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खालिस्तान का अर्थ क्या है ?

Bhindarawala 2नई दिल्‍ली:  आजकल हमारे देश में खालिस्तान की काफी चर्चा हो रही है. लेकिन ये खालिस्तान क्या है और इसके उद्देश्य कैसे भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरनाक हैं. खालिस्तान के इतिहास और मौजूदा स्थिति की पूरी एबीसीडी  बताएंगे और ये समझने की भी कोशिश करेंगे कि कैसे Sikhistan के विचार ने खालिस्तान का रूप लिया.

खालिस्तान का अर्थ क्या है?

हम चाहते हैं कि आज के हमारे इस विश्लेषण को आप बहुत ध्यान से पढ़ें क्योंकि, नफ़रत को हराने का एक ही तरीक़ा होता है और वो है, सही जानकारी और सही इतिहास, जिसके बारे में आज हम आपको बताएंगे. लेकिन सबसे पहले आप ये समझिए कि खालिस्तान का अर्थ क्या है?खालिस्तान का अर्थ है- The Land Of Khalsa. हिन्दी में इसका मतलब है,  खालसा के लिए एक अलग राष्ट्र या सिखों के लिए अलग राष्ट्र.  खालसा की स्थापना सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने वर्ष 1699 में की थी. खालसा का अर्थ होता है, प्‍योर यानी शुद्ध. लेकिन समय के साथ इस विचार के उद्देश्य बदल गए और इसका राजनीतिकरण हो गया. इसे समझने के लिए आज हम इतिहास के कुछ पन्नों को पलटेंगे और इसके लिए आपको हमारे साथ 100 वर्ष पीछे जाना होगा.

गुरुद्वारा सुधार आंदोलन की शुरुआत

ये बात वर्ष 1920 की है, जब भारत अंग्रेज़ों से आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था. इस दौरान एक आंदोलन की शुरुआत हुई थी और इसका नाम था, गुरुद्वारा सुधार आंदोलन. ये बहुत प्रभावशाली आंदोलन था और इसका मकसद था,  भारत के गुरुद्वारों को उदासी सिख महंतों से मुक्त कराना, जिन्हें उस समय के अकाली, हिंदू महंत मानते थे.  हालांकि उदासी सिख सम्प्रदाय की स्थापना खुद गुरु नानक देव जी के बड़े बेटे श्रीचंद ने की थी.

इस आंदोलन के तहत वर्ष 1920 से 1925 के बीच हुए संघर्ष के दौरान 30 हजार से ज्‍यादा सिखों को जेलों में डाल दिया गया. 400 सिख मारे गए और लगभग 2 हजार सिख घायल हुए थे. उसी दौरान 1920 में 10 हजार सिखों की एक बैठक के बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन हुआ था और आज भारत में गुरुद्वारों का प्रबंधन इसी कमेटी के पास है.

ये आंदोलन पांच वर्षों तक चला और उस समय सैकड़ों गुरुद्वारे, जिनमें अमृतसर के गोल्‍डन टेम्‍पल और पाकिस्तान के ननकाना साहिब गुरुद्वारे का नियंत्रण उदासी सिख महंतों से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पास चला गया था. 1925 आते आते अंग्रेज़ों ने संघर्ष कर रहे सिखों की ज़्यादातर मांगें मान ली थीं, जिसके बाद ये आन्दोलन ख़त्म हो गया.

हालांकि इस आंदोलन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बात ये है कि जब ये संघर्ष चल रहा था तब सिख तीन हिस्सों में बंट चुके थे.

-पहले वो थे, जो सिर्फ़ गुरुद्वारों को उदासी सिख महंतों से मुक्त कराना चाहते थे.

-दूसरे लोग वो थे, जो इस आंदोलन के समाप्त होने के बाद भी भारत की आज़ादी के लिए लड़ते रहे.

-और तीसरे लोग वो थे, जिन्होंने इसे सिख सांप्रदायिकता का राजनीतिक मंच बना दिया.

