेशा होता है. बीजेपी की रणनीति ऐसा करने की दिख भी रही है.कांग्रेस के अंदर ही अब्बास सिद्दीक़ी की पार्टी के साथ गठबंधन पर ख़ूब खींचतान चल रही है. आनंद शर्मा ने इस गठबंधन पर जैसे ही सवाल खड़े किए, तो अगले ही दिन बीजेपी ने इस पर प्रेस कांफ्रेंस कर कांग्रेस गठबंधन पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप लगा दिए. यही आरोप वो टीएमसी पर भी लगाते आई है.

ममता पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप

साल 2011 में राज्य की सत्ता में आने के साल भर बाद ही ममता ने इमामों को ढाई हज़ार रुपए का मासिक भत्ता देने का एलान किया था. उनके इस फ़ैसले की काफ़ी आलोचना की गई थी. कलकत्ता हाईकोर्ट की आलोचना के बाद अब इस भत्ते को वक़्फ़ बोर्ड के ज़रिए दिया जाता है.लेकिन इस बार बीजेपी ने उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण के साथ हिंदू विरोधी होने के आरोप भी लगाए हैं.इसके बाद ममता बनर्जी ने अपनी रणनीति थोड़ी बदली है. ममता ने राज्य के लगभग 37 हज़ार दुर्गापूजा समितियों को 50-50 हज़ार रुपए का अनुदान देने का एलान किया है. यही नहीं, कोरोना और लॉकडाउन की वजह से आर्थिक तंगी का रोना रोने वाली मुख्यमंत्री ने पूजा समितियों को बिजली के बिल में 50 फ़ीसद छूट देने का भी एलान किया. राज्य के आठ हज़ार से ज़्यादा ग़रीब ब्राह्मण पुजारियों को एक हज़ार रुपए मासिक भत्ता और मुफ़्त आवास देने की घोषणा की थी.बंगाल के अल्पसंख्यक मुख्य रूप से दो धार्मिक संस्थाओं का अनुसरण करते हैं. इनमें से देवबंदी आदर्शों पर चलने वाले जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अलावा फुरफुरा शरीफ़ शामिल है.प्रोफ़ेसर समीर दास कोलकाता विश्वविद्यालय में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर हैं. बंगाल से फ़ोन पर बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “अब्बास सिद्दीक़ी और ओवैसी दोनों के मैदान में उतने से बंगाल के मुसलमान वोट बंट जाएँगे. दोनों नेताओं के फॉलोअर अलग-अलग हैं. अब्बास सिद्दीक़ी जिस फुरफुरा शरीफ़ के पीरज़ादा हैं उसको मानने वाले मॉडरेट मुसलमान माने जाते हैं. जबकि ओवैसी जिस तरह का प्रचार करते हैं, उनके साथ कट्टर मुसलमान ज़्यादा जुड़ते हैं.”जनवरी के महीने में ओवैसी ने अब्बास सिद्दीक़ी से मुलाक़ात की थी. कहा जा रहा था कि ओवैसी और अब्बास सिद्दीक़ी साथ आ सकते हैं. लेकिन अब्बास सिद्दीक़ी के लेफ़्ट कांग्रेस गठबंधन के साथ आने की वजह से समीकरण थोड़े बिगड़े नज़र आ रहे हैं.प्रोफ़ेसर समीर कहते हैं, “हमने हाल के दिनों में देखा है कि सिद्दीक़ी जिस तरह की भाषा बोल रहे हैं, वो धीरे-धीरे ओवैसी जैसे ही कैम्पेन मोड में आ जाएंगे. फ़ुरफ़ुरा शरीफ को मानने वाले दक्षिण बंगाल के कुछ इलाक़ों में ही हैं. पश्चिम बंगाल के मुसलमान ये जानते हुए भी कि लेफ़्ट के साथ उनका गठबंधन इस बार सत्ता में नहीं आएगा, फिर भी वो अब्बास सिद्दीक़ी के लिए वोट करेंगे.”ओवैसी बंगाल चुनाव में कितनी बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं? इस पर प्रोफ़ेसर दास कहते हैं, “किसे मालूम था कि बिहार में वो इतनी सीटें जीतेंगें? इसलिए उनको पूरी तरह से दरकिनार नहीं किया जा सकता. वो जिस तरह से प्रचार करते हैं, मुसलमानों को हाशिए पर किए जाने की बात करते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं कि इस चुनाव में वो उसी तरह का प्रचार करेंगे और कट्टर मुसलमानों का गुट उनके साथ जुड़ेगा भी. भले ही उनको मिलने वाले वोट, उन्हें बंगाल में सीट ना जीता पाएं लेकिन एक बड़े मुसलमान तबक़े को अपनी तरफ़ कर सकते हैं.”

कांग्रेस से हाथ मिलाने वाली ISF, वोट काटेगी या किंगमेकर बनेगी?

पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव के सियासी संग्राम में एक दिलचस्प मोड़ तब आ गया, जब इंडियन सेक्युलर फ्रंट (Indian Secular Front) के साथ कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट (Congress-Left Alliance) ने हाथ मिला लिया. जैसे ही ये खबरें ब्रेक हुईं तो पहली कड़वी प्रतिक्रिया कांग्रेस के भीतर के ही असंतुष्टों (Congress Dissents) यानी G-23 समूह से आई, जिसने इस गठजोड़ पर नाराज़गी और दुख जताया. अब सवाल है कि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (Trinmool Congress) और भाजपा के बीच खास मुकाबले के मद्देनज़र कांग्रेस और लेफ्ट के गठबंधन में नई पार्टी का शामिल होना बंगाल चुनाव (Bengal Elections) में क्या अहमियत रखता है?

