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एनयूजे आई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में हुआ पत्रकारों के मुदृों पर मंथन

nuji meeting oneउत्तराखंड। ऋृषिकेश स्थित परमार्थ निकेतन में हुई नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट इंडिया एनयूजे आई की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में देश भर से जुटे पत्रकार ने भारत सरकार से तीसरे प्रेस—मीडिया आयोग के गठन की मांग की है। एनयूजे आई कार्यकारिणी ने कहा है कि मीडिया अभिव्यक्ति का स्वतंत्र और खुला माध्यम न रह कर निहित स्वार्थ सिद्धि का साधन बनता जा रहा है। लिहाजा तीसरे प्रेस—मीडिया आयोग समय की मांग है। इस संबंध में कार्यकारिणी में एक प्रस्ताव पारित किया गया। तीसरे मीडिया आयोग के गठन के अलावा पत्रकारों के पेंशन,पत्रकार सुरक्षा कानून और वेजबोर्ड के क्रियावंयन के लिए भी सरकार से मांग की गई। लघु मझोले अखबारों के आगे अस्तित्व का संकट का मुदृा भी कार्यकारिणी की बैठक में उठा। बैठक में विभिन्न nuj meetinh twoराज्यों के सौ से अधिक पत्रकार ने भाग लिया। बैइक में यह भी तय हुआ कि कि तीसरे प्रेस—मीडिया आयोग के गठन की मांग को लेकर एनयजे आई और उसकी प्रदेश इकाईयां राष्ट्रव्यापी अभियान चलाएंगी और जनप्रतिनिधियों को तीसरे प्रेस आयोग की आवश्यकता से अवगत कराएंगी।

पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है। राजनीतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक और आर्थिक विकास में मीडिया की महती भूमिका को देखते हुए हर लोकत्रांत्रिक समाज में स्वतंत्र,निष्पक्षा एवं जीवंत प्रेस को मान्यता दी जाती है, उसके संरक्षण और प्रोत्साहन के कानूनी और दूसरे उपाय किए जाते हैं। प्रेस या nuj 4मीडिया की स्वतंत्रता की गारंटी तभी हो सकती है जबकि उसका संचालन करने वाले और उसमें जुड़े संपादक, पत्रकार और संवाददाता अपने दायित्व व धर्म का निवाह करने को पूरी तरह स्वतंत्र हों। प्रेस व मीडिया के सामने इन चुनौतियोें को समझने तथा उनके समाधान के रास्ते निकालने के लिए इसके संचार व परिचालन के स्वरूप तथा इसमें समय समय पर कानूनी, प्रौद्योगिकीय और आर्थिक कारणों से होने वाले बदलावों का अध्ययन-विश्लेषण जरूरी है। इस प्रसंग में मीडियाकर्मियों की कार्य की दशाओं को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। पत्रकारों के कार्य की दशाओं का अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से चोली दामन का संबंध है। स्वतंत्र रूप से कार्य के अनुकूल दशा के बिना प्रेस की स्वतंत्रता की बात का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रहता। इसका सीधा संबंध लोकतंत्र की गुणवत्ता से भी है।

nuj meetinh 3स्वाधीनता के बाद देश के विकास में प्रेस की भूमिका के महत्व को समझते हुए इसकी स्थिति व अवस्था तथा श्रमजीवी पत्रकारों की कार्य की दशाओं की जांच पड़ताल कर उसकी बेहतरी के उपाय सुझाने के लिए सरकार की ओर से दो आयोग गठित किए जा चुके हैं। पहला आयोग न्यायमूर्ति राजाध्यक्ष की अध्यक्षता में 1950 के दशक के प्रारंभ में बना।दूसरे का गठन आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार ने मई 1978 में गठित किया था। इसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति पीके गोस्वामी थे। मोरारजी देसाई सरकार के पतन के बाद न्यायमूर्ति गोस्वामी ने परंपरा के अनुसार इस्तीफा दे दिया था। बाद में पुनः सत्ता र्में आइं इंदिरा गांधी की सरकार ने 1980 में न्यायमूर्ति केके मैथ्यू के नेतृत्व में पूरा nuj oneआयोग ही बदल दिया । मैथ्यू आयोग ने 1982 में आपनी रपट दी। प्रथम प्रेस आयोग ने प्रेस की स्वतंत्रता,पत्रकारिता के मानकों को उूंचा रखने की व्यवस्था, प्रेस के स्वामित्व के स्वरूप,भाषायी और क्षेत्रीय अखबारों के प्रोत्साहन के तरीकों आदि पर विचार कर 1954 में प्रस्तुत अपनी रपट में बहुत सी महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं। भारतीय प्रेस परिषद,श्रमजीवी पत्रकार अधिनियम और समाचार पत्रों के महापंजीयक की स्थापना जैसे अनेक सुझाव और सिफारिशें प्रथम प्रेस आयोग की महती उपलब्धियां हैं।

