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नई शिक्षा नीति और महात्मा गांधी

atul kothari[अतुल कोठारी]। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को यदि भविष्य के आत्मनिर्भर भारत की पीठिका कही जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। आत्मनिर्भरता की संकल्पना हमारे देश में कोई नई बात नहीं है। महात्मा गांधी ने भी इसे अपने चिंतन और व्यवहार में समावेशित किया था। आत्मनिर्भरता या स्वावलंबन की संकल्पना गांधी जी की जीवन-दृष्टि का सार तत्त्व है। कोरोना संकट ने वैश्विक स्तर पर ‘आत्मनिर्भरता’ की संकल्पना को पुनः विमर्श के केन्द्र में ला दिया है। ऐसे में, भारत केन्द्रित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आना आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में एक सार्थक पहल है। इसमें समग्रता की दृष्टि का परिचय देते हुए व्यावसायिक शिक्षा, कौशल शिक्षा, हस्तकला, लोक विद्या इत्यादि के पाठ्यक्रम में स्थानीय व्यावसायिक ज्ञान के समावेशन और विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण एवं व्यक्तित्व के समग्र विकास पर बल देने की बातें कही गई हैं, जो कहीं-न-कहीं आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का ही संकेत है।

देश को आत्मनिर्भर बनाना है तो हमारे छात्रें-युवकों तथा गांवो को आत्मनिर्भर बनाना होगा, जिसका महत्त्वपूर्ण माध्यम शिक्षा ही हो सकती है। हम जिस प्रकार के नागरिक, समाज और राष्ट्र को बनाना चाहते हैं ठीक उसी के अनुरूप ही देश की शिक्षा का स्वरूप भी होना चाहिए। इस शिक्षा नीति के सही क्रियान्वयन के द्वारा छात्र केवल नौकरी के लिए कतार में नहीं खड़े होगें बल्कि अपने पैरो पर खड़े होने में सक्षम बनेंगे। महात्मा गांधी ने ‘‘हरिजन सेवक (10-11-1946) के अंक में ग्राम स्वराज के संदर्भ में लिखा था- गांवों की पुनर्स्थापना का कार्य कामचलाऊ नहीं बल्कि स्थायी होना चाहिए। उद्योग, हुनर, तदुरूस्ती और शिक्षा इन चारों का सुन्दर समन्वय करना चाहिए और वह नई तालीम में किया गया है। उन्होंने आगे कहा कि ‘‘मैं किसी उद्योग और शिक्षा को अलग नहीं मानूंगा, बल्कि उद्योग शिक्षा का जरिया है।’’

गांधी की नई तालीम का आज का स्वरूप नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति है। इस नीति में सैद्धातिक शिक्षा के साथ-साथ छात्रें के लिए व्यावसायिक शिक्षा, कौशल विकास (स्किल डेवलपमेंट), स्वास्थ्य शिक्षा आदि का समावेश किया गया है। छात्रें का माघ्यमिक स्तर से ही व्यावसायिक शिक्षा में एप्रेंटिशिप करने की बात भी जोड़ी गई है। इस नीति में वर्ष 2025 तक 50: छात्र व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त कर सकें ऐसा लक्ष्य भी रखा गया है। आत्मनिर्भरता का तात्पर्य है स्वयं पर निर्भर होना, आज हम भाषा-भूषा, खानपान, तकनीकी आदि अनेक बातों में अन्यों पर निर्भर हैं या दूसरो का अंधानुकरण कर रहे हैं। स्वयं पर निर्भरता का आधार है स्वदेशी, महात्मा गांधी ने स्वदेशी के संदर्भ में कहा था ‘‘स्वदेशी की भावना का अर्थ है हमारी वह भावना जो हमें दूर को छोड़कर अपने समीपवर्ती प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाता है। इसी प्रकार नई शिक्षा नीति में अनेक स्थान पर स्थानीय भाषा, तकनीक, कौशल, कला एवं कारीगरी आदि को प्राथमिकता देने की बात कही गई हैं।