चुनावी समीकरणों पर आने से पहले जानिए कि ISF एक राजनीतिक पार्टी है, जिसे फुरफुरा शरीफ के धार्मिक नेता अब्बास सिद्दीकी ने बनाया. खबरों की मानें तो कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद हुए सीट समझौते के मुताबिक ISF 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की तैयारी में है. इस पार्टी के बारे में कुछ खास बातें अब तक सामने आ चुकी हैं.294 विधानसभा सीटों के लिए बंगाल में चुनाव होन जा रहे हैं. इस बीच 21 जनवरी को हुगली ज़िले के पीरज़ादा अब्बास सिद्दीकी ने नई पार्टी ISF का ऐलान किया था. देश में अजमेर शरीफ के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र माना जाने वाला मज़ार फुरफुरा शरीफ है, जिससे जुड़े परिवार से ताल्लुक रखने वाले धर्मगुरु 34 वर्षीय अब्बास ने यह पार्टी बनाई.अपने लक्ष्य स्पष्ट रूप से घोषित करते हुए पार्टी ने कहा कि मुस्लिमों, आदिवासियों और दलितों के विकास के लिए पार्टी काम करेगी. वहीं, अब्बास के बयान के मुताबिक ममता बनर्जी ने सत्ता में आने पर नौकरियां, शिक्षा और 15 फीसदी आरक्षण देने का वादा किया था, लेकिन अब तक निभाया नहीं. अब्बास का यह भी आरोप है कि वादा तो दूर, बंगाल में हिंदू व मुस्लिमों के बीच खाई और गहरी हो गई.अब्बास ने कहा था कि उन्होंने ममता पर विश्वास करते हुए अपने प्रभाव के मुस्लिम समुदाय से टीएमसी के पक्ष में वोटिंग करने को कहा था, लेकिन अब उनके समर्थक छला हुआ महसूस करते हैं. इसी कारण अब्बास ने अपनी खुद की पार्टी खड़ी करने का इरादा किया. ममता बनर्जी के विरोध का एक समीकरण और है, जिसकी आगे चर्चा करते हैं.

क्या रहे ISF के चुनावी समीकरण?
अब्बास की इस पार्टी के बारे में पहले इस तरह की चर्चा चल रही थी कि बंगाल के चुनावी मैदान में ज़ोर आज़माइश करने जा रहे असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ ISF का गठजोड़ हो सकता है. अब्बास और ओवैसी की एक ‘सीक्रेट’ किस्म की मुलाकात भी मज़ार शरीफ पर 3 जनवरी को हुई थी.लेकिन, फरवरी के पहले हफ्ते में ही इस तरह के अंदाज़ों पर आधारित खबरें आ गई थीं कि दोनों पार्टियों के बीच समझौता होने के आसार नहीं बन रहे. ओवैसी चुनाव अपनी लीडरशिप में लड़े जाने को लेकर अड़े थे, जिसे अब्बास ने सशर्त समझौता कहकर तरजीह देने से मना कर दिया था. आखिरकार अब्बास की पार्टी ने कांग्रेस और लेफ्ट के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया.ISF के बनने और कांग्रेस के साथ जुड़ने के बाद मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति खुलकर सामने आ गई है. एक तरफ, तृणमूल कांग्रेस ने इस तरह की पार्टी के वजूद पर सवालिया निशान लगाते हुए कहा कि ऐसी पार्टियां राज्य में सांप्रदायिक भेदभाव पैदा करती हैं, जिनका कोई आधार नहीं है क्योंकि बंगाल सांप्रदायिक आधार पर वोटिंग नहीं करता.वहीं, भाजपा ने टीएमसी की इस अप्रोच को नाटक करार देकर कहा कि मुस्लिम वोटों को टीएमसी अपनी बपौती न समझे. बंगाल में मुस्लिम आबादी सबसे ज़्यादा पिछड़ी हुई है, यह दावा करते हुए भाजपा ने यह भी कहा कि किसी को भी राजनीतिक पार्टी बनाने का हक है और टीएमसी को इससे डरना नहीं चाहिए.इस पूरी बहसबाज़ी से साफ है कि ‘वोट काटने’ की राजनीति से सभी वाकिफ हैं. कहा जा रहा है कि ओवैसी की पार्टी हो या अब्बास की, इससे खास तौर से मुस्लिमों के वोट बंटेंगे तो बड़ा नुकसान टीएमसी को ही होगा. गौरतलब है कि बंगाल में करीब 30 फीसदी वोट मुस्लिम आबादी के हैं.रिपोर्ट्स की मानें तो अब्बास सिद्दीकी के परिवार के ही बुज़ुर्ग तोहा सिद्दीकी फुरफुरा शरीफ के वरिष्ठ पीर हैं, जिन्हें ममता बनर्जी का करीबी माना जाता है. लेकिन उनसे अलग राह पर अब्बास के जाने की वजह यही बताई जा रही है कि वो 40 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन ममता ने इस प्रस्ताव को नहीं माना तो अब्बास ने अपनी ही नई पार्टी बनाई.
इस राजनीति का साफ इशारा यही है कि मुस्लिम वोट बैंक पर जो पार्टी कब्ज़ा करने में सफल होगी, वो एक तरह से बंगाल में सत्ता का भविष्य तय करेगी. दूसरी तरफ, जी 23 समूह के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा ने कांग्रेस के ISF से हाथ मिलाने को नेहरू और गांधी की पार्टी के उसूलों के खिलाफ बताकर आलोचना की.

 

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