ऐसा करने वाले लोगों ने ही सिखों को हिंदुओं और मुसलमानों से अलग दिखाने का प्रयास शुरू किया और यहीं से अलग सिख देश की मांग ने जन्म लिया,  जिसके लिए Sikhistan शब्द इस्तेमाल हुआ.

खालिस्तान का विचार कैसे अस्तित्व में आया

हिंदुओं के लिए सिखों के मन में अलगाव की भावना के पीछे दो बड़ी वजह थीं.

-पहली ये कि समाज में हिंदू समुदाय ज्यादा प्रभावशाली था और दूसरी वजह थी सरकारी नौकरियों और राजनीति में सिखों की कमज़ोर स्थिति.

-वर्ष 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पहली बार पूर्ण स्वराज की मांग रखी थी और अंग्रेज़ों से भारत को आज़ाद कराने का संकल्प लिया था. लेकिन कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन का भी विरोध हुआ था और ऐसा करने वाले तीन ग्रुप थे.

-पहला ग्रुप मोहम्मद अली जिन्नाह का था, जिनका मानना था कि मुसलमानों के लिए एक अलग देश होना चाहिए.

-दूसरा ग्रुप भारत के संविधान निर्माता डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर का था, जो दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे थे.

-और तीसरा ग्रुप मास्टर तारा चंद का था, जो ये कह रहे थे कि अगर भारत में मुसलमानों के लिए अलग से सीटें आरक्षित की जाती हैं तो इस आधार पर सिख अल्पसंख्यकों के लिए भी सीटें आरक्षित होनी चाहिए.

-मास्टर तारा चंद उसी शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के संस्थापक सदस्य थे, जिसका गठन गुरुद्वारों को मुक्त कराने के लिए किया गया गया था.  मास्टर तारा चंद ने अपनी दो बड़ी बातों को लेकर लाहौर अधिवेशन का विरोध किया था.

– पहली बात ये कि वो चाहते थे कि कांग्रेस सिखों को नजरअंदाज न करे.

– और दूसरी बात ये कि उन्हें डर था कि राजनीतिक हिस्सेदारी में सिखों की भूमिका बहुत सीमित रह जाएगी क्योंकि, सिखों की आबादी उस समय भी हिंदू और मुसलमानों के मुकाबले  काफी कम थी.

इन्हीं वजहों से बाद में सिखों के लिए अलग देश की मांग उठी और कहा जाता है कि खालिस्तान का विचार यहीं से अस्तित्व में आया. हालांकि तब खालिस्तान की जगह Sikhistan का शब्द इस्तेमाल होता था.

आज़ादी के आंदोलन के दौरान कई बार उठी अलग सिख देश की मांग  

भारत की आज़ादी के लिए हुए आंदोलन के दौरान अलग सिख देश की मांग कई बार उठी लेकिन जब 1947 में भारत आज़ाद हुआ तो उसके दो हिस्से हुए. पहला था, भारत और दूसरा था पाकिस्तान. विभाजन के दौरान संयुक्त पंजाब में जहां सिखों की आबादी ज़्यादा थी, उसका पश्चिमी हिस्सा पाकिस्तान में चला गया और पूर्वी पंजाब भारत का हिस्सा बन गया और इससे कुछ सिखों का अलग देश का सपना टूट गया.

इससे नाराज़ अकाली नेताओं ने सांप्रदायिक सिद्धांतों को सिख राजनीति का केन्द्र बना लिया. अकाली नेताओं ने शुरू से ही ये कहा कि सिख विचारधारा में धर्म और राजनीति को अलग करना संभव नहीं है.  इन लोगों का तब ये भी कहना था कि सिख समुदाय के अधिकारों को सिर्फ वही अभिव्यक्त कर सकते हैं और यही नहीं, उन्होंने आज़ाद भारत में लगातार सिखों के साथ भेदभाव की बातें कहीं, जो कि ग़लत थी.