महात्मा गांधी का मानना है कि ‘‘भारत की अधिकांश जनता की गरीबी का कारण यह है कि आर्थिक और औद्योगिक जीवन में हमने स्वदेशी के नियम का भंग किया है, वह आगे कहते है कि ‘‘स्वदेशी को मैं ऐसा धार्मिक सिद्धांत मानता हूँ, जिसका पालन सब लोगों को करना चाहिए।’’गांधी जी ने शिक्षा के महत्वपूर्ण तीन आयामों की बात कही थी। हैंड, हेेड एंड हार्ट अर्थात बालक हाथ से काम करना सीखें, उनकी बौद्धिक क्षमता का विकास हो तथा बालक संवेदनशील बने। इस नीति में व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। साथ ही बालक के व्यक्तित्व के समग्र विकास की बात को प्राथमिकता दी है और नैतिक मूल्य, संवैधानिक मूल्य आदि के शिक्षा में समावेश करने का प्रावधान किया गया है। एक प्रकार से गांधी जी के तीनों आग्रहों का इस नीति में भली-भांति समावेशन किया गया है।

गांधी जी ने अधिकार एवं कर्त्तव्य के संदर्भ में हरिजन सेवक के 06-07-1947 के अंक में लिखा था हर व्यक्ति अधिकारों पर जोर देने के बदले कर्त्तव्य अदा करें तो मनुष्य जाति में जल्दी ही व्यवस्था और अमन का राज्य कायम हो जाएगा। इस शिक्षा नीति में भी मौलिक अधिकारों के साथ-साथ बालकों को मौलिक कर्त्तव्य सिखाने पर बल दिया गया है। एक प्रकार से संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ संवैधानिक मूल्यों को पढ़ाने पर जोर दिया गया हैं। इस प्रकार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में महात्मा गांधी के विचारों का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।

प्रधानमंत्री ने शिक्षा नीति पर बोलते हुए कहा था कि यह सरकार की नहीं समाज की नीति है। वास्तव में इस नीति को समाज की नीति बनाना है तो सरकार एवं शिक्षा जगत के लोगों द्वारा देशव्यापी शिक्षा नीति के प्रचार-प्रचार हेतु संगोष्ठियां, परिचर्चाएं, वेबिनार आदि के आयोजन करके एक अभियान चलाना होगा, जिससे समाज के प्रत्येक वर्ग तक शिक्षा नीति की बात पहुंचने से परिणाम स्वरूप समाज की इस नीति के क्रियान्वयन में भी भूमिका सुनिश्चित की जा सकेगी। आवश्यकता है इस नीति के उचित क्रियान्वयन की। इस हेतु कई स्तर पर क्रियान्वयन की रणनीति बनाने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विद्यालयों के साथ-साथ प्रत्येक जिले स्तर पर समितियों का गठन करना चाहिए।

इन समितियों के द्वारा प्रत्येक स्तर पर विचार-विमर्श के माध्यम से क्रियान्वयन की रणनीति तैयार करनी होगी। इस क्रियान्वयन के संदर्भ में कुछ बातें तो सभी स्थानों पर समान होंगी, परंतु कुछ बातों का सम्यक सम्पादन स्थानीय परिस्थिति एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर करना होगा। स्थानीयता को इस शिक्षा नीति में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है ताकि व्यावसायिक शिक्षा और कौशल विकास से सम्बन्धित प्रावधानों को हर जिले और क्षेत्रें के स्तर पर आवश्यकताओं के अनुरूप क्रियान्वयन हो सके तथा जो स्थानीय कृषि, उद्योग और वहां की नागरिक आवश्यकताओं का सही संस्पर्श कर सके। इसके परिणाम स्वरूप हम आत्मनिर्भर भारत की ओर आगे बढ़ेंगे। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की संकल्पना, आर्थिक विकेन्द्रीकरण और स्वावलंबन के मूल्य में भी यही चिंता रही है।

(लेखक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के सचिव हैं) 

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