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मुस्लिम बच्चियों का खतना,सुप्रीम कोर्ट सख्त …

maxresdefaultफीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन (एफजीएम) या आसान भाषा में कहें तो महिला खतना पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोक के बावजूद दुनिया के कई देशों में यह एक हकीकत है.भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में मुसलमानों के दाऊदी बोहरा समुदाय में बच्चियों का खतना यह मानकर किया जाता है कि इससे वे बड़ी होने पर पति के अलावा किसी दूसरे पुरुष से शारीरिक संबंध नहीं बनाएंगी. इस परंपरा के मुताबिक, महिला को शारीरिक संबंध का आनंद लेने का अधिकार नहीं है. यदि उसका खतना होता है तो वह अपने पति के प्रति वफादार रहेगी और घर के बाहर नहीं जाएगी.

महिला खतना की प्रथा के खिलाफ संघर्ष

khatnaमहिला खतना को अंग्रेजी में फीमेल जेनिटल म्यूटेशन कहते हैं. इसमें योनि के क्लिटोरिस के एक हिस्से को रेजर या ब्लेड से काट दिया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, यह खतना चार तरह का हो सकता है- क्लिटोरिस के पूरे हिस्से को काट देना, कुछ हिस्सा काटना, योनि की सिलाई या छेदना. इस दर्दनाक और अमानवीय प्रथा से कई बार यौन संक्रमण संबंधी बीमारियां हो सकती है. मानसिक पीड़ा का असर सारी उम्र रहता ही है.अपनी हालिया टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं का अपने शरीर पर अधिकार की वकालत की. केंद्र ने इस प्रथा पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका का समर्थन किया. कोर्ट में इस समुदाय के प्रतिनिधियों की पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह इस समुदाय की बुनियादी परंपरा है और कोर्ट इस समुदाय के धर्म से जुड़े अधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकता. इस दलील का अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने विरोध किया. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच से कहा, “इस प्रथा पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कई अफ्रीकी देशों में रोक लग चुकी है. इस पर कानूनी प्रतिबंध लगना चाहिए.”

चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर महिलाएं किसी प्रथा को स्वीकार न करें तो क्या उन पर उसे थोपा जा सकता है? उन्होंने कहा, “अगर वे इसके विरोध में हों तो क्या आप उन पर इसे थोप सकते हैं?” जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “अपने शरीर की अखंडता के महिला के अधिकार का हनन क्यों हो?” बेंच ने कहा कि वह इस मामले पर जुलाई में ही फिर सुनवाई करेगी और आदेश देगी.साहियो नाम की एक गैर सरकारी संस्था महिला खतने के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुहिम चला रही है. भारत में साहियो की सह संस्थापक और पत्रकार आरेफा जोहरी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को आशा की किरण मानती है. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि महिलाओं के पक्ष में की गई कोर्ट की टिप्पणी फैसले में बदलेगी. खतना प्रथा एक गैर वैज्ञानिक और गैर जरूरी प्रथा है जिसे महिलाओं पर थोपा गया है. जो महिलाओं के शुद्धिकरण के नाम पर इसकी वकालत करते हैं, वे मूर्ख बना रहे हैं.” यूनिसेफ के आंकड़े बताते हैं कि दुनियाभर में हर साल 20 करोड़ महिलाओं का खतना होता है जिनमें अधिकतर की उम्र 14 वर्ष या उससे कम होती है. इंडोनेशिया में आधी से अधिक बच्चियों का खतना हो चुका है. भारत में दाऊदी बोहरा एक छोटा सा समुदाय है, लेकिन महिला खतना को लेकर वह अकसर सुर्खियों में रहता है. सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी ने इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठा रहे लोगों को एक उम्मीद दी है.

सुप्रीम कोर्ट में खतना करने की प्रथा के खिलाफ सुनवाई 16 जुलाई को

बोहरा मुस्लिम समुदाय में औरतों का खतना करने की प्रथा के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 16 जुलाई को सुनवाई करेगा। कोर्ट ने इस प्रथा पर हैरानी जताई और कहा कि बच्चों के साथ ऐसा करना पोक्सो एक्ट के उल्लंघन का मामला हो सकता है। शीर्ष अदालत ने महिला के निजी अंग को स्पर्श किये जाने को पहली नजर में गलत माना।

सोमवार (9 जुलाई) को सुप्रीम कोर्ट ने खतना की प्रथा पर केंद्र सरकार से राय मांगी .

