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किचन से फैल रहा है कैंसर का खतरा

dr.-anshuman-kumarकिचन में काम करते समय हममें से अधिकांश लोग यह नहीं जानते कि छोटी-छोटी गलतियां हमें कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियों की तरफ ले जाती हैं. उदाहरण के तौर पर एल्युमिनियम के बर्तनों का इस्तेमाल करना, प्लास्टिक के डिब्बों में सामान रखना या फिर नॉन-स्टिक के उपयोग पर जोर देना.

आजकल एल्युमिनियम के बर्तनों का इस्तेमाल काफी किया जाता है. इसके पीछे कई मिथक हैं, जिसके चलते हम जाने-अंजाने में अपने स्वास्थ्य के लिए खतरा मोल ले लेते हैं. जब आप एल्युमिनियम के बर्तन में एसिडिक फूड बनाते हैं, सीधे शब्दों में कहें तो खट्टा खाना जैसेकि कढ़ी आदि, तो गर्म होने पर एल्युमिनियम पिघलकर खाने में मिल जाता है और खाने से हमारे शरीर में पहुंच जाता है.

आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अब तक कितना एल्युमिनियम आपके शरीर में पहुंच चुका होगा. एल्युमिनियम के इस अप्रत्यक्ष सेवन से कई गंभीर बीमारियां उत्पन्न हो सकती हैं. इसे अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) से जोड़कर भी देखा जाता है. हालांकि इसका अल्जाइमर से कोई सीधा संबंध अब तक नहीं मिला है, लेकिन शोध जारी हैं.एल्युमिनियम बच्चों के लिए भी काफी नुकसानदेह है. यह उनके मानसिक विकास को बाधित करता है. इसके अलावा, यदि एल्युमिनियम ज्यादा मात्रा में शरीर में इकठ्ठा हो जाता है, तो खून बनने की क्षमता भी प्रभावित होती है. बात केवल एल्युमिनियम के बर्तनों में खाना पकाने की ही नहीं है, यदि आप एसिडिक फ़ूड जैसे कि कढ़ी, टमाटर, आम की चटनी या फिर कोई अन्य खट्टा खाद्य पदार्थ एल्युमिनियम के बर्तन में स्टोर करके रखते हैं, तो भी उसके रिसकर खाने में मिलने की आशंका रहती है.

फिर भले ही आपने उसे फ्रिज में क्यों न रखा हो. इसलिए बेहतर यह है कि आप एल्युमिनियम के बर्तनों को इस्तेमाल करना तुरंत बंद कर दें. यहां यह भी काबिले गौर है कि एल्युमिनियम फॉयल बर्तनों से भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि उसमें ज्यादा अनस्टेबल एल्युमिनियम उपयोग किया जाता है. इसलिए फॉयल को जितनी जल्दी आप अपनी किचन और जिंदगी से बाहर कर देंगे उतना ही अच्छा रहेगा.अब बात कर लेते हैं प्लास्टिक के डिब्बे या बोतलों की, जो लगभग हर किचन में नजर आ जाएंगे. प्लास्टिक भी कैंसर के प्रमुख कारकों में से एक है. हमारे देश में पश्चिमी देशों की तरह फूड-ग्रेड प्लास्टिक का चलन बेहद कम है, क्योंकि इसकी लागत ज्यादा आती है. ये प्लास्टिक का वह रूप होता है, जिसमें मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले तत्व नहीं होते.

जब हम माइक्रोवेव में प्लास्टिक के किसी बर्तन में खाना गर्म करते हैं या गर्म खाना उसमें डालते हैं, तो प्लास्टिक के कैमिकल रिसकर हमारे खाने में मिल जाते हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि खतरा केवल गर्म करने पर ही है. प्लास्टिक किसी भी वातावरण में क्यों न हो, उससे कैमिकल का रिसाव निरंतर जारी रहता है, फर्क बस इतना है कि गर्म होने पर इस प्रक्रिया में तेजी आ जाती है.आमतौर पर लोग मैंगो जूस या स्क्वैश को प्लास्टिक की बोतलों में भरकर फ्रिज में रख देते हैं. अब चूंकि ये कई दिनों तक चलते हैं, इसलिए प्लास्टिक में मौजूद हानिकारक कैमिकल Bisphenol-A और Phthalate को रिसने के लिए भरपूर समय मिल जाता है. लिहाजा इस आदत को भी आप आज ही बदल डालिए.एल्युमिनियम और प्लास्टिक के साथ ही नॉन-स्टिक बर्तन भी हमारे स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम उत्पन्न कर रहे हैं. अमूमन हम अपने खाने में तेल कम करने के लिए नॉन-स्टिक बर्तन इस्तेमाल करते हैं, लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि शरीर के लिए तेल भी उतना ही जरुरी है जितनी की बाकी चीज़ें. फैट को जीरो करके हम जिंदा नहीं रह सकते.

