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ना काम के ना काज के

kejriwal 3नई दिल्ली। ( मनोज वर्मा )  कहने को तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यही कहते हैं कि कोरोना संकट में दिल्ली सरकार की राशन योजना पर निर्भर 72 लाख लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है। कोई भूखा न रहे इसके लिए भोजन वितरण भी किया जा रहा है। साथ ही हर व्यक्ति को 5 किलो राशन की जगह 7.5 किलो राशन  भी दिया जा रहा है और विधवाओं,वृद्ध लोगों और दिव्यांगों को मिलने वाली पेंशन को दोगुना कर दिया गया। लेकिन मुख्यमंत्री केजरीवाल की बातों और दावों का जमीन पर उतना असर नहीं दिखता जितना उनकी सरकार की टीवी पर विज्ञापन प्रचार शैली में देखने को मिलता है। इसलिए बात चाहे राशन वितरण की हो या अस्पतालों में मरीजों के इलाज की।लोगों के बयान, कोरोना के बढते मामले और कोरोना संकट के बीच दिल्ली में आआप नेताओं की मुस्लिम राजनीति और तब्लीगी जमात के मरकज जैसी घटनाओं ने केजरीवाल सरकार के प्रबंधन तंत्र पर गंभीर सवाल खडे कर दिए हैं।

कोरोना संकट के बीच दिल्ली सरकार लोगों के लिए क्या कर रही है इस सवाल के उत्तर में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से लेकर उनकी सरकार के मंत्री घोषाणओं को पिटारा खोल देते हैं। पर जब ऐसे सवाल पूछे जाते हैं कि दिल्ली में 72 लाख लोगों को राशन कहां मिल रहा है ? दिल्ली से लाखो लोगों का पलायन क्यों हुआ? देश में एक मात्र दिल्ली राज्य के सभी ग्यारह जिले रेड जोन कैसे हो गए? लॉकडाउन के बावजूद दिल्ली में कोरोना के छह हजार से अधिक मामले कैसे पार हो गए? राशन वितरण में भेदभावए हेराफरी का आरोप, अस्पतालों में मरीजों को बेहतर इलाज न मिलने की शिकायतों से संबंधित सवाल पूछा तो केजरीवाल सरकार ऐसे सवालों पर या तो चुप्पी साध लेती है या इन सवालों से किनारा कर एक नई घोषणा कर देती है। केजरीवाल सरकार की कार्यशैली और प्रबंधन को लेकर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता संभालने से पहले एक नई राजनीतिक संस्कृति स्थापित करने की बात खूब जोर से की थी लेकिन बात चाहे सरकार के कामकाज के तरीके की हो या मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की,केजरीवाल सरकार दोनों ही मामलों में शासकों की उसी जमात में खड़ी नजर आ रही है जिसे लेकर जनता अक्सर कथनी करनी में अंतर की नजर से देखती है।

 

keriwal 21 दिल्ली में 72 लाख लोगों को राशन कहां मिल रहा है ? दिल्ली से लाखो लोगों का पलायन क्यों हुआ? देश में एक मात्र दिल्ली राज्य के सभी ग्यारह जिले रेड जोन कैसे हो गए?

2 राजस्थान के एजुकेशनल हब कोटा शहर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी करने वाले दिल्ली के छात्र छात्रों का दिल्ली घर वापसी में देरी का मुदृा विवाद का नया कारण बना।

3 सबसे पहले निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात को लेकर केजरीवाल सरकार की पोल खुली। आज तब्दीगी जमात के कारण देश के कई राज्यों में हजारों कोरोना संक्रमण के मामले हैं। केजरीवाल पार्टी के कई मुस्लिम नेता विधायक तब्दीगी जमात के बचाव में लगे रहे।

4.राशन वितरण में घप्पले और गुणवत्ता की शिकायतें केजरीवाल सरकार के लिए नई मुसीबत बनकर उभरी।दो  राशन दुकानदारों पर एफआइआर दर्ज करने का हुबा आदेश

