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पुत्र मोह में मारे गए लालू

Lalu-and-Tejashwi-prasad-yadav_Social_PTIबिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी चीफ लालू यादव ने सप्ताह भर बिहार की राजनीति में पिताधर्म और राजनीतिक संतुलन बनाने के लिए बहुत संघर्ष किया। लेकिन बीती रात उन्होंने इसपर तब घुटने टेक दिए जब बिहार का महागठबंधन टूट गया और सरकार गिर गई। पद से इस्तीफा दे चुके नीतिश कुमार ने लालू के बेटे और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी द्वारा अपने ऊपर लगे भष्टाचार के आरोपों पर सार्वजनिक तौर पर सफाई ना देने पर पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि लालू यादव ने नीतीश पर विश्वासघात का आरोप लगाते हुए कहा, भाजपा से हाथ मिलाने के बाद नीतीश नष्ट हो जाएंगे, उनकी राजनीतिक पारी खत्म हो जाएगी। लालू ने आगे कि इस्तीफे से पहले उन्होंने नीतीश कुमार से बातचीत की, जिसमें उन्होंने गठबंधन तोड़ने का कोई सकेंत नहीं दिया था। वहीं बुधवार (26 जुलाई, 2017) को पार्टी के 80 विधायकों के साथ मीटिंग के बाद लालू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी साफ किया कि उनके बेटे तेजस्वी यादव इस्तीफा नहीं देंगे। इस दौरान उन्होंने कहा कि तेजस्वी के इस्तीफे की मांग लंबे समय से चल रही है, जोकि उनके नेता द्वारा सही नहीं है।

हालांकि ऊपरी तौर पर सबकुछ सही दिखाई दे रहा था लेकिन महागठबंधन में कुछ और ही हो रहा था। क्योंकि बुधवार शाम नीतीश कुमार ने राज्य के राज्यपाल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिए जाने की जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने भाजपा के साथ सरकार बनाने का कोई संकेत नहीं दिया। साल 2013 में नीतीश ने भाजपा से गठबंधन तोड़ा था। लेकिन पद से इस्तीफा दिए जाने के बाद नीतीश ने इस दौरान कहा कि जो बिहार के लिए अच्छा होगा वो वही करेंगे। हालांकि गुरुवार (27 जुलाई, 2017) को सबकुछ साफ हो गया। क्योंकि नीतीश एक बार फिर पुराने साथी भाजपा के साथ मिलकर सरकाने बनाने जा रहे थे। लेकिन लालू भष्टाचारों के आरोपों से घिरे बेटे तेजस्वी का अबतक बचाव करते हुए नजर आ रहे थे। सूत्रों के अनुसार लालू ने पार्टी सांसदों से बेटे को राजनीतिक सुरक्षा घेरा दिए जाने की बात तक कही थी। क्योंकि लालू जानते थे उनके बेटे को उप मुख्यमंत्री पद से हटाया जा सकता है। इस दौरान लालू बेटे को लेकर काफी चिंतित भी थे। क्योंकि बेटे की राजनीतिक विरासत बचाने की मुश्किल ने उन्हें काफी परेशान कर दिया था। ये जानकारी सूत्रों के हवाले से है। वहीं बेटे के ऊपर लगे आरोपों के बाद भष्टाचार के आरोपों का सामना कर रही सरकार के बारे में जब मीडिया ने लालू से इसपर सवाल पूछा तो उन्होंने कहा, मैं नीतीश कुमार की सरकार को क्यों अस्थिर करूंगा? मैंने उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया है।

लालू ने आगे कहा कि नीतीश कुमार के मन में कुछ और ही चल रहा था। तेजस्वी के लगे आरोपों के बाद एक फिर उन्हें पुराने साथी भाजपा की तरफ जाने का एक मौका दे दिया। क्योंकि नीतीश पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई फैसलों का समर्थन कर चुके हैं। बीते साल नवंबर में केंद्र सरकार द्वारा की गई नोटबंदी का भी महागठबंधन में नीतीश की पार्टी ने सर्मथन किया था। राष्ट्रपति चुनाव में भी नीतीश ने भाजपा के उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करने की घोषणा की। जिससे साफ हो गया कि वो भाजपा के खेमे जा रहे हैं। नीतीश ने खुद कभी इस बात से इंकार नहीं किया कि वो भाजपा के साथ दोबारा गठबंधन कर सकते हैं।

जानकारी के लिए बता दें कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में देशभर में मोदी लहर चली और केंद्र में भाजपा की सरकार बनी। केंद्र में मोदी की पूर्णबहुमत की सरकार से ना सिर्फ कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को झटका लगा, बल्कि भाजपा विरोधी लालू यादव की मुश्किलों का दौर भी एक बार फिर शुरू हो गया। जेडीयू ने अपने दम पर लोकसभा चुनाव लड़ा, मगर कुछ खास नहीं कर पाई। दूसरी तरफ मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में जैसे भाजपा के पक्ष में हवा चल पड़ी। राज्य विधानसभाओं में भाजपा को अपने दम पर अप्रत्याशित जीत मिलने लगी। जिसने साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव को हाथ मिलाने पर मजबूर कर दिया। कांग्रेस भी इस महागठबंधन का हिस्सा बनी और बिहार में बीजेपी को परास्त कर दिया। इस चुनाव में लालू यादव का एक तरह से ‘कमबैक’ हुआ। पार्टी ने बिहार विधानसभा में सबसे ज्यादा सीटें जीतीं। लालू के दोनों बेटे भी चुनाव जीत गए। गठबंधन सरकार में छोटे बेटे तेजस्वी को डिप्टी सीएम बनवा दिया और बड़े बेटे तेजप्रताप को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिला दिया। अब जब तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो लालू एक बार फिर संकट में आ गए। मगर चुनावी राजनीति से आउट हो चुके लालू को पुत्रमोह ने मजबूर कर दिया और आरजेडी की राजनीति पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

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