हालांकि इसी का परिणाम था कि 1953 में मास्टर तारा चंद, जो उस समय अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी का प्रमुख चेहरा थे, उन्होंने सिखों से कहा कि अंग्रेज़ चले गए हैं लेकिन हमें आज़ादी नहीं मिली है. हमारे लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ इतना है कि हमारे शासक गोरों से काले बन गए हैं.  लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सिख धर्म और हमारी स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है.  आज हम आपके लिए एक नक्शा भी ढूंढ कर लाए हैं, इस नक्शे की मदद से आप ये समझ सकते हैं कि 1966 से पहले पंजाब कैसा दिखता था

यहां एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि आज़ादी के बाद भारत के जिस एक हिस्से को PEPSU यानी पटियाला एंड ईस्‍ट पंजाब स्‍टेट्स यूनियन कहा जाता था, उसे 1956 में पंजाब में शामिल कर लिया गया.

तीन हिस्‍सों में बंट गया पंजाब 

जिस समय ये सब हो रहा था, उस दौरान संत फतेह सिंह ने Punjab Suba नाम से एक आंदोलन की शुरुआत की. इसका मकसद था पंजाबी भाषा बोलने वाले लोगों का एक अलग राज्य बनाना. लेकिन उस समय सरकार ने इस मांग को इसलिए नहीं माना क्योंकि, तब उसे लग रहा था कि इस राज्य की मांग की आड़ में अलग सिख राज्य का सपना देखा जा रहा है और भारत का संविधान धर्म के आधार पर इसकी इजाज़त नहीं देता.

हालांकि 10 साल के बाद ही इसे लेकर सरकार का रुख़ बदल गया और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वर्ष 1966 में पंजाब को तीन हिस्सों में बांट दिया.

-पहला हिस्सा वो है, जिसे आज पंजाब कहते हैं.

-दूसरा हिस्सा हरियाणा था.

-और तीसरे हिस्से में वो पहाड़ी इलाके थे, जिन्हें हिमाचल प्रदेश को सौंप दिया गया.

-इसके अलावा चंडीगढ़ को केन्द्र शासित प्रदेश और पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी बना दिया गया.

बंटवारे के बाद खालिस्तान की राजनीति में आया नया मोड़ 

पंजाब के इस बंटवारे के बाद ही खालिस्तान की राजनीति में एक नया मोड़ आया. ये वो दौर था, जब खालिस्तान शब्द का ज़्यादा इस्तेमाल होना शुरू हुआ. पंजाब के बंटवारे के बाद अकाली दल ने कई मांगें सरकार के सामने रख दी. उस समय भी देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी.

1973 में शिरोमणि अकाली दल ने 12 लोगों की एक कमेटी बनाई, जिन्होंने Anandpur Sahib Resolution पास किया. इस रेजॉल्‍यूशन  की तीन बड़ी मांगें थीं.

-पहली मांग ये थी कि पंजाब की नदियों, सतलुज और ब्यास के पानी का बंटवारा फिर से हो.

-दूसरी मांग थी कि चंडीगढ़ को पूरी तरह से पंजाब को सौंप दिया जाए.

-और तीसरी मांग थी कि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के उन ज‍िलों को, जहां सिखों की आबादी अधिक है, उन्हें पंजाब में शामिल किया जाए.

जब Anandpur Sahib Resolution पास हुआ, तब पंजाब में शिरोमणि अकाली दल की राजनीतिक स्थिति काफी कमज़ोर हो गई थी. ऐसे में अकाली दल के नेता इंदिरा गांधी की सरकार पर ज्यादा दबाव नहीं बना सके.

जरनैल सिंह भिंडरावाले कैसे बना पोस्‍टर बॉय

सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि अकाली दल सभी सिखों के प्रतिनिधित्व का दावा करता था लेकिन 1952 से 1980 के बीच हुए चुनावों में अकाली दल को पंजाब में औसतन 50 प्रतिशत वोट भी नहीं मिले. इस राजनीतिक विफलता की वजह से ही पंजाब में अलगाववादी विचारधारा मज़बूत होनी शुरू हुई और सिखों के लिए खालिस्तान नाम का अलग देश बनाने की मांग ने जोर पकड़ लिया. ये वही दौर था, जब पंजाब में आतंकवाद शुरू हुआ और जरनैल सिंह भिंडरावाले इसका पोस्‍टर बॉय बन गया.

यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि शुरुआती दिनों में इंदिरा गांधी और पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष ज्ञानी जैल सिंह दोनों ने भिंडरावाले का समर्थन किया था क्योंकि, भिंडरावाले के ज़रिए इंदिरा गांधी पंजाब में अकाली दल को और कमज़ोर करना चाहती थीं. लेकिन इंदिरा गांधी का ये क़दम उनके लिए सबसे बड़ी ग़लती साबित हुआ.

साल 1980 से 1984 के बीच पंजाब में सैकड़ों निर्दोष लोगों की दिनदहाड़े हत्याएं हुईं और हिंदुओं और सिखों के बीच टकराव पैदा करने की कोशिश की गई. भिंडरावाले ने शुरुआत में निरंकारियों और खालिस्तान का विरोध करने वालों को अपना निशाना बनाया और इसके बाद पत्रकार, नेता, पुलिस और हिन्दू समुदाय के लोग भी उसके निशाने पर आ गए.

जुलाई 1982 तक भिंडरावाले इतना मजबूत हो गया था कि उसने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में अपनी जड़ें मज़बूत कर ली थीं और जून 1984 तक हालात इतने बिगड़ चुके थे कि स्वर्ण मंदिर को खालिस्तानी अलगाववादियों से मुक्त कराने के लिए इंदिरा गांधी के पास सेना के अलावा दूसरा और कोई विकल्प नहीं बचा था. देश के अंदरुनी मामले में इतने बड़े स्तर पर सेना का ऐसा इस्तेमाल पहली बार हुआ था.

5 जून 1984 को भारतीय सेना को स्वर्ण मंदिर में घुसना पड़ा और इसे ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार कहा गया. ये ऑपरेशन 10 जून दोपहर को समाप्त हुआ, जिसमें 83 जवान शहीद हुए थे और 493 खालिस्तानी आतंकवादी मारे गए थे, जिनमें जरनैल सिंह भिंडरावाले भी था.

इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ सिखों में रोष 

भिंडरावाले के मारे जाने के बाद इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ सिखों में रोष था और 31 अक्टूबर 1984 की सुबह उनके दो सिख अंगरक्षकों ने उनकी हत्या कर दी थी.  इसी के बाद देश में बड़े पैमाने पर सिखों के ख़िलाफ़ दंगे हुए और कांग्रेस के बड़े नेताओं पर इन दंगों में शामिल होने के भी आरोप लगे.  इन दंगों के बाद धीरे धीरे भारत में खालिस्तान की मांग कमज़ोर पड़ने लगी.

-अगस्त 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर कर, शिरोमणि अकाली दल के नेता हरचंद सिंह लोगोंवाल ने चुनावी राजनीति में शामिल होने पर सहमति दी. हालांकि इसके बावजूद पंजाब में आतंकवादी हमले जारी रहे.

-23 जून 1985 को एयर इंडिया के कनिष्क विमान को हवाई यात्रा के दौरान आतंकवादियों ने बम धमाके से उड़ा दिया था, जिसमें 329 लोगों मारे गए थे.

-10 अगस्त 1986 को भारत के 13वें सेना प्रमुख जनरल अरुण श्रीधर वैद्य की हत्या कर दी गई क्योंकि, वो ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार के दौरान भारत के सेना प्रमुख थे और 31 अगस्त 1995 को पंजाब के पूर्व CM बेअंत सिंह को कार बम धमाके में मार दिया गया.