5 मरीजों और उनके परिजनों के दर्द बयां करते अनेक वीडियो वायरल हैं जो दिल्ली में कोरोना संकट में केजरीवाल सरकार के दावों और प्रबंधन की पोल खोल रहे हैं।

6 कोरोना संकट के समय में भी देश के सभी मुख्यमंत्रियों की तुलना में केजरीवाल टीवी पर अधिक छाए रहते हैं इसलिए भी केजरीवाल के प्रचार पर उनके विरोधी अधिक सवाल उठाते हैं।केजरीवाल सरकार पर एक आरोप प्रचार तंत्र पर बेहिसाब पैसा खर्च करने का

7दिल्ली में शराब कि दुकानों के बाहर हजारों की संख्या में लोगों की लाइनें लग गई तो कोरोेना संकम्रण का खतरा और बढ गया। कोरोना वायरस महामारी पर नियंत्रण पाये जाने तक देश की राजधानी में शराब की दुकानों को बंद रखने का आआप सरकार को निर्देश देने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गयी

8 सरकार ने सभी ब्रांड की शराब की अधिकतम कीमत के ऊपर 70 प्रतिशत विशेष कोरोना शुल्क लगा दिया लेकिन इसके बावजूद शराब की दुकानों के बाहर बड़ी संख्या में लोगों की कतार नजर आती रही। शराब बिक्री के लिए सरकार का ई टोकन व्यवस्था केजरीवाल सरकार की नई शराब बिक्री नीति का हिसा है।

9 दिल्ली में पेट्रोल के भाव में 1.67 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में 7.10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी

10 लॉकडाउन के कारण दिल्ली सरकार को राजस्व में भारी नुकसान हुआ है। इसलिए पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ाकर अपने राजस्व में वृद्धि करना चाहती है सरकार ।

 

kejrieal leadदिल्ली से लोकसभा सांसद रमेश बिधूड़ी कहते भी हैं कि  “ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार की कथनी करनी में अंतर है कोरोना संकट में दिल्ली की जनता आज उसी का दुष्परिणाम भोग रही है। केजरीवाल कहतेे हैं 72 लाख को राशन मिल रहा है लेकिन लोग कहते हें राशन नही मिल रहा। केजरीवाल दिल्ली में लाखों लोगों को खाना खिलाने की बात करते हैं पर यह खाना कहां बन रहा है किसे मिल रहा है किसी को कुछ नहीं पता। जिन्हें खाना मिला वह खाने की गुणवत्ता से नाराज हैं। केजरीवाल मजदूरों को रोकने की बात करते हैं तो दूसरी ओर दिल्ली से लाखों मजदूरों का पलायन क्यों हुआ इसका उत्तर नहीं देते। मोहल्ला क्लीनिक से लेकर दिल्ली सरकार के अस्पतालों में बदहली की शिकायतें खुद डॉक्टर कर रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल धरातल पर भले कुछ न करें, लेकिन विज्ञापनों में उनका काम जमकर बोलता है। विज्ञापन प्रचार पर खर्च होने वाले इस पैसे का इस्तेमाल कोरोना से लोगों को बचाने और राहत देने के लिए होना चाहिए न का अपना चेहरा टीवी पर दिखाने के लिए। ” तो क्या दिल्ली सरकार को लॉकडाउन और अधिक सख्ती से लागू करना चाहिए था कहां कमी रह गई ? इसके जवाब में सांसद रमेश बिधूड़ी कहते हैं “ तबलीगी जमात मामला दिल्ली से ही शुरू हुआ, सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों, पुलिस और यहां तक कि गृहमंत्री ने भी जमातियों की यात्रा की डिटेल बताने और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने की बात कहीं लेकिन केजरीवाल की तरफ से इस मुद्दे पर कोई बयान नहीं आया। केजरीवाल लोगों की सेवा करने के लिए नहीं हैं, बल्कि केवल राजनीति करने के लिए हैं। केजरीवाल सरकार सभी मोर्चो पर फेल रही है। वह राशन बांटने में भी फेल रहे। राशन बांटने का जो उन्होंने लिंक जारी किया वह 15 दिनों तक काम नहीं कर रहा था। लोगों के पास टोकन नंबर हैं, लेकिन समय से उन्हें राशन नही मिल पा रहा है। बिना किसी स्क्रीनिंग के 5-7 लाख मजदूरों को बसों से आनंद विहार छोड़ा गया। अगर दिल्ली हॉटस्पॉट है तो केजरीवाल सरकार की देन है। यह विफलता नहीं तो और क्या है।” दूसरी ओर दिल्ली के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद अजय माकन कहते हैं”दिल्ली में कोरोना के अनेक मामले ऐसे हैं जिनके स्रोत के बारे में पता नहीं है। यह स्थिति बहुत चिंताजनक हैं केजरीवाल जी को बताना चाहिए कि क्या दिल्ली में कोरोना तीसरे चरण में जा रहा है? दिल्ली इकलौता राज्य है जहां 55 चिकित्साकर्मी संक्रमित हुए हैं।”

