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प्रेरक व्यक्तित्व; खेलों के महानायक मिल्खा सिंह….

Milkha Singh (2)भारतीय खेल जगत की सबसे सम्‍मानित हस्तियों में से एक, मशहूर धावक मिल्‍खा सिंह का शुक्रवार देर रात निधन हो गया। आजादी के फौरन बाद वैश्विक खेल मंच पर अगर किसी एक खिलाड़ी ने भारत का सिर ऊंचा किया तो वो थे मिल्‍खा सिंह। मिल्‍खा ने अपनी जिंदगी में कई यादगार रेस पूरी की हैं, मगर 1958 की उस रेस के बाद सबकुछ बदल गया था। मिल्‍खा ने उस रेस का अनुभव साझा क‍िया था। पढ़‍िए 1958 की उस गौरवशाली रेस की कहानी, मिल्‍खा सिंह की जुबानी। “मैं टोक्‍यो एशियन गेम्‍स में दो गोल्‍ड मेडल्‍स (200 मीटर और 400 मीटर) जीतकर 1958 के कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स (कार्डिफ, वेल्‍स) में हिस्‍सा लेने पहुंचा था। जमैका, साउथ अफ्रीका, केन्‍या, इंग्‍लैंड, कनाडा और ऑस्‍ट्रेलिया के वर्ल्‍ड क्‍लास एथलीट्स वहां थे। कार्डिफ में चुनौती बेहद तगड़ी थी। और कार्डिफ के लोग सोचते थे: ‘अरे इंडिया क्‍या है, इंडिया इज नथिंग।’ मुझे यकीन नहीं था कि मैं कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में गोल्‍ड जीत सकता हूं। उस तरह का भरोसा कभी रहा ही नहीं क्‍योंकि मैं वर्ल्‍ड रेकॉर्ड होल्‍डर मैल्‍कम क्‍लाइव स्‍पेंस (साउथ अफ्रीका) से टक्‍कर ले रहा था। वह उस समय 400m में दुनिया के सर्वश्रेष्‍ठ धावक थे।”

चरपाई पर बैठ कोच ने दिया ब्रह्मज्ञान

“मैं मेरे अमेरिकन कोच डॉ आर्थर डब्‍ल्‍यू हावर्ड को क्रेडिट दूंगा। NIS पटियाला के पहले डेप्‍युटी डायरेक्‍टर, डॉ पटियाला उन गेम्‍स में भारत की एथलेटिक्‍स टीम के कोच थे। पूरे रेस की रणनीति उन्‍होंने की तैयार की थी। उन्‍होंने स्‍पेंस को पहले और दूसरे राउंड में दौड़ते हुए देखा। फाइनल रेस से पहले वाली रात वो चारपाई पर बैठे और मुझसे कहा, “मिल्‍का, मैं थोड़ी-बहुत हिंदी ही समझता हूं लेकिन मैं तुम्‍हें मैल्‍कम स्‍पेंस की रणनीति के बारे में बताता हूं और ये भी कि तुम्‍हें क्‍या करना चाहिए।”कोच ने मुझसे कहा कि स्‍पेंस अपनी रेस के शुरुआती 300-350 मीटर धीमे दौड़ता है और फाइनल स्‍ट्रेच में बाकियों को पछाड़ देता है। डॉ हावर्ड ने कहा, तुम्‍हें शुरू से ही पूरी स्‍पीड से जाना चाहिए क्‍योंकि तुममें स्‍टैमिना है। अगर तुम ऐसा करोगे तो स्‍पेंस अपनी रणनीति भूल जाएगा।'”

मिल्‍खा की चाल ने उड़ा द‍िए स्‍पेंस के होश

milkha-singh“मैं आउटर लेन पर था, नंबर 5 वाली और स्‍पेंस दूसरी पर था। कार्डिफ आर्म्‍स पार्क स्‍टेडियम में रेस होनी थी। उन दिनों आप एक बैग से जो नंबर चुनते थे, उसके आधार पर लेन अलॉट होती थी। इसी वजह से मुझे 5 नंबर वाली मिली। मतलब हमें शुरुआती राउंड में पहले दौड़ना था, फिर क्‍वार्टरफाइनल्‍स में, सेमीफाइनल में और फाइनल में भी।मैं शुरू से ही पूरा दम लगाकर भागा, आखिरी 50 मीटर तक बड़ी तेज दौड़ा। और जैसा डॉ हावर्ड ने कहा था, स्‍पेंस को अहसास हो गया कि ‘सिंह बहुत आगे निकल गया है।’ मुझे दिख रहा था कि स्‍पेंस अपनी रणनीति भूल गया है क्‍योंकि वह मेरी बराबरी में लगा था। वह तेज दौड़ने लगा और आखिर में वह मुझसे एक फुट ही पीछे था। वह आखिर तक मेरे कंधों के पास था मगर मुझे हरा नहीं पाया। मैंने 46.6 सेकेंड्स में रेस खत्‍म की और उसने 46.9 में। डॉ हावर्ड का शुक्रिया कि मैंने गोल्‍ड मेडल जीता।”

जब नेहरू ने पूछा, क्‍या चाहते हो मिल्‍खा सिंह?