हमारे ब्रेन को फैट चाहिए, हार्ट को फैट चाहिए और बॉडी को भी चलने के लिए फैट चाहिए. हां, अत्यधिक वसा या फैट निश्चित तौर पर नुकसानदायक होता है. हम खुद को फिट रखने की चाह में कम एक्सरसाइज के बजाए ‘जीरो फैट डाइट’ अपना रहे हैं और इसके लिए किचन में नॉन-स्टिक बर्तन बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन यह हमारे स्वास्थ्य के लिए ज्यादा हानिकारक है. नॉन-स्टिक बर्तनों में कई तरह की कोटिंग आती है, जैसे कि टेफ्लॉन.

इसकी वजह से खाना पकाते समय वह चिपकता नहीं है और इसे साफ करना भी आसान हो जाता है. मगर जब आप बर्तन को गर्म करते हैं, तो कोटिंग पिघलकर खाने में मिल जाती है. दरअसल, नॉन-स्टिक पश्चिमी देशों द्वारा ईजाद किया गया था और उनकी फ़ूड हैबिट के हिसाब से यह ठीक है, लेकिन हमारे यहां खाना पकाने का स्टाइल और स्वाद उनकी तुलना में काफी अलग है. हमारे यहां जब तक मसाले अच्छी तरह से भुन नहीं जाते, तब तक बर्तन में चम्मच चलता रहता है. हर रोज होने वाली इस लंबी प्रक्रिया की वजह से नॉन-स्टिक बर्तन पर खरोच लगती रहती है और इससे कोटिंग छिल-छिलकर हमारे खाने में मिलती रहती है, जो कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है.

शायद आपने ध्यान दिया हो कि कुछ समय के बाद नॉन स्टिक, स्टिकी हो जाता है यानी उसमें खाना चिपकने लगता है. ऐसा इसलिए कि उस पर लगी कोटिंग हट जाती है, अब इसमें से कुछ कोटिंग बर्तन धुलते समय निकल जाती है और कुछ आपके पेट में चली जाती है. लिहाजा जीरो फैट के चक्कर में अपनी सेहत से खिलवाड़ न करें और नॉन-स्टिक बर्तनों को भी अपनी किचन से आउट कर दें.अब सवाल यह उठता है कि आखिरी कौन से बर्तन इस्तेमाल किये जाएं? तो जवाब है, स्टेनलेस स्टील. यह एक मिश्रित धातु है, जो लोहे में कार्बन, क्रोमियम और निकल मिलाकर बनाई जाती है. इसमें खाना पकाने से सेहत को कोई नुकसान नहीं होता. इसके अलावा, आप लोहे के बर्तन भी इस्तेमाल कर सकते हैं. इन बर्तनों में पकने वाले खाने में आयरन की मात्रा बढ़ जाती है. एनीमिया पीड़ितों को इसकी सलाह दी जाती है, ताकि उन्हें आयरन मिलता रहे.  अंत में फ्रिज में रखी जाने वाली आइस ट्रे के बारे में भी बात कर लेते हैं. अगर आप प्लास्टिक की ट्रे इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो यह सुनिश्चित करें लें कि वो फूड ग्रेड प्लास्टिक से निर्मित हों. इसके अलावा, कई अन्य प्रकार की ट्रे भी आजकल बाजार में मौजूद हैं. उदाहरण के तौर पर, ऐसी ट्रे जिसका फ्रेम प्लास्टिक का है, लेकिन अंदर से स्टील बॉडी है. ध्यान रखें सामान्य प्लास्टिक की ट्रे इस्तेमाल करना खतरनाक हो सकता है.

(लेखक: डॉ अंशुमान कुमार, दिल्‍ली में कैंसर विशेषज्ञ हैं.)

 (डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.)
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