असल में मजदूरों के दिल्ली से पलायन के बाद से ही मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनकी सरकार पर जिम्मेदारी से बचने और प्रबंधन में विफल रहने के आरोप लग रहे हैं। दिल्ली से मजदूरों के पलायन ने केजरीवाल सरकार की भूमिका पर सवाल उठाया तो इसके बाद राजस्थान के एजुकेशनल हब कोटा शहर में इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी करने वाले दिल्ली के छात्र छात्रों का दिल्ली घर वापसी का मुदृा विवाद का नया कारण बना। लॉकडाउन-एक लागू होते समय कोटा शहर में करीब सभी राज्यों के बच्चे फंस गए थे। इन बच्चों के परिजनों को उम्मीद थी कि 21 दिन बाद लॉकडाउन खुलने पर बच्चे घर आ जाएंगे लेकिन जब सरकार ने लॉकडाउन-दो लागू किया तो बच्चों के साथ परिजनों की बेचैनी बढ़ गई। ऐसे में बच्चों और उनके परिजनों का चिंतित होना लाजमी था। बच्चों और परिजनों की परेशानी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समझा उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ बातचीत करके उत्तर प्रदेश के छात्रों को निकालने पर रजामंदी बनाई। उस समय इस बात का विरोध भी हुआ लेकिन उत्तर प्रदेश ने 300 से ज्यादा बसों को लगाकर अपने 11 हजार बच्चे घरों तक पहुंचाए। जब यह सब कुछ हो रहा था तब अरविंद केजरीवाल मौन धारण किए हुए थे। देर से ही सही अरविंद केजरीवाल सरकार ने भी दिल्ली के बच्चों को कोटा से निकालने का निर्णय लिया तो लिया उनकी सोशल मीडिया टीम ने इसका प्रचार अधिक किया। हैशटैग चलाए जाने लगे। विरोधियों ने सवाल पूछा कि दिल्ली के छात्र छात्राओं को कोटा से बुलाने का फैसला देर से क्यों लिया ।