हालांकि यहां समझने वाली बात ये है कि पंजाब में हिंसा और आतंक के माहौल को देखते हुए वर्ष 1987 में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और इसके बाद सीधे वर्ष 1992 में पंजाब में विधान सभा चुनाव हो पाए थे. महत्वपूर्ण बात ये है कि 1984 में सिख दंगों और उसके बाद हुई आतंकवादी घटनाओं के बावजूद तब पंजाब में कांग्रेस सरकार बनाने में कामयाब रही थी.  मुख्यमंत्री बेअंत सिंह बने थे.  लेकिन 31 अगस्त 1995 को उन्हें भी कार बम धमाके में मार दिया गया.

खालिस्तान के विचार को बहुत से सिखों ने नकार दिया

आज भारत में खालिस्तान के विचार को बहुत से सिखों ने नकार दिया है.  लेकिन विदेशों में बैठे खालिस्तानी संगठन आज भी भारत के टुकड़े टुकड़े करने का षड्यंत्र रचते हैं और इन संगठनों को पाकिस्तान का भी खुला समर्थन मिलता है.  कनाडा इनके लिए सुरक्षित ज़मीन बन गया है. यही वजह है कि भारत में आंदोलन तो कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहा है लेकिन ज़्यादा चर्चा खालिस्तान की हो रही है क्योंकि, खालिस्तान ही इसकी जड़ में है.

सिखों का गौरवमयी इतिहास

हालांकि भारत की रक्षा में सिखों का गौरवमयी इतिहास रहा है.  ये बात हमारे दुश्मनों को बुरी लगती है और वो भारत में सिखों को बदनाम करने और उन्हें गुमराह करने के लिए तरह तरह की साज़िश रचते हैं. हमें लगता है कि इसी साज़िश को आज आपको पहचानना है और हमें पूरी उम्मीद है कि आज के हमारे इस विश्लेषण से आप खालिस्तान और इसकी मांग को समझ गए होंगे और ये भी समझ गए होंगे कि खालिस्तान एक भारत विरोधी विचार है, जिसमें टुकड़े टुकड़े गैंग खाद और पानी डालने का काम करता है.

अमेरिका के अखबार में क्‍यों छपा किसानों का 1 करोड़ 80 लाख रुपये का विज्ञापन?

किसानों के 1 करोड़ 80 लाख रुपये वाले विज्ञापन के बारे में बताएंगे. ये विज्ञापन किसानों के हितों के नाम पर अमेरिका के अखबार The New York Times में छपा है. 16 फरवरी को इस समाचार पत्र में एक पूरे पेज का विज्ञापन प्रकाशित किया गया है.  विज्ञापन भारत में चल रहे किसान आंदोलन के समर्थन में है.

1 करोड़ 80 लाख रुपये वाली कागजी हमदर्दी का मकसद

इस विज्ञापन को एक NGO ने छपवाया है और समर्थन के तौर पर 70 से ज्यादा संस्थाओं और व्यक्तियों के हस्ताक्षर भी इस विज्ञापन पर मौजूद हैं. इनमें से से किसी भी व्यक्ति का सीधे तौर पर भारत और भारत के किसान से कोई संबंध नहीं है. किसानों के नाम पर छापे गए इस विज्ञापन में ऐसे कई नाम मौजूद हैं जिन्हें देखकर आप समझ सकते हैं कि किसान के नाम पर 1 करोड़ 80 लाख रुपये वाली कागजी हमदर्दी का मकसद क्या है.

समर्थन में एमनेस्‍टी इंटरनेशनल की अमेरिकी ब्रांच का नाम

विज्ञापन में समर्थन के तौर पर एमनेस्‍टी इंटरनेशनल की अमेरिकी ब्रांच का नाम लिखा है. वहीं एमनेस्‍टी इंटरनेशनल जो भारत में मानवाधिकारों की रक्षा के नाम पर भारत विरोधी प्रोपेगेंडा चलाती है. प्रवर्तन निदेशालय ने मंगलवार को यानी कल ही एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया की दो संस्थाओं के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में बैंक में जमा 17 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति जब्त की है.