पहले प्रेस अयोग की रपट को भारतीय मीडिया का बाइबल‘ कह कर उसकी सराहना की गयी थी। इसके विपरीत दूसरे प्रेस आयोग की सिफारिशों ने लोगों को निराश किया। आयोग ने बदलते हालात में प्रेस और मीडियाकर्मियां की स्वतंत्रता के समक्ष नयी उभरती चुनौतियों की एक तरह से अनदेखी कर दी। यह तय है कि 1954 की nuj 5परिस्थितियां 1982 तक आते आते बिल्कुल बदल गयी थीं। इसी तरह 1982 पर विचार करें तो 1995 एक नये युग का सूत्रपात कराता दिखेगा। बाजार और प्रौद्यागिकीय परिवर्तनों से उत्पन्न युगांतकारी बदलावों के साथ साथ मीडिया के स्वरूप और स्वामित्व में पहले से अधिक बदलाव आ गए। व्यावसायिक हितों में टकराव का मुद्दा पहले की तरह या उससे भी कहीं अधिक गंभीर हो कर खड़ा हुआ है। आजदी के समय पत्र पत्रिकाओं की संख्या 6000 के करीब थी जो बढ़ कर 1,10,000 से भी अधिक हो गयी है। वीडियो समाचार पत्रिका से शुरू हुए निजी टीवी कार्यक्रमों के प्रसार आज केबल टीवी, उपग्रहण टीवी से होते हुए जिजिटल टीवी तक पहुंच चुकी है। आज तीसरे प्रेस आयोग या मीडिया आयोग का गठन बहुत जरूरी। तीसरे प्रेस व मीडिया आयोग कोे प्रिंट के अलावा , टीवी, रेडियो और डिजिटल तथा सोसल मीडिया, इन सब का अध्यययन एवं विश्लेषण कर इनके लिए यथोचित मानकों और नियमों एवं नयी मार्गदर्शक एवं अपीलीय संस्थाओं की स्थापना की सिफारिशें और सुझाव प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी दी जा सकती है। नया मीडिया कमीशन इस लिए भी जरूरी है क्योंकि मीडिया अभिव्यक्ति का स्वतंत्र और खुला माध्यम न रह कर निहित स्वार्थ सिद्धि का साधन बनता जा रहा है।

मीडिया घरानों में संपादक की स्थिति और हैसियत बदल गयी है।पत्रकारों के काम की दशाओं में आज भारी अंतर आ गया है। नयी नयी प्रौद्योगिकी के आने से वे एक से अधिक प्रकार के काम करने लगे हैं। इस सबसे बढ़ कर यह हुआ है कि अखबारी कंपनियों ने वर्किग जर्नलिस्ट एक्ट के प्रावधानों को किनारे लगा दिया है। इनकी भर्तियों में ठेका व्यवस्था का बोलबाला है और ठेके पर रखे गए पत्रकारों की नौकरी को किसी प्रकार का काूननी संरक्षण नहीं रह गया है। उनसे यूनियन में शामिल न होने का गैरकाूननी बांड भरवाया जाता है। मीडिया प्रतिष्ठानों में अब ज्यादातर भर्तियां डिजिटल संस्करणों के लिए है और उनमें काम करने वालों की स्थिति कानूनी दृष्टि से निरीह है। कर्मचारियों के वेतनमान में संशोधन पर मजीठिया वेतन आयोग की सिफारिशों की ज्यादातर अखबारों ने अनदेखी कर दी है। वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट में संशोधन कर के टीवी, रेडियो, और डिजिटल तथा मोबाइल प्रत्रकारिता:मोजोः के कर्मियों को इसके दायरे में लाना समय की मांग है।

वर्ष 1991-92 के उदारीकरण के बाद बाजार का स्वरूप बदल गया। 1915 में मोबाइल फोन और इंटरनेट ने आ कर मीडिया के पूरे परिदृश्य को बदल दिया। उससे पहले जहां टीवी ओर रेडियो पर सरकार का एकाधिकार था, आज 450 से अधिक निजी टीवी समाचार चैनलों और सैकड़ों की संख्या में एफएम रेडियो स्टेशनों को लाइसेंस मिला हुआ है।इलेक्ट्रानिक व नया मीडिया बेलगाम घोडा बन गया। गंभीर विषय यह है कि पूरा टीवी/डिजिटल बिना किसी नियामकीय व्यवस्था के चल रहा है। इन्हें सरकार लाइसेंस देती है। इस तरह वे सरकार के सीधे नियंत्रण में हैं। कोई ऐसी स्वतंत्र नियामकीय संस्था नहीं है जो इन्हें लाइसेंस दे सके या इनका पंजीकरण और विनियमन करे। केबल टीवी नेटवर्क रेग्यूलेशन अधिनियम के तहत कोई मजिस्ट्रेट उनकी मशीन उपकरण जब्त कर सकता है। 1978 के प्रसारण विधेयक में भारतीय प्रसारण प्राधिकरण नाम से एक स्वायत्त निकाय बनाने का प्रस्ताव किया गया था। यह सरकार से अलग होता और प्राइवेट समचार एवं रेडियो चैनलों के लिए लाइसेंसिंग एजेंसी का काम करता। विधेयक में अपीलीय निर्णय की व्यवस्था के लिए भी प्रावधान प्रस्तावित थे। इस विधेयक में एक मीडिया कंपनी की दूसरी मीडिया कंपनी में हिस्सेदारी के नियमन एवं नियंत्रण के भी प्रस्ताव किए गए थे। मालिकान के विरोध के चलते यह विधेयक आज तक सिरे नहीं चढ़ सका है।