दरअसल लॉकडाउन-एक की शुरुआत से अरविंद केजरीवाल सरकार के प्रबंधन की विफलता साफ झलकने लगी थी। सबसे पहले निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात को लेकर केजरीवाल सरकार की पोल खुली। आज तब्दीगी जमात के कारण देश के कई राज्यों में हजारों कोरोना संक्रमण के मामले हैं। केजरीवाल पार्टी के कई मुस्लिम नेता विधायक तब्दीगी जमात के बचाव में लगे रहे। इसके बाद उत्तर प्रदेश बिहार के प्रवासी श्रमिकों के साथ अरविंद केजरीवाल सरकार का दुर्व्यवहार खुलकर सामने आया। राशन न मिलने का डर दिखाया। डराने वाले संदेश कराए गए। पूरा षड़्यंत्र रचकर डीटीसी बसों से श्रमिकों को उत्तर प्रदेश-दिल्ली सीमा पर छुड़वाया गया। इसे लेकर केजरीवाल सरकार पर गंभीर आरोप लगे। इस बीच केजरीवाल सरकार ने राशन वितरण को लेकर खासतौर पर अधिक प्रचार प्रसार किया इसे लेकर उन्होंने कई घोषणाएं भी की पर राशन वितरण में घप्पले और गुणवत्ता की शिकायतें केजरीवाल सरकार के लिए नई मुसीबत बनकर उभरी। कहने को दिल्ली सरकार गरीबों को बिना राशन कार्ड के भी राशन देने का इंतजाम कर रही है। पर राशन में हेराफेरी करने वाले जनकपुरी के एक डीलर पर एफआईआर दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी के आदेश सरकारी व्यवस्था को मुंह चिढा रहे हैं। हुआ यह कि जनकपुरी में एक सरकारी दुकान पर राशन आया लेकिन दुकानदार ने सारा राशन बाहर भेज दिया और खुद दुकान बंद कर फरार हो गया। इसकी जानकारी दिल्ली सरकार के मंत्री इमरान हुसैन को औचक निरीक्षण से मिली। इसी तरह एक अन्य राशन वाले ने भी ट्रक दिल्ली से बाहर भेजने की कोशिश की। लोगों ने शिकायत की तो उसकी गिरफ्तारी के आदेश भी जारी किए गए। यह राशन वितरण में हेराफेरी के वो मामले हैं जो सामने आए लेकिन ऐसी हेरीफेरी की कहानी पूरी दिल्ली मेें जनता से सुनने को मिल रही हैं। कहीं राशन मिल नहीं रहा है तो कहीं कम मिल रहा है। कहीं राशन की खराब गुणवत्ता की शिकायतें हैं। इसी प्रकार दिल्ली के कई क्षेत्रों में राशन के नाम पर गेंहू वितरण के मामले में भी सामने आए हैे। सवाल उठता है कि जब लॉकडाउन है और चक्की खुल नहीं रही हैं तो गेंहू पिसेगा कहां से और जब पिसेगा नहीं तो लोगों को आटा कहां से मिलेगा। राशन वितरण के काम में शिक्षकों की डयूटी लगा दी गई। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन सेवा बंद है ऐसे में राशन वितरण के लिए शिक्षक जाएं भी तो जाएं कैसे। पर केजरीवाल सरकार का आदेश है तो लोग जैसे तैसे जा रहे हैं। इस तरह के अव्यावहारिक फैसलों ने भी केजरीवाल सरकार की नीतियों को पलीता लगाने का काम किया है।

अब बात कोरोना मरीज़ के इलाज की। लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में कोरोना के मरीजों के इलाज में होने वाली घोर लापरवाही के लक्षणों से पता चलता है कि मरीजों के साथ कितना अमानवीय, क्रूर और संवेदनहीन व्यवहार किया जा रहा है।जैसे लक्षण से कोरोना के मरीजों का पता चलता है इसी तरह अस्पताल के लक्षणों से इलाज में लापरवाही का पता चलता है।कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए बनाए गए मुख्य अस्पताल के इस मामले ने खुद को दिल्ली के बुजुर्गों का बेटा मानने वाले अरविंद केजरीवाल, दिल्ली सरकार और डॉक्टरों के तमाम दावों की धज्जियां उड़ा दी। कोरोना पीड़ित  मरीज़ को बिना इलाज, भूखे रख कर एक तरह से उसे मरने के लिए छोड़ देने का यह मामला किसी मीडिया ने नहीं बल्कि पीड़ित मरीज के परिवार ने उजागर किया है। जहांगीर पुरी में रहने वाले अरविंद गुप्ता की जान बचाने के लिए उसकी बेटी प्रतिभा गुप्ता और पत्नी ने एक वीडियो बना कर अस्पताल और सरकार की पोल खोल दी। इस वीडियो के वायरल होने के बाद सरकार के कान पर जूं रेंगी और मरीज़ की सुध ली। प्रतिभा गुप्ता ने वीडियो में बताया कि 16 अप्रैल की रात में दो बजे उसके पिता दो मिनट के लिए बेहोश हो गए थे। वह उनको इलाज के लिए शालीमार बाग में फोर्टिस अस्पताल में ले गए। वहां के डाक्टरों ने टेस्ट कराने के बाद कहा कि वह कोरोना पाज़िटिव हैं। सरकारी आदेश के अनुसार इनका इलाज सिर्फ लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में ही होगा।

