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अयोध्या केस: जस्टिस नजीर के फैसले से खारिज हुई मुस्लिम पक्ष की दलील

Ayodhya-Verdict-Supreme-Courtअयोध्या मामले की सुनवाई के दौरान विवादित जमीन पर अपने दावे के पक्ष में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड द्वारा कोर्ट में ये तर्क दिया गया था कि प्रतिकूल कब्जे (Adverse possession) के सिद्धांत के आधार पर इस जमीन पर अब उनका हक है. लेकिन पांच जजों की विशेष पीठ ने उनके इस दावे को खारिज कर दिया. पीठ ने कहा कि मुस्लिम पक्ष प्रतिकूल कब्जा सही माने जाने के लिए जरूरी शर्तों को पूरा करने में नाकाम रहा.  इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए जस्टिस अब्दुल नजीर द्वारा चार साल पहले दिए गए एक फैसले को आधार बनाया गया. कर्नाटक हाई कोर्ट का जज रहते हुए जस्टिस नजीर ने कहा था कि प्रतिकूल कब्जा का दावा माने जाने के लिए कब्जा ‘निरंतरता के साथ’ ‘वास्तविक’ ‘दिखने वाला और एक्सक्लूसिव’ होना चाहिए.

क्या है प्रतिकूल कब्जा (Adverse possession)

सबसे पहले हम आपको बताते हैं कि प्रतिकूल कब्जा है क्या? इसे उदाहरण के साथ समझाते हुए मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि मान लिया जाए मोहन नाम के शख्स का दिल्ली में अपना मकान है. उसने इस मकान को सोहन को रहने के लिए दिया है. अगर सोहन 12 साल तक लगातार इस घर पर बिना रोक-टोक रहता है तो 12 साल बाद उसे इस संपत्ति को बेचने का अधिकार है. अगर इसे लेकर मामला कोर्ट में जाता है तो कानून के मुताबिक इसका मालिकाना हक सोहन को मिलेगा. इसके कहते हैं प्रतिकूल कब्जा यानी कि एडवर्स पोजेशन.अयोध्या विवाद में मुस्लिम पक्ष ने कहा कि चूंकि मस्जिद के बनने के बाद से इसे ढहाये जाने तक इस पर उनका लंबे समय तक, एक्सक्लूसिव और निरंतर कब्जा रहा है, इस वजह से प्रतिकूल कब्जे की थ्योरी के मुताबिक इस संपत्ति पर उनका दावा बनता है.

इस दलील को नकारते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “सूट 4 में वादी ने विकल्प में प्रतिकूल कब्जे की मांग की. 2015 में दिए गए एक फैसले में, कर्नाटक उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश के रूप में हम में से एक (जस्टिस अब्दुल नजीर) ने प्रतिकूल कब्जे का दावा मानने के लिए कुछ पूर्व निर्धारित शर्तें रखी.”

जस्टिस नजीर द्वारा 2015 का निर्णय एक संपत्ति विवाद पर पारित किया गया था, जिसमें संपत्ति के मालिक के कानूनी उत्तराधिकारियों ने एक गिफ्ट डीड (Gift deed) को रद्द करने और अन्य पक्षों को विवादित संपत्ति के कब्जे से रोकने के लिए अदालत के आदेश की मांग की थी.

अयोध्या मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने 2015 में जस्टिस नजीर द्वारा दिए गए फैसले का जिक्र किया और कहा,  ‘प्रतिकूल कब्जे की अवधारणा शत्रुतापूर्ण कब्जे पर विचार करती है.’ आगे कोर्ट ने कहा, ‘एक व्यक्ति द्वारा कब्जा adverse possession होने के लिए  निश्चित रूप से ऐसा हना चाहिए, जिसमें वो किसी दूसरे के अधिकार को स्वीकृति नहीं देता हो बल्कि उससे इनकार करता हो. कब्जे का मतलब ये होता है कि कब्जा करने वाले व्यक्ति के दिमाग में स्वामित्व और नियंत्रण का भाव हो कि उसका एक संपत्ति पर अधिकार है और वह इस अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है.”

2015 के जजमेंट का आगे जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा, ‘भूमि को प्रतिकूल कब्जा सिद्ध करने के लिए ये दिखाना पर्याप्त नहीं है कि कब्जे का कुछ काम किया गया था. कब्जा होने के लिए इसमें निरंतरता होनी चाहिए, इसकी जानकारी होनी चाहिए और इस हद तक होना चाहिए कि ये मालिक के अधिकार के विपरीत है. दूसरे शब्दों में कब्जा वास्तविक, दृश्य, एक्सक्लूसिव और इतना निरंतर होना चाहिए कि लिमिटेशन एक्ट के तहत क्वालिफाई कर सके. यानी कि निजी संपत्ति की हालत में कब्जा 12 साल तक और सरकारी संपत्ति में 30 साल तक होना चाहिए.इस फैसले के आलोक में सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष के रूप में कहा कि मुस्लिम पक्ष के लिए यह असंभव था कि वे पूरी संपत्ति पर शांतिपूर्ण, ओपन और निरंतर कब्जे का केस तैयार कर सकें.”  बता दें कि मुस्लिम पक्षकारों ने स्वीकार किया है कि अयोध्या में विवादित संपत्ति पर उनके दावे को अदालत में हिंसा के जरिये कई बार चुनौती दी गई है.

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