“वह गोल्‍ड मेडल भारत के लिए बड़ा मौका था। मुझे बहुत सारे लोगों के कॉल्‍स और मेसेजेस मिले, प्रधानमंत्री पंडित (जवाहरलाल) नेहरू जी का भी। उन्‍होंने मुझसे पूछा, ‘मिल्‍खा, तुम्‍हें क्‍या चाहिए?’ उस वक्‍त मुझे पता नहीं था कि क्‍या मांगना चाहिए। मैं 200 एकड़ जमीन या दिल्‍ली में घर मांग लेता। आखिर में मैंने भारत में एक दिन की छुट्टी मांगी।”

चंडीगढ़ में मिल्खा सिंह का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार

milkhaउड़न सिख के नाम से मशहूर महान एथलीट पद्मश्री‍ मिल्‍खा सिंह का शुक्रवार देर रात निधन हो गया। उन्‍होंने रात 11:30 बजे अंतिम सांस ली। कोरोना संक्रमण के कारण वह तीन जून से पीजीआइ चंडीगढ़ में भर्ती थे। मिल्खा सिंह कोरोना वायरस से तो उभर चुके थे लेकिन पोस्ट कोविड साइडइफेक्ट्स से वह नहीं उबर सके। वह 91 साल के थे। पांच दिन पहले ही उनकी पत्नी निर्मल मिल्‍खा सिंह का निधन मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में हुआ था। वह भी कोरोना संक्रमण से पीड़ित थीं।मिल्खा सिंह के घर पर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल और हरियाणा के खेल मंत्री संदीप सिंह भी पहुंचे। वहीं, केंद्रीय खेल मंत्री रिजिजू और यूटी प्रशासक वीपी सिंह बदनौर के श्मशानघाट पर पहुंचे हैं। मिल्खा सिंह का पार्थिव शरीर शाम 4:15 बजे घर से सेक्टर-25 श्मशानघाट लाया गया। अंतिम संस्कार की रस्में पूरी होन के बाद मिल्खा सिंह को राजकीय सम्मान के साथ पंचतत्व में विलीन किया गया।उड़नसिख मिल्खा सिंह के चाहने वाले भी कई लोग सेक्टर-25 के श्मशानघाट पहुंचे हैं। लोगों ने नम आखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। मिल्खा सिंह के अंतिम दर्शन के लिए पंजाब के लुधियाना से खास तौर पर मास्टर इंटरनेशनल एथलीट चन्नण सिंह भी चंडीगढ़ पहुंचे हैं। चन्नण सिंह ने मलेशिया मास्टर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में पांच मेडल जीते हैं। मिल्खा सिंह को अपना प्रेरणा स्रोत मानते हैं।वीरवार रात अचानक मिल्खा सिंह का ऑक्सीजन लेवल गिर गया और बीपी डाउन होने से उनकी मौत हो गई। मौत होने के बाद उनके बेटे जीव मिल्खा सिंह लेने पीजीआइ गए थे। मिल्खा सिंह के शव को सेक्टर-8 स्थित उनकी कोठी में रखा गया है। घर के बाहर मिल्खा सिंह और उनकी पत्नी निर्मल कौर की फोटो रखी हुई है जिस पर फूलों की माला चढ़ाई गई है। मिल्खा सिंह के बेटे जीव मिल्खा सिंह ने उनकी फोटो पर माल्यापर्ण किया। कोठी में मृत देह रखी होने के कारण शहर के कई गणमान्य लोग यहां पहुंच रहे हैं। सुरक्षा के लिहाज से घर के बाहर चंडीगढ़ पुलिस के जवान तैनात किए गए हैं।

मिल्खा सिंह के निधन के साथ एक युग के अंत पर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री समेत पूरे देश ने शोक जताया. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि उनके संघर्ष और जुझारूपन की कहानी भारतीयों की आने वाली पीढियों को प्रेरित करती रहेगी. राष्ट्रपति ने ट्वीट किया ,‘‘खेलों के महानायक मिल्खा सिंह के निधन से दुखी हूं. उनके संघर्ष और जुझारूपन की कहानी भारतीयों की आने वाले पीढियों को प्रेरित करती रहेगी. उनके परिवार और असंख्य प्रशंसकों के प्रति मेरी संवेदनायें.’’प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया ,‘‘ मिल्खा सिंह जी के निधन से हमने एक बहुत बड़ा खिलाड़ी खो दिया जिनका असंख्य भारतीयों के ह्रदय में विशेष स्थान था. अपने प्रेरक व्यक्तित्व से वे लाखों के चहेते थे. मैं उनके निधन से आहत हूं.’’पीएम मोदी ने आगे लिखा ,‘‘ मैने कुछ दिन पहले ही श्री मिल्खा सिंह जी से बात की थी. मुझे नहीं पता था कि यह हमारी आखिरी बात होगी. उनके जीवन से कई उदीयमान खिलाड़ियों को प्रेरणा मिलेगी. उनके परिवार और दुनिया भर में उनके प्रशंसकों को मेरी संवेदनायें.’’चार बार के एशियाई खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मिल्खा ने 1958 राष्ट्रमंडल खेलों में भी पीला तमगा हासिल किया था. उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन हालांकि 1960 के रोम ओलंपिक में था जिसमें वह 400 मीटर फाइनल में चौथे स्थान पर रहे थे. उन्होंने 1956 और 1964 ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया. उन्हें 1959 में पद्मश्री से नवाजा गया था.

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