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अल-अक्सा मस्जिद को लेकर इजरायल-फलस्‍तीन के बीच जंग

aqsa 2020 afpयरुशलम इजरायल और फलस्‍तीन के बीच संघर्ष की वजह यरुशलम में अल-अक्सा मस्जिद मानी जा रही है। दोनों देशों के बीच 2017 के बाद का यह सबसे बड़ा हिंसक संघर्ष है। दरअसल, मुस्लिम समुदाय अल-अक्सा मस्जिद को मक्का और मदीना के बाद तीसरा पवित्र स्थल मानता है। मुसलमान इसे हरम अल-शरीफ के नाम से भी बुलाते हैं। वहीं, इजरायल के यहूदियों के अलावा ईसाई भी इस जगह को अपने लिए पवित्र मानते हैं।मुसलमानों का मानना है कि पैगंबर मोहम्मद रात की यात्रा (अल-इसरा) के दौरान मक्का से चलकर अल-अक्सा मस्जिद आए थे और जन्नत जाने से पहले यहां रुके थे। आठवीं सदी में बनी यह मस्जिद पहाड़ पर स्थित है। इसे दीवारों से घिरा हुए पठार के रूप में भी जाना जाता है। यहां पठार में ‘टेंपल माउंट’ भी है, जिसे यहूदी अपने लिए पवित्र मानते हैं। इसके अलावा यहां एक और मंदिर है। इसे भी यहूदी पवित्र मानते हैं।

इजरायल ने यरुशलम के कई हिस्सों को कब्जे में लिया
dome_on_theबाइबल के अनुसार, ‘टेंपल माउंट’ को राजा सोलोमन ने बनाया था, जिसे बाद में रोमन साम्राज्य ने इसके पश्चिम हिस्से के छोड़कर नष्ट कर दिया। यहूदी इसी दीवार की पूजा करते हैं। दूसरा मंदिर 600 वर्षों तक बना रहा, लेकिन रोमन साम्राज्य ने इसे भी पहली सदी में तोड़ दिया था। फलस्‍तीन के साथ अरब देशों के मुस्लिम और इजरायली दीवारों से घिरे इस पठार पर अपना दावा करते हैं। इजरायल ने 1967 के अरब युद्ध के दौरान जॉर्डन से यरुशलम के कई हिस्सों को अपने कब्जे में ले लिया।इजरायली इसी के बाद से यरुशलम दिवस मनाने लगे। सोमवार को इस घटना की वर्षगांठ के मौके पर यहूदी राष्ट्रवादी एक मार्च निकालने वाले थे। इसी बीच हिंसा भड़क उठी। इजरायल ने बाद में एकीकृत यरुशलम को अपनी नई राजधानी बनाने के ऐलान किया। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे मान्यता नहीं मिली। ऐसे में नई व्यवस्था के तहत जॉर्डन का इस्लामिक ट्रस्ट वक्फ अक्सा मस्जिद और ‘द डोम ऑफ द रॉक’ की प्रशासनिक जिम्मेदारी संभालता रहा।

1994 में जॉर्डन के साथ समझौते के बाद इजरायल को यहां विशेष भूमिका दी गई। उसके बाद से इजरायली सुरक्षा बल यहां लगातार मौजूद रहते हैं और वक्फ के साथ मिलकर इलाके का प्रशासन संभालते हैं। यथास्थिति वाले समझौते के तहत यहूदियों और ईसाइयों को यहां जाने की इजाजत है, लेकिन मुसलमानों यहां मैदान पर नमाज से मना किया जाता है। यहां यहूदी पश्चिमी दीवार के पास पवित्र पठार के ठीक नीचे प्रार्थना करते हैं, जो पहले टेंपल माउंट की चारदीवारी थी।

क्यों हुआ हालिया संघर्ष

ISRAEL-PALESTINIAN-CONFLICTइजरायली पुलिस ने यहां बड़ी संख्या में लोगों को जुटने से रोकने के लिए 12 अप्रैल को बैरिकेड्स लगा दिए। रमजान के महीने में फिलीस्तीनी मुस्लिम यहां बड़ी संख्या में जुटते हैं। उसने कुछ दिनों बाद अल-अक्सा मस्जिद में नमाज के लिए लोगों की संख्या सीमित कर दी। वहीं, हजारों की संख्या में आए फलीस्तीनियों को वापस भेज दिया गया। इसके बाद से इजरायल और फिलीस्तीन के चरमपंथी समूह हमास के बीच संघर्ष तेज हो गया।

खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं, ”1967 से पहले फ़लस्तीन और इसराइल समस्या अरब की समस्या थी लेकिन 1967 में अरब-इसराइल युद्ध में इसराइल की जीत के बाद से यह केवल इसराइल और फ़लस्तीन की समस्या रह गई है. अगर इसे कोई हल कर सकता है तो वे इसराइल और फ़लस्तीनी हैं.”तलमीज़ अहमद कहते हैं, ”इस्लामिक देशों की प्रतिक्रिया दिखावे भर से ज़्यादा कुछ नहीं है. ज़्यादातर इस्लामिक देश राजशाही वाले हैं और वहां की जनता का ग़ुस्सा जनादेश के रूप में आने का मौक़ा नहीं मिलता है. ऐसे में वहाँ के शासक फ़लस्तीनियों के समर्थन में कुछ बोलकर रस्मअदायगी कर लेते हैं. जहाँ तक तुर्की की बात है तो अर्दोआन ने बाइडन के आने के बाद इसराइल के साथ संबंध सुधारने की कोशिश की. वे राजदूत भेजने को भी तैयार थे लेकिन इसराइल ने कुछ दिलचस्पी नहीं दिखाई. इसराइल के ख़िलाफ़ हाल के दिनों में अर्दोआन ने बहुत ही आक्रामक बयान दिए हैं.”तलमीज़ अहमद कहते हैं कि तुर्की या सऊदी अरब से इसराइल का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला है और अगर कोई दख़ल दे सकता है तो वो अमेरिका है लेकिन वहाँ की दक्षिणपंथी लॉबी इसराइल के समर्थन में मज़बूती से खड़ी है.

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