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नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी: संसद में क्या कहा, कैसे कहा….

modi rahulबीते शुक्रवार को लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया गया. इसके बाद से प्रस्ताव पर हुई राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी की रोचक बहस लगातार चर्चा में है. राजनीति के जानकार इस बहस से आगामी राजनीतिक गतिविधियों का अंदाजा लगा रहे हैं. राहुल गांधी के लिए जहां यह कहा जा रहा है कि उन्होंने 2019 के चुनाव में विपक्ष द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों की झलक दे दी है, वहीं मोदी सरकार की आक्रामकता कम होने और बचाव की मुद्रा में आकर भाषण देने की चर्चा भी जोरों पर है. इस बहस के राजनीतिक मतलबों को ज्यादा न भी पकड़ा जाए तो भी यह हमारे देश के दो सबसे बड़े नेताओं के बारे में कई जरूरी बातें बता जाती है. इसमें यह भी शामिल है कि इनकी राजनीति एक-दूसरे से कितनी अलग है. आइये जानने की कोशिश करते हैं कि संसद में राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी ने क्या और कैसे कहा और इससे भी ज्यादा इन दोनों ने एक-दूसरे को कैसे सुना!

राहुल गांधी ने अपने भाषण के दौरान इस बार जिस बात से सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, वह उनकी हिंदी है. बेहद सहजता से शुद्ध हिंदी के आसपास की भाषा बोलते हुए राहुल गांधी ने इस बार कुछ इस तरह से अपनी बात कही है कि न तो उनका मजाक बनाया जा सकता है और न ही यह शिकायत की जा सकती है कि आम लोगों को उनकी बातें नहीं समझ आई होंगी. इस भाषण में राहुल गांधी ने ‘जुमला स्ट्राइक’ और ‘चौकीदार नहीं भागीदार’ जैसे वर्डप्ले कर सरकार को घेरने की सफल कोशिश की, अमित शाह का नाम न लेने का निर्देश मिलने पर तुरंत उन्होंने ‘प्रधानमंत्री के मित्र के पुत्र’ कहकर अपने भाषण की विशिष्टता और रोचकता बनाए रखी. तत्परता से सुधारा गया उनका यह कथन उनकी हिंदी के बनावटी न होने की बात कहता है.

मां सोनिया गांधी के विदेशी मूल का होने और अंग्रेजी पर हिंदी से ज्यादा अधिकार होने के चलते राहुल गांधी की छवि भी कई लोगों के मन में एक अर्धविदेशी व्यक्ति की रही है. खराब हिंदी के अलावा, भाषण के दौरान जुबान फिसलने के कारण होने वाली गलतियों के लिए भी वे अक्सर आलोचना के शिकार होते रहे हैं. लेकिन इस भाषण के जरिये कम से कम भाषा के मामले में उन पर तंज करने वालों को उन्होंने पूरी तरह से चुप कर दिया है. इसे देते समय राहुल गांधी ने न केवल किसी अंग्रजीदां भारतीय से अच्छी हिंदी बोली बल्कि इस मामले में वे कई बार आम हिंदीभाषियों और यहां तक कि हिंदी के अच्छे जानकार माने जाने वाले पत्रकार सरीखे पेशेवरों से भी आगे जाते दिखे. और अपने भाषण के दौरान उन्होंने किसी अर्थ का अनर्थ करने वाला कोई ब्लंडर भी नहीं किया.

नरेंद्र मोदी की बात करें तो उनकी छवि हमेशा हिंदी बोलने वाले नेता की रही है और यह सर्वमान्य है कि अग्रेजी वे राहुल गांधी से अच्छी नहीं बोल सकते. लेकिन अगर सिर्फ उनके हिंदी बोलने की बात करें तो वह भी इस बार राहुल गांधी की हिंदी के सामने फीकी नजर आ रही थी. नरेंद्र मोदी जो हिंदी बोलते हैं, उस पर गुजराती का प्रभाव साफ नजर आता है. शब्दों का उच्चारण करते हुए जरूरत से ज्यादा अनुस्वार (अं की मात्रा) का प्रयोग करने के कारण सोशल मीडिया पर उनकी मिमिक्री भी कुछ इसी तरह की जाती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदी प्रभावित करने वाली होती है, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता. लेकिन जब भी वे इसे विशिष्ट बनाने के लिए उर्दू का इस्तेमाल करते हैं, बात बनने की बजाय बिगड़ जाती है.