प्रतिभा के अनुसार हमारी राय या मर्ज़ी के बिना उनके पिता को लोकनायक अस्पताल में भेज दिया गया। 18 अप्रैल की शाम को अस्पताल के बाहर एंबुलेंस में दो तीन घंटे के इंतजार के बाद उसके पिता को लोकनायक अस्पताल वालों ने भर्ती किया। भर्ती किए जाने के बाद उन्हें किसी डॉक्टर ने नहीं देखा यहां तक कि उनको खाना भी नहीं दिया गया जबकि वह डायबिटीज/ शुगर, हाइपरटेंशन  के मरीज हैं। भर्ती किए जाने के अगले दिन सुबह यानी 19 अप्रैल को उनको नाश्ता दिया गया। इसके बाद दोपहर में उनसे कह दिया गया कि नरेला क्वारंटीन सेंटर में भेजा जाएगा। सारा दिन वह इंतजार करते रहे आधी रात को कहा कि अब तो देर हो गई कल भेजेंगे। प्रतिभा के अनुसार 20 अप्रैल को सुबह 5 बजे उसके पापा का फ़ोन आया और उन्होंने रोते हुए कहा कि मुझे 102 बुखार है।  मुझे बचाने के लिए मुझे यहां से निकालो और किसी प्राइवेट अस्पताल में ले जाओ। यहां तो अभी तक न तो डाक्टर ने देखा और न ही कोई उनकी सुनवाई कर रहा है। अपने पिता की ऐसी हालत सुन कर प्रतिभा ने अपनी मां के साथ वीडियो बनाया और उसे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी टैग कर टि्वट कर दिया। मां- बेटी का रोते हुए बनाया यह वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुआ। इसके बाद सरकार और डाक्टर हरकत में आए और उसके पिता की सुध ली गई और उनके लिए अलग से कमरे की व्यवस्था भी की गई यह जानकारी भी प्रतिभा गुप्ता ने ही दूसरा वीडियो जारी करके दी।

प्रतिभा गुप्ता ने तो अपने पिता की जान बचाने के लिए  समझदारी से काम लिया और वीडियो बना कर वायरल कर दिया। इस मामले ने इलाज में घोर लापरवाही बरतने को उजागर किया। लेकिन ऐसा कितने लोग कर सकते हैं ? अमूमन मरीज़ के परिजन जो खुद भी क्वारंटीन में हो बीमारी के डर और घबराहट में जिनकी मानसिक स्थिति सामान्य नहीं रहती वह ऐसा करने की वह सोच भी नहीं सकते। एक अन्य मामले में दिल्ली पुलिस के सिपाही ने भी खोली सरकार के दावों की पोल खोल दी।दिल्ली पुलिस का सिपाही सचिन तोमर 17 अप्रैल को कोरोना पाज़िटिव पाया गया है। तिलक विहार पुलिस चौकी में तैनात सचिन नजफगढ़ के चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेदिक अस्पताल में भर्ती हुए। सचिन ने भी अस्पताल से अपना एक वीडियो वायरल किया। सचिन ने कहा कि गले में खराश या खराबी और बुखार के लिए भी यहां किसी को कोई दवाई नहीं दी जा रही है। पीने के लिए गर्म पानी भी नहीं दिया जाता। एक फ्लोर पर बीस मरीजों को रखा गया है और सिर्फ एक बाथरूम है। चद्दर और तकिया कवर भी नहीं बदले जा रहे हैं। सचिन ने कहा कि उनके बच्चों का भी सरकार ने कोरोना टेस्ट नहीं कराया है। उन्हे कह दिया गया कि प्राइवेट सिटी लैब में 4500 रुपए में खुद टेस्ट करा लो। जहां तक दवा, गर्म पानी, चद्दर आदि न देने और टेस्ट न कराने की बात है तो यह डाक्टरों, अस्पताल प्रशासन और दिल्ली सरकार के ऊपर सवालिया निशान लगाते हैं। दिल्ली पुलिस के एक जवान की मौत ने सरकारी तंत्र को कटघरे में खडा कर दिया। मरीजों और उनके परिजनों के दर्द बयां करते अनेक वीडियो वायरल हैं जो दिल्ली में कोरोना संकट में केजरीवाल सरकार के दावों और प्रबंधन की पोल खोल रहे हैं।