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल वेणुगोपाल ने कहा कि धार्मिक रीति-रिवाजों के पालन का मौलिक अधिकार कुछ सीमाओं से बंधा है। ये नैतिकता के लिहाज से सही और स्वास्थ्य को नुकसान नहीं पहुंचाने वाला होना चाहिए। जैसे कभी सती प्रथा को इस दलील के बावजूद बंद किया गया कि ये धर्म का जरूरी हिस्सा है।वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और 27 अफ्रीकी देशों में इस प्रथा पर रोक लगी हुई है।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ से उन्होंने कहा कि “इस प्रथा से बच्ची को ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसे भरा नहीं जा सकता और इसको प्रतिबंधित किया जाना चाहिए…. किसी एक व्यक्ति की शारीरिक अखंडता क्यों और कैसे एक आवश्यक प्रथा हो सकती है?’’

मुस्लिम समुदाय की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ वकील ए एम सिंघवी ने कहा कि मामले को संवैधानिक पीठ के पास भेजा जाना चाहिए क्योंकि यह एक धर्म की आवश्यक प्रथा का मामला है, जिसकी जांच की आवश्यकता है…. इस्लाम में पुरुषों का खतना सभी देशों में मान्य है।

खतना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में वकील सुनिता तिवारी ने याचिका दाखिल की है। जिसमें इस प्रथा को सम्मान से जीने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन बताया गया है।

महिलाओं के खतना का चलन सिर्फ बोहरा मुसलमानों के बीच है। जब लड़की बहुत छोटी होती है तो खतने को अंजाम दिया जाता है। अधिकतर मौकों पर छह-सात साल की छोटी उम्र में ही खतना किया जाता है। इसके तहत लड़की के जननांग के बाहरी हिस्से यानि क्लिटरिस को काट दिया जाता है या बाहरी त्वचा निकाल दी जाती है। इस दौरान बच्चियों को काफी तकलीफ होती है क्योंकि खतना से पहले एनीस्थीसिया भी नहीं दिया जाता। पारंपरिक तौर पर इसके लिए ब्लेड या चाकू का इस्तेमाल किया जाता है।

भारत में बोहरा मुसलमानों की आबादी पश्चिम और दक्षिण भारत में है. इनकी आबादी गुजरात और महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा है। राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में भी इनकी कुछ आबादी है।भारत में इनकी कुल आबादी महज़ 10 लाख है, लेकिन शैक्षणिक और आर्थिक तौर पर ये काफी समृद्ध और मजबूत समुदाय है।इस समुदाय का मुसलमानों के दूसरे समुदाय से मिलनाजुलना काफी कम है। इस समुदाय पर अपने धार्मिक रहनुमा का बहुत ही ज्यादा असर होता है और समुदाय के खिलाफ बोलने पर अपने समाज में अलग-थलग पड़ने का डर रहता है इसलिए खतना के खिलाफ बोहरा समाज से आवाज़ नहीं उठ पाती।बोहरा मुसलमानों की आबादी भारत के बाहर अरब देशों और यूरोप में हैं।

क्या है महिलाओं का खतना या ‘खफ्ज प्रथा’

मुस्लिम बोहरा समुदाय में छोटी बच्चियों के भगशिश्निका (clitoris) की सुन्नत की यह प्रक्रिया औरतों के लिए एक अभिशाप है. इस प्रक्रिया में औरतें छोटी बच्चियों के हाथ-पैर पकड़ते हैं और फ़िर क्लैटोरिस पर मुल्तानी लगाकर वह हिस्सा काट दिया जाता है.औरतों की ख़तना का यह रिवाज अफ्रीकी देशों के कबायली समुदायों में भी प्रचलित है लेकिन अब भारत में भी ये शुरू हो गया है.अफ्रीका में यह मिस्र, केन्या, यूगांडा जैसे देशों में सदियों से चली आ रही है. ऐसा कहा जाता है कि ख़तना से औरतों की मासित धर्म और प्रसव पीड़ा को कम करती है.ख़तना के बाद बच्चियां दर्द से कईं महीनों तक जूझती रहती हैं और कई की तो संक्रमण फ़ैलने के कारण मौत भी हो जाती है.