लहज़ा

अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी का लहजा विपक्ष के मिजाज के साथ एकदम सटीक बैठने वाला रहा. उनकी आवाज का तेज-धीमा होना, जरूरत पड़ने पर एकदम फिल्मी अंदाज में रुककर या जोर देकर अपनी बात कहना, इन बातों को वजनदार बनाने वाला था. आमतौर पर नाटकीयता से दूर रहने वाले राहुल गांधी ने इस बार जमकर इसका इस्तेमाल किया. यहां तक कि अपने भाषण के आखिर में वे जाकर प्रधानमंत्री को गले लगाकर भी आ गए. गांधी के इस अंदाज से खुद दूसरों को जब-तब गले लगाने वाले पीएम मोदी भी अचकचा गए. राहुल गांधी ने इस बार कुछ फिल्मी अंदाज में आक्रामक होते हुए अपना भाषण दिया.

कई लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख में इस बार पहले से थोड़ी नरमी थी. लेकिन यह साफ-साफ यह कह पाना मुश्किल है कि यह नरमी रक्षात्मक होने के कारण आई या जवाबदेही के बोझ से. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की शुरूआत तो जरा मंद रही लेकिन सरकार की उपलब्धियां गिनवाते हुए वे पूरी स्टाइल और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात कहते नजर आए. संसद में बोलते हुए प्रधानमंत्री को सुनकर यह भी साफ-साफ कहा जा सकता है कि उनकी आक्रामकता, व्यंग्य से भरी हुई थी. नाटकीयता प्रधानमंत्री मोदी का खास गुण है, जो अविश्वास प्रस्ताव पर दिये उनके भाषण में भी जमकर देखने को मिली.

क्या बोला

कभी जुबान फिसलने के कारण तो कभी गलत तथ्य देने के चलते यह माना जाने लगा था कि राहुल गांधी सोच-समझकर बातें नहीं करते हैं. उन्हें मिलने वाले निकनेम भी इसी छवि का एक उदाहरण हैं. इस बार राहुल गांधी ने अपनी स्पीच में सरकार की जुमलेबाजी, किसानी, रोजगार, भ्रष्टाचार और महिलाओं की सुरक्षा जैसे शाश्वत कहे जा सकने वाले मुद्दे उठाए जिन्हें बाद में विपक्ष के कई और नेताओं ने अपने-अपने तरीके से उठाया. जानकारों की मानें तो यह बताता है कि आने वाले चुनावों में कांग्रेस या उसकी कोशिशों से अगर बना तो उस महागठबंधन के मुद्दे क्या होने वाले हैं.

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में असली सवालों का जवाब देने से ज्यादा कांग्रेस और राहुल गांधी को अपने निशाने पर रखा. इनमें से कुछ बातें वे पहले भी बोलते रहे हैं. उन्होंने कर्नाटक चुनाव में भी राहुल गांधी का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि उनकी हैसियत राहुल गांधी के सामने बैठने की नहीं है क्योंकि वे कामदार लोगों में से हैं और राहुल गांधी नामदार हैं. संसद में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने अपनी योजनाओं और घोषणाओं का ब्यौरा भी दिया लेकिन वह ऊपर-ऊपर से छूकर गुजरने सरीखा ही रहा. फिर भी प्रधानमंत्री को न पसंद करने वाले व्यक्तियों को भी उनका यह भाषण ‘जुमलों’ से ज्यादा तथ्यों पर आधारित लगा.

सरकार, उसे चाहने वाले और उनसे सवाल पूछने वालों के बीच होने वाली अब तक की सियासी बयानबाजियों की खासियत यही रही थी कि पूछने वाला जब भी तथ्यों की बात करता, सरकार और उसके समर्थक उसका जवाब देने के बजाय अक्सर कोई ऐसी तान छेड़ देते कि पूछने वाला ही रक्षात्मक हो जाता. यहां पर कुछ-कुछ उल्टा हो गया. राहुल गांधी बिना डरे, पूरे आत्मविश्वास के साथ कुछ ऐसे आरोप भी लगा रहे थे जो पूरी तरह से तथ्यों पर आधारित नहीं थे. और कई लोगों के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस वजह से अपनी तरह की बातें करते हुए भी तथ्यों का सहारा लेना पड़ रहा था.

