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कश्मीर में आतंकवाद महिला सशक्तिकरण के लिए खतरा

kashmir women terrorम्मू कश्मीर के बड़गाम जिले की एक भाजपा नेता को पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन अल बद्र ने धमकी दी है कि वह अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को भूल जाएं या अंजाम भुगतने को तैयार रहें।विशेषज्ञों का मानना है कि महिला नेता को मिली धमकी की इस घटना से एक बार फिर इस बात की पुष्टि हुई है कि पिछले तीन दशकों से घाटी में महिला सशक्तिकरण के लिए आतंकवाद एक बड़ा खतरा है।अल बद्र के झंडे के साथ भाजपा नेता का चित्र और ऑडियो संदेश सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।आतंकवादी संगठन ने कहा, “इस संदेश से हम आखिरी बार आगाह कर रहे हैं…।”विशेषज्ञों का मानना है कि हालांकि आतंकी संगठनों द्वारा किसी को भी धमकी दिए जाने पर जम्मू कश्मीर पुलिस उसकी सुरक्षा सुनिश्चित कर रही है लेकिन कभी-कभार लापरवाही की संभावना बनी रहती है।

जम्मू कश्मीर पुलिस के पूर्व महानिदेशक कुलदीप खोड़ा ने जम्मू से पीटीआई-भाषा को बताया, “कश्मीर में 1989 में आतंकवाद की शुरुआत से ही हिंसा के कारण आर्थिक पिछड़ेपन का खामियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ा है। पाकिस्तान से प्रशिक्षण लेकर आए आतंकवादियों ने इस बहकावे में लोगों को रखा था कि कश्मीर को भारत से अलग कर देंगे। जब युवक बंदूक से फैलाए जा रहे प्रकोप के जाल में फंसे थे तब लड़कियों को घर बैठना होता था। कई लड़कियों के भाइयों ने जब आतंक की राह पकड़ ली तो बहनों को माता पिता की देखभाल के लिए अपनी शिक्षा कुर्बान करनी पड़ी।”खोड़ा के मुताबिक, सभी आतंकवादी संगठन आधुनिक शिक्षा के माध्यम से महिला सशक्तिकरण के विचार से घृणा करते हैं।उन्होंने कहा कि बोको हराम, तालिबान, अल शबाब, अल कायदा, आईएसआईएस और अन्य आतंकी संगठनों द्वारा, महिलाओं पर किए गए जुल्म पर कई किताबें लिखी जा चुकी हैं।

उन्होंने कहा कि पिछले महीने कश्मीर में कई महिलाओं को निशाना बनाया गया। उदाहरण के लिए, पुलवामा में नगीना बानो और इशरत मुनीर को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी।खोड़ा ने कहा, “वे सभी जिंदगी में आगे बढ़ना और करियर बनाना चाहती थीं। पिछले साल इसी तरह शोपियां में आतंकवादियों ने विशेष पुलिस अधिकारी खुशबू जान की हत्या कर दी थी।”जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय की वरिष्ठ अधिवक्ता मोनिका कोहली मानती हैं कि कश्मीर की महिलाओं को भी जीवन में सपने देखने और आगे बढ़ने का अधिकार है।उन्होंने कहा कि यह सुनने में व्यावहारिक नहीं लगता किंतु यह एक अदृश्य तथ्य है कि बंदूक का दामन थामने वाले पुरुषों की अनुपस्थिति में घर परिवार चलाने की जिम्मेदारी संभालने के कारण बहुत सी लड़कियों को शिक्षा के माध्यम से अपने सपनों को जीने का अवसर नहीं मिला।कोहली ने कहा कि बहुत सी निर्दोष लड़कियों को सुरक्षा बलों का साथ देने और मुखबिरी के आरोपों के चलते मार दिया गया।

उन्होंने  बताया, “हालांकि कश्मीर में स्कूल जाने वाली लड़कियों की अच्छी खासी संख्या है लेकिन देश के अन्य हिस्सों में उनके जैसी लड़कियों को जो स्वतंत्रता प्राप्त है उसमें और कश्मीरी लड़कियों की घुटनभरी जिंदगी में जमीन आसमान का अंतर है।”कोहली ने कहा कि कश्मीर का एकमात्र लड़कियों का रॉक बैंड “प्रगाश” 2013 में कट्टरपंथियों के कारण दिन का उजाला नहीं देख सका।उन्होंने कहा कि हमें उस दिन को नहीं भूलना चाहिए जब जनवरी 2011 में सोपोर जिले में लश्कर के आतंकवादियों ने दो बहनों को बेरहमी से मार डाला था।वे दोनों गरीब लड़कियां अपने माता पिता की सहायता करती थीं और उन्हें आतंकवादियों ने मुखबिर समझकर केवल इसलिए मार दिया था क्योंकि उनके हाथों में मोबाइल फोन था।

 

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