ये है महिला खतना की प्रक्रिया 

  • महिला योनि के एक हिस्से क्लिटोरिस को रेजर ब्लेड से काट कर खतना किया जाता है। वहीं कुछ जगहों पर क्लिटोरिस और योनि की अंदरूनी स्किन को भी थोड़ा सा हटा दिया जाता है।
  • खतना की इस परंपरा के पीछे यह माना जाता है कि महिला यौनिकता पितृसत्ता के लिए खतरा है, साथ ही महिलाओं को यौन संबंध का लुत्फ उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
  • ऐसी मान्यता है कि जिस भी लड़की का खतना हुआ है, वह अपने पति के लिए ज्यादा वफादार साबित होगी।
  • संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खतना 4 तरीके का हो सकता है- पूरी क्लिटोरिस को काट देना, योनी की सिलाई, छेदना या बींधना, क्लिटोरिस का कुछ हिस्सा काटना।

इंटरनेशनल डे फॉर जीरो टॉलरेंस’

  • संयुक्त राष्ट्र पॉपुलेशन फंड प्रोजेक्ट ने महिलाओं के खतना के खिलाफ मनाये जाने वाले इंटरनेशनल डे फॉर जीरो टॉलरेंस’ के अवसर पर एक आंकड़ा जारी किया है, जो ना सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि महिला अधिकारों की धज्जियां उड़ाता भी नजर आता है.
  • प्रोजेक्ट की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिवर्ष विश्वभर में 9 मिलियन महिलाओं का खतना होता है, जो वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 4.6 मिलियन हो जायेगा.
  • संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो जीटरस ने चेतावनी देते हुए आज कहा कि अगर कोई त्वरित कार्रवाई नहीं की गयी तो 2030 तक 68 मिलियन लड़कियां महिला जननांग के संक्रमण का शिकार हो सकती हैं.
  • उन्होंने कहा महिला जननांग को अवैज्ञानिक तरीके से काटे जाने का असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है और यह महिला अधिकारों का घोर उल्लघंन है.
  • संयुक्त राष्ट्र ने यह लक्ष्य बनाया है कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ वर्ष 2030 तक इस कुप्रथा को विश्वभर से समाप्त किया जाये.
  • दुनिया भर में लगभग 20 करोड़ महिलाओं और लड़कियों का खतना हुआ है.
  • माना जाता है कि अफ्रीका में हर साल तीस लाख लड़कियों पर इसका खतरा मंडरा रहा है.
  • तीस अफ्रीकी देशों, यमन, इराकी कुर्दिस्तान और इंडोनेशिया में महिला खतना ज्यादा चलन में है. वैसे भारत समेत कुछ अन्य एशियाई देशों में भी इसके मामले मिले हैं.
  • औद्योगिक देशों में बसी प्रवासी आबादी के बीच भी महिला खतना के मामले देखे गए हैं. यानि नए देश और समाज का हिस्सा बनने के बावजूद कुछ लोग अपनी पुरानी रीतियों को जारी रखे हुए हैं.
  • जिन देशों में लगभग सभी महिलाओं को खतना कराना पड़ता है, उनमें सोमालिया, जिबूती और गिनी शामिल हैं. ये तीनों ही देश अफ्रीकी महाद्वीप में हैं.
  • महिला खतना कई तरह का होता है. लेकिन इसमें आम तौर पर क्लिटोरिस समेत महिला के जननांग के बाहरी हिस्से को आंशिक या पूरी तरह हटाया जाता है. कई जगह योनि को सिल भी दिया जाता है.
  • लड़कियों का खतना शिशु अवस्था से लेकर 15 साल तक की उम्र के बीच होता है. आम तौर पर परिवार की महिलाएं ही इस काम को अंजाम देती हैं.
  • साधारण ब्लेड या किसी खास धारदार औजार के जरिए खतना किया जाता है. हालांकि मिस्र और इंडोनेशिया जैसे देशों में अब मेडिकल स्टाफ के जरिए महिलाओं का खतना कराने का चलन बढ़ा है.

खतना से जुड़े आंकड़े 

  • यूनिसेफ के आंकड़ों के अनुसार, दुनियाभर में हर साल बीस करोड़ से ज्यादा महिलाओं का खतना होता है।
  • इनमें से आधी महिलाएं सिर्फ इथियोपिया, मिस्र और इंडोनेशिया की होती हैं।
  • खतना होने वाली इन 20 करोड़ लड़कियों में से करीब 5 करोड़ बच्चियां 14 साल से कम उम्र की होती हैं।

धार्मिक आधार?

  • महिला खतने का चलन मुस्लिम और ईसाई समुदायों के अलावा कुछ स्थानीय धार्मिक समुदायों में भी है. आम तौर पर लोग समझते हैं कि धर्म के मुताबिक यह खतना जरूरी है लेकिन कुरान या बाइबिल में ऐसा कोई जिक्र नहीं है.