बॉडी लैंग्वेज

कर्नाटक चुनाव के वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को 15 बिना बिना कागज देखे बोलने की चुनौती दी थी. और आधा सर झुकाकर कागज से पढ़-पढ़कर बोलने के बजाय राहुल गांधी ने इस बार बगैर पढ़े खुलकर अपना 45 मिनट लंबा भाषण दिया. उनके हाथ, उनके बोलने के साथ चलते नजर आ रहे थे. अपनी बात कहने के लिए उंगलियों, आंखों और आवाज के उतार-चढ़ाव का भरपूर इस्तेमाल करने वाले राहुल गांधी अपने अंग-अंग से बता रहे थे कि वे आज मैदान मार लेने की तैयारी से आए हैं. बीते कुछ समय से राहुल गांधी यह आत्मविश्वास दिखाने लगे हैं कि वे जो कह रहे हैं, सही कह रहे हैं. इसके साथ ही वे अपने आपको मर्यादा के दायरे में रहकर बात और वार करने वाला दिखाने की कोशिश भी करते रहते हैं. अपने पूरे भाषण और प्रधानमंत्री को गले लगाने के बाद राहुल गांधी अपने किसी सहयोगी की बात का जवाब देते वक्त आंख मारते हुए भी दिखाई दिये. इस एक हरकत के चलते उनके भाषण की गंभीरता कटघरे में खड़ी हो गई. हालांकि यह बात कोई नहीं जानता कि उनका कि ऐसा उन्होंने क्यों किया था लेकिन विपक्ष और समर्थक इसके जो चाहें मतलब निकालने को स्वतंत्र हैं. यहां तक कि प्रधानमंत्री ने भी अपने भाषण में इसका जिक्र किया.

उधर राहुल गांधी के उलट अपने भाषण के दौरान नरेंद्र मोदी कई बार कागजों की तरफ देखते हुए नजर आए. यह शायद इसलिए भी था क्योंकि अपने भाषण में उन्होंने तमाम योजनाओं का जिक्र किया और उनके भाषण का एक बड़ा हिस्सा शायद राहुल गांधी के भाषण की प्रतिक्रिया में तैयार किया गया था. इसलिए उसकी तैयारी के लिए प्रधानमंत्री के पास ज्यादा समय नहीं रहा होगा. लेकिन फिर भी इसमें कोई दोराय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा आत्मविश्वास से लबरेज नजर आते हैं. शुक्रवार को दिए अपने भाषण के समय वे कई बार किसी आम आदमी की तरह कमर पर हाथ टिकाकर विरोधियों को चिढ़ाते और उंगली दिखाते नजर आए. इस दौरान कई बार उनके शब्दों, भंगिमाओं और शारीरिक क्रियाओं से दंभ जैसी नकारात्मक भावनाएं भी देखने को मिलीं जो कई बार उनकी सही और सार्थक बातों पर भी हावी होती लगीं. अपनी शारीरिक सक्रियता के जरिए आक्रामकता जताने में नरेंद्र मोदी अपने से आधी उम्र के नेताओं को भी बराबर की टक्कर देते लगते हैं. लेकिन इस भाषण में उनकी बॉडीलैंग्वेज, खासकर शुरूआत, इस बात का इशारा दे रही थी कि मोदी सरकार थोड़ी रक्षात्मक मुद्रा में आ चुकी है.

प्रतिक्रिया

अगर यहां पर भी राहुल गांधी का बात पहले करें तो वे प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान ज्यादा असामान्य नजर नहीं आए. उऩ हिस्सों में, जहां पर नरेंद्र मोदी लगातार कांग्रेस पर हमला कर रहे थे या खुद को गले लगाने के लिए राहुल गांधी का मजाक बना रहे थे, वहां पर राहुल गांधी के चेहरे पर ‘ये क्या बात हुई’ वाले एक्सप्रेशन देखे जा सकते हैं. प्रधानमंत्री जब सरकार की उपलब्धियां गिनवा रहे थे तब उनके चेहरे पर असहमति के भाव देखे जा सकते थे. कुल मिलाकर राहुल गांधी कुछ मौकों पर रिएक्शन देने के अलावा बाकी समय गंभीरता से प्रधानमंत्री की बात सुनते हुए ही दिखाई दिए.

इस मामले में प्रधानमंत्री मोदी का व्यवहार जरूर अगंभीर कहा जा सकता है. राहुल गांधी की बहस के दौरान प्रधानमंत्री उनकी बातें सुन तो पूरी गंभीरता से रहे थे. लेकिन किन्ही गैरजरूरी बातों पर जरूरत से ज्यादा हंसते दिखाई पड़ रहे थे. राहुल गांधी ने जुबान फिसलने के चलते एक बार ‘बाहर’ को ‘बार’ जैसा कुछ बोल दिया तो उनकी इस बात पर प्रधानमंत्री करीब आधा मिनट तक हंसते रहे. हालांकि संसद में और किसी को राहुल की इस बात पर कम से कम उनके हंसने तक इतनी हंसी नहीं आई. ऐसा ही कई और मौकों पर भी हुआ. उनके चाहने वाले इसे उनकी प्राकृतिक प्रतिक्रिया कह सकते हैं और उन्हें न चाहने वाले इसे दंभ या खिसियानी हंसी बता सकते हैं. कुछ लोगों को उऩकी हंसी राहुल गांधी पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाकर उनके भाषण को पटरी से उतारने की कोशिश भी लग सकती है.

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