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आंदोलन देश का सबसे नया उद्योग….

tomar kissanनई दिल्‍ली: आज हम भविष्य के कुछ ऐसे विज्ञापनों से आपका परिचय कराना चाहते हैं, जिन पर बड़ी कंपनियां लाखों, करोड़ों रुपये खर्च करेंगी. ये विज्ञापन आज आपको बिल्कुल भी मिस नहीं करने चाहिए, क्योंकि हो सकता है कि कल जब आप अखबार के पन्नों को पलटें, तो आपका सामना कुछ ऐसे ही विज्ञापनों से हो.

भारत की फास्‍टेस्‍ट ग्रोइंग इंडस्‍ट्री 

इन विज्ञापनों में लिखा होगा – Wanted Executive Protest Sales Manager यानी प्रोटेस्ट के लिए सेल्‍स मैनेजर की तलाश है और आंदोलन में कम से कम 5 साल का अनुभव रखने वाले ही इस नौकरी के लिए अप्लाई कर सकते हैं. किसी एनजीओ में सीनियर प्रोटेस्‍ट कन्वेनर (Senior Protest Convener) के पद पर भी आपको नौकरी का विज्ञापन देखने को मिल सकता है, जिसमें आपसे 12 साल का अनुभव मांगा जाएगा और इसके बदले में आपको 10 लाख या उससे भी ज्‍यादा सैलरी का ऑफर भी मिल सकता है.अब हम आपको भारत की एक ऐसी फास्‍टेस्‍ट ग्रोइंग इंडस्‍ट्री के बारे में बताते हैं, जो नकारात्मक विचारों का बड़ी संख्या में उत्पादन कर रही हैं और इन विचारों की सबसे ज्‍यादा खपत भारत में ही है. यानी इस इंडस्‍ट्री को भारत पसंद आ गया है और ये फास्‍टेस्‍ट ग्रोइंग इंडस्‍ट्री है, आंदोलन की.

कॉलेजों में इसकी पढ़ाई भी शुरू होगी?

भारत में आज आंदोलन का उद्योग बहुत बड़ा और विशाल हो चुका है और ये बड़े ही व्यवस्थित तरीके से काम कर रहा है. आंदोलन की अपनी टूल किट है, मार्केटिंग और इवेंट कंपनियां हैं और हमें लगता है कि आने वाले समय में संभव है कि भारत के स्कूलों और कॉलेजों में इसकी पढ़ाई भी शुरू हो जाए.

सोचिए, आज से 10 वर्षों के बाद जब कोई आपसे ये पूछेगा कि आपका बेटा क्या कर रहा है? तो आपका जवाब क्या होगा? शायद आप कहेंगे कि आपका बेटा ‘एमबीए इन प्रोटेस्‍ट मैनेजमेंट’ कर रहा है. ये भी हो सकता है कि अगले कुछ वर्षों में सरकारें कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की तरह आंदोलन कल्याण मंत्रालय का गठन कर दें और इस मंत्रालय के लिए भी अलग से बजट की व्यवस्था कर दी जाए. ये सब हो सकता है और हमें लगता है कि आपको इसके लिए तैयार हो जाना चाहिए. अमेरिका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च के मुताबिक, अगर किसी देश की कुल आबादी के 3.5 प्रतिशत लोग किसी आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं तो उस आंदोलन के 100 प्रतिशत सफल होने की गारंटी होती है.

यानी अगर ये मान लिया जाए कि किसी देश की कुल आबादी 100 है और उनमें से 3 से ज्‍यादा लोग किसी एक विषय को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं, तो उनका ये आंदोलन सफल हो जाएगा. यानी 3 लोग देश के बाकी 97 लोगों पर अपनी राय को थोप कर अपने मनपसंद कानून लागू भी करवा लेंगे और रद्द करवाने की स्थिति में भी होंगे.

प्रोटेस्‍ट मैनेजमेंट की पढ़ाई

अब आप सोच सकते हैं कि क्यों हम कह रहे हैं कि आने वाले समय में MBA- Master In Business Administration की जगह Master In Business Andolan बन जाएगा और आपके बच्चों को प्रोटेस्‍ट मैनेजमेंट की पढ़ाई करनी होगी.