खतने का मकसद

  • माना जाता है कि महिला की यौन इच्छा को नियंत्रित करने के लिए उसका खतना किया जाता है. लेकिन इसके लिए धर्म, परंपरा या फिर साफ सफाई जैसे कई और कारण भी गिनाए जाते हैं.

विरोध की सजा

  • बहुत से लोग मानते हैं कि खतने के जरिए महिलाएं पवित्र होती हैं, इससे समुदाय में उनका मान बढ़ता है और ज्यादा कामेच्छा नहीं जगती. जो लड़कियां खतना नहीं करातीं, उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है.

खतने के खतरे

  • महिला खतने के कारण लंबे समय तक रहने वाला दर्द, मासिक धर्म से जुड़ी समस्याएं, पेशाब का संक्रमण और बांझपन जैसी समस्याएं हो सकती हैं. कई लड़कियों की ज्यादा खून बहने से मौत भी हो जाती है.
  • एक ही ब्लेड से कई महिलाओं का खतना किया जाता है, जिससे उन्हें योनी संक्रमण के अलावा बांझपन जैसी बीमारियां होने का खतरा होता है।
  • खतने के दौरान ज्यादा खून बहने से कई बार लड़की की मौत भी हो जाती है और दर्द सहन न कर पाने पर कई लड़कियां कोमा में भी चली जाती हैं।
  • खतने के कारण उस महिला को मां बनने के समय बहुत सी जटिलताओं का सामना करना पड़ सकता है.
  • खतने के कारण महिला को कई तरह की मानसिक समस्याएं और अवसाद भी हो सकता है.

कमजोर कानून

  • बहुत ही अफ्रीकी देशों में महिला खतने पर प्रतिबंध है. लेकिन अकसर इस कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जाता है.
  • माली, सिएरा लियोन और सूडान जैसे देशों में यह कानूनी है.

यूएन का प्रस्ताव

  • महिला खतने से कई अंतरराष्ट्रीय संधियों का उल्लंघन होता है.
  • 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने महिला खतने को खत्म करने के लिए एक प्रस्ताव स्वीकार किया था.

खफ्ज प्रथा’ या खतना कुप्रथा

  • लेकिन इस्लाम में अब भी कई कुप्रथाएं हैं जिसमें मुस्लिम महिलाओं का शारीरिक और मानसिक शोषण होता है। ‘महिलाओं का खतना’ या ‘खफ्ज प्रथा’ इस्लाम में एक पीड़ादायिक कुप्रथा है।
  • ‘महिलाओं का खतना’ या ‘खफ्ज प्रथा’ को भारत में संज्ञान में लाई एक मुस्लिम महिला मासूमा रानाल्वी। मासूमा रानाल्वी बोहरा समुदाय से आती है और शिया मुस्लिम महिला हैं।

भारत में बोहरा मुसलमानों के बीच मौजूद है यह परंपरा

  • भारत में बोहरा मुसलमानों के बीच यह रुढ़िवादी परंपरा कायम है. बोहरा मुसलमान भारत के गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में रहते हैं.
  • बोहरा मुसलमानों की कुल आबादी 10 लाख के आसपास है और यह समुदाय आर्थिक रूप से तो सशक्त है ही शिक्षित भी है, बावजूद इसके इस समुदाय में यह परंपरा व्याप्त है.
  • वर्ष 2015 में बोहरा समुदाय की एक महिला जेहरा पटवा ने अपनी तसवीर जारी कर इस परंपरा का विरोध किया था और बताया था कि किस तरह उन्हें इंग्लैंड से भारत लाकर उनका खतना किया गया था.

मुस्लिम महिला का PM को खुला खत, तीन तलाक के बाद महिला खतना कुप्रथा को रोकने की मांग

(22 अगस्त, 2017)

देश में चल रही तीन तलाक की बहस और सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बीच ही मुस्लिम महिलाओं ने खतने को लेकर भी आवाज उठाई हैं. इसी कड़ी में मासूमा रानाल्वी ने पीएम के नाम एक खुला ख़त लिखकर इस कुप्रथा को रोकने की मांग की है.

मासूमा बोहरा समुदाय से है. अपने खत में वह लिखती हैं- स्वतंत्रता दिवस पर आपने मुस्लिम महिलाओं के दुखों और कष्टों पर बात की थी. ट्रिपल तलाक को आपने महिला विरोधी कहा था, सुनकर बहुत अच्छा लगा था. हम औरतों को तब तक पूरी आज़ादी नहीं मिल सकती जब तक हमारा बलात्कार होता रहेगा, हमें संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहेगा.