लघु मझोले अखबारों के आगे अस्तित्व का संकट

बाजार के बदले हालात में लघु एवं मझोले समाचार पत्रों के समक्ष अस्तित्व का संकट आ गया है। इनके लिए अवसरों की तलाश और प्रोत्साहन के नए उपाय करने की जरूरत महसूस की जा रही है।संपादक के अधिकार और गरिमा का हनन:
संपादकों के अधिकारों का हनन प्रेस की स्वतंत्रता को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। प्रेस एवं पुस्तक पंजीकरण अधिनियम में संपादक की परिभाषा दी गयी है। संपादक को संपादकीय मामलों में सार्वभौमिक अधिकार दिया गया है। यह बात पत्र पत्रिका में प्रकाशित हर प्रकार की सामग्री पर लागू होती है। इसमें समाचार व लेख के साथ साथ विज्ञापन भी आते हैं। कई मामलों में स्पष्ट व्यवस्था की जरूरतः पहले प्रेस आयोग की तरह दूसरे आयोग ने भी ऐसे संसदीय विशेषाधिकारों को संहिताद्ध किए जाने की सिफारिश की थी जो प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं। आयोग ने 1967 की विशेषाधिकार समिति की सिफारिशों को रपट में नत्थी कर दिया था। उसके बाद 1997 में एक अन्य समिति विषेशाधिकार उल्लंघन के मामलों में जेल की सजा की जगह केवल जुर्माना लगाने की सिफारिश कर चुकी है। दूसरे आयोग ने जीवन तथा वैयक्तिक स्वतंत्रता की गारंटी देने वाले अनुच्छेद 21 के तहत विधायी कार्रवाई के विरुद्ध संरक्षण के बारे में भी कोई सिफारिश नहीं की।

निजता के अधिकार पर उच्चतम न्यायालय के 25 अगस्त 2017 के निर्णय का प्रेस और मीडिया के काम में नयी चुनौतियां आ सकती है क्यों की डाटा सुरक्षा, धर्म परिवर्तन, भोजन चुनने की स्वतंत्रता तथा समलैंगिक विवाह जैसे क्षेत्र भी इसमें आ सकते हैं। संसद की कार्यवाही से हटाई गयी टिप्पणियों के प्रकाशन के विरुद्ध कार्रवाई भी प्रेस व मीडिया के सामाने एक ज्वलंत मुद्दा है। प्रौद्योगिकी में बदलाव के बाद तो यह और भी गंभीर हो गया है। दूूसरे प्रेस आयोग अदलात की अवमानना संबंधी कानून में बदाव की सिफारिश की थी कि सही और सार्वजनिक हित में प्रकाशित समाचारों व टिप्पणियों पर अवमानना का मामला न चलाया जा सके। दूसरे आयोग ने ‘‘निजता के अधिकार का अशोभनीय अतिक्रमण ‘ के मामलों को प्रेस परिषद को भेजने की व्यवस्था किए जाने की सिफारिश की थी।

ये ऐसे कुछ ज्वलंत विषय हैं जो भारत में प्रेस और मीडिया के स्तर को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। इसका प्रभाव हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली और प्रक्रिया पर पड़ रहा है। चुनावों के दौरान पैसा लेकर रपट प्रकाशित करने की शिकायतें, विज्ञापन को खबर के रूप में प्रकाशित करना, कंपनियों की खबर प्रकाशित करने के लिए कमर्शियल समझौते करना तथा ब्रांड प्रोमोशन के लिए नेताओं और अधिकारियों के साथ नजदीकियां बिठाना ये सब बातें भारतीय प्रेस और मीडिया की गुणवत्ता व स्तर में गिरावट का संकेत देती है। देश ने देखा है कि संविधान की व्यवस्थाओं और सुप्रीम कोर्ट की प्रति स्थापनाओं के बाद भी 1976 में देश में आपातकाल लागू कर दिया गया और अभिव्यक्ति की आजादी और अन्य मौलिक अधिकार छीन लिए गए। देश के मीडिया के लिए आज उस तरह का बाहरी खतरा नहीं लगता पर मीडिया की अपनी आंतरिक कमजोरी और गिरावट संकट का कारण जरूर बन सकता है। मीडिया जैसे महत्वपूर्ण अंक के अंदर के हालात का अध्ययन करने और उसे मजबूत बनाने के सुझाव के लिए नए तीसरा आयोग का गठन जितना शीघ्र गठित हो,देश के लिए उतना ही अच्छा होगा।एनयूजे की यह राष्ट्रीय कार्यकारिणी सरकार से तीसरे प्रेस आयोग के गठन की मांग करती थी। साथ ही इसके गठन के लिए एक राष्ट्र व्यापी अभियान चलाने का भी संकल्प लेती है।

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