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केजरीवाल पार्टी की जीत और मुस्लिम राजनीति

arvind-kejriwal-scullcapआज हम दिल्ली में हुए रिवर्स पोलराइजेशन यानी उल्टे ध्रुवीकरण का विश्लेषण करेंगे. आज हम आपके लिए एक केस स्टडी लेकर आए हैं. दिल्ली की ये केस स्टडी कहती है कि विकास का चेहरा माने जाने वाले मनीष सिसोदिया बड़ी मुश्किल से सिर्फ 3 हजार वोटों से जीते जबकि नफरत से भरा सांप्रदायिक भाषण देने वाले अमानत-उल्लाह खान ने 71 हजार वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की.

दिल्ली में अमानत-उल्लाह खान भी चुनावों के दौरान भड़काऊ बयान दे रहे थे और वोटों का ध्रुवीकरण कर रहे थे जबकि बीजेपी के नेता अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा ने भी नफरत भरे बयान दिए. कुल मिलाकर दिल्ली का चुनाव बहुत जहरीले वातावरण में लड़ा गया. दोनों तरफ से ध्रुवीकरण की जबरदस्त कोशिश हुई. आखिरकार अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के बयानों का कोई खास असर नहीं हुआ क्योंकि बीजेपी को सिर्फ 8 सीटों पर जीत मिल पाई. अमानत-उल्लाह खान रिकॉर्ड मार्जिन से जीत गए. यहां तक कि अरविंद केजरीवाल की जीत का अंतर भी 21 हजार वोटों का था. अमानत-उल्लाह अरविंद केजरीवाल के मुकाबले भी. करीब साढ़े तीन गुना ज्यादा वोटों से जीते. इसलिए ये केस स्टडी ना सिर्फ राजनीति विज्ञान के छात्रों के लिए बल्कि उन लोगों के लिए भी ज़रूरी है जो समाज की नब्ज़ टटोलने का दावा करते हैं. प्रवेश वर्मा और अनुराग ठाकुर के भड़काऊ बयान हिंदू वोटों को एकजुट नहीं कर सके.

kejriwal-muslim-capअब आपको ये समझना चाहिए कि क्यों विकास की बातें करने वाले नेताओं की जीत का अंतर इतना कम रहा जबकि नफरत की बात करने वाले अमानत-उल्लाह ख़ान नया रिकॉर्ड बनाने में सफल रहे. इसके लिए आपको भारत में ध्रुवीकरण के इतिहास को समझना होगा. विज्ञान में ध्रुवीकरण के सिद्धांत की खोज आज से 212 वर्ष पहले यानी सन 1808 में हुई थी लेकिन भारत के समाज और राजनीति में इसका अस्तित्व इससे भी पुराना है. राजनीति की भाषा में ध्रुवीकरण का मतलब होता है. दो वर्गों का पूरी तरह से बंट जाना यानी उनके मत का विभाजन हो जाना.

ऐसे दो मुस्लिम नेताओं के नाम थे सर सैयद अहमद खान और मोहम्मद अली जिन्ना. ये दोनों टू नेशन थ्योरी के सूत्रधार थे. मोहम्मद अली जिन्ना चाहते थे कि भारत का संविधान मुसलमानों को उनका उम्मीदवार चुनने की स्वतंत्रता दे. यानी जिस सीट पर मुस्लिम बहुसंख्यक हैं वहां सिर्फ मुसलमानों को वोट डालने का अधिकार हो. उन्होंने ये मांग अपने 14 सूत्रीय मसौदे में रखी थी. इतना ही नहीं ब्रिटिश राज के दौरान बंगाल की 117 सीटें ऐसी थी जिन पर सिर्फ मुसलमानों को वोट करने का अधिकार था. किन आजादी के बाद भारत एक धर्म निरपेक्ष देश बन गया और इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान का जन्म हुआ.

keriwal muslimआज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी भारत खुद को ध्रुवीकरण की जंजीरों से मुक्त नहीं कर सका. इसी का नतीजा है कि आज भी भारत में धर्म और जाति के आधार पर वोट डाले जाते हैं और सबसे ताजा उदाहरण देश की राजधानी दिल्ली का है. दिल्ली चुनावों में आम आदमी पार्टी को 70 में से 62 सीटें हासिल हुई हैं जबकि बीजेपी सिर्फ 8 सीटें हासिल कर पाई है. चुनावों से पहले कहा जा रहा था कि शाहीन बाग के नाम पर बीजेपी ने हिंदुओं का ध्रुवीकरण कर दिया है और बड़ी संख्या में हिंदू बीजेपी के पक्ष में वोट डालेंगे.लेकिन नतीजों से ये साफ हो गया कि हिंदुओं का ध्रुवीकरण नहीं हुआ. जिन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा थी, वहां बड़े पैमाने पर रिवर्स पोलराइजेशन (Reverse Polarisation) यानी उलटा ध्रुवीकरण हुआ और मुस्लिम मतदाताओं ने एकजुट होकर मतदान किया.