पर असल सवाल यह है कि इतनी विफलताओं की यह कहानी मुखर तौर पर सामने क्यों नहीं आ पा रही है।
दरअसल केजरीवाल सरकार पर एक आरोप प्रचार तंत्र पर बेहिसाब पैसा खर्च करने का भी लग रहा है। कारण जब से वो दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, विज्ञापनों पर उनकी सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। 2019 की एक आरटीआई से विज्ञापनों पर खर्च के जो आंकड़े आए थे,वो चौंकाने वाले थे। आरटीआई के जवाब में बताया गया था कि 2015 से 2019 तक अरविंद केजरीवाल सरकार ने 311.78 करोड़ रुपए खर्च किए, जो पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार से चार गुना अधिक है। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी केजरीवाल की विज्ञापन नीति बदस्तूर जारी है। दिल्ली की सड़कों पर हर जगह केजरीवाल सरकार के संस्तुति वाले विज्ञापन लगे मिल जाएंगे। न्यूज चैनलों और एफ.एम रेडियो पर उनके विज्ञापन छाए ही रहते हैं। समाचारपत्रों में पूर्ण पृष्ठ वाले विज्ञापन अक्सर दिखते हैं। विज्ञापनों से अंदाज होता है कि सरकार काूम कर रही है। यह बात अलग है कि विज्ञापन से जमीनी काम की सच्चाई का पता नहीं चलता। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम से मिली जानकारी के अनुसार आम आदमी पार्टी (आप) के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने अपने पहले चार वर्षों में हर साल करीब 78 करोड़ रुपये विज्ञापनों पर खर्च किए हैं जबकि इसकी तुलना में पिछली शीला दीक्षित सरकार ने 19 करोड़ रुपये सालाना विज्ञापनों पर खर्च किए थे। आईएएनएस को आरटीआई से सूचित किया गया कि शीला दीक्षित की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने 2008-2012 तक में 75.9 करोड़ रुपये यानी लगभग 18.97 करोड़ रुपये सालाना विज्ञापनों पर खर्च किए हैं। वहीं अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आप सरकार ने 2015-2019 के बीच 311.78 करोड़ रुपये जो लगभग 77.94 करोड़ रुपये सालाना के हिसाब से यानी करीब कांग्रेस सरकार से चार गुना ज्यादा विज्ञापनों पर खर्च किए हैं। प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों द्वारा लिया जाने वाला औसत विज्ञापन शुल्क कांग्रेस सरकार के समय की तुलना में 20-40 प्रतिशत तक बढ़ गया है।कोरोना संकट के समय में भी देश के सभी मुख्यमंत्रियों की तुलना में केजरीवाल टीवी पर अधिक छाए रहते हैं इसलिए भी केजरीवाल के प्रचार पर उनके विरोधी अधिक सवाल उठाते हैं।