ट्रिपलतलाक अन्याय है, पर इस देश की औरतों की सिर्फ़ यही एक समस्या नहीं है. मैं आपको औरतों के साथ होने वाले खतने के बारे में बताना चाहती हूं, जो छोटी बच्चियों के साथ किया जाता है.

ख़त के द्वारा आपका ध्यान इस भयानक प्रथा की तरफ़ खींचना चाहती हूं. बोहरा समुदाय में सालों से ‘ख़तना’ या ‘ख़फ्ज़’ प्रथा का पालन किया जा रहा है. बोहरा, शिया मुस्लिम हैं, जिनकी संख्या लगभग 2 मिलियन है और ये महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बसे हैं. मैं बताती हूं कि मेरे समुदाय में आज भी छोटी बच्चियों के साथ क्या होता है. जैसे ही कोई बच्ची 7 साल की हो जाती है, उसकी मां या दादीमां उसे एक दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती हैं. बच्ची को ये नहीं बताया जाता कि उसे कहां ले जाया जा रहा है या उसके साथ क्या होने वाला है. दाई या आया या वो डॉक्टर उसके प्राइवेट अंग को काट देते हैं. इस प्रथा का दर्द ताउम्र के लिए उस बच्ची के साथ रह जाता है. इस प्रथा का एकमात्र उद्देश्य है, बच्ची या महिला के यौन इच्छाओं को दबाना.

मासूमा के मुताबिक खतना महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकार का हनन है. महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव का ये सबसे बड़ा उदाहरण है. बच्चों के साथ ये अकसर होता है और ये उनके अधिकारों का भी हनन है. इस प्रथा से व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.’सैंकड़ों सालों से इस प्रथा का शांति से पालन किया जा रहा है और बोहरा समुदाय के बाहर बहुत कम लोग ही इस प्रथा के बारे में जानते होंगे.

‘WeSpeakOut On FGM’ कैंपेन

2015 में बोहरा समुदाय की कुछ महिलाओं ने एकजुट होकर ‘WeSpeakOut On FGM’ नाम से एक कैंपेन शुरू किया और यहां हमने आपस में अपनी दुख और कहानियां एक-दूसरे से कही. हमने ख़तना के खिलाफ़ एक जंग का ऐलान करने की ठानी. हमने अपने पादरी, सैदना मुफ़्फदल को इस प्रथा को रोकने के लिए कई ख़त लिखे, पर हमारी बात किसी ने नहीं सुनी.

ये प्रथा न सिर्फ़ आज भी चल रही है, बल्कि पादरी साहब ने एक पब्लिक प्रेस स्टेटमेंट में ये घोषणा भी कर दी कि 1400 साल से जो प्रथा चल रही है उसे किसी भी हालत में नहीं बदला जाएगा. 18 दिसंबर. 2014 में यूएन महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत पूरी दुनिया में खतने को बैन करने की बात कही गई. पीएमजी, एक बार पहले भी आपने कहा था कि संविधान के अनुसार, मुस्लिम औरतों और उनके अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है.

मुझे आपकी बातें सुनकर सुकून मिला कि मुस्लिम महिलाओं की हक की रक्षा करना भी सरकार का कर्त्वय है.आपने ये भा कहा था कि, लोकतंत्र में बातचीत ज़रूरी है.’ इसलिये मेरी आपसे दरख्वास्त है कि मेरी और मेरी बहनों की, जो FGM की शिकार हुईं हैं कि बात सुनी जाए. दिसंबर 2015 में हमने ‘WeSpeakOut On FGM’ नाम से Change.org पर एक कैंपन की शुरुआत की थी.

इसे बंद करने के समर्थन में हमें 9 हजार से ज़्यादा साइन मिल गए हैं. लेकिन अब तक सरकार की तरफ़ से हमें कोई जवाब नहीं मिला है. हमारे देश में सिर्फ़ बोहरा समुदाय में और केरल के कुछ समुदायों में ही इस प्रथा का पालन किया जाता है. हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और कुछ चीज़ें बदलनी ही चाहिए. मैं सरकार से ये दरख़्वास्त करती हूं कि जल्द से जल्द इस कुप्रथा को ख़त्म करने पर काम शुरू किया जाए. इस प्रथा को बैन करके बोहरा बेटी बचाना बहुत ज़रूरी है.

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