लेकिन सिर्फ अमानत-उल्लाह ख़ान ही नहीं आम आदमी पार्टी के सभी मुस्लिम उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की है. दिल्ली चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवारों ने औसतन 21 हजार वोटों से जीत दर्ज की है. मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत का अंतर औसतन 43 हज़ार वोटों का है. यानी औसत से लगभग दोगुना. यहां तक कि खुद अरविंद केजरीवाल भी सिर्फ 21 हज़ार वोटों से जीते.जबकि अरविंद केजरीवाल को इस समय देश में विकास का सबसे बड़ा चेहरा कहा जा रहा है.

इसके उलट मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर ना सिर्फ जमकर वोटिंग हुई बल्कि मुस्लिम उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत दर्ज की. उदाहरण के लिए मटियामहल सीट से शोएब इकबाल 50 हज़ार वोटों से जीते हैं. उन्हें 76 प्रतिशत वोट मिले हैं. सीलमपुर से अब्दुर रहमान करीब 37 हज़ार वोटों के अंतर से जीते हैं. उन्हें 56 प्रतिशत वोट मिले हैं. बल्लीमरान से इमरान हुसैन ने 36 हज़ार वोटों से जीत हासिल की और उन्हें 65 प्रतिशत वोट मिले और मुस्तफाबाद से हाजी युनूस की जीत का अंतर 20 हज़ार वोटों का रहा और उन्होंने 53 प्रतिशत वोट हासिल किए. ये सभी आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार थे. ओखला से जीतने वाले अमानतुल्लाह खान को पिछली बार के मुकाबले 26 हज़ार ज्यादा वोट मिले हैं. अब आप सोचिए जिस विधानसभा सीट के केंद्र में शाहीन बाग था. वहां अगर हिंदुओं का ध्रुवीकरण हुआ होता तो क्या अमानतुल्लाह खान इतने बड़े अंतर से जीत पाते?

चुनावों का विश्लेषण करने वाली एजेंसी Axis My India के सर्वे के मुताबिक, दिल्ली में 69 प्रतिशत मुस्लिमों ने आम आदमी पार्टी को वोट डाला है. दिल्ली में उल्टा ध्रुवीकरण कैसे हुआ? इस पर आज हमने Axis My India के डायरेक्टर और CMD प्रदीप गुप्ता से बात की.

यहां आपको एक और आंकड़े पर गौर करना चाहिए. इस आंकड़े के मुताबिक दिल्ली में आम आदमी पार्टी का वोट शेयर पिछले वर्ष के मुकाबले थोड़ा घटा है. 2015 में आम आदमी पार्टी को 54.34 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि इस बार 53.6 प्रतिशत वोट मिले हैं.लेकिन मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर आम आदमी पार्टी का वोट शेयर औसतन 7 प्रतिशत बढ़ा है.अलग-अलग सीटों की बात करें तो मुस्तफाबाद सीट पर आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 23 प्रतिशत बढ़ा है. मटियामहल सीट पर 17 प्रतिशत और चांदनी चौक सीट पर आम आदमी पार्टी का वोट शेयर करीब 16 प्रतिशत बढ़ा है.

दिल्ली में करीब 5 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर्स की संख्या 30 से 40 प्रतिशत के बीच है जबकि 5 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम वोटर्स की संख्या 40 प्रतिशत से ज्यादा है. जहां पूरी दिल्ली में सिर्फ 62.6 प्रतिशत लोगों ने वोट डाले गए, वहीं इन 10 सीटों पर औसतन 66.3 प्रतिशत लोगों ने वोटिंग की. बल्लीमारान सीट पर 71 प्रतिशत वोट पड़े, सीलमपुर में भी 71 प्रतिशत जबकि मटियामहल और मुस्तफाबाद में 70 प्रतिशत वोटिंग हुई. यानी इन सीटों पर दिल्ली की औसत Voting Percentage से 8 से 10 प्रतिशत ज्यादा मतदान हुआ.

अब आप इसको ऐसे समझिए कि जिन सीटों पर मुसलमानों की आबादी 40 प्रतिशत या उससे भी ज्यादा है. वहां करीब करीब 50 या 60 प्रतिशत गैर मुस्लिम रहते होंगे. अगर गैर मुस्लिमों का ध्रुवीकरण हुआ होता तो इन सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार इतने भारी अंतर से जीत कैसे दर्ज करते? ऐसा भी कहा जा सकता है कि हिंदुओं ने धर्मनिरपेक्ष तरीके से वोटिंग की और अपने वोटों को किसी एक धर्म या जाति विशेष की तरफ केंद्रित नहीं होने दिया जबकि शाहीन बाग के बाद से दिल्ली के ज्यादातर मुसलमानों ने एकजुट होकर वोट डाले और ये सुनिश्चित किया कि उनका उम्मीदवार भारी अंतर से जीत जाए. यानी जो लोग ये आरोप लगा रहे थे कि शाहीन बाग का मुद्दा उछालकर बीजेपी हिंदुओं के वोट हासिल करना चाहती है. उन लोगों का आंकलन पूरी तरह से गलत साबित हुआ.

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