एक तरफ कोरोना संकट में केजरीवाल सरकार के प्रचार विज्ञापन पर खर्च सवालों के घेरे में हैं तो दूसरी ओर केजरीवाल सरकार को अपने खजाने की चिन्ता है। खजाना भरने की केजरीवाल की चाहत दिल्ली वालों की जेब पर भारी पड़ सकती है। दिल्ली में पहले से कोरोना का संक्रमण विकराल हो चुका है और कोरोना मरीजों की संख्या छह हजार से अधिक हो चुकी है।ऐसे में दिल्ली में शराब कि दुकानों के बाहर हजारों की संख्या में लोगों की लाइनें लग गई तो कोरोेना संकम्रण का खतरा और बढ गया। कोरोना वायरस महामारी पर नियंत्रण पाये जाने तक देश की राजधानी में शराब की दुकानों को बंद रखने का आआप सरकार को निर्देश देने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गयी। इस याचिका में कहा गया है कि शराब की दुकानें खोलने से लॉक डाउन का मकसद फेल हो रहा है।यह याचिका गैर सरकारी संगठन सिविल सेफ्टी काउन्सिल आफ इंडिया ने दायर की। याचिका में बगैर किसी योजना और भीड़ के प्रबंधन के बारे में किसी तैयारी के बिना ही शराब की दुकानें खोलने के बारे में दिल्ली सरकार और उसके आबकारी विभाग के फैसले को चुनौती दी गयी है। अधिवक्ता अरविन्द वशिष्ठ के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि दिल्ली की जनता पिछले कई दिन से लॉकडाउन के नियमों का पालन कर रही थी, लेकिन शराब की दुकानें खोलने के बारे में तीन मई की अधिसूचना ने सारे किये धरे पर पानी फेर दिया है और अब इससे नागरिको की जिंदगी को खतरा हो सकता है। शराब की दुकानों पर बड़ी तादात में लोगों की भीड़ जुट रही दिल्ली सरकार के इस फैसले के बाद शराब की दुकानों के बाहर बड़ी संख्या में लोगों की लाइनें लग गयीं और सामाजिक दूरी बनाये रखने के नियमों की घज्जियां उड़ गयी। याचिका में कहा गया है कि चार मई को सरकार ने सभी ब्रांड की शराब की अधिकतम कीमत के ऊपर 70 प्रतिशत विशेष कोरोना शुल्क लगा दिया लेकिन इसके बावजूद शराब की दुकानों के बाहर बड़ी संख्या में लोगों की कतार नजर आती रही। शराब बिक्री के लिए सरकार का ई टोकन व्यवस्था केजरीवाल सरकार की नई शराब बिक्री नीति का हिसा है।

इस बीच दिल्ली की जनता पर दोहरी मार करते हुए केजरवीवाल सरकार ने पेट्रोल और डीजल के रेट भी बढ़ा दिए। दिल्ली में पेट्रोल के भाव में 1.67 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत में 7.10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी केजरीवाल सरकार ने कर दी। दिल्ली सरकार द्वारा वैट में इजाफा करने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों में यह तेजी देखने को मिली है। लॉकडाउन के कारण दिल्ली सरकार को राजस्व में भारी नुकसान हुआ है। इसलिए सरकार पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ाकर अपने राजस्व में वृद्धि करना चाहती है। कोरोना वायरस संकट की वजह से सरकारों के राजस्व पर बड़ा अंतर पड़ा है। दिल्ली सरकार का रेवेन्यू भी अप्रैल में 3 हजार  करोड़ से घटकर तीन सौ करोड़ के आसपास पहुंच गया है। ऐसे में अब सरकार खर्च कम करने में जुटी है। पर असल सवाल जो सरकार प्रचार से काम करते हुए अधिक दिखना और दिखाने का काम करती हो उस सरकार के राज में लोग व्यवस्था पर कम भगवान भरोसे अधिक नजर आते हैं।

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