इसी विज्ञापन में Signatory यानी समर्थन के तौर पर काउंसिल ऑफ अमेरिकन इस्‍लामिक रिलेशंस संस्था का भी नाम है. ये संस्था अमेरिका की है. ये संस्था अमेरिका में मुसलमानों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने का दावा करती है. काउंसिल ऑफ अमेरिकन इस्‍लामिक रिलेशंस कश्मीर की आजादी की वकालत करती है. अगस्त 2019 में जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के वक्त भी ये संस्था काफी सक्रिय थी.  इस संस्था पर अमेरिका में रहते हुए आतंकवादी संगठन हमास को वित्तीय मदद करने के आरोप लगे हुए हैं. अमेरिका में इसकी जांच जारी है.

विज्ञापन के प्रकाशन का खर्च इस एनजीओ ने उठाया

किसानों को समर्थन देने वाले इस विज्ञापन के प्रकाशन का खर्च जिस एनजीओ ने उठाया है, अब हम आपको उसके बारे में बताते हैं.  Justice For Migrant Women नाम के एक NGO ने इस विज्ञापन के लिए 2 लाख 46 हज़ार 562 डॉलर खर्च किए हैं. भारतीय रुपयों में ये रकम 1 करोड़ 80 लाख है. न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स में पूरे पेज का ब्‍लैक एंड व्‍हाइट विज्ञापन प्रकाशित करने की यही कीमत है.  इस संस्था की संचालक Monica Ramirez नाम की महिला हैं. ये मीना हैरिस की करीबी हैं.

मीना हैरिस पिछले कई दिनों से भारत के किसानों के समर्थन में ट्वीट कर रही हैं. इन ट्वीट्स में भारत की सरकार की मंशा पर शक जताया गया है. मीना हैरिस भारत में भयावह माहौल होने की बात कर रही हैं.

अमेरिका में बैठे लोगों को ऐसा कौन सा दर्द हुआ कि 1 करोड़ 80 लाख खर्च करके किसानों को समर्थन का संदेश लिखवाया गया है. हमदर्दी वाली इस चिट्ठी के बहाने भारत की स्थिरता पर निशाना साधा जा रहा है.  हम ऐसा क्यों कह रहे हैं ये हमने आपको इस चिट्ठी के हमदर्दों के नाम और उनके परिचय पत्र बता कर साफ कर दिया है.

कृषि सब्सिडी खत्म करने का दबाव बना रहा अमेरिका 

अमेरिका पिछले कई वर्षों से भारत पर कृषि सब्सिडी खत्म करने का दबाव बना रहा है. अमेरिका का मानना है कि भारत में किसानों को जो सब्सिडी मिलती है उससे इंटरनेशनल मार्केट में उसके जैसे देशों को नुकसान होता है. सब्सिडी की वजह से भारतीय कृषि उत्पादों की लागत कम होती है,  इसलिए उसके दाम भी कम होते हैं.  एक ओर अमेरिका को किसानों को मिलने वाली सब्सिडी की राहत से दिक्कत है और दूसरी तरफ वहीं कुछ लोगों को किसानों से हमदर्दी है. दोनों ही बातों में निशाने पर भारत का अहित है.

लिखी गई ये बात

देखने में आपको ये साधारण अखबार का साधारण विज्ञापन लग सकता है. लेकिन ऐसा है नहीं. ये दुनिया के प्रतिष्ठित और सबसे महंगे अखबारों में से एक अमेरिका के The New York Times में 16 फरवरी को छपा फुल पेज एड  यानी पूरे पेज का विज्ञापन है. ये विज्ञापन भारत के किसानों के बारे में है.  सबसे पहले आपको विस्तार से ये बताते हैं कि ये विज्ञापन क्या कह रहा है-

WE-FARMERS, ACTIVISTS, AND CITIZENS OF THE WORLD- STAND IN SOLIDARITY WITH FARMERS IN INDIA PROTESTING TO PROTECT THEIR LIVELIHOOD.