अगर आज आप इस व्यापार को नहीं समझे तो कल हो सकता है कि आपको पानी पीने और खाना खाने के लिए भी आंदोलनों  में शिफ्ट करनी पड़े और ऐसा नहीं करने पर आपको मुट्ठीभर आंदोलनजीवी डराने की कोशिश करें. इसलिए आज हम इन आंदोलनजीवियों से भी आपका परिचय करवाएंगे. लेकिन सबसे पहले आपको ये समझना चाहिए कि आंदोलन कैसे अब एक बिजनेस मॉडल बन गया है और इसकी टूल किट क्या है?

आंदोलन कैसे एक बिजनेस मॉडल बन गया

ये टूल किट शब्द पिछले ही दिनों चर्चा में आया था जब स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने शायद गलती से इसे अपने ट्विटर अकाउंट पर शेयर कर दिया था और इसमें भारत के खिलाफ षड्यंत्र की पूरी स्क्रिप्ट लिखी थी.

असल में टूलकिट एक ऐसा डॉक्‍यूमेंट होता है, जिसमें ये बताया जाता है कि कैसे आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया पर समर्थन जुटाया जाएगा, ट्विटर पर किस तरह के हैशटैग इस्तेमाल होंगे, प्रदर्शनों के दौरान अगर कोई समस्या होती है तो किससे सम्पर्क करना होगा और मुश्किल स्थिति में क्या करें और क्या करने से बचें? ये सब एक टूल किट में होता है.

यानी कुछ मेकैनिक इन टूल्‍स का इस्तेमाल करके आंदोलन की गाड़ी को झूठ के हाइवे पर ले जाते हैं और फिर फेक न्‍यूज़ फैला कर लोगों की भीड़ इकट्ठा करने की कोशिश होती है.

किसान आंदोलन, प्रोटेस्‍ट मैनेजमेंट का सबसे बड़ा उदाहरण

इससे आंदोलन एक आयोजन में बदल जाता है और इवेंट मैनेजमेंट कंपनियां  इसके नाम पर करोड़ों रुपये कमा लेती हैं. अगर किसान आंदोलन के संदर्भ में इस पूरी व्यवस्था को समझें, तो ये प्रोटेस्‍ट मैनेजमेंट  का सबसे बड़ा उदाहरण हो सकता है.

ट्रैक्टर इस आंदोलन का चेहरा बन चुके हैं और दावा है कि दो लाख ट्रैक्टर दिल्ली की सीमाओं पर खड़े हैं. औसतन एक ट्रैक्टर की कीमत 6 से 7 लाख रुपये तक होती है.

इस हिसाब से देखें तो दिल्ली की सीमाओं पर 12 हजार करोड़ रुपये की कीमत के ट्रैक्टर खड़े हैं और विडंबना देखिए कि जो लोग ये ट्रैक्टर अपने साथ लेकर आए हैं उन्हें गरीब किसान कहा जा रहा है और लोगों के बीच इस तरह की राय बनाने वाली कंपनियां बड़े पैमाने पर काम कर रही हैं.

अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर फैलाया जा रहा झूठ

इस आंदोलन में कई बड़ी पब्लिक रिलेशन एजेंसियां भी शामिल हो गई हैं, जो एक इवेंट के लिए लाखों रुपये तक लेती हैं और अब यही कंपनियां अंतरराष्‍ट्रीय स्तर पर इस आंदोलन को लेकर झूठा फैला रही हैं

भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बड़ी संख्या में लोगों की मदद ली जा रही है. यानी क्राउड मैनेजमेंट के नाम पर कई लोग अलग अलग शिफ्ट में काम कर रहे हैं और इन लोगों को वॉलेंटियर बताया जा रहा है.

ऐसे लोगों को हायर किया जा रहा है जो चंदा इकट्ठा करने में माहिर हैं.

टूल किट और पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है.