हम दुनिया के किसान, एक्टिविस्ट और नागरिक भारत के किसानों के साथ हैं जो अपनी आजीविका को बचाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं. इस विज्ञापन में कहा गया है कि भारत के बड़े कॉरपोरेट किसानों की जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं.  ये भी कहा गया है कि किसान तीनों कृषि कानूनों का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि ये उनके लिए जीवन और मरण का प्रश्न है.

किसने दिया ये एड

अब हम आपको ये बताते हैं कि ये विज्ञापन किसने दिया है. विज्ञापन वाले पेज पर आखिरी लाइन में लिखा है कि इस विज्ञापन का पैसा JUSTICE FOR MIGRANT WOMEN नाम के एनजीओ ने दिया है. JUSTICE FOR MIGRANT WOMEN एनजीओ Monica Ramirez नाम की महिला का है. ये खुद को महिला शरणार्थियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली एक्टिविस्‍ट बताती हैं.  मोनिका माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर खुद को मीना हैरिस की दोस्त और बहन बताती हैं. मीना हैरिस अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भतीजी हैं.

कीमत भी जान लीजिए 

इससे पहले कि हम आपको ये बताएं कि अमेरिका के अखबार के इस पेज पर भारत के किसान कैसे पहुंचे हैं. आप ये जान लीजिए कि इस विज्ञापन की कीमत क्या है.

न्यूयॉर्क टाइम्स की वेबसाइट के मुताबिक, अगर कोई विज्ञापन फुल पेज छपता है तो उसके लिए 1 लाख 78 हज़ार 733 डॉलर खर्च करने होंगे, जो कि भारतीय रुपयों में लगभग 1 करोड़ 30 लाख है. अगर विज्ञापन को इंटरनेशनल एडिशन के साथ साथ एशिया और यूरोप में भी पहुंचाना है तो 67 हज़ार 929 डॉलर अलग से लगेंगे. यानी इस विज्ञापन की कीमत हुई 2 लाख 46 हज़ार 562 डॉलर. भारतीय रुपयों के मुताबिक देश के अन्नदाता को समर्पित इस विज्ञापन की कीमत 1 करोड़ 80 लाख रुपए बनती है.

किसानों के नाम पर भारत को अस्थिर करने का इंटरनेशनल एजेंडा

किसानों के नाम पर भारत को अस्थिर करने का इंटरनेशनल एजेंडा अब किसी से छिपा नहीं है.  विज्ञापन का समर्थन करने वालों में एमनेस्टी इंटरनेशनल की अमेरिका ब्रांच समेत तमाम ऐसे नाम शामिल हैं जो भारत में मानवाधिकारों के नाम पर सरकार विरोधी प्रोपेगेंडा चला रहे हैं.

भारत द्वारा कृषि क्षेत्रों में दी जाने वाली सब्सिडी का अमेरिका पिछले कई दशकों से विरोध कर रहा है. विरोध के पीछे अमेरिका का तर्क है कि भारत अपने किसानों को सब्सिडी देता है जिससे उनकी फसल की लागत कम आती है. इस वजह से भारतीय किसान का उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बाकी देशों के मुकाबले सस्ता होता है और कीमत के लिहाज से प्रतियोगिता में भारत आगे निकल जाता है.

कृषि कानूनों के खिलाफ प्रोपेगेंडा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका के कई सेलेब्रिटीज और NGO कृषि कानूनों के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में व्यस्त हैं. पहले टूलकिट और अब न्यूयॉर्क टाइम्स का विज्ञापन इसी कड़ी का हिस्सा है. लेकिन अब किसान आंदोलन के पीछे छिपे एजेंडे का सच देश के सामने आ चुका है. इसलिए दिल्ली के तीनों बॉर्डर पर अब न किसान हैं और न उनके हमदर्द. मुट्ठीभर आंदोलनजीवियों की टुकड़ियां मोर्चे पर तैनात हैं और किसान खेत में लौट चुका है.

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