एनजीओ की मदद से प्रदर्शन स्थल पर रहने के लिए वाटर प्रूफ टेंट्स, खान-पाने की व्यवस्था, फुट मसाजर और कपड़े धोने के लिए वॉशिंग मशीन उपलब्ध करवाई जा रही है.

गाने और नारे लिखने के लिए कलाकारों की मदद ली जा रही है और बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज आंदोलन स्थल पर होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं.

ये सबकुछ एक बड़े आयोजन की तरह हो रहा है और अंतरराष्‍ट्रीय ताकतें भी इसमें हिस्सा ले रही हैं. सबसे महत्वपूर्ण ये है कि ऐसा कहा जा रहा है कि सब मुफ्त में हो रहा है.

आंदोलन की नई परिभाषा

अंग्रेजी की एक कहावत है, There Are No Free Lunches In This World. हिंदी में इसका अर्थ है, दुनिया में कुछ भी मुफ्त में नहीं मिलता और हमें लगता है कि आंदोलन कर रहे किसानों को जो भी सुविधाएं और समर्थन मिल रहा है, उसकी भी एक कीमत है. ये सब मुफ्त में तो बिल्कुल भी नहीं हो रहा है.  जिस तरह किसान आंदोलन एक उद्योग बन गया है, ठीक उसी तरह इसकी परिभाषा भी बदल गई है और इसकी नई परिभाषा क्या है, वो भी आज हम आपको बताना चाहते हैं.

इसमें A का मतलब है Anarchy – हिंदी में इसका मतलब है अराजकता

फिर दूसरे A का अर्थ है – Anti National – यानी देशद्रोही

N का अर्थ – Negative Propaganda – नकारात्मक प्रचार प्रसार

D का मतलब है – Delegitimise State – यानी संवैधानिक सरकार की वैधता को चुनौती देना

O का अर्थ है- Ostracise Government – सरकार का बहिष्कार करना

L का मतलब है – Lies यानी झूठ और Fake News की फैक्ट्री चलाना

A का अर्थ है – Anger – क्रोध की राजनीति करना

और सबसे आखिर में N का अर्थ है – Negate Nationalism यानी राष्ट्रवाद को सिरे से खारिज कर देना

तो ये है, आंदोलन की नई परिभाषा, जो नकारात्मक शब्दों से भरी पड़ी है.  इस उद्योग में इन्हीं नकारात्मक विचारों का व्यापार किया जाता है और भारत में इन विचारों के खरीदार भी आसानी से मिल जाते हैं. भारत में पॉजिटिव विचारों को जल्दी से खरीदार नहीं मिलते, लेकिन नकारात्मक विचारों की अच्छी कीमत देने के लिए हर कोई तैयार हो जाता है.

नकारात्मक प्रदर्शनों की व्यवस्था को समझिए 

किसान आंदोलन के रूप में नकारात्मक प्रदर्शनों की जो व्यवस्था भारत में उभर कर सामने आई है, आज आपको उसे भी समझना चाहिए और इसे हम आपको कुछ पॉइंट्स में बताएंगे-

पहली बात, किसान आंदोलन को भारत में Protest Entrepreneurs ने हाइजैक कर लिया है.

दूसरी बात, इस आंदोलन का उद्देश्य कृषि कानूनों को रद्द कराना नहीं है, बल्कि इस आंदोलन का उद्देश्य मौजूदा केंद्र सरकार की वैधता को खत्म करना है और ये मोदी विरोध तक सीमित है.

तीसरी बात, इस पूरे आंदोलन में कुतर्क, तर्क पर हावी है.  यानी तर्क और तथ्यों को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है.

चौथी बात, झूठ का शोर इतना ज्‍यादा है कि सच की मांग बहुत कम हो गई है.  कोई सच नहीं जानना चाहता.  एक जमाने में ये मुहावरा काफी प्रसिद्ध था कि झूठ आग की तरह फैलता है और विनाश का रूप ले लेता है, लेकिन आज हम आपसे कहना चाहते हैं कि झूठ ट्वीट की तरह फैलता है और फिर फेक न्‍यूज़ का रूप लेकर रीट्वीट होते हुए दुनियाभर में फैल जाता है.

पांचवीं बात, किसान आंदोलन में ट्रैक्टरों को हथियार बना लिया गया है और ये कहना गलत नहीं होगा कि खेती को आसान बनाने वाले ट्रैक्टर अब टैंक और AK-47 राइफल जैसा डर लोगों के मन में पैदा कर रहे हैं.

छठी बात, SUV गाड़ियों में घूमने वाले किसानों को गरीब किसान बताया जा रहा है.

सातवां पॉइंट, जिन किसानों को ग़रीब बताया जा रहा है, वो दुनिया के बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज को अपने पक्ष में लाने में कामयाब हो गए और यहां समझने वाली बात ये है कि इन सेलिब्रिटीज ने कृषि कानूनों के बारे में पढ़े बिना ही अपना समर्थन किसानों को दे दिया है.  इनमें अमेरिका की मशहूर पॉप सिंगर रिआना भी हैं और पोर्नस्‍टार  मिया खलीफा का भी नाम इसमें शामिल है.

आठवां पॉइंट, आंदोलनजीवियों ने इस झूठ को तथ्य बना कर दुनिया के सामने पेश कर दिया है कि नए कृषि कानूनों से MSP और सरकारी मंडियों की व्यवस्था खत्म हो जाएगी. ये आंदोलनजीवी राजनीति के राजबाबू ही हैं, जो हर आंदोलन में नजर आ जाते हैं.

नौवीं बात, किसानों ने सरकार से बातचीत के कई प्रस्तावों को ठुकरा दिया लेकिन बावजूद इसके दुनिया में ये फेक न्‍यूज़ फैलाई गई कि सरकार अहंकार में है और वो गरीब किसानों से बातचीत नहीं कर रही.

और सबसे आखिरी बात ये कि इस आंदोलन का मकसद कृषि कानूनों को रद्द कराना नहीं है. इसका मकसद कुछ और है क्योंकि, अगर बात कानूनों की होती तो किसान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में बनाई गई कमेटी का सम्मान करते और सरकार ने कानूनों को डेढ़ साल के लिए होल्ड पर रखने का जो प्रस्ताव दिया था, उसे आंदोलन पर बैठे किसान मान लेते. उन्होंने ऐसा नहीं किया और इससे ये पता चलता है कि ये आंदोलन प्रायोजित है.

पहले इसमें कृषि कानूनों की बात हुई, फिर जेल में बंद अर्बन नक्‍सल्‍स की रिहाई के लिए बैनर लगाए गए और हो सकता है कि आगे जम्मू-कश्मीर में अनुच्‍छेद 370 की बहाली की मांग भी की जाए.

असली आंदोलन क्या है?

आज आपके मन में ये सवाल भी होगा कि असली आंदोलन क्या है या इसे कैसा होना चाहिए? इस सवाल का जवाब हम आपको National Institute of Open Learning की 9वीं कक्षा में पढ़ाई जाने वाली एक किताब से देंगे.

अब अगर कोई कहता है कि उसे तो संविधान ने विरोध का अधिकार दिया है तो उसे भी 9वीं की किताब पढ़नी चाहिए. अब कुछ लोग ये कहेंगे कि आंदोलनजीवी तो प्रेशर ग्रुप हैं और लोकतंत्र के लिए प्रेशर ग्रुप की जरूरत होती है क्‍योंकि, इनका राजनीति से कोई संबंध नहीं होता और ये तो देश के उन लोगों के लिए काम करते हैं जिनकी कोई नहीं सुनता है,  तो एक बार फिर हम 9वीं कक्षा की पुस्तक में लिखी गई प्रेशर ग्रुप की परिभाषा और उनकी कमियों के बारे में आपको बताते हैं.

आज अगर कोई आपसे ये पूछे कि देश में क्या चल रहा है तो आपका जवाब यही होगा कि आंदोलन चल रहा है. हमारे देश की मौजूदा परिस्थितियां कुछ ऐसी है. इसलिए आज आपको ये भी समझना चाहिए कि एक आंदोलन का चरित्र कैसा होता है और इसे समझने के लिए आपको 100 साल पीछे चलना होगा, जब भारत आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहा था.

-भारत में वर्ष 1920 में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ था और इस आंदोलन में भीड़ इकट्ठा करने के लिए किसी तरह की टूलकिट का सहारा नहीं लिया गया था.

-1920 में ही प्रजा मंडल आंदोलन  भी शुरू हुआ और ये आंदोलन  भी तब सफल रहा था और इसमें किसी तरह की कोई मिलावट नहीं थी. ये 100 प्रतिशत शुद्ध आंदोलन थे.

-1930 में महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा निकाली और वर्ष 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की जड़ें मज़बूत हुईं. इनमें से किसी भी आंदोलन में लोगों की भीड़ जुटाने के लिए पानी की तरह पैसा नहीं बहाया गया.

-इन सभी आंदोलनों में एक समानता थी कि ये प्रायोजित और लोगों पर जबरदस्‍ती थोपे गए आंदोलन नहीं थे. तब लोग अपने मन से मजबूत होकर आंदोलन की रीढ़ बनते थे और आज़ादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते थे.

आज़ादी के बाद भी जब भारत में आंदोलन हुए और किसान सड़कों पर उतरे तब भी ये आंदोलन प्रायोजत नहीं थे. आपको 1974 में शुरू हुआ जेपी आंदोलन याद होगा. तब इस आंदोलन की कमान भारत के बड़े नेता जय प्रकाश नारायण के हाथों में थी और उनके कहने पर लाखों लोगों की भीड़ सड़कों पर उतर आती थी.

इसी तरह वर्ष 1978 में किसान नेता और देश के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने दिल्ली में ही एक किसान रैली आयोजित की थी. इसमें करीब 50 लाख किसानों ने हिस्सा लिया था.  किसान गन्ने की फसल का सही दाम, सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था जैसी मांग के लिए आए थे.  लेकिन किसानों ने पूरी शांति के साथ अपनी रैली की और घरों के लिए लौट गए.  ये होता है किसान, जो देश बनाता है, वो देश बिगाड़ नहीं सकता है.

आप ये भी कह सकते हैं कि चौधरी चरण सिंह जैसे नेताओं की अब कमी है. उनकी बात उनके समर्थक सुनते थे, लेकिन आज के नेता भीड़ तो इकट्ठा कर लेते हैं लेकिन उनकी कोई सुनता नहीं है.

आज जो किसान आंदोलन दिल्ली की सीमाओं पर चल रहा है, वो आंदोलन कम आयोजन ज्‍यादा नजर आता है. इस आंदोलन के लिए बड़ी-बड़ी मार्केटिंग कंपनियां काम कर रही हैं. पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है और सबसे अहम ये आंदोलन अपने लक्ष्यों से भटका हुआ और विदेशी ताकतों से प्रभावित है.

अमेरिका का उदाहरण 

आंदोलन का उद्योग भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इस उद्योग की जड़ें दुनियाभर में मौजूद हैं और अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.

अमेरिका में क्राउट्स ऑन डिमांड नाम की एक वेबसाइट है और इस वेबसाइट के फ्रंट पेज पर ही लिखा है, विरोध प्रदर्शन, रैली, पीआर स्‍टंट और पॉलिटिकल इंवेंट करवाने के लिए आपकी भरोसेमंद.

इस वेबसाइट पर कई केस स्टडी भी दी गई हैं, जिनमें कंपनी ने अपनी सक्‍सेस स्‍टोरी भी बताई है.  इनमें एक केस स्टडी के मुताबिक, अमेरिका में एक विरोधी कंपनी के कहने पर एक बड़ी कंपनी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करवाया गया. दूसरी कंपनी दबाव में आ गई और सस्ते में अपनी कंपनी उसे बेच दी जिसने पैसे देकर आंदोलन करवाया था.

आज की हमारी खबर का एक लाइन में सार ये है कि आंदोलन अब एक उद्योग बन गया है और ये उद